प्रधानमंत्री और उनके नंबर टू लोकसभा से गायब है, विपक्ष ढूंढ़ रहा है, इंडियन एक्सप्रेस ने लीड के फ्लैग शीर्षक से बताया है मानसून सत्र के विस्तार का प्रस्ताव नहीं!
संजय कुमार सिंह
शिक्षा और लीक मुक्त परीक्षा की मांग कर रहे निहत्थे और शांतिपूर्ण बच्चों पर गोली चली, लाठियां मार कर कइयों को जख्मी किया गया सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया है। 15 दिन से ज्यादा हो गए प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लोक सभा में नहीं आ रहे हैं, विपक्ष के नेता कह रहे हैं कि उनकी चिट्ठी की पावती तक नहीं मिली, सत्तारूढ़ पार्टी के प्रवक्ता ने प्रेस कांफ्रेंस कर है कि गोली नहीं चली। फिर भी, अमर उजाला तथा टाइम्स ऑफ इंडिया की सबसे बड़ी व पहली खबर है, ‘मेटा ने माफी मांगी’। अमर उजाला ने अतिरिक्त देशभक्ति दिखाते हुए शीर्षक लगाया है, जुकरबर्ग ने ‘भारत से’ माफी मांगी। मुझे लगता है और यह तथ्य है कि जुकरबर्ग और उनकी कंपनियां नहीं थीं तब भी भारत था और भाजपा भी होगी। जुकरबर्ग या उनकी कंपनियों से भारत को फर्क नहीं पड़ना चाहिए। इस समय देश के सामने जो मुद्दे हैं उसमें संसद की कार्यवाही नहीं चल पाना या प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का लोकसभा में नहीं आना सबसे बड़ा मुद्दा है। मुद्दा यह भी है कि सत्तारूढ़ दल ने ऐसी व्यवस्था कर ली है कि वह चुनाव नहीं हारती, सामान्य प्रशासन के काम नहीं होते हैं, शिक्षा-परीक्षा का बुरा हाल है और सरकार के विरोध को मीडिया में जगह नहीं मिलती है। सरकार अभी भी कोशिश कर रही है कि किसी भी तरह परिसीमन और महिला आरक्षण का विधेयक पास हो जाए ताकि वह आगे के चुनाव जीतने की अपनी व्यवस्था करती रहे। इसमें एक देश एक चुनाव भी है। ऐसे में आज बोफर्स घोटाले के प्रचारकों, दि इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू की लीड एक है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, सरकार ने विपक्ष से संपर्क किया, एफसीआरए विधेयक को हल्का करने, चिन्ताओं को दूर करने के लिए तैयार है। इस खबर का इंट्रो है, गतिरोध खत्म करने के लिए (संसदीय मामलों के मंत्री किरेन) रिजिजू ने राहुल गांधी से मुलाकात की। विपक्ष ने प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई के संबंध में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बयान की मांग की। इस खबर का फ्लैग शीर्षक रिजिजू के हवाले से ही है, अभी तक की स्थिति के अनुसार मानसून सत्र के विस्तार का कोई प्रस्ताव नहीं है।
आप जानते हैं कि अभी तो गृहमंत्री और प्रधानमंत्री को लोकसभा में आने की चुनौती दी जा रही है और दोनों लोग नहीं आ रहे हैं। ऐसे में संसद का सत्र खत्म हो जाए तो यह मांग ठंडी हो जाएगी। इसलिए सामान्य तौर पर इसका विस्तार नहीं होना है – कोई भी समझ सकता है। खबर तब होती जब सरकार ने इसका विस्तार करने की घोषणा की होती। द हिन्दू में इसी खबर का शीर्षक इंडियन एक्सप्रेस से अलग है, संसद में गतिरोध खत्म करने के लिए रिजिजू ने राहुल से मुलाकात की। