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सुख-दुख

मेरी पत्रकारिता यात्रा (2) : दैनिक जागरण छोड़कर मैं टाइम्स समूह आ गया, दोनों की कार्यशैली में बड़ा फर्क था, जिसका मुझे नुकसान-लाभ दोनों हुआ!

देवप्रिय अवस्थी-

मेरी पत्रकारिता यात्रा में दूसरा पड़ाव था टाइम्स समूह का पत्रकारिता प्रशिक्षण विभाग, मुंबई. इस पड़ाव में आठ अन्य साथी थे-रंजीत कुमार, मधुरेंद्र सिन्हा, पंकज शर्मा, आशा किशोर, लता करंदीकर (विवाह के बाद जोशी), कुलदीप सिंह राठौर, विनोद खत्री और सुशील चतुर्वेदी.

हमें प्रशिक्षणार्थी भत्ते के रूप में 650 रुपए और मकान भाड़ा भत्ते के रूप में 50 रुपए मासिक मिलते थे. हमारा प्रशिक्षण 1979 की मई की शुरुआत में टाइम्स समूह के मुंबई मुख्यालय में शुरू हुआ. साथ में अंग्रेजी के भी कुछ प्रशिक्षणार्थी थे. इनमें से एक विजय वर्गीज ख्याल पत्रकार बीजी वर्गीज के पुत्र थे. प्रशिक्षण विभाग के प्रमुख थे अंग्रेजी के नामी-गिरामी पत्रकार पतंजलि सेठी. हिंदी के प्रशिक्षणार्थियों को पत्रकारिता की बारीकियां सिखाने-समझाने की जिम्मेदारी विश्वनाथ सचदेव की थी. उस समय विश्वनाथ जी नवभारत टाइम्स, मुंबई में मुख्य उपसंपादक थे. बाद में वे धर्मयुग के संपादक भी रहे और अभी 84 वर्ष की उम्र में भारतीय विद्या भवन की प्रतिष्ठित पत्रिका नवनीत का संपादन कर रहे हैं.

सभी प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण विभाग में प्रातः 9:30 बजे पहुंचना होता था. 9:30 से दोपहर 2:30 बजे तक कुछ विशेषज्ञों के लेक्चर होते थे और कुछ असाइनमेंट करने होते थे. फिर 3:00 बजे से 5:00 बजे तक का समय टाइपिंग सीखने के लिए नियत था. चूंकि मुझे टाइपिंग पहले ही आती थी इसलिए मैं इस समय का मनचाहा इस्तेमाल कर सकता था. सप्ताहांत में मैं अक्सर अपने बुआ-फूफा के पास पुणे चला जाता था. उन दिनों बंबई वीटी (अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनल) से पुणे (शिवाजीनगर) का मासिक रेलवे पास 60 रुपए में बनता था. सोमवार को वहां से मुंबई लौटने के लिए सुबह 4:30 बजे महालक्ष्मी एक्सप्रेस पकड़नी होती थी जो 9:00 बजे मुंबई पहुंचा देती थी. कभी-कभार ट्रेन के लेट होने पर दफ्तर में गैर हाजिरी लग जाती थी. मुंबई में रहने के लिए एक दूसरी बुआ का कुर्ला में एक छोटा-सा कमरा मिल गया था.

प्रशिक्षण शुरू होने के दो-ढाई महीने बाद कुछ मांगे लेकर मुंबई के मजदूर नेता दत्ता सामंत की अगुवाई वाली बेनेट कोलमैन कर्मचारी यनियन ने हड़ताल कर दी. प्रबंधन और यूनियन के बीच बातचीत के कुछ दौर नाकाम होने के बाद प्रबंधन ने अनिश्चितकालीन तालाबंदी का ऐलान कर दिया. नतीजतन, सभी प्रशिक्षणार्थियों को अपने-अपने घर लौटना पड़ा. तालाबंदी लगभग महीने भर चली होगी. उसके खत्म होने के बाद प्रशिक्षण दोबारा शुरू हुआ ही था कि प्रशिक्षणार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए टाइम्स समूह के विभिन्न प्रकाशनों से संबद्ध करने का सिलसिला शुरू हुआ. मेरे लिखित आग्रह पर सबसे पहले मुझे नवभारत टाइम्स, दिल्ली भेजा गया. कुछ दिन बाद रंजीत कुमार, मधुरेंद्र सिन्हा और आशा किशोर भी दिल्ली आ गए.

