यशवन्त सिंह-
मेरी माताजी को पुलिस से डर लगता है। झगड़ा लड़ाई से डर लगता है। उन्हें प्रेम और सौहार्द भरा संसार चाहिए जो मिल न सका। गाँव की लड़ाइयाँ, परिवार की लड़ाइयाँ। इन सबके बीच रोतीं जीतीं अब बुजुर्ग हो गई हैं माताजी। लेकिन भय ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। पुलिस वाले उनके सामने पहुँच जा रहे हैं और फोटो खींच ले रहे हैं। पुलिस वालों के कठोर और ताक़तवर बूटों के नीचे होता है आम आदमी की प्राइवेसी और आत्मसम्मान।
पत्रकारीय विवादों झगड़ों के चलते मेरे पर नोएडा में कई मुकदमे थे जो अब ख़त्म हो चुके हैं। आपसी सहमति से हाईकोर्ट से क्वैश करा लिया गया। लेकिन मेरा नाम यूपी पुलिस के यक्ष एप में पड़ा हुआ है, संगीन धाराओं के साथ। इस एप में दर्ज अपराधियों/आरोपियों/अभियुक्तों का मौके का सत्यापन हर महीने होता है। एप में मेरा एड्रेस गांव का फीड है। सो, स्थानीय नन्दगंज थाने से पुलिस वाले गांव पहुंचकर मोबाइल लोकेशन ऑन करते हैं और मेरे बारे में पूछताछ करते हुए माताजी का फोटो खींच कर लेटेस्ट जानकारी अपडेट कर देते हैं।
आरोपी / अपराधी / अभियुक्त मैं हूँ लेकिन भुगत रही हैं माताजी। उनका भय और आशंका ज़िंदा हो जाता है। वो नर्वस हो जाती हैं। भय जनित स्ट्रेस से उनका पेट ख़राब हो जाता है। (Anxiety-induced gastrointestinal disturbance) पुलिस वाले गाँव के आम आदमी से जिस लैंग्वेज में बात करते हैं, ख़ासकर किसी घोषित अपराधी के घर जाकर, वो आप सब महसूस कर सकते हैं।
पहली दफ़ा माई का फ़ोन आया तो मैंने नन्दगंज थाने के एसएचओ अतुल मिश्रा को कॉल किया। कई बार। कभी नार्मल कॉल तो कभी ह्वाट्सऐप कॉल। फ़ोन नहीं उठना था तो नहीं उठा। ग़ाज़ीपुर ज़िले के कप्तान डॉ इरज़ राजा जी को संदेश भेजा। उन्होंने त्वरित सक्रियता दिखाते हुए थानेदार को निर्देशित किया और फिर थानाध्यक्ष महोदय का कॉल आया।
मैंने थानेदार के सामने माँ की पीड़ा रखी। अपना पक्ष रखा। मुकदमे क्वैश होने के बारे में बताया। हाईकोर्ट के आदेश की कापियाँ भेजीं। उन्होंने आश्वस्त किया, अब ऐसा नहीं होगा।
महीना बीतते बीतते कल फिर पुलिस वाले यक्षधारी मोबाइल चमकाते घर पहुँच गए। अबकी बुआ भी आई हुई हैं सो उन्होंने मुझे फ़ोन कर बताया कि पुलिस वाले आए हुए हैं और फोटो खींच रहे हैं। थानेदार से पूछा तो वही टालमटोल वाला जवाब। यक्ष एप से कैसे डिलीट होता है नाम, हमें नहीं पता, किसी को नहीं पता।
अंततः अबकी डीआईजी Vaibhav Krishna जी से गुहार लगाई। बेहद ईमानदार और जनपक्षधर अफ़सर वैभव जी ने मुझे आश्वस्त किया कि समस्या का निदान हो जाएगा, पूरा मामला मैं ख़ुद देखूँगा। चौबीस घंटे भी नहीं बीते कि उनका फ़ोन आ गया। यक्ष एप के डेवलपर से संपर्क साध कर नाम रिमूवल की प्रक्रिया को उन्होंने ख़ुद समझा और नन्दगंज के थानेदार को समझाया। इसके बाद थानेदार का फ़ोन आया कि वे लोग यक्ष एप से नाम निकालने का काम शुरू कर चुके हैं।
मैं ये सब क्यों लिख रहा हूँ? क्या ये सिर्फ़ मेरा मामला है? नहीं। मेरे जैसे न जाने कितने निर्दोष लोग होंगे जो ऐसी ही विकट स्थिति को झेल रहे होंगे। हर बदलाव के लिए किसी को आगे आना पड़ता है। सिस्टम को जगाना पड़ता है। पता नहीं मेरा नाम यक्ष एप से निकलेगा या नहीं, माँ को फिर से यक्ष धारी पुलिस वालों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ेगा या नहीं, मुझे नहीं मालूम। लेकिन वो दुष्यंत कुमार कह गए हैं न, कौन कहता है आसमां में सुराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों!
