डरी हुई सरकार नागरिकों की कमाई कम करने के हर संभव उपाय कर रही है। दूसरी ओर आरएसएस और पीएम केयर्स के मामले में उसके तर्क अनूठे हैं। अपराध तो देसी पैसे से भी हो ही रहे हैं या अपराधी जो ठग-लूट रहे हैं उसे रोकना ज्यादा जरूरी नहीं है? अपराध तो ठगे-लूटे और किसी भी तरह कमाए गए पैसे या कमीशन से किया जा सकता है। बाकी को रोकने पर गंभीरता क्यों नहीं? पैसे कमाना और दूसरों को कमाने नहीं देना ही इस सरकार का एकमात्र लक्ष्य लगता है।
संजय कुमार सिंह
केंद्र सरकार ने विदेशी चंदा या दान से संबंधित नियम अचानक सख्त कर दिए हैं। इस कारण देश में समाज सेवा से लेकर रोजगार तक पर असर पड़ेगा। सरकार जब समाज सेवा के बहुत से काम नहीं कर पा रही है, जरूरत है लोग करने के लिए तैयार हैं तब विदेशी चंदे पर रोक बेमानी है। अगर बहुत जरूरी हो तो भी उसके प्रभावों पर विचार किया जाना चाहिए और जहां जरूरी हो विकल्प मुहैया कराया जाना चाहिए। पर सरकार एकतरफा कार्रवाई करती जा रही है। मीडिया में ही चर्चा नहीं है तो कोई विरोध क्या करेगा। मुझे लगता है कि डरी हुई और कमजोर सरकार विरोध को कुचलने के लिए अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है। आज यह खबर मेरे 10 अखबारों में सिर्फ द हिन्दू में लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर दो कॉलम की खबर है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सिंगल कॉलम की खबर है। मुझे लगता है कि यह बड़ा मामला है क्योंकि नागरिकों को सरकार का विरोध करने का पूरा अधिकार है और सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं है जैसा इस सरकार ने बना दिया है। 2014 से पहले तक यह विरोध मीडिया के सहारे चलता था लेकिन अब सरकार ने मीडिया को पूरी तरह गुलाम बना लिया है। जो स्वतंत्र हैं उनसे पूरे देश को कवर नहीं किया जा सकता है। दूसरे, सरकारी और प्रचारक मीडिया दुष्प्रचार भी कर रहे हैं। सरकार ने विपक्ष को भी कमजोर किया ही है। इसलिए यह मुद्दा और गंभीर हो जाता है। इसे समझने से पहले आज के अखबारों की लीड देख लें। हिन्दी अखबारों में अंमर उजाला की लीड का शीर्षक है, चढ़ावा चोरी और कमीशन खोरी के सुबूत, एफआईआर की सिफारिश। मंदिर के पैसों की चोरी के इस मामले में सरकार पैसों के दुरुपयोग के प्रति निश्चिंत लगती है। गुजरात की अनाम सी पार्टियों के पास 4000 करोड़ से ज्यादा होने के मामले में भी किसी कार्रवाई की खबर नहीं है। दैनिक भास्कर की लीड सीयूईटी का परिणाम है। खबर के अनुसार 100 प्रतिशत पाने वाले 20 प्रतिशत बढ़ गए हैं। टॉपर भाजपा नेता की बेटी देवीना गहलौत है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, व्यापार समझौते को नया रूप देने पर भारत-अमरीका की बातचीत। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, भवानीपुर सीट का रिकार्ड सुरक्षित रखें। अंग्रेजी अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, टैक्सी वाले ने 10 साल की लड़की का अपहरण किया, बलात्कार करके हत्या कर दी। इंडियन एक्सप्रेस की लीड मौसम की खबर है। सरकार के हवाले से शीर्षक है, अभी तक 43 प्रतिशत बारिश कम हुई, खरीफ की फसल प्रभावित होने की आशंका है। दि एशियन एज और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड विदेशी खबरें हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, न्यूक्लियर जांच और होर्मुज को लेकर अमेरिका-ईरान में मतभेद; निकासी शुरू होगी। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, टैरिफ बदलने की खबरों के बीच भारत और अमेरिका ने व्यापार करार पर फिर से विचार किया। द टेलीग्राफ में बंगाल के बजट के बाद मुख्यमंत्री सुवेन्दू अधिकारी की घोषणा है कि वे गलत ढंग से पैसे कमानों वालों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे ऐसे पैसे से जुटाई गई संपत्ति भी जब्त होगी। कुल मिलाकर, सरकार विपक्षियों को आर्थिक रूप से कमजोर करने में लगी हुई है।
आइए, समझें कैसे और क्यों? – मोदी सरकार ने इससे पहले 2020 में एफसीआरए कानून में सबसे बड़ा बदलाव किया था। उससे पहले भी लाइसेंस नवीनीकरण, रिटर्न दाखिल करने और अनुपालन की जांच कड़ी की गई थी। बड़े पैमाने पर लाइसेंस की समीक्षा की गई। हजारों संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई मुख्यतः वार्षिक रिटर्न न भरने, खातों में गड़बड़ी या अन्य अनुपालन उल्लंघनों के आधार पर हुई। इसी अवधि में बड़ी संख्या में एनजीओ के लाइसेंस रद्द हुए या नवीनीकरण नहीं हुआ। सरकार का तर्क था कि बड़ी संख्या में संस्थाएं केवल कागज पर मौजूद थीं या नियमों का पालन नहीं कर रही थीं। आलोचकों का कहना था कि कार्रवाई का दायरा बहुत व्यापक था। सितंबर 2020 में एफसीआरए (संशोधन) अधिनियम 2020 अभी तक का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। इसके तहत विदेशी धन दूसरे एनजीओ को देने का रास्ता लगभग बंद कर दिया गया। 29 सितंबर 2020 से पुरानी व्यवस्था समाप्त कर दी गई और विदेशी चंदे के हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यही नहीं, प्रशासनिक खर्च सीमा 50% से घटाकर 20% कर दी गई। कायदे से इसकी चिन्ता चंदा देने वाले को करनी चाहिए पर भारत सरकार कर रही थी। इसका प्रभाव शोध संस्थानों, नेटवर्क आधारित संगठनों, प्रशिक्षण संस्थाओं और नीति-अध्ययन संस्थानों के संचालन पर पड़ा। नियमों को सख्त करते हुए भारतीय स्टेट बैंक की नई दिल्ली शाखा में एफसीआरए खाता होना अनिवार्य कर दिया गया। सरकार ने इसे निगरानी और ट्रैकिंग आसान बनाने के लिए आवश्यक बताया। लेकिन देश भर की संस्थाओं के लिए यह कितना मुश्किल हो गया इसकी परवाह नहीं की जबकि इससे एनजीओ चलाने वाले और 20 प्रतिशत दान का इस्तेमाल अपने वेतन भत्तों के मद में करने वालों के भी बेरोजगार होने का खतरा खड़ा हो गया। मतदान के लिए आधार मान्य नहीं है लेकिन विदेशी चंदे के लिए जरूरी है। पंजीकरण, नवीनीकरण और अनुमति के लिए प्रमुख पदाधिकारियों के आधार विवरण अनिवार्य कर दिए गए। “लोक सेवकों” पर भी रोक लगा दी गई और उन्हें विदेशी योगदान प्राप्त करने वालों की निषिद्ध श्रेणी में जोड़ा गया। निलंबन अवधि बढ़ा दी गई। इससे जांच के दौरान संस्था की गतिविधियों पर अधिक समय तक रोक लगी रह सकती है।
2021–2023: नवीनीकरण प्रक्रिया सख्त कर दी गई। इन वर्षों में बड़ी संख्या में एनजीओ का नवीनीकरण लंबित रहा या अस्वीकार हुआ। सरकार का कहना था कि प्रत्येक संस्था की विस्तृत जांच की जा रही है। आलोचकों का आरोप था कि प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत और धीमी हो गई। अब 2026 के फिर नए नियम लागू हुए हैं। इसके तहत संस्था को अपनी गतिविधियों की स्पष्ट श्रेणी बतानी होगी। भौगोलिक कार्यक्षेत्र का उल्लेख करना होगा। सोशल मीडिया खातों की जानकारी देनी होगी। प्रकाशनों और संचार माध्यमों का विवरण देना होगा। विदेशी धन