संजय कुमार सिंह
आज जब ज्यादातर अखबारों की लीड जापान के साथ भारत के करार की खबर है तब टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने की एक खबर से पता चलता है कि खाड़ी युद्ध के दौरान लेकिन बंगाल चुनाव के बाद कई बार में बढ़ाई गई पेट्रोल की कीमत तभी कम की जाएगी जब अगले कुछ हफ्तों तक वैश्विक तेल बाजार स्थिर रहेगा। यह खबर दैनिक भास्कर और अमर उजाला में भी है। यह जानकारी पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने दी है। आप जानते हैं कि कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध से पहले के स्तर पर पहुंच गई है। और अब यह खबर पुरानी हो चुकी है। चंदा चोरी का मामला और उसकी जांच का काम जिस ढंग से चल रहा है उससे यह स्पष्ट हो चला है कि चोरी योजनाबद्ध थी और अभी जैसे जांच चल रही है उसमें जो बलि के बकरे बनते दिख रहे हैं उनके वश की बात ही नहीं है कि वे इतने बड़े पैमाने पर मंदिर के दान या चढ़ावे की चोरी कर पाते और करते रहते। जो कार्रवाई चल रही है वह दिखावा और प्रचार ज्यादा है संभावना है कि बाद में कुछ साबित नही होगा। जैसा तमाम मामलों में होता रहा है और आरोपी बच जाएगे या बच जाते रहे हैं। शायद इसीलिए, विपक्ष ने चढ़ावा चोरी पर हमले तेज कर दिए हैं लेकिन उसकी खबर नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड ली़ड है, एसआईटी वापस अयोध्या में, और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। अरविन्द केजरीवाल ने कहा है, असली चंदा चोरों को बचा रहे हैं मोदी। यह खबर देशबन्धु में पहले पन्ने पर है। मुख्य खबर इस संबंध में कांग्रेस की मांग है। देशबन्धु की इस खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो चंदा चोरी की जांच। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी राजनीति पर राहुल गांधी की एक सख्त टिप्पणी भी पहले पन्ने पर नहीं है। राहुल गांधी ने कहा है कि मणिपुर हिंसा विभाजनकारी विचारधारा का नतीजा है और सरकार इस हिंसा को रोकने या समस्या के समाधान के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि मणिपुर ही नहीं, पूरा देश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से संवेदना के दो शब्द की उम्मीद भी छोड़ चुका है, कार्रवाई की बात तो दूर है। दि एशियन एज में खबर है कि नगा-कुकी की नई झड़प में 30 से जयादा घर जला दिए गए हैं। अतिरिक्त सुरक्षाबल भेजे गए हैं पर स्थिति तनावपूर्ण है। द हिन्दू की खबर से पता चला कि भाजपा की सरकारें और कुछ करें या नहीं, बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से बंगला खाली करा लिया है।
यह तथ्य है कि सिस्टम अपने स्वार्थ में या सहूलियत के लिए कठोर हो जाता है। ऐसे में मीडिया का काम है कि जनहित में उसपर दबाव बनाए रखे पर सरकार ने मीडिया को खरीद लिया है और डराकर रखे हुए है। इसीलिए नागरिकों और कार्यकर्ताओं के साथ न्याय के मामलों में सरकार और न्यायपालिका का रवैया अक्सर परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग दिखाई देता है। सोनम वांगचुक जैसी हस्ती के मामले में सुप्रीम कोर्च के सवाल उठाने के बाद सरकार ने खुद ही एनएसए हटा लिया, जबकि मणिपुर की हिंसा और दिल्ली दंगों के मामलों में पीड़ितों को लंबी कानूनी लड़ाई के बावजूद राहत नहीं मिली है। युवा उमर खालिद छह साल से जेल में है तो स्टेन स्वामी जैसे बुजुर्ग एक्टिविस्ट को जेल में सिपर के लिए संघर्ष करना पड़ा और निधन होना दिखाता है कि आम नागरिकों की बुनियादी मानवीय जरूरतों व अधिकारों के मामले में सिस्टम कितना कठोर रहा है। वही जो बलात्कारियों को जमानत और फर्लो देने में उदार दिखता है। यह विरोधाभास साफ करता है कि न्याय और कानून का इस्तेमाल कभी जन-दबाव के आगे झुकने, तो कभी असहमति को कुचलने के लिए एकतरफा तरीके से किया जाता है। एक तरफ अगर खबर है कि सरकार और उसका डबल इंजन जनहित के मामलों में कठोर है तो दिखाई दे रहा है कि भ्रष्टाचार या पैसे कमाने के मामले में कोई ढिलाई नहीं है। दिल्ली के मडिकल ठेके से सेबंधित कई खबरें देखने लायक है। अभी उनकी चर्चा तो नहीं ही है बाद में यह दावा भी किया जा सकता है कि मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के दाग नहीं हैं। यही नहीं, सरकार आम लोगों का जीवन मुश्किल बनाने वाले तमाम निर्ण लेती रहती है। आपने कल पढ़ा कि व्हाट्सप्प को एक नई सुविधा लागू करने से रोक दिया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, सरकार अब वीपीएन प्रदाताओं के लिए नियम सख्त करने पर विचार कर रही है। आप जानते हैं कि डिजिटल ठगी और लूट के मामलों में उसका रवैया ढीला रहा, प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए टेलीग्राम बैन कर दिया गया और जब चर्चा रही कि वीपीएन से बैन को कोई मतलब नहीं रहा तो अब वीपीएन पर नजर है। इससे पहले आदार बनवाना जरूरी था, पर वह नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है, मतदाता सूची में नाम दर्ज करवाने के लिए डिजिटल डिसक्रपेंसी का नया मामला निकाल लिया गया और पासपोर्ट क भी नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा रहा है। आरटीआई के अनुसार, प्रधानमंत्री की नागरिकता का सबूत उनका भारत में जन्म लेना है लेकिन देश में रहने वाले तमाम लोगों को यह साबित करना है कि उनका जन्म देश में हुआ है, माता पिता दोनों देसी है आदि आदि। पहले नियम था कि जिनके मामले में शिकायत हो उन्हीं को सबित करना होगा और यह आसान भी था लेकिन अब वैसी बात नहीं है।
