सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक जज को मिलते हैं 11 कर्मचारी

सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित प्रत्येक जज को सहवर्ती स्टाफ के रूप में 11 कर्मी प्रदान किये जाते हैं. इनमे 01 वैयक्तिक सचिव, 02 वरिष्ठ वैयक्तिक सहायक, 01 चालाक, 01 प्रवेशक तथा 06 कनिष्ठ कोर्ट परिचारक शामिल हैं. यह जानकारी सुप्रीम कोर्ट के जन सूचना अधिकारी अजय अग्रवाल द्वारा लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को दी गयी सूचना से सामने आई है. Continue reading

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वरिष्ठ IRS अधिकारी ने दो महिला IRS अफसरों को उनके मुंह पर कह दिया ‘वेश्या’!

आईआरएस अधिकारी संजय श्रीवास्तव


‘वेश्या’ कहे जाने को सुप्रीम कोर्ट ने भी किया नजरअंदाज, कैट ने आईआरएस अधिकारियों शुमाना सेन और अशिमा नेब का प्रमोशन रोका….  सुप्रीम कोर्ट ने आईआरएस अधिकारी शुमाना सेन और एक अन्य आईआरएस अधिकारी अशिमा नेब को कमिश्नर एसके श्रीवास्तव द्वारा “वेश्या” कहे जाने को नजरअंदाज कर दिया। ज्ञात हो कि शुमाना सेन एंकर अभिसार शर्मा की पत्नी हैं। Continue reading

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बालिकागृह रेप कांड की रिपोर्टिंग पर रोक को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया

Santosh Singh : मुजफ्फरपुर बालिकागृह रेप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के मीडिया के रिपोर्टिंग की तारीफ करते हुए कहा कि मुजफ्फरपुर बालिकागृह रेप मामले में रिपोर्टिंग पर लगा बैन गलत है और अभी से इस बैन को खत्म किया जाता है। पत्रकार की ओर से दलील दे रही वकील ने कोर्ट के सामने कहा कि इस मामले का मुख्य आरोपी खुद मीडिया घराने से ताल्लुक रखता है और उसके परिवार के कई लोग बड़े मीडिया हाउस से जुड़े हैं फिर भी मीडिया ने खबर उजागर करने से परहेज नहीं किया। Continue reading

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सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली को कड़ी फटकार लगाई- ‘बहानेबाजी मत करो, यह बताओ घर कब दोगे’

सुप्रीम कोर्ट ने आज बेइमान और धोखेबाज बिल्डर कंपनी आम्रपाली के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है. घर पाने से वंचित निवेशकों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली के निदेशकों से पूछा है कि बिना बहानेबाजी किए यह साफ साफ बताओ, घर कब दोगे. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा- बहानेबाजी मत करो. यह गंभीर मसला है. लोगों की जीवनभर की कमाई लगी है. साफ बताओ, घर कब दोगे. आपको उत्तरदायी बनना पड़ेगा. आम्रपाली को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि वो एक सप्ताह के अंदर अपने हर प्रोजेक्ट के प्लान से संबंधित रेसोल्यूशन जमा करें. 

समय पर प्रोजेक्ट पूरे न करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की फटकार खा चुके आम्रपाली बिल्डर ने कहा है कि गैलेक्सी नाम की कंपनी उसके प्रोजेक्ट्स में निवेश को तैयार है. इससे 32 हज़ार फ्लैट खरीदारों को फायदा पहुंचेगा. कोर्ट ने एक हफ्ते में ठोस प्रस्ताव पेश करने को कहा. आम्रपाली से सभी प्रोजेक्ट का विस्तृत ब्यौरा देने को भी कहा. अगली सुनवाई 21 फरवरी को होगी. NCLT में दिवालिया होने की कार्रवाई का सामना कर रहे आम्रपाली सिलिकॉन सिटी जैसे कुछ प्रोजेक्ट्स पर भी इस प्रस्ताव से फर्क पड़ सकता है.

सुप्रीम कोर्ट में आज निवेशकों की याचिका पर सुनवाई हुई. आज के दिन का सभी आम्रपाली घर खरीदारों को बेसब्री से इंतजार था. सुप्रीम कोर्ट में आम्रपाली के तमाम केसों की सुनवाई हुई जिसमें नेफोवा द्वारा फ़ाइल किए गए केस भी शामिल थे. सुनवाई के दौरान गैलेक्सी कंपनी ने आम्रपाली के सभी प्रोजेक्ट को पूरा करने संबंधी सभी कागजात जमा किये हैं. इस पर सभी पार्टियों से एक हफ्ते की समय सीमा में रेसोल्यूशन मांगा गया है. आम्रपाली को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि वो एक सप्ताह के अंदर अपने हर प्रोजेक्ट के प्लान से संबंधित रेसोल्यूशन जमा करें. इस मामले की अब अगली सुनवाई 21 फरवरी को होगी.

इस बीच, नेफोवा की तरफ से 4 फरवरी को ‘लीगल इंटरैक्शन प्रोग्राम’ का आयोजन इंदिरा गांधी कला केंद्र में दिन के 11 बजे किया जा रहा है. इसमें सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट के जाने माने एडवोकेट के अलावा रेरा एक्सपर्ट और एनसीडीआरसी एक्सपर्ट का पैनल भी शामिल होगा. साथ ही आज सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के आधार पर सभी पक्षों द्वारा जो महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाएंगे, उनकी जानकारी कार्यक्रम के दौरान दी जाएगी. अतः सभी निवेशकों से अनुरोध है कि 4 फरवरी को लीगल इंटरैक्शन प्रोग्राम के दौरान जरूर उपस्थित रहें.

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दो सौ करोड़ रुपये के विज्ञापन फर्जीवाड़े मामले में हिंदुस्तान अखबार की मालकिन शोभना भरतिया के खिलाफ सुनवाई पांच दिसंबर को

Rs.200 crore Dainik Hindustan Government Advertisement Scam of Bihar : Supreme court of India will hear Shobhana Bhartia’s Criminal Appeal No.-1216/2017 on Dec.05, 2017 next…

By ShriKrishna Prasad, advocate, Munger, Bihar

The order of  the court of Hon’ble Mr.Justice R.K.Agrawal and Hon’ble Mr.Justice Navin Sinha on Nov 28,2017

New Delhi : In the globally talked Rs.200 crore Dainik Hindustan Government Advertisement Scandal, the Supreme Court of India, on Nov,28, 2017 , has notified  through its website  that the Supreme Court of India (New Delhi) will list Criminal Appeal No.1216/2017 {SLP(Criminal)No.1603/2013} for hearing in the court of Hon’ble Mr.Justice R.K.Agrawal on Dec 05, 2017 next.