के उपयोग की निगरानी को और विस्तृत किया गया है। सरकार का तर्क है कि इन कदमों से पारदर्शिता बढ़ेगी और विदेशी धन के दुरुपयोग पर रोक लगेगी लेकिन सरकार अपने मामलों में पारदर्शिता नहीं बरतती है। आरटीआई कानून का भी बाजा बजा दिया गया है। दूसरी ओर, एफसीआरए से प्राप्त धन के दुरुपयोग का कोई बड़ा या बढ़िया उदाहरण नहीं है। जो है वह मुकदमों में फंसा हुआ है। दूसरी ओर, देश में तमाम आरोपों और अपराधों की जांच नहीं हुई है या सुराग नहीं मिला। जो आरोप सरकार ने लगाए वे गलत साबित हुए या सही साबित नहीं हो पाए। कहने की जरूरत नहीं है कि नियमों की सख्ती से विदेश से जो पैसे आ सकते थे वो भी नहीं आएंगे और यहां रोजगार की जो समस्या है वह भी बनी रहेगी। विदेशी निवेशकों ने जो पैसे वापस ले लिए हैं सो अलग। बेशक, दान के पैसों का दुरुपयोग किया जा सकता है लेकिन इसके लिए कार्रवाई भी की जा सकती है। सरकार चाहे तो ऐसी व्यवस्था कर सकती है कि दुरुपयोग हो ही नहीं पर चंदा रोकना और पीएम केयर्स में किसी से भी ले लेना या किससे लिया उसमें पारदर्शिता नहीं रखना – दोहरा रवैया है। हालांकि, सरकार यह कहती रही है कि कुछ संस्थाओं ने विदेशी धन का उपयोग घोषित उद्देश्यों से अलग कार्यों में किया। मुझे नहीं लगता कि कार्य गलत नहीं है तो सरकार को परेशान होना चाहिए। पैसा देने वाला शिकायत करे तो बात अलग है। सरकार का कहना है कि बड़ी संख्या में संस्थाएं वार्षिक रिटर्न दाखिल नहीं कर रही थीं। यही बाक आरएसएस के बारे में कही जाए तो सरकार और समर्थकों का रुख अलग होता है।
सरकार ने 2024 में पांच प्रमुख संस्थाओं के एफसीआर लाइसेंस रद्द करते समय आरोप लगाया था कि उन्होंने विदेशी चंदे का उपयोग अपने घोषित उद्देश्यों के अलावा अन्य कार्यों में किया। सरकार ने जिन मामलों में कार्रवाई की उनमें कुछ चर्च-सम्बद्ध संस्थाएं, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा क्षेत्र की संस्थाएं तथा अन्य संगठन शामिल रहे हैं। सरकार का आरोप आम तौर पर यह रहा कि धन का उपयोग घोषित उद्देश्य से अलग हुआ या एफसीआरए प्रावधानों का उल्लंघन हुआ। हालांकि यह भी सच है कि कई मामलों में संबंधित संगठनों ने आरोपों का खंडन किया और कहा कि कार्रवाई तकनीकी या प्रक्रियागत कमियों के आधार पर की गई अथवा उनकी आलोचनात्मक गतिविधियों के कारण उन्हें निशाना बनाया गया। तथ्य है कि 2014 के बाद लगभग 20,000 एनजीओ ने एफसीआरए लाइसेंस खोए हैं। इनमें कुछ के लाइसेंस रद्द हुए और कुछ के लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं हुआ। 2021 तक सरकार ने बताया कि 20,600 से अधिक एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस रद्द किए जा चुके थे। 2024 तक सरकार के आंकड़ों के अनुसार 20,701 से अधिक संगठनों के लाइसेंस रद्द हो चुके थे और 14,000 से अधिक लाइसेंस की मियाद निकल गई थी। 2022 में लगभग 5,900 संस्थाओं का पंजीकरण नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो गया था। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और शोध से जुड़ी संस्थाएं भी थीं। जाहिर है इससे नौकरियां भी गई होंगी। लाभार्थियों को परेशानी हुई होगी सो अलग। लेकिन सरकार ने एफसीआरए कार्रवाई से गई नौकरियों का कोई समेकित आंकड़ा जारी नहीं किया है। उपलब्ध स्रोतों से भी ऐसा कोई आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा नहीं मिलता कि कितने रोजगार समाप्त हुए। इसके अलावा, बंद हुए एनजीओ स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, अनुसंधान एवं नीति अध्ययन, मानवाधिकार और पर्यावरण क्षेत्र में काम करते थे। इन संगठनों के विदेशी फंड घटने या बंद होने से कर्मचारियों की संख्या कम हुई, परियोजनाएं बंद हुईं और कई सेवाएं सीमित हुईं। लेकिन सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर इस का प्रमाणित आंकड़ा उपलब्ध कराने की भी जरूरत नहीं समझी है।