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पास कराने के लिए कोई विशेष सत्र बुलाने का प्रस्ताव नहीं है; कांग्रेस शाह के बयान और (विदेशी) चंदे से जुड़े विवाद पर बहस की मांग कर रही है। संसद परिसर में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अन्य नेता केंद्र सरकार के खिलाफ नियमित विरोध कर रहे हैं। एक दिन चंदा चोरी पर एक नाटक हुआ और इसके लिए भी एफआईआर कराई गई है। स्पष्ट है कि सरकार सत्ता में बने रहने और हिन्दू राष्ट्र बनाने के अपने लक्ष्य पर डटी हुई है। हिन्दू समाज का एक बड़ा वर्ग अभी भी राहुल गांधी को पप्पू मानता है और साबित करने में लगा हुआ है। झारखंड का छात्र आंदोलन इसका उदाहरण है। इंडियन एक्सप्रेस की स्पेशल खबर है, झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता बाबू लाल मरांडी रांची में विरोध प्रदर्शन स्थल पर गए। दिल्ली में राहुल गांधी ने 20 जुलाई और बाद के छात्र आंदोलन के नेताओं, घायलों के साथ प्रेस कांफ्रेंस की उसकी खबर इंडियन एक्सप्रेस तो क्या मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है।
नवोदय टाइम्स में आज पहले पन्ने पर विज्ञापन बहुत ज्यादा है इसलिए जो खबरें नहीं हैं उनकी बात नहीं की जा सकती है। लीड का शीर्षक है, परिसीमन बिल लाने की पूरी तैयारी। यह खबर किरेन रिजिजू के साथ है और इसके साथ की एक खबर से यह भी बताया गया है कि परिसीमन विधेयक क्या है। खबर के अनुसार, लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का मौजूदा परिसीमन 1971 की जनगणना के आधारित है। अब इसे 2011 की जनसंख्या के आधार पर करने की कवायद चल रही है। इस विधेयक के पास होने के बाद लगभग सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में 50 फीसद तक का इजाफा हो सकता है। इससे लोकसभा की मौजूदा 543 सीटें बढ़कर 850 तक हो सकती हैं। लेकिन, इससे संसद में क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होने की आशंका है। इस विधेयक के लागू होने के बाद उन राज्यों का लोकसभा में ज्यादा प्रतिनिधित्व होगा, जिनकी जनसंख्या ज्यादा है। जबकि दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल जैसे राज्यों की सीटें उत्तर भारतीय राज्यों की अपेक्षा इसलिए कम हो सकती हैं कि वहां जनसंख्या नियंत्रण पर काफी बेहतर काम हुआ है। इसलिए कहा जाता है कि दक्षिण की सरकारों ने अच्छा काम किया, अच्छी शिक्षा और जनसंख्या नियंत्रण का नुकसान होगा। दूसरे, भाजपा देश से सबसे साक्षर राज्य में सबसे खराब हालत में है तो उसे दिल्ली की सत्ता के लिए उस राज्य के सांसदों की जरूरत ही नहीं रहेगी। आप जानते हैं कि भाजपा सांसद शिक्षा और नैतिकता के स्तर पर ऐसे हैं कि पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक की आलोचना कर सकते हैं, उनपर झूठे आरोप लगाने का अफसोस भी न करें तो ठीक है लेकिन चाहते हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना न हो। यह स्थिति आम लोगों में भी है और यूं ही नहीं है। वर्षों की ब्रेन वाशिंग और शाखा शिक्षा का नतीजा है पर वह अलग मुद्दा है। सीटें बढ़ाना इसलिए जरूरी है। भले इसका संबंध जनगणना से हो और 2021 की जनगणना समय से नहीं हुई। अभी चल रही है और अगर परिसीमन करना ही है तो नवीनतम स्थिति के अनुसार करना भी जरूरी नहीं है। पर ये सब अलग मुद्दे हैं। खास बात यह है कि नवोदय टाइम्स ने परिसीमन के बारे में पहले पन्ने पर इतना तो बताया।