The court of Hon’ble Mr.Justice R.K.Agrawal and Hon’ble Mr.Justice Navin Sinha, on Nov 28, 2017, heard the mentioning and passed an order,” Upon being mentioned, the court made the following order—List the  matter on 5th December, 2017.’’

The senior lawyer of Munger(Bihar) ShriKrishna Prasad,appearing on behalf of the Respondent No.02 (Mantoo Sharma, a resident of Munger, Bihar) of the S.L.P (Criminal) No.1603 / 2013, on Nov 28, 2017, appeared before  the court of Hon’ble Mr.Justice R.K.Agrawal and Hon’ble Mr.Justice Navin Sinha and prayed to the  Hon’ble court by mentioning,” My Lordship, my humble prayer before  the Lordship is to list this case for hearing on any date as it was listed in this court  for Nov 27, 2017, but couldn’t come up in the cause-list.” 

“It is Smt. Shobhana Bhartia, w/o Shri Shyam Sunder Bhartia, a resident of 19, Friends Colony(West), New Delhi -110065, who has filed the S.L.P(Criminal) No-1603 of 2013 (now Criminal Appeal No. 1216/2017) in the Supreme Court of India, praying the supreme court to quash the Munger(Bihar) Kotwali P.S case No.445 of 2011,dated 18-11-2011).

It is important to note that Smt. Shobhana Bharatia is the  Chairperson of Mess. Hindustan Media Ventures Limited (New Delhi). Smt. Shobhana Bhartia’s company  prints, publishes and  distributes the popular Hindi daily ‘Dainik Hindustan’. What is in the Munger(Bihar) Kotwali P.S CaseNo.445 /20111(dated 18 Nov.2011) ? In the F.I.R No.445/2011, dt 18 Nov.2011,one social worker, Mantoo Sharma, a resident of Puraniganj locality of the Munger town has accused (1) the Principal accused Shobhana Bhartia(Chairperson, Hindustan Publication Group-Mess. Hindustan Media Ventres Limited, Head Office- 18-20, Kasturba Gandhi Marg, New Delhi, (2) Shashi Shekhar(Chief Editor, Dainik Hindustan, New Delhi, (3) Aakku Srivastawa (Acting Editor, Dainik Hindustan, Patna Edition), (4) Binod Bandhu (Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edititon, Bhagalpur) and (5) Amit Chopra, Printer & Publisher , Mess. Hindustan Media Ventures Limited, Lower Nathnagar Road, Parbatti, Bhagalpur of violating different provisions of the Press & Registration of Books Act, 1867 and the IPC,printing  and publishing the Bhagalpur and Munger editions of Dainik Hindustan (A Hindi daily) using the wrong registration No. and illegally obtaining the govt. advertisements of the Union and the State governments upto Rs. 200 crore  approximately in the advertisement head by presenting the forged documents of registration before the Bihar and the Union governments.

RTI activist Mantoo Sharma,his lawyer Shrikrishna Prasad and Advocate-clerk (Supreme Court) K.K.Choudhary are seen coming out of the Supreme Court  after mentioning in the Hon’ble Supreme Court on Nov 28, 2017.

The Munger (Bihar) Kotwali police have lodged a criminal case(F.I.R No.445/2011) u/s  8(B),14 &15 of the Press and Registration of Books Act, 1867 and sections 420,471 & 476 of the Indian Penal Code against (1) Shobhana Bhartia,(2) Shashi Shekhar,(3) Aakku Srivastawa,(4) Binod Bandhu and (5) Amit Chopra on Nov, 18,2011 .All five are named accused persons in this criminal case of forgery and cheatings.

The present status of the police investigation in this case:  The Deputy Police Superintendent(Munger) ,A.K.Panchlar and the Police Superintendent (Munger), P.Kannan have submitted the ” Supervision Report No.01 ” and ” the Supervision Report No.02” in this criminal case.In the Supervision Report No.01 & 02,the Dy.S.P and the S.P  have concluded the following facts : “On the basis of facts, coming in course of investigation and supervisions , and available documents in  the Kotwali P.S. case No.445/2011, all allegations  are   prima-facie true against all named accused persons including  the principal accused Shobhana Bharatia .”

Patna High Court Order: It is worth mentioning that the Hon’ble Justice, Smt. Anjana Prakash , in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012( Smt. Shobhana Bhartia ,Petitioner Vs (1) State of Bihar,(2) Mantoo Sharma,Munger & others)  on Dec, 17, 2012, has rejected the petition of the accused person, Shobhana Bharatia and others  and has directed the Munger Investigating Police officer to expedite the investigation and  conclude the  same within a period of three months from the date of receipt of this order.

By ShriKrishna Prasad, Advocate, Munger, Bihar
Moble No. 9470400813

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मजीठिया मामला : सुप्रीम कोर्ट ने दैनिक भास्कर प्रबंधन को राहत देने से किया इनकार

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण और आलिया शेख के मामले में भास्कर प्रबंधन को लगा झटका

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मुंबई उच्च न्यायालय के एक आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट गए दैनिक भास्कर (डी बी कॉर्प लि.) अखबार के प्रबंधन को सुप्रीम कोर्ट ने राहत देने से इनकार करते हुए उसे वापस मुंबई उच्च न्यायालय की शरण में जाने के लिए मजबूर कर दिया है। यह पूरा मामला मुंबई में कार्यरत दैनिक भास्कर के प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह संग मुंबई के उसी कार्यालय की रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया इम्तियाज़ शेख की मजीठिया वेज बोर्ड मामले में जारी रिकवरी सर्टीफिकेट (आरसी) से जुड़ा हुआ है… पत्रकार सिंह और रिसेप्शनिस्ट चव्हाण व शेख ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा के मार्गदर्शन एवं उन्हीं के दिशा-निर्देश में कामगार आयुक्त के समक्ष 17 (1) के तहत क्लेम लगाया था।

