नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को TV Today Network की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसके तहत नाबालिग यौन उत्पीड़न पीड़िता की निजता और गोपनीयता भंग करने के मामले में कंपनी पर 5 लाख रुपये का मुआवजा बरकरार रखा गया था। TV Today Network ही ‘आज तक’ चैनल का संचालन करता है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने TV Today की चुनौती खारिज करते हुए हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया। मामले का शीर्षक ‘TV Today Network Limited v. ABC and Ors.’ है और सुप्रीम कोर्ट में यह SLP(C) No. 27299/2026 के रूप में सामने आया।
2005 में क्या हुआ था?
मामला वर्ष 2005 का है। एक नाबालिग लड़की ने अपने पिता के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।
इसके बाद ‘आज तक’ की टीम ने इस मामले को लेकर रिपोर्ट तैयार की। अदालत में पीड़िता की मां का कहना था कि उन्होंने चैनल की टीम से बातचीत करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया था और अपनी बेटी या परिवार से संबंधित जानकारी प्रसारित करने की अनुमति नहीं दी थी।
इसके बावजूद चैनल पर प्रसारित रिपोर्ट में ऐसी कई जानकारियां दिखाई गईं जिनसे नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर होने की संभावना थी। इनमें उसके पिता का नाम, पद और कार्यस्थल से संबंधित विवरण, परिवार के आवासीय इलाके तथा घर से जुड़े दृश्य और पीड़िता की मां की आवाज जैसी सामग्री शामिल थी।
अदालतों ने माना कि इन जानकारियों को एक साथ प्रसारित किए जाने से उस नाबालिग की पहचान आसानी से स्थापित की जा सकती थी, जबकि वह यौन उत्पीड़न की पीड़िता थी।
2013 में दिल्ली हाईकोर्ट के एकल जज ने लगाया था ₹5 लाख मुआवजा
पीड़िता की मां ने प्रसारण के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। फरवरी 2013 में हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने TV Today Network के खिलाफ फैसला देते हुए 5 लाख रुपये के मुआवजे का आदेश दिया था।
TV Today ने इस आदेश को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष चुनौती दी। कंपनी का प्रमुख कानूनी तर्क यह था कि वह एक निजी मीडिया संस्था है और उसके खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने 1 जुलाई 2026 को TV Today की अपील खारिज कर दी और 5 लाख रुपये के मुआवजे के आदेश को बरकरार रखा। पीठ में न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला शामिल थे।
निजी मीडिया संस्थान भी ‘सार्वजनिक कार्य’ करता है : हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मीडिया संस्थान निजी स्वामित्व में होने के बावजूद जब समाचार और सूचनाओं का प्रसार करते हैं तो वे एक सार्वजनिक कार्य कर रहे होते हैं। इसलिए यदि इस सार्वजनिक कार्य के दौरान किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो अदालत के समक्ष उसकी जवाबदेही तय की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में गरिमा के साथ जीने और निजता का अधिकार भी शामिल है।
अदालत के अनुसार यौन अपराध के मामलों में पीड़ित की पहचान उजागर करने वाली जानकारी का प्रसारण अत्यंत गंभीर विषय है। मीडिया की व्यापक पहुंच को देखते हुए ऐसी जानकारी पीड़ित को सामाजिक अपमान और लंबे समय तक नुकसान की स्थिति में डाल सकती है।
‘आप सार्वजनिक कार्य करते हैं तो जिम्मेदारी से नहीं बच सकते’
सुप्रीम कोर्ट में TV Today की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने मीडिया के ‘सार्वजनिक कार्य’ करने के सिद्धांत को गलत तरीके से लागू किया है। उनका कहना था कि यदि मीडिया संस्थानों को सार्वजनिक कार्य करने वाला माना गया तो उनके खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत बड़ी संख्या में याचिकाएं दाखिल होने का रास्ता खुल सकता है।
इस पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने TV Today के इस तर्क पर सवाल उठाया।