कहने की जरूरत नहीं है कि भारत में एनजीओ क्षेत्र बहुत विविध है। इनमें स्कूल और अस्पताल चलाने वाली संस्थाएं, ग्रामीण विकास संगठन, महिला एवं बाल अधिकार समूह, पर्यावरण संगठन, नीति अनुसंधान संस्थान (थिंक टैंक), मानवाधिकार संगठन, धार्मिक और परोपकारी संस्थाएं भी शामिल हैं। ये सरकार को नीति सुझाव, शोध रिपोर्ट और जमीनी आंकड़े भी उपलब्ध कराती रही हैं। इसलिए विदेशी चंदे पर रोक या कमी का असर केवल “चैरिटी” तक सीमित नहीं है बल्कि शोध और सामाजिक हस्तक्षेपों पर भी पड़ सकता है। इस लिहाज से सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च का नाम लिया जा सकता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी अय्यर इस संस्था की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी थीं। प्रचारक मीडिया इसे अय्यर की बेटी का एनजीओ कहता था जबकि इसकी स्थापना 1973 में हुई थी। जो 21वीं सदी की भारतीय चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक नीति (पब्लिक पॉलिसी) से जुड़े मुद्दों पर शोध करता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एफसीआरए कानूनों के कथित उल्लंघन के चलते जनवरी 2024 में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च का विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम लाइसेंस रद्द कर दिया। इससे पहले संस्था को मिलने वाले विदेशी चंदे पर रोक लगा दी गई थी। सरकार का तर्क है कि विदेशी धन पर अतिरिक्त निगरानी उचित है। आलोचकों का कहना है कि निगरानी होनी चाहिए, लेकिन इतनी और ऐसी नहीं कि जरूरी और वैध सामाजिक कार्य और शोध भी रुक जाएं। तथ्यों के आधार पर यह कहना सही होगा कि एफसीआरए सख्ती के कारण पहले ही हजारों एनजीओ विदेशी चंदे से वंचित हुए हैं। कुछ मामलों में सरकार ने वास्तविक उल्लंघनों और धन के कथित दुरुपयोग का हवाला दिया है। लेकिन कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोध संस्थानों और एनजीओ का कहना है कि अत्यधिक नियमन से वैध सामाजिक कार्य, अनुसंधान और सेवा कार्यक्रम प्रभावित हुए हैं। सरकार की इस कार्रवाई से देश भारी राशि से वंचित रहा है। गृह राज्य मंत्री ने दिसंबर 2023 में लोकसभा को बताया था कि 2019-20 से 2021-22 के बीच 13,520 संस्थाओं को कुल ₹55,741.51 करोड़ का विदेशी चंदा प्राप्त हुआ। सवाल है कि जो बंद हुए, चल रहे होते तो कितने पैसे आते। और आतंकी गतिविधि के लिए इतने पैसे कम हैं क्या? सरकार ने संसद में भिन्न मौकों पर बताया है कि हजारों संस्थाओं के लाइसेंस रद्द हुए या नवीनीकरण नहीं हुआ। अलग-अलग अवधियों में यह संख्या 6,600 से लेकर 20,000 से अधिक बताई गई है। इनमें बड़ी संख्या शैक्षणिक और सामाजिक संस्थाओं की थी। 2022-24 के दौरान नीति अनुसंधान, मानवाधिकार, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को भी एफसीआरए संबंधी कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