मैंने एक पत्थर तबीयत से उछाल दिया है। उम्मीद है मेरे जैसे बहुत से लोगों के लिए राह प्रशस्त होगा कि अगर वो अब आरोपी / अभियुक्त / अपराधी नहीं हैं तो उनके नाम की पर्ची को यक्ष के चंगुल से निकाल कर फाड़ा जा सके।
मायावती शासन में गांव में एक मर्डर के चलते चचेरे भाई का बेवजह नाम आने से माताजी और चाचीजी को थाने में बिठा लिया गया था। उस समय बृजलाल जी डीजीपी हुआ करते थे। मैंने नए नए शुरू हुए भड़ास पर “माँ को न्याय” शीर्षक से (तब हैश टैग का जमाना नहीं था) अभियान चलाया था और ख़ुद जाकर बृजलाल जी को उनके कक्ष में खरी-खोटी सुनाई थी। बिना परवाह किए कि पुलिस मेरा हश्र क्या करेगी। लेकिन बृजलाल जी ने कक्ष में मौजूद कई आईपीएस अफसरों को मेरे गुस्से पर रियेक्ट करते देख उन्हें शांत कराया था। कई जांचें बैठीं। गाजीपुर में पदस्थ एक ट्रेनी आईपीएस अधिकारी जाँच करने गाँव गए और माताजी से मिले थे। मानवाधिकार आयोग की जाँच शुरू हुई। क्या नतीजा आया, मुझे नहीं पता। ये लोकतंत्र आम आदमी के लिए नहीं होता। बस उनके लिए कथित न्याय का दिखावा किया जाता है।
एक निर्दोष माँ यूपी पुलिस से डरी रहती है। उसका भय कम होने का नाम नहीं ले रहा। पुलिस विभाग में अगर थोड़ी भी संवेदनशीलता है, तो जाकर माताजी से उनकी तस्वीर खींच कर उनकी निजता का हनन करने और ऊँची आवाज में बदतमीजी से बात करने के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए। पर हम किससे अपेक्षा कर रहे हैं?
आया है तेरे दर पे तो जाता नहीं सवाल,
कुछ दस्त-ए-सवाल को भी दरकार है दुआ।
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़्याल अच्छा है।
माँ हैं तो मेरी, लेकिन क्या ये आपकी माँ नहीं हैं?
सोचियेगा!
बुआ को मैंने आज फ़ोन कर बोला कि माई को समझा दीजिए, पुलिस के बड़े साहब ने कहा है सब ठीक हो जाएगा!
ये कहते हुए मेरे मन में कितना यकीन था, मुझे खुद नहीं पता।
प्लीज पुलिस जी, मेरे नोएडा वाले फ्लैट पर आकर मेरा ही फोटो खींचा करिए क्योंकि अपराधी मैं हूँ, मेरी माँ को सजा मत दीजिए! प्लीज!
(माँ की एक पुरानी तस्वीर, छोटे भाई के पुत्र को जन्मदिन पर आशीर्वाद देती हुईं)
UP Police Ghazipur Police Dig Varanasi Range MYogiAdityanath Chief Minister Office Uttar Pradesh Police Commissionerate Gautam Buddh Nagar SP Ghazipur
(साभार- फेसबुक)