अज्ञेय जी की विदाई

नवभारत टाइम्स, दिल्ली में उन दिनों तत्कालीन प्रधान संपादक अज्ञेय जी की चलाचली का समय था. उनकी जगह मुंबई संस्करण के स्थानीय संपादक आनंद जैन लेने वाले थे. इसलिए अज्ञेय जी से महज औपचारिक परिचय ही हुआ. उनके संपादन में सप्ताह भर भी काम करने का मौका नहीं मिला. अज्ञेय जी के साथ अनुबंध पर काम कर रहे दो सहायक संपादकों-सिद्धेश्वर प्रसाद और गुलशेर खां शानी की भी विदाई हो गई. सिद्धेश्वर जी इंदिरा गांधी की मंत्रिपरिषद में उप मंत्री रह चुके थे और शानी ने अपने उपन्यास काला जल के कारण प्रसिद्धि पाई थी.

आनंद जैन अपने काम से मतलब रखने वाले संपादक थे. वे विभाग के वरिष्ठ साथियों से सीमित संपर्क रखते थे. जूनियर साथियों से तो बिलकुल भी नहीं. मुझे समाचार संपादक रामपाल सिंह को रिपोर्ट करना होता था. उन्होंने मुझे मुख्य समाचार डेस्क से संबद्ध किया था. इस डेस्क पर तब तीन मुख्य उपसंपादक थे- जयदत्त पंत, हरीश अग्रवाल और दीवान द्वारका खोसला. पंत जी वामपंथी रुझान ‌रखते थे तो खोसला जी कांग्रेसी थे और उसके श्रम प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय सचिव भी. हरीश अग्रवाल विज्ञान लेखन में महारत रखते थे. पारसदास जैन उप समाचार संपादक थे जिनकी मुख्य जिम्मेदारी साप्ताहिक ड्यूटी चार्ट बनाना और जैन समाज की खबरों को अखबार में प्रमुखता से स्थान देना होता था.

मुख्य समाचार डेस्क बहुत भीड़-भाड़ वाली थी. इस पर सत सोनी, रंगनाथ पांडे, वीरेंद्र बड़थ्वाल, लक्ष्मीरमण, जगदीश त्यागी, श्रीकांत त्रिपाठी, रमेशचंद्र जैन, वीर कुमार अधीर, राजकृष्ण नेपाली, नीरज शर्मा, इब्बार रब्बी, विष्णु नागर, राकेश कपूर, प्रदीप कुमार आदि थे. खेल डेस्क के प्रभारी सु्शील जैन थे. उनके सहयोगी थे अजय भल्ला और श्रीकांत शर्मा. व्यापार डेस्क विनय कुमार और रत्नसिंह शांडिल्य के जिम्मे थी और संपादकीय पेज माया शर्मा के.

वेदप्रताप वैदिक और वासुदेव झा सहायक संपादक थे. वैदिक जी ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय विषयों पर और झा जी आर्थिक विषयों पर लिखते थे. रोजाना संपादकीय लिखना भी उनकी ज़िम्मेदारी में आता था.

राष्ट्रीय ब्यूरो के प्रमुख ललितेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव थे. ब्यूरो में नंदकिशोर त्रिखा, दीनानाथ मिश्र और दीवान सिंह मेहता विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत थे. बाद में आलोक मेहता भी ब्यूरो में जुड़ गए थे. सिटी रिपोर्टिंग टीम के अगुआ रामअवतार त्यागी थे. रमेशचंद्र गौड़, महेश जैन, धर्मवीर सहाय (रघुवीर सहाय के अनुज) और विभावसु तिवारी अन्य संवाददाता थे. प्रभात डबराल और आदित्य अवस्थी बाद में इस टीम में जुड़े थे.

नवभारत टाइम्स में एक सज्जन महीने में सिर्फ एक बार हाजिरी रजिस्टर पर दस्तखत करने आते थे. बाद में पता चला कि वे दिल्ली महानगर परिषद के निर्वाचित सदस्य थे. वे नवभारत टाइम्स में बतौर प्रूफ रीडर भर्ती हुए थे और विशेष संवाददाता पद तक प्रमोट होकर रिटायर हुए. उनका मुख्य काम नगर निगम और अन्य सरकारी विभागों में बेनेट कोलमैन कंपनी के अटके काम पूरे कराना था.