आज देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, ‘हिंसा’ के लिए शाह जिम्मेदार। दैनिक भास्कर ने सुप्रीम कोर्ट की सलाह को लीड बनाया है। फ्लैग शीर्षक से पता चलता है कि यह सीजेपी प्रदर्शन के आयोजकों पर कार्रवाई की मांग वाली याचिका से संबंधित है। इस खबर का इंट्रो है, कुछ लोग पथराव करें तब भी पुलिस संयम बरते…। मुख्य शीर्षक है, “युवाओं को सुनिए… समझिए वे क्यों नाराज हैं : सुप्रीम कोर्ट।” हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट 20 जुलाई के आंदोलन के आयोजकों के खिलाफ अपील पर सुनवाई करेगा। तथ्य है कि “मध्य प्रदेश से कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन खारिज होने के बाद भाजपा उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए थे। इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था और चुनाव याचिका दायर करने की छूट दी थी। अब उसी चुनाव याचिका को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए उम्मीदवारों के साथ-साथ रिटर्निंग ऑफिसर (चुनाव अधिकारी) को भी नोटिस जारी किया है।” देश में चुनाव याचिकाओं पर फैसले कार्यकाल खत्म होने के बाद भी होते रहे हैं। द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है। फ्लैग शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, युवाओं के ख़िलाफ़ सख्ती से बचा जा सकता है: कोर्ट। मुख्य शीर्षक है, सरकार की ताकत के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने सतर्क किया। खबर का पहला पैरा इस प्रकार है, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मौखिक रूप से कहा कि विरोध कर रहे युवाओं के ख़िलाफ़ “ताकतवर सरकार” की “सख्ती” से हिंसा और भड़क सकती है, लेकिन कोर्ट जंतर-मंतर पर परीक्षा-घोटाले के विरोध-प्रदर्शन के आयोजकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की याचिका पर विचार करने को भी तैयार हो गया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा, “ये युवा हैं, इन्हें सलाह और कौनसेलिंग की ज़रूरत है। ताकतवर सरकार की ओर से कोई भी सख्त रवैया स्थिति को बेवजह बिगाड़ सकता है और ज़्यादा हिंसा भड़का सकता है। इससे बचा जाना चाहिए।” इसके साथ दिल्ली में राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस की खबर फोटो के साथ है। भले सिंगल कॉलम में। फोटो कैप्शन है, बुधवार को नई दिल्ली में मीडिया कॉन्फ्रेंस में प्रदर्शनकारियों के साथ राहुल गांधी। (रॉयटर्स)। खबर का शीर्षक है, प्रदर्शनकारी: नाम के आधार पर निशाना बनाया गया।
दि एशियन एज की आज की लीड के अनुसार, संसद में गतिरोध खत्म करने और प्रमुख विधेयकों को पास कराने के लिए सरकार के प्रस्ताव को राहुल गांधी ने खारिज कर दिया। अखबार यह भी बताया है कि अनुच्छेद 370 हटाने की सातवीं सालगिरह के मौके पर जम्मू कश्मीर में विरोध प्रदर्शन हुए। इसी के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हवाले से खबर है कि 2019 के परिवर्तन के बाद से जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख को बदला जा रहा है। आप जानते हैं कि इसी के साथ एक पूर्ण राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने का काम हुआ था और सोनम वांगचुक इसके समर्थकों में थे। बाद में वे ऐसे विरोधी हो गए कि केंद्र सरकार ने उन्हें छह महीने जेल में रखा और उन्होंने कॉक्रोच जनता पार्टी का समर्थन करके सरकार का विरोध किया। सरकार ने उन्हें कैसे परेशान किया वह उन्होंने अपने वीडियो में बताया था लेकिन एक साप्ताहिक में छपे इंटरव्यू से फिर यह संदेश गया है कि उन्हें भाजपा सरकार से कोई शिकायत नहीं है। इन खबरों और चंदा चोरी पर नाटक के लिए एफआईआर होने से यह