मीडिया को इसपर नजर रखना है जो नहीं हो रहा है। सराकर सिर्फ राजनीति कर रही है और मीडिया उसका सहयोग कर रहा है। आज की तीसरी बड़ी खबर तृणमूल के एक गुट का दावा है कि वही असली तृणमूल है। आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को चुनाव हराने के लिए क्या सब किया गया, हारने के बाद संसदीय दल में फूट पड़ गई, राज्य सभा के सदस्यों ने इस्तीफा दिया और बागी सांसदों ने एक नए और अनजाने से दल में शामिल होने की घोषणा की तथा लोकसभा में तृणमूल सांसदों की एक तिहाई संख्या ने लोकसभा अध्यक्ष से मिलकर अलग बैठने की व्यवस्था करने की अपील की। इसमें बहुत सारे अगर-मगर हैं पर यह तृणमूल के सांसदों का एक गुट तो है ही। दूसरा गुट विधायकों का है जो ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में काम कर रहा है। इसके 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने कल चुनाव आयोग से मुलाकात की थी। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मूल तृणमूल ने आयोग पर अपने ही नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। देशबन्धु ने मुख्य खबर के साथ मूल तृणमूल के आरोप को भी जगह दी है और उसके सवालों को भी महत्व दिया है।
मेरा मानना है कि जब तीन गुट साफ दिखाई दे रहे हैं, फैसला नहीं हुआ है, आपस में निपटारा भी नहीं हुआ है तो असली या अलग गुट के रूप में मान्यता देने से पहले किसी को भी इंतजार करना चाहिए। जिसका काम है उसके फैसले का इंतजार किया जाना चाहिए। असली होने का दावा तो लोकसभा अध्यक्ष के फैसले के बाद ही किया जा सकता है और उसके बिना तो नही ही किया जा सकता है। जहं तक सांसदों के अलग दल में विलय से उसके अलग और बेमतलब होने की बात है, तो तथ्य यह है कि वे तृणमूल के टिकट पर ही जीत कर सांसद हैं और जब तक तृणमूल के सांसद हैं अगर तृणमूल बंटेगा तो एक गुट वह भी होगा ही। इसलिए यह खबर आज दिलचस्प औऱ महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ देशबन्धु ने लीड बनाया है। दि एशियन एज में यह खबर दो कॉलम में है। इसका शीर्षक है, “बागियों के खेमे ने चुनाव आयोग पर ‘असली टीएमसी’ मानने के लिए दबाव बनाया, दस्तावेज जमा किए”। इस खबर में ममता बनर्जी वाले मूल तृणमूल का भी पक्ष है और चुनाव आयोग ने सोमवार तक विवाद का विवरण मांगा है। तृणमूल के एक गुट के दावे की इस खबर को कोलकाता के द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है। ऊपर बताई गई खबरों के अलावा आज एक खबर अदालत के फैसलों में एआई के इस्तेमाल पर भी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे विनाशकारी प्रवृत्ति बताया है और अमर उजाला ने इस खबर को लीड के ऊपर बैनर शीर्षक से छापा है। दिलचस्प यह है कि जापान के साथ जिस करार की खबर आज ज्यादातर अखबारों की लीड है उसमें छह महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं और एक एआई पर भी है। हमारे प्रधानमंत्री एआई को आई यानी मां और ऑल इनक्लसिव कह चुके हैं। बाकी, भारत में एआई सम्मेलन हुआ था तो क्या सब हुआ था उससे आप परिचित होंगे। एआई पर भारत में सरकारी स्तर पर क्या हो रहा है या वैसे भी देश ने क्या कुछ किया है उसका पता नहीं चला है। दैनिक भास्कर में मुंबई हाईकोर्ट के एक फैसले और टिप्पणी से जुड़ी खबर है। इसके अनुसार हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में पूछा कि सरकार मुर्दाबाद के नारे के लिए तड़ीपार का आदेश क्यों? मुख्य शीर्षक बांबे हाईकोर्ट की यह टिप्पणी है कि नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है और विरोध करने पर केस हो जा रहा है। मुंबई हाईकोर्ट की खबर इंडियन एक्सप्रेस में दो कॉलम में है।
मुंबई में बारिश की खबर नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है। नगर निगमों ने झेली शर्मिन्दगी देश भर का हाल बताने वाला शीर्षक है। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि मुंबई में मैनहोल में गिरकर एक व्यक्ति की मौत होने के बाद स्थानीय निकाय ने चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। नवोदय टाइम्स ने मुंबई की पानी से भरी सड़क की फोटो छापी है और खबर में जो अंश हाईलाइट किए हैं उसके अनुसार, उत्तराखंड में पांच जिलों में ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है, हिमाचल में भारी वर्षा के बाद 46 सड़कें बंद हैं। मुंबई में खुले मैनेहोल में गिरने से व्यक्ति की मौत के अलावा पानी भरी सड़क पर बिजली की तार गिरने से एक महिला की मौत की खबर भी नवोदय टाइम्स में छपी है। यह सब तब जब इस बार मानसून देर से आया है और बारिश पहले के मुकाबले काफी कम है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