कामगार आयुक्त कार्यालय में यह सुनवाई पूरे एक साल तक चली.. कंपनी की एचआर टीम ने अपने वकील के जरिए वहां तरह-तरह के दांव-पेंचों का इस्तेमाल किया… यहां तक कि धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का सीकर (राजस्थान) और लतिका चव्हाण का मुंबई से काफी दूर सोलापुर (महाराष्ट्र) ट्रांसफर भी कर दिया गया था! इसके विरुद्ध सिंह को इंडस्ट्रियल कोर्ट से स्टे मिल गया, तब भी कंपनी ने उन्हें दफ्तर में लेने में आनाकानी की तो उन्होंने लेबर कोर्ट में अवमानना का मुकदमा दायर कर दिया… दैनिक भास्कर ने अब उन्हें पुन: दफ्तर में एंट्री दे दी है। बहरहाल, लेबर ऑफिस में बकाए के मामले की चली लंबी सुनवाई के बाद सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोसले ने 6 जून को ऑर्डर और 1 जुलाई, 2017 को डी बी कॉर्प लि. के खिलाफ आरसी जारी करते हुए वसूली का आदेश मुंबई के जिलाधिकारी को निर्गत कर दिया था।

इस आदेश के बाद डी बी कॉर्प ने मुंबई उच्च न्यायालय में फरियाद लगाई तो उच्च न्यायालय ने 7 सितंबर, 2017 को आदेश जारी किया कि डी बी कॉर्प प्रबंधन सर्वप्रथम वसूली आदेश की 50-50 फीसदी रकम कोर्ट में जमा करे। मुंबई उच्च न्यायालय के इसी आदेश के खिलाफ डी बी कॉर्प प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट गया था, जहां उसे मुंह की खानी पड़ी है… सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी प्रबंधन को राहत देने से इनकार करते हुए वापस मुंबई हाई कोर्ट जाने को विवश कर दिया। इसके बाद कंपनी की ओर से 25 अक्टूबर को मुंबई उच्च न्यायालय को सूचित कर प्रार्थना की गई है कि वह धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण और आलिया शेख के बकाए की 50-50 फीसदी राशि आगामी 6 सप्ताह के अंदर जमा कर देगी…

यह राशि क्रमश: 9 लाख, 7 लाख और 5 लाख है। ज्ञात रहे कि आरसी मामले में जिलाधिकारी द्वारा वसूली की प्रक्रिया बिल्कुल उसी तरह की जाती है, जैसे जमीन के बकाए की वसूली की जाती है… इसमें कुर्की तक की कार्यवाही शामिल है! मुंबई उच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई जस्टिस एस जे काथावाला के समक्ष चल रही है, जबकि उनके समक्ष इन तीनों का पक्ष वरिष्ठ वकील एस पी पांडे रख रहे हैं।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया वेज बोर्ड के लिए अब जो क्लेम करेगा, वह हार हाल में जीतेगा : एडवोकेट उमेश शर्मा

सुप्रीम कोर्ट के टाइम बाउण्ड के निर्णय का स्वागत… जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट में देश भर के मीडियाकर्मियों का केस लड़ रहे जाने-माने एडवोकेट उमेश शर्मा ने 13 अक्टूबर को सुप्रीमकोर्ट द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड मामले को श्रम न्यायालय और कामगार विभाग द्वारा टाइम बाउंड करने के निर्णय का स्वागत किया है और कहा है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्लेम लगाने वाले मीडियाकर्मियों की हर हाल में जीत तय है, वह एक निश्चित समय के भीतर। इससे एक बार फिर साबित हो गया है कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उनको ही मिलेगा जो वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17(1) के तहत क्लेम लगाएंगे।

एडवोकेट उमेश शर्मा ने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट का आदेश साफ संकेत देता है कि मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने का दो रास्ता है। एक तो ये कि मालिक अपने आप वेज बोर्ड की सिफारिशों को ईमानदारी से लागू कर दें जो कि असंभव है। ऐसे में दूसरा और आखिरी रास्ता बचता है 17 (1) का क्लेम लगाना। उमेश शर्मा ने साफ कहा है कि जो भी मीडियाकर्मी क्लेम लगाएंगे, उनकी जीत तय है।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उमेश शर्मा ने कहा कि मैं शुरू से ही इस मामले को टाइम बाउंड कराने और इस बाबत एक कमेटी बनाने पर जोर दे दे रहा था। आपको बता दें कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जस्टिस माजीठिया वेज बोर्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी राज्यों के श्रम विभाग एवं श्रम अदालतों को निर्देश दिया कि वे अखबार कर्मचारियों के मजीठिया संबंधी बकाये सहित सभी मामलों को छह महीने के अंदर निपटाएं।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एवं नवीन सिन्हा की पीठ ने ये निर्देश अभिषेक राजा बनाम संजय गुप्ता/दैनिक जागरण (केस नंबर 187/2017) मामले की सुनवाई करते हुए दिए। गौरतलब है कि मजीठिया के अवमानना मामले में 19 जून 2017 के फैसले में इस बात का जिक्र नहीं था जिसे लेकर अभिषेक राजा ने सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्पष्टीकरण की गुहार लगाई थी। एडवोकेट उमेश शर्मा ने सभी मीडियाकर्मियों से मजीठिया वेज बोर्ड मामले में क्लेम लगाने का निवेदन किया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर ये है :

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एचटी बिल्डिंग के सामने सिर्फ एक मीडियाकर्मी नहीं मरा, मर गया लोकतंत्र और मर गए इसके सारे खंभे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती… ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है… एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे… उसमें से एक ये भी है… एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता… आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं… सब बेशर्म हैं… आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं…

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय… बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा… बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी… हम सब के लिए शर्म का दिन है… खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है… क्यों न कभी इनके धरने पर गया… क्यों न कभी इनकी मदद की… ओफ्ह…. शर्मनाक… मुझे खुद पर घिन आ रही है… दूसरों को क्या कहूं… हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है… किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय…

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो…

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख… “कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।”

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti…

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद…

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ….sb kuch fix hota h….kuchh bhi fair nhi hota…

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद…..

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

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इस संजय गुप्ता को सुप्रीम कोर्ट की बात न मानने पर हुई दस दिन की जेल, एक करोड़ 32 लाख रुपये जुर्माना भी भरना होगा

ये संजय गुप्ता एक मिल मालिक हैं. इनका भी काम  कोर्ट को गुमराह करना हो गया था. सो, इस संजय गुप्ता को सुप्रीम कोर्ट ने दस दिन की जेल और एक करोड़ 32 लाख रुपये का जुर्माना लगाकर दिमाग ठिकाने पर ला दिया. इस फैसले से पता चलता है कि कोई भी अगर माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करेगा और अदालत को गुमराह करते पाया गया तो उसे एक लाख रुपये प्रतिमाह का जुर्माना और दस दिन की जेल होगी. सोमवार को शीर्ष अदालत ने संजय गुप्ता नामक एक मिल मालिक को 10 दिन की कैद के साथ-साथ एक करोड़ 32 लाख रुपये का जुमार्ना सुनाया है.

