लखनऊ। उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के प्रधान सहायक डॉ. मनोज कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार, नियमों के उल्लंघन, पद के दुरुपयोग तथा अनुशासनहीनता सहित कई गंभीर आरोपों की शिकायतें सामने आने के बाद शासन स्तर पर जांच की प्रक्रिया तेज हो गई है। उपलब्ध सरकारी पत्रों से पता चलता है कि अलग-अलग शिकायतकर्ताओं और एक राज्य मंत्री की शिकायतों के आधार पर शासन ने संबंधित विभागों से तथ्यात्मक जांच कर रिपोर्ट मांगी है।
दस्तावेजों के अनुसार, एक विस्तृत शिकायत में आरोप लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (UPSDMA) में राहत आयुक्त कार्यालय द्वारा लगभग 140 करोड़ रुपये की लागत से लगाए गए ऑटोमैटिक रेन गेज और ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन परियोजना में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं हुईं। शिकायत में दावा किया गया है कि घटिया गुणवत्ता के उपकरण लगाने के बावजूद संबंधित कंपनी को भुगतान दिलाने के लिए दबाव बनाया गया तथा कथित रूप से करोड़ों रुपये की रिश्वत लेकर भुगतान कराने का आरोप लगाया गया है। शिकायत में इन आरोपों की जांच होटल के सीसीटीवी फुटेज और रजिस्टर से कराने की मांग भी की गई है।
इसी शिकायत में डॉ. मनोज कुमार पर यह भी आरोप लगाया गया है कि उनकी तैनाती नियमों के विपरीत कराई गई तथा वे विभाग में प्रभाव का इस्तेमाल कर कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ कई शिकायतों के बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश शासन के सूचना अनुभाग-1 ने 2 फरवरी 2026 को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक को पत्र भेजकर शिकायत पर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई करने और जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
इसके बाद 11 फरवरी 2026 को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक ने उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी को पत्र लिखकर डॉ. मनोज कुमार के विरुद्ध प्राप्त विभिन्न शिकायतों की प्रतियां भेजीं। पत्र में कहा गया कि शिकायतों एवं आरोपों की सत्यता की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए तथा विभाग को अवगत कराया जाए।
दस्तावेजों से यह भी सामने आता है कि उत्तर प्रदेश सरकार के एक राज्य मंत्री सुरेश राही ने भी सूचना विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर डॉ. मनोज कुमार के विरुद्ध लगातार मिल रही भ्रष्टाचार, अभद्रता और अनुशासनहीनता की शिकायतों का उल्लेख किया। मंत्री ने पत्र में लिखा कि आपदा राहत जैसे संवेदनशील विभाग में ऐसे अधिकारी की प्रतिनियुक्ति सरकार की छवि को प्रभावित कर सकती है और उनकी प्रतिनियुक्ति समाप्त करने पर विचार किया जाना चाहिए।
इन दस्तावेजों से स्पष्ट है कि मामला केवल एक शिकायत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभिन्न व्यक्तियों और जनप्रतिनिधियों द्वारा अलग-अलग स्तर पर उठाए गए आरोपों के बाद शासन ने संबंधित विभागों से जांच कर रिपोर्ट मांगी है।


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