अदालत ने कहा कि जब मीडिया की स्वतंत्रता या इंटरनेट तक पहुंच प्रभावित होती है, तब मीडिया संस्थान स्वयं अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देते हैं। ऐसे में जब किसी गैर-जिम्मेदार प्रकाशन या प्रसारण के कारण मुआवजा देने की स्थिति आती है तो मीडिया यह नहीं कह सकता कि वह कोई सार्वजनिक कार्य नहीं कर रहा था।
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि मीडिया को अपनी सार्वजनिक भूमिका को बोझ की तरह देखने के बजाय उस पर गर्व करना चाहिए, क्योंकि समाचार का प्रसार लोकतंत्र में महत्वपूर्ण सार्वजनिक कार्य है।
‘फ्लडगेट खुल जाएंगे’ की दलील पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी
TV Today की ओर से यह भी दलील दी गई कि यदि इस फैसले को बरकरार रखा गया तो इसी तरह के मामलों में मीडिया संस्थानों के खिलाफ मुकदमों की बाढ़ आ सकती है।
इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कथित तौर पर कहा कि यदि इससे पीड़ितों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत आने का रास्ता मिलता है तो अदालत इसे प्रोत्साहित करती है।
सुनवाई के दौरान जब TV Today की ओर से बार-बार यह कहा गया कि मामला व्यापक कानूनी प्रभाव वाला है, तब पीठ ने हाईकोर्ट के निष्कर्षों को सही बताते हुए अपील खारिज कर दी।
पीड़िता की मां की सहमति न होने को भी कोर्ट ने माना महत्वपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीठ ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि पीड़िता की मां ने चैनल की टीम के साथ बातचीत करने से इनकार किया था और बाद में भी पीड़िता की पहचान से जुड़ी जानकारी के प्रकाशन को लेकर आपत्ति की थी।
अदालत ने इस बात को महत्वपूर्ण माना कि किसी व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे मंच पर अपनी पहचान या निजी जानकारी का खुलासा कर देने मात्र से यह अधिकार समाप्त नहीं हो जाता कि कोई मीडिया संस्थान उसकी निजी जानकारी को सार्वजनिक रूप से प्रसारित कर दे।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कहा था कि किसी व्यक्ति की निजता उसके अपने नियंत्रण में है और यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़ित की पहचान की सुरक्षा का दायित्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
मीडिया के लिए क्या संदेश?
इस मामले का महत्व केवल 5 लाख रुपये के मुआवजे तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा TV Today की चुनौती खारिज किए जाने से दिल्ली हाईकोर्ट की वह महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति बरकरार रहती है जिसके अनुसार निजी मीडिया संस्थान भी कुछ परिस्थितियों में अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं, खासकर तब जब उनके सार्वजनिक कार्य के निर्वहन के दौरान किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार के उल्लंघन का आरोप हो।
यह फैसला विशेष रूप से यौन अपराधों के नाबालिग पीड़ितों की पहचान और निजता की सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। मीडिया को ऐसी खबरों में नाम, फोटो, पता, परिवार की पहचान, स्कूल, कार्यस्थल, आवासीय इलाके या अन्य ऐसे विवरणों से बचना होगा जिनसे पीड़ित की पहचान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उजागर हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के सोमवार के आदेश के बाद TV Today Network पर 5 लाख रुपये के मुआवजे से संबंधित हाईकोर्ट का फैसला कायम है।
मामला: TV Today Network Limited v. ABC & Ors.
सुप्रीम कोर्ट: SLP(C) No. 27299/2026
सुप्रीम कोर्ट की पीठ: CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना
विवाद: नाबालिग यौन उत्पीड़न पीड़िता की पहचान उजागर होने योग्य विवरण का प्रसारण
मुआवजा: ₹5 लाख
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: 1 जुलाई 2026
सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज: 10 अगस्त 2026