पीठ का कहना है कि अदालत आदेश पर आदेश पारित करती है, लेकिन इसके पालन की किसी को चिंता ही नहीं है. ऐसे में सबक सिखाना जरूरी था। चीफ जस्टिस जेएस खेहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने संजय गुप्ता नामक फैक्टरी मालिक को सात दिनों के भीतर तिलक मार्ग थाने में समर्पण करने को कहा है. पीठ ने जुर्माने की राशि को एक अगस्त तक सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में जमा कराने का निर्देश दिया है.

पीठ ने कहा कि यह आदेश उनके लिए एक टोकन चेतावनी है, जो अदालती आदेश का पालन नहीं करते और एक के बाद एक झूठ बोल कर अदालत को गुमराह करने की कोशिश करते हैं. यह सुप्रीम कोर्ट के लिए एक विपदा है. पीठ ने तल्खी दिखाते हुए कहा कि अदालत आदेश पर आदेश पारित करती हैं, लेकिन किसी को इसकी चिंता ही नहीं है. भविष्य में कोई सुप्रीम कोर्ट को हल्के में न ले, इसलिए इस तरह का आदेश जरूरी है.

पीठ ने पाया कि दिल्ली के रिहायशी इलाकों से फैक्टरी को शिफ्ट करने के अदालती आदेश के बावजूद संजय गुप्ता बापरोला में दाल की मिल चला रहा था, लेकिन वह लगातार झूठ बोलता रहा कि उसने फैक्टरी को शिफ्ट कर दिया है. बापरोला गांव के निवासी ने अवमानना याचिका दायर कर संजय गुप्ता पर आदेश की अनदेखी का आरोप लगाया था. पीठ ने अदालत में मौजूद संजय गुप्ता से कहा कि आपको सजा तो जरूर मिलेगी, क्योंकि आपने अदालत को लंबे अर्से तक गुमराह किया है.

पीठ ने गुप्ता को सजा के दो विकल्प दिये. पहला या तो वह वर्ष 2004 से 2015 तक (जिस दौरान गुपचुप फैक्टरी चला रहा था) प्रति महीने एक लाख रुपये के हिसाब से 1 करोड़ 32 लाख रुपये जुमार्ना और 10 दिनों की कैद का विकल्प चुने. दूसरा वर्ष 2004 से लेकर 2015 तक 10 हजार प्रति महीने के हिसाब से जुमार्ना और तीन महीने कैद की सजा भुगते. गुप्ता ने पहला विकल्प चुना, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया. माना जा रहा है कि यह नियम अब उन अखबार मालिकों पर भी लागू होगा जिन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश अपने यहां नहीं लागू किया.

पत्रकार शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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(पार्ट थ्री) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

16. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा सिफारिशों को स्वीकार करने और अधिसूचना जारी किए जाने के बाद श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के तहत अपना वेतन/मजदूरी प्राप्त करने के हकदार हैं। यह, अवमानना याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अधिनियम की धारा 16 के साथ धारा 13 के प्रावधानों से होता है, इन प्रावधानों के तहत वेजबोर्ड की सिफारिशें, अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित होने पर, सभी मौजूदा अनंबधों के साथ श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों की सेवा की शर्तों को नियंत्रित करने वाले विशिष्ट अनुबंध/ठेका व्यवस्था को अधिलंघित  (Supersedes) करती है या इसकी जगह लेती है।

वेजबोर्ड द्वारा अनुसंशित, जैसे कि केंद्र सरकार द्वारा मंजूर और स्वीकृत वेतन/मजदूरी को संबंधित श्रमजीवी और गैर पत्रकार कर्मचारियों के अधिनियम द्वारा गारंटी दी जाती है। केवल अधिक लाभकारी/फायदेमंद और अनुकूल दरों को अपना कर ही अधिसूचित वेतन/मजदूरी को निर्गत/खत्म किया जा सकता है। इसलिए, अवमानना याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पिछली मजदूरी संरचना द्वारा नियंत्रित किसी भी समझौता या परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग), जो मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा सुझाई गई सिफारिशों से कम अनुकूल है, वो वैध नहीं है। इसके अलावा, वाद-विवाद उठाया गया था कि कोई भी परिवचन/वचन(अंडरटेकिंग) स्वैच्छिक नहीं है, इन्हें दबाव और स्थानांतरण/बर्खास्त किए जाने के खतरे के तहत प्राप्त किया गया है। इसलिए अवमानना याचिकाकर्ताओं का निवेदन है कि उपरोक्तानुसार न्यायालय द्वारा मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को स्पष्ट किया जा सकता है।

17. जहां तक कि वेरिएवल-पे, अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों, और वित्तीय क्षमता का संबंध है, अवमानना याचिकाकर्ताओं का मामला इस प्रकार से है कि उपरोक्त सभी मामलों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा पूरी तरह से निपटाया गया है। उन सिफारिशों को मजीठिया वेजबोर्ड द्वारा स्वीकार कर लिया गया है, तो कथित वजह पर कोई और बहस या विवाद के लिए कोई गुंजाईश नहीं है। अनुमोदित और अधिसिूचित वेजबोर्ड की सिफारिशें अनुबंध/संविदा/ठेका कर्मचारियों सहित सभी श्रेणियों के कर्मचारियों पर लागू होती हैं, जो वेरिएवल पे/ परवर्तित वेतन के हकदार होंगे और वेरिएवल पे के समावेश द्वारा सभी भत्तों की गणना करेंगे। सभी नियोक्ता निर्धारित अवधि से बकाया राशि का भुगतान करने के लिए भी बाध्य हैं, जब तक कि एक प्रतिष्ठान को अवार्ड/पंचाट के कार्यान्वयन की तारीख से पहले तीन पूर्ववर्ती लेखा वर्षों में भारी नकदी हानि का सामना करना पड़ रहा है, जो कि नियोक्ता द्वारा अनुमानित महज वित्तीय कठिनाइयों से अलग होना चाहिए। 

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मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एडवोकेट द्वय उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी दायर करेंगे पुनरीक्षण याचिका

