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दैनिक भास्कर के इस संपादकीय पर वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने लगाया प्रश्न चिह्न!

मैं सोच में हूं कि क्या कभी इसी अख़बार का समूह संपादक था?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मध्य एशिया संकट के दौरान देश को “सुरक्षित” खींच कर आगे ले जाने का जो ताजा नैरेटिव परोसा है, भास्कर ने उसे हू-ब-हू अपने संपादकीय में “टो” करते हुए देर नहीं लगाई है। पूर्व समूह संपादक श्रवण गर्ग हैरत में हैं।

गर्ग ने इस संपादकीय को टैग कर तीन वाक्यों के सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है:-

“क्या अख़बार का नाम बताने की जरूरत है? आप समझ जाएँ तो संपादकों को उनके संपादकीय कौशल के लिए बधाई भेजिए। मैं सोच में हूं कि क्या कभी इसी अख़बार का समूह संपादक था?”

Social media post by Shravan Garg asking if it's necessary to name a newspaper; includes a Hindi newspaper clipping about a major crisis.

याद रहे, भास्कर समूह तमाम मुकदमों में फंसा है, आयकर छापे पड़ चुके हैं, जांच जारी है, फाइलें खुलने बैठीं तो कोयले से लेकर डीबी माल और जंगल काटकर बनाए गए संस्कार वैली स्कूल तक सब नप सकते हैं। शायद इसीलिए मोहन यादव की उज्जैन की ज़मीनों पर चुप्पी ओढ़ रखी है। सिर्फ प्रतिक्रियाएं स्थान पा रही हैं। वह मामला भी ठंडा छोड़ दिया गया है।

फिर केंद्र को भी साधना है। भाजप सत्ता प्रतिष्ठान के करीबी रिपोर्टर एक के बाद एक दिल्ली ब्यूरो में तैनात किए और बदले जा रहे हैं, पर बात बन नहीं रही है।

इस समय जब “महामानव” अपनी लोकप्रियता के गर्त पर हैं तो सीधे संपादकीय से संदेश दिया जा रहा है: हम आपके साथ हैं!

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