साफ दिखाई दे रहा है कि भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थक नहीं चाहते हैं कि चढ़ावा चोरी भी मुद्दा बने। पूरी बेशर्मी से कहा जा चुका है कि जिन्होंने चंदा नहीं दिया वे चंदा चोरी की बात न करें। गनीमत है कि उन्हें वोट नहीं देने वालों से उनकी राजनीति की बात नहीं करने के लिए नहीं कहा गया है लेकिन कह भी दें तो कोई क्या कर लेगा। अब यह स्पष्ट हो चला है कि चुनाव जीतने की व्यवस्था ही उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और भले तमाम पद खाली रहते हैं, भले सरकार अग्निवीरों से काम चलाकर पेंशन बचाने की कोशिश करे सांसदों की संख्या बढ़ानी है। हिन्दी पट्टी में सांसदों की संख्या बढ़ जाए तो दिल्ली की सत्ता के लिए दक्षिण में सीटें जीतना जरूरी नहीं रहेगा। ऐसे में सत्तारूढ़ दल की प्राथमिकता ऐसी है कि उसने अपनी सरकार के खिलाफ आंदोलन को तो कुचल ही दिया, झारखंड में विपक्ष की सरकार के खिलाफ आंदोलन चल रहा है तो उसका भी राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करती नहीं दिखती है। सरकार के समर्थक और प्रचारक राहुल गांधी का मजाक उड़ाने और उन्हें बदनाम करने के लिए यह मुद्दा जरूर उठा रहे हैं कि राहुल गांधी रांची क्यों नहीं जा रहे हैं या इलाहाबाद क्यों जा रहे हैं। उधर, इलाहाबाद का कार्यक्रम खराब करने लिए दी गई अनुमति रद्द कर दी गई है। खबर है कि झारखंड आंदोलन पर राहुल गांधी भले चुप हों उनके कहने पर आंदोलनकारी छात्रों के बीच कई कांग्रेसी नेता पहुंच चुके हैं। इसके बावजूद सोशल मीडिया राहुल गांधी पर सवाल उठा रहा है।
दि एशियन एज में आज खबर है कि झारखंड छात्र आंदोलन के सिलसिले में मुख्य मंत्री हेमंत सोरेन छात्रों के पैनल से मिलने के लिए तैयार हो गए हैं। द टेलीग्राफ में खबर है कि दिल्ली में शेख हसीना का कार्यक्रम होने से बांग्लादेश नाराज है। कल खबर थी कि, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना वर्चुअल न्यूज कांफ्रेंस करने वाली थीं। बांग्लादेश के अधिकारियों ने अपने मीडिया से कहा था कि शेख हसीना की प्रेस कांफ्रेंस को प्रकाशित प्रसारित नहीं करें। भारत सरकार ने कहा था कि यह आयोजन एक निजी मीडिया इकाई कर रही है। द टेलीग्राफ की आज की खबर इस प्रकार है, नई दिल्ली में ‘फ़ॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब ऑफ़ साउथ एशिया’ के कार्यक्रम पर देर रात प्रतिक्रिया देते हुए बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा, “बांग्लादेश इस बात से नाराज़ है कि नरसंहार की दोषी और फ़रार शेख़ हसीना को आज शाम नई दिल्ली में मीडिया से लाइव बातचीत करने की इजाज़त दी गई, जहाँ उन्होंने और उनके गुर्गों ने बांग्लादेश और वहाँ के लोगों के ख़िलाफ़ ज़हरीली बातें कहीं।” आप समझ सकते हैं कि सरकार जो कर रही है या नहीं कर रही है उसका क्या असर हो रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स में शेख हसीना की प्रेस कांफ्रेंस लीड है। शीर्षक है, हसीना ने गिरफ्तारी के खतरे के बावजूद बांग्लादेश लौटने का प्रण किया। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, शेख हसीना ने कहा : भले मुझे जेल भेज दिया जाए, मैं इस दिसंबर में बांग्लादेश लौट जाउंगी। बांग्लादेश की प्रतिक्रिया इस खबर का इंट्रो है, एक फरार और सजायाफ्ता ‘नरसंहार कर्ता’।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