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसला पर मीडियाकर्मियों में बहस-विचार-चर्चा जोरों पर है. ताजी सूचना ये है कि मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई से जुड़े रहे दो वकीलों उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर करने का ऐलान कर दिया है. ये दोनों वकील अलग-अलग रिव्यू पिटीशन दायर करेंगे. इनकी पुनरीक्षण याचिकाओं में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी न माने जाने का बिंदु तो होगा ही, ट्रांसफर-टर्मिनेशन जैसे मसलों पर स्पष्ट आदेश न दिया जाना और इस मजीठिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट में फिर न आने की सलाह देने जैसी बातों का भी उल्लेख होगा. इन समेत ढेर सारे बिंदुओं पर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट करते हुए फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एडवोकेट उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी द्वारा रिव्यू पिटीशन दायर करने के ऐलान के बाद मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है. मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 19 जून को आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मीडियाकर्मियों और वकीलों का एक हिस्सा निराश है. शोषण, उत्पीड़न और अवमानना के आरोपी मीडिया मालिकों के साथ सुप्रीम कोर्ट का नरम व्यवहार चर्चा का विषय बना हुआ है. पीड़ित मीडियाकर्मियों को फौरी तौर पर कोई राहत सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में नहीं दी है और सभी को एक बार फिर लेबर कोर्ट का रुख करा दिया है जहां लड़ाई वर्षों चल सकती है. इन सब बिंदुओं को देखते हुए देश भर के मीडियाकर्मियों के पक्ष में माननीय सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 19 जून के फैसले पर पुनर्विचार के लिए माननीय सुप्रीमकोर्ट में मीडियाकर्मियों के पक्ष में रिव्यू पिटीशन दायर करने का फैसला किया.

एडवोकेट उमेश शर्मा ने मजीठिया क्रांतिकारी और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह से बातचीत में साफ़ कहा कि वे मीडियाकर्मियों की लड़ाई को अधूरा नहीं छोड़ेंगे और वे इस फैसले में छूटी हुई कई बातों-खामियों को लेकर रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं. इसके लिए उनकी पूरी टीम तैयारी में लगी है. उमेश शर्मा ने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश में कई खामियां हैं जिन पर सुप्रीमकोर्ट से गुहार लगाई जाएगी कि वे इन कमियों पर पुनर्विचार कर उन्हें दूर करें. एडवोकेट उमेश शर्मा द्वारा रिव्यू पिटीशन लगाए जाने की खबर से देश भर के मीडियाकर्मियों के चेहरे पर चमक आ गयी है. आपको बतादें कि उमेश शर्मा ने सुप्रीमकोर्ट का फैसला आने से पहले ही बता दिया था कि लीगल प्वाइंट की डफली ज्यादा बजेगी तो अखबार मालिक बच निकलेंगे. उनके इस पुराने इंटरव्यू को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : Advocate Umesh Sharma interview

देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियों के वेतन और भत्ते तथा एरियर से जुड़ा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का मामला एक बार फिर सुप्रीमकोर्ट पहुंच रहा है. 19 जून को आये सुप्रीमकोर्ट के फैसले में यूं तो ज्यादातर फैसले मीडियाकर्मियों के पक्ष में आये हैं लेकिन कुछ फैसलों में सुप्रीमकोर्ट ने अखबार मालिकों को राहत दी है. इस फैसले में हुयी कुछ कमियों को लेकर रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे एक अन्य वकील का नाम दिनेश तिवारी है.

एडवोकेट दिनेश तिवारी ने खुद इस खबर की पुष्टि पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह से फोन पर हुयी बातचीत में की है. उन्होंने कहा कि वे जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट के 19 जून फैसले में कुछ कमी देख रहे हैं और इन कमियों को लेकर वे सुप्रीमकोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं. दिनेश तिवारी बिहार के आरा के प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ मिथलेश कुमार का केस माननीय सुप्रीमकोर्ट तक लेकर आये थे. प्रभात खबर प्रबंधन ने मिथलेश कुमार का ट्रांसफर जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मांगने के कारण झारखण्ड के चाईबासा में कर दिया था.

इसके बाद वे एडवोकेट दिनेश तिवारी की मदद से सुप्रीमकोर्ट की शरण में गए थे. सुप्रीमकोर्ट ने उनके ट्रांसफर पर रोक लगा दिया था. एक प्रश्न के उत्तर में एडवोकेट दिनेश तिवारी ने कहा कि उन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अखबार मालिकों के खिलाफ लगाए गए अवमानना मामले में सुप्रीमकोर्ट द्वारा दिए गए 19 जून के फैसले को अच्छी तरह पढ़ लिया है. ये फैसला वैसे तो अखबार कर्मियों के पक्ष में है लेकिन कुछ प्वाइंट हमारे खिलाफ गए हैं. अखबार कर्मियों के खिलाफ गए फैसले में कई खामियां है जिसका लाभ अखबार मालिक उठाएंगे. इसलिए वे रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं. वे और उनकी पूरी टीम रिव्यू पिटीशन के लिए दिन रात तैयारी कर रही है. एडवोकेट दिनेश तिवारी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट किसी के मौलिक अधिकार को ब्लॉक नहीं कर सकता और किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट बार-बार न्याय के लिए जाने से रोक नहीं सकता.

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मजीठिया मामले में सुप्रीम कोर्ट का आज आया पूरा फैसला इस प्रकार है…

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जागरण के पत्रकार पंकज के ट्रांसफर मामले को सुप्रीमकोर्ट ने अवमानना मामले से अटैच किया

दैनिक जागरण के गया जिले (बिहार) के मीडियाकर्मी पंकज कुमार के ट्रांसफर के मामले पर आज सोमवार को माननीय सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई हुई। इस मुकदमे की सुनवाई कोर्ट नम्बर 4 में आयटम नम्बर 9, सिविल रिट 330/2017 के तहत की गई। न्यायाधीश रंजन गोगोई ने सुनवाई करते हुए इस मामले को भी मजीठिया वेज बोर्ड के अवमानना मामला संख्या 411/2014 के साथ अटैच कर दिया है। माननीय न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे ही अन्य मामलों पर निर्णय आने वाला है, लिहाजा याचिका का निपटारा भी इसी में हो जाएगा।

पत्रकार पंकज कुमार के ट्रांसफर मामले में उनका पक्ष सुप्रीमकोर्ट में पटना हाई कोर्ट के रिटायर मुख्य कार्यकारी न्यायाधीश नागेंद्र राय ने रखा और राज्य सरकार के साथ साथ दैनिक जागरण को भी इस मामले में पार्टी बनाया गया। यह सुनवाई सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश रंजन गोगोई की अदालत में हुई। उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई को पूरा करके इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा हुआ है। बिहार गया के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार का तबादला मजीठिया मांगने के कारण दैनिक जागरण प्रबन्धन द्वारा जम्मू कर दिया गया था। इसके खिलाफ भड़ास4मीडिया में विस्तृत रिपोर्ट का प्रकाशन किया गया जिसके बाद पूरे देश में खलबली मची।