मेरे दिल्ली आने के कुछ ही दिन बाद तीन और प्रशिक्षणार्थी साथी-रंजीत कुमार, मधुरेंद्र सिन्हा और आशा किशोर भी मुंबई से दिल्ली आ गए. ये तीनों शुरुआत में मुख्य डेस्क पर ही रहे. तीन साथी-लता करंदीकर, कुलदीप सिंह राठौर और विनोद खत्री मुंबई के प्रकाशनों से जुड़े थे जबकि सुशील चतुर्वेदी को अनुशासन तोड़ने की वजह से बर्खास्त कर दिया गया था. कुलदीप कुछ वर्ष मुंबई में काम करने के बाद दिल्ली आ गए और खेल संपादक रहे. रंजीत कुमार विशेष संवाददाता और राजनीतिक संपादक भी रहे. मधुरेंद्र सिन्हा पटना संस्करण के स्थानीय संपादक और पंकज शर्मा विशेष संवाददाता रहे. रंजीत, मधुरेंद्र और कुलदीप लगभग 35-36 साल की सेवा के बाद नवभारत टाइम्स से रिटायर हुए. पंकज ने रिटायरमेंट के कुछ पहले वीआरएस ले लिया था और राजनीति में सक्रिय हो गए थे.

दिसंबर 1979 में टाइम्स समूह ने सांध्य टाइम्स का प्रकाशन शुरू किया. इसके संपादन की पूरी जिम्मेदारी सत सोनी के पास थी. वे आम बोलचाल की भाषा में खबरों के शीर्षक बनाने में बेजोड़ थे. सोनी जी सांध्य टाइम्स की लीड खबर का शीर्षक फाइनल करने से पहले अक्सर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की राय लेते थे. टाइम्स प्रबंधन ने उन्हें कई सेवा विस्तार दिए. सोनी जी 70 वर्ष से भी ज्यादा उम्र तक सांध्य टाइम्स से जुड़े रहे. इब्बार रब्बी, राजकृष्ण नेपाली, नीरज शर्मा और पंकज शर्मा सांध्य टाइम्स की न्यूज डेस्क पर सोनी जी के शुरुआती सहयोगी थे. आनंद जैन के छोटे भाई चेतन जैन रिपोर्टर के रूप में सांध्य टाइम्स से जुड़े थे.

शुरूआती सबक

चूंकि नवभारत टाइम्स में स्टाफ जरूरत से बहुत ज्यादा था इसलिए यहां की नौकरी बहुत आराम की थी. मुझे यहां जो शुरुआती सबक मिले उनमें एक था कि मुझे अपने काम करने का तरीका बदलना होगा. खबरें आराम से लिखिए, जल्दबाजी में और ज्यादा मात्रा में खबरें लिखने की कोई जरूरत नहीं है. मेरी शुरुआत जागरण की कार्य संस्कृति में हुई थी जहां नियुक्ति पत्र में ही लिखा था कि आपको प्रतिदिन कम से कम तीन कालम खबरें लिखनी हैं. वह भी बिना शीर्षक के और 10 पाइंट में. तेजी से और ज्यादा मात्रा में काम करने की जो अच्छी-बुरी आदत जागरण में पड़ गई थी, वह कोशिश करके भी नहीं छोड़ पाया. इसका लाभ (और नुकसान भी) यह हुआ कि जिस डेस्क पर स्टाफ की कमी होती, मुझे वहां बैठा दिया जाता.

इसी दौरान दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जुलाई 1979 में जनता पार्टी टूट गई. मोरारजी के इस्तीफे के बाद चरण सिंह प्रधानमंत्री बने, लेकिन कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने के कारण उन्हें लोकसभा का सामना करे बगैर इस्तीफा देना पड़ा. जनवरी 1980 में आम चुनाव में भारी बहुमत हासिल कर कांग्रेस सत्ता में वापस लौटी और इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बनीं. उन चुनावों के दौरान दर्जन भर से ज्यादा लोकसभा सदस्यों ने अपने निर्वाचन क्षेत्र बदल लिये थे. इस पर मैंने एक लेख लिखकर संपादक आनंद जैन को विचारार्थ सौंपा. उन्होंने तत्काल तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन दो दिन बाद संपादकीय पेज पर छापने के लिए स्वीकृत कर लिया. उन दिनों किसी प्रशिक्षणार्थी पत्रकार को संपादकीय पेज पर जगह मिलना विरल था. स्वाभाविक था कि लेख छपना मेरे लिए बड़ी उपलब्धि थी.

मई 1980 में प्रशिक्षण की एक साल की अवधि पूरी होने पर हमारे बैच के सभी साथियों की उपसंपादक पद पर नियुक्ति हो गई थी. तब पालेकर वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हुई ही थीं और हमारा वेतन 1000 रुपए हो गया था.

पहला भाग…

दैनिक जागरण की संपादकीय बैठक में नरेंद्र मोहन की एक टिप्पणी पर मेरा फौरी जवाब उन्हें नागवार गुजरा, उन्होंने माफी मांगने का संदेश भेजा तो मैंने डाक से इस्तीफे की सूचना भेज दी!

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