पंकज कुमार सामाजिक सरोकार के व्यक्ति हैं और गया जिले में मगध सुपर थर्टी के संचालन से जुड़े हैं। इसमें प्रतिभावान गरीब छात्र छात्राओं को गुरुकुल परंपरा के तहत निशुल्क आवास, भोजन तथा पठन पाठन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। इस संस्थान से निकले सैकडों छात्र छात्राएं आईआईटी, एनआईटी तथा अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ रहे हैं या नौकरी कर रहे हैं।

उग्रवाद प्रभावित मगध क्षेत्र से आने वाले युवा भी इसके माध्यम से आज अपना जीवन संवार रहे हैं और समाज को राह दिखा रहे हैं। पंकज कुमार के साथ दैनिक जागरण द्वारा किये गए व्यवहार की खबर जैसे ही भड़ास पर प्रकाशित हुई, इन सैकडों युवाओं तथा पंकज कुमार के परिचितों ने भड़ास का लिंक लगाकर पीएम तथा केन्द्रीय मंत्रियों को टैग करके ट्वीट किया। पंकज कुमार की इमानदारी का ही फल था कि उच्चतम न्यायालय में बिहार पटना उच्च न्यायालय के रिटायर्ड कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश श्री नागेन्द्र राय जी उनसे बिना कोई फीस लिए मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो गए।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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दैनिक जागरण के पत्रकार पंकज के ट्रांसफर मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में होगी ऐतिहासिक सुनवाई

पटना हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य कार्यकारी न्यायाधीश रखेंगे मीडियाकर्मी का सुप्रीम कोर्ट में पक्ष… देश भर के अखबार मालिकों की जहां मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सांस टंगी है वहीं दैनिक जागरण के बिहार के मीडियाकर्मी पंकज कुमार के ट्रांसफर मामले में आज सोमवार को सुप्रीमकोर्ट में एक ऐतिहासिक सुनवाई होने जा रही है। ऐतिहासिक इस मामले में यह सुनवाई होगी कि दैनिक जागरण, बिहार के गया जिले के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार का तबादला किए जाने पर फौरन सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होने जा रही है, साथ ही पीड़ित पत्रकार का पक्ष माननीय सुप्रीमकोर्ट में पटना हाई कोर्ट के रिटायर मुख्य कार्यकारी न्यायाधीश नागेंद्र राय रखेंगे।

यह सुनवाई सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश रंजन गोगोई की अदालत में ही होगी जिन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने के आदेश की अवमानना करने के मामले की सुनवाई कर इस प्रकरण मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा है। बिहार गया के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार का तबादला मजीठिया वेज बोर्ड मांगने के कारण दैनिक जागरण प्रबन्धन द्वारा जम्मू कर दिया गया। इसको लेकर भड़ास4मीडिया में एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की हुई थी। पंकज कुमार सामाजिक सरोकार के व्यक्ति हैं और गया में मगध सुपर थर्टी के संचालन से जुड़े हुए हैं जहां प्रतिभावान गरीब छात्र छात्राओं को गुरुकुल परंपरा के तहत निशुल्क आवास, भोजन तथा पठन पाठन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।

इस संस्थान से निकले सैकड़ों छात्र-छात्राएं आईआईटी, एनआईटी तथा अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ रहे हैं या नौकरी कर रहे हैं। उग्रवाद प्रभावित मगध क्षेत्र से आने वाले युवा भी इसके माध्यम से आज अपना जीवन संवार रहे हैं और समाज को राह दिखा रहे हैं। पंकज कुमार के साथ दैनिक जागरण द्वारा किये गए दुर्व्यवहार की खबर जैसे ही भड़ास पर प्रकाशित हुई, सैकड़ों युवाओं तथा पंकज कुमार के परिचितों ने भड़ास4मीडिया में प्रकाशित खबर का लिंक लगाकर पीएम तथा केन्द्रीय मंत्रियों को टैग कर ट्वीट किया। इन लोगों ने पंकज कुमार के साथ हो रहे अत्याचार में हस्तक्षेप करने की मांग की। गया जिले के जाने माने वकील मदन तिवारी ने भी पंकज के प्रकरण को लेकर हर तरफ सक्रियता दिखाते हुए उन्हें न्याय दिलाने का प्रण किया और इस बारे में भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह से कई राउंड बातचीत की।

पंकज कुमार की इमानदारी का ही फल था कि उच्चतम न्यायालय में बिहार पटना उच्च न्यायालय के रिटायर्ड कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश श्री नागेन्द्र राय जी उनसे बिना कोई फ़ीस लिए मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो गए। उक्त मुकदमे की सुनवाई सोमवार को माननीय सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट नम्बर 4 में आयटम नम्बर 9, सिविल रिट 330 के तहत माननीय न्यायमूर्ति श्री रंजन गोगई के न्यायालय में होने की संभावना है। इस सुनवाई पर देश भर के सभी पत्रकारों की नजर है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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मजीठिया मामले के निपटारे को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कमेटी बनाए जाने की उम्मीद : एडवोकेट उमेश शर्मा

मजीठिया मामले में तीन मई को आरपार की उम्मीद…. देश भर के मीडियाकर्मियों के लिये माननीय सुप्रीमकोर्ट में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे एडवोकट उमेश शर्मा का मानना है कि अखबार मालिकों के खिलाफ चल रही अवमानना मामले की यह लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और तीन मई को इस मामले में आरपार होने की उम्मीद है। यह पूछे जाने पर कि इस लड़ाई का निष्कर्ष क्या निकलने की उम्मीद है, एडवोकेट उमेश शर्मा का कहना है कि लड़ाई मीडियाकर्मी ही जीतेंगे लेकिन जहां तक मुझे लग रहा है, सुप्रीमकोर्ट इस मामले में एक कमेटी बना सकती है।

यह कमेटी अखबार मालिकों से साफ कहेगी कि आप कर्मचारियों की लिस्ट और इनकम टैक्स विभाग में जमा कराया गया अपना 2007 से 2010 तक की बैलेंसशीट लेकर आईये। यह कमेटी फाईनल कर देगी कि आपने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया या नहीं। यह कमेटी दस्तावेज देखकर तुरंत बता देगी कि अखबार मालिकों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ कर्मचारियों को दिया है या नहीं। इससे काफी कुछ साफ हो जायेगा।

लीगल इशूज के मामले पर उमेश शर्मा ने कहा कि मैं बार बार कहता हूं कि लीगल इशूज कोई गंभीर मुद्दा नहीं हैं। इसके जरिये कुछ लोग सिर्फ भ्रम फैला रहे हैं और अखबार मालिक भी सुप्रीमकोर्ट को भ्रमित कर रहे हैं। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री शर्मा ने कहा कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले का सही निराकरण कमेटी बनाकर ही हो सकता है और कमेटी बनी तो हम केस जीत भी जायेंगे। नहीं तो, लीगल इश्यू में फसेंगे तो फंसते ही जायेंगे।

उमेश शर्मा कहते हैं- अरे भाई साफ बताईये, हम अ्वमानना की सुनवाई में गये हैं तो इसमें लीगल इश्यू कहां से आ गया। लीगल इश्यू के ज्यादा चक्कर में पड़ेंगे तो हमें जिन्दगी भर लेबर कोर्ट का चक्कर ही काटना पड़ेगा। मैं आज भी अपने इस बात पर कायम हूं। लीगल इश्यू जो फ्रेम हुये हैं, सुप्रीम कोर्ट अगर सुनवाई के बाद यह बोल दे कि २० जे का मामला विवादित है और ये हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता तो हम इस पर कुछ नहीं कर सकते हैं।

दूसरी चीज अगर सुप्रीम कोर्ट यह बोल दे कि कंटेंप्ट के तहत यह स्पष्ट नहीं हो रहा कि मालिकों ने जान बूझ कर अवमानना की है, तो हो गया ना सबको नुकसान। इसका तरीका यह है कि पहले जांच कमेटी बनाने पर जोर दिया जाता फिर जांच कमेटी के सामने २० जे व अन्य समस्याओं के बारे में तथ्य इकट्ठा कर सुप्रीम कोर्ट के सामने लाया जाये तो सुप्रीमकोर्ट भी इसे गंभीरता से लेती। मैं फिर कह रहा हूं कमेटी बनाना ही एक मात्र उचित विकल्प होगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
९३२२४११३३५

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माई लॉर्ड ने वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना में तिहाड़ भेजा पर मीडिया मालिकों के लिए शुभ मुहुर्त का इंतजार!

…सहारा का होटल न खरीद पाने वाले चेन्नई के एक वरिष्ठ पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का दोषी मान कर आनन-फानन में जेल भेज दिया… यह वरिष्ठ पत्रकार गिड़गिड़ाता रहा लेकिन जज नहीं पसीजे… पर मीडिया मालिक तो खुद एक बार सुप्रीम कोर्ट के सामने उपस्थित तक नहीं हुए और कोर्ट को चकरघिन्नी की तरह हिलाडुला कर, कोर्ट से समय पर समय लेकर अघोषित रूप से ललकारने में लगे हैं कि जेल भेज सको तो जरा भेज कर दिखाओ….

सवाल है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अवमानना पर अवमानना कर रहे मीडिया मालिकों के सिर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कर रखी है अच्छी खासी कृपा… आखिर इन्हें जेल भेजने के लिए क्यों नहीं निकल पा रहा शुभ मुहुर्त और क्यों नहीं जग पा रहे सुप्रीम कोर्ट के जज साहिब लोग… एक वरिष्ठ पत्रकार को अवमानना के मामले में लालची आदि बताते हुए जितनी तेजी से जेल भेजा गया, उतनी तेजी आखिर महा लालची मीडिया मालिकों के प्रकरण में क्यों नहीं दिखती… सवाल तो अब उठेंगे सुप्रीम कोर्ट पर भी क्योंकि पीड़ित मीडियाकर्मियों के सिर से उपर पानी बहने लगा है… 

पहले जानिए वरिष्ठ पत्रकार का प्रकरण जिसे सहारा के न्यूयार्क स्थित होटल को खरीदने के वादे से मुकरने पर जजों ने लानत-मलानत करते हुए आनन-फानन में जेल भेज दिया, उस पत्रकार के लाख गिड़गिड़ाने, कांपने, रोने और दस लाख रुपये तक जुर्माना भरने की अपील के बावजूद…

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ये क्या, सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश में जागरण के मालिकों को तलब करने का जिक्र ही नहीं!

सुप्रीमकोर्ट के लिखित आदेश से समाचारपत्र कर्मियों में निराशा : माननीय सुप्रीमकोर्ट में 4 अक्टूबर को हुयी मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई के बाद लिखित आदेश कल 6 अक्टूबर को आया। लेकिन इस आदेश में दैनिक जागरण के मालिकों संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता को तलब किए जाने का जिक्र ही नहीं है। न ही इन दोनों का नाम किसी भी संदर्भ में लिया गया है। यानि संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता को अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट में उपस्थित नहीं रहना पड़ेगा।

4 अक्टूबर को हुयी सुनवाई में दैनिक जागरण के मालिकों का नाम सामने आया था। इन्हें तलब किए जाने की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने कोर्ट से बाहर की थी। इसी तरह माननीय सुप्रीमकोर्ट में मजीठिया मामले के पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने 17 (1) के मुद्दे को उठाया लेकिन आर्डर में 17(2) के बारे में लिखा है। सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट ने सुनवाई के बाद बाहर निकलकर पत्रकारों को बताया कि अगली डेट 25 अक्टूबर को रखी गयी है लेकिन आर्डर में अगली डेट के बारे में बताया गया है कि यह 8 नवंबर 2016 को दोपहर 2 बजे से सुनवाई है।

इसी तरह सुप्रीमकोर्ट में अगले पांच राज्यों के श्रमायुक्त को तलब करने में राजस्थान का भी नाम था लेकिन आर्डर में राजस्थान का नाम नहीं है। इस बार की सुनवाई में 20जे का भी मुद्दा था लेकिन उस पर भी बहस नहीं हो सकी जिसको लेकर देश भर के मीडिया कर्मी निराश हैं। फिर भी, मीडियाकर्मियों को माननीय सुप्रीमकोर्ट पर पूरा भरोसा है। इनका मानना है कि देश के इस सबसे बड़े न्याय के मंदिर में देर तो है लेकिन अंधेर नहीं है, उन्हें न्याय जरूर मिलेगा। आप भी पढ़िए माननीय सुप्रीमकोर्ट का ताज़ा आदेश….

सुप्रीमकोर्ट में मजीठिया मामले की सुनवाई के बाद जारी लिखित आदेश…

UPON hearing the counsel the Court made the following

O R D E R

We have heard the learned counsels for the
parties. We have considered the status reports
filed by the Labour Commissioners of the concerned
States.

The monitoring in respect of State of
Nagaland is closed. So far as the State of
Maharashtra is concerned, the State is granted
further two weeks’ time to file its response.
Insofar as the States of Uttar Pradesh,
Himachal Pradesh, Uttarakhand, Manipur, Madhya
Pradesh, Chhattisgarh, Delhi and Jharkhand are
concerned, we direct that all revenue recovery
proceedings which are pending shall be
completed at the earliest.

In respect of such of the defaulting units
against whom recovery proceedings have not been
initiated, the same shall be initiated and
completed at the earliest.

In all cases where there is a dispute with
regard to the amount payable, we direct the State
Governments to act under the provisions of Section
17(2) of the Working Journalists and Other ewspaper Employees (Conditions of Service) and
Miscellaneous Provisions Act, 1955. The concerned
Labour Court will finalize its award expeditiously
and send the same to the State Government for due
execution.

Insofar as the legal issues that have to be
heard and decided are concerned, Shri Colin
Gonsalves, learned senior counsel, who had agreed
to identify and carve out the principles that would
be required to be decided in these cases, is
granted two weeks further time to formulate the
said questions and file appropriate written notes.
We make it clear on the next date fixed, the
Court will hear the aforesaid legal questions and
pass necessary orders thereon.

List these matters on 8th November, 2016 at
2.00 p.m.

On the said date i.e. 8th November, 2016,
status report with regard to the implementation of
the Majithia Wage Board recommendations in respect
of the following five States shall be placed before the Court for consideration:

(1) Tamil Nadu
(2) Kerala
(3) Andhra Pradesh
(4) Karnataka
(5) Telangana

We also direct that copies of the status
reports filed by all the States till date be
circulated to the learned counsels appearing for
the contesting establishments.

Contempt Petition(C)No.570/2014 In W.P.(C) No. 246/2011
Leave sought for withdrawal of the
contempt petition is allowed. This contempt
petition is accordingly closed.

All pending applications shall also stand
disposed of.

(Neetu Khajuria)
Court Master
(Asha Soni)
Court Master

(Signed order in Contempt Petition(C) No.570/2014
in W.P.(C) No.246/2011 is placed on the file.)
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL ORIGINAL JURISDICTION
CONTEMPT PETITION(C) NO. 570 OF 2014
IN
WRIT PETITION (C) NO.246 OF 2011
BENNET COLEMAN & CO. EMPLOYEES UNION PETITIONER(S)
VERSUS
INDU JAIN & ORS. RESPONDENT(S)
O R D E R
Leave sought for withdrawal of the
contempt petition is allowed. This contempt
petition is accordingly closed.
All pending applications shall also stand
disposed of.
……………..J.
(RANJAN GOGOI)
……………..J.
PRAFULLA C. PANT)
NEW DELHI
OCTOBER 04, 2016

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

पढ़िए मूल खबर जिसकी अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है…

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सुप्रीम कोर्ट में भास्कर को सबसे ज्यादा नंगा किया गया

शशिकांत सिंह

मंगलवार को मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई के दौरान माननीय सुप्रीम कोर्ट में सबसे ज्यादा नंगा किया गया दैनिक भास्कर को। इस सुनवाई के दौरान सभी सीनियर वकीलों ने दैनिक भास्कर की सच्चाई से माननीय सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया। देश भर के पत्रकारों की मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे सीनियर एडवोकेट उमेश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट को विस्तार से बताया कि एक हजार करोड़ से ज्यादा टर्न ओवर की इस कंपनी ने आज तक किसी भी वेज बोर्ड का पालन नहीं किया, चाहे वो पालेकर वेज बोर्ड हो, बछावत हो, मणिसाना वेज बोर्ड हो या फिर मजीठिया वेज बोर्ड।

एक एडवोकेट ने तो सुप्रीम कोर्ट को यहां तक अवगत कराया कि दस से ज्यादा राज्यों में इसके तमाम संस्करण हैं और लेकिन सबसे ज्यादा यहीं शोषण है, जो वेज बोर्ड की मांग करता है उसका निलंबन या स्थानांतरण कर दिया जाता है। इतनी जानकारियां पाने के बाद इस मामले की सुनवाई कर रहे विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने भी आश्चर्य व्यक्त किया। माना जा रहा है कि जिस तरह दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई में तलब कर लिया है, उसी तरह अगली बार दैनिक भास्कर के मालिकों चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल और मैनेजिंग डायरेक्टर सुधीर अग्रवाल को भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आने के लिए आदेश जारी हो सकता है।

मंगलवार को हुयी सुनवाई में मालिकों की तरफ से एडवोकेट सलमान खुर्शीद का एकदम शांत रहना भी लोगों की समझ से परे था। वैसे आपको बता दें कि अपने घमंड में चूर दैनिक भास्कर के मालिकों को अगर सुप्रीम कोर्ट ने बुला लिया और दो चार मालिकों को जेल में डाल दिया तो तय मानिये कि देश भर के अखबार मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ अपने कर्मचारियों को देना ही पड़ेगा। इसको लेकर भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह का यह कथन उचित जान पड़ता है : ”हजारों मीडियाकर्मियों को खून के आंसू रुलाने वाले दैनिक जागरण के गुप्ताज को उच्चतम न्यायालय ने सबक सिखाने का मूड बना लिया है… देरी से लेकिन सही कदम.. थैंक्यू सुप्रीम कोर्ट.. एक को मारोगे तो बाकी मालिक सब खुद मूतेंगे… बधाई मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने वाले मीडियाकर्मी शेरों को…”

शशिकान्त सिंह
पत्रकार एवं आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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सुप्रीम कोर्ट ने लेबर कमिश्नरों को दिया सख्त निर्देश- आरसी काटिये और वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कराइए

सुप्रीम कोर्ट से शशिकांत सिंह की रिपोर्ट…

सभी लेबर कमिश्नरों को अखबार मालिकों की रिकवरी काटने का सख्त आदेश… लेबर कमिश्नरों को आज माननीय सुप्रीमकोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू ना करने पर जमकर लताड़ा और दैनिक जागरण के मालिकों संजय गुप्ता और महेन्द्र मोहन गुप्ता को अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में तलब कर लिया है। साथ ही सभी लेबर कमिश्नरों को सख्त आदेश दिया कि आप इस मामले की रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करा कर इस सिफारिश को अमल में लाइए।

माननीय सुप्रीमकोर्ट में आज पत्रकारों की तरफ से लड़ाई लड़ रहे वरिष्ठ उमेश शर्मा ने 17(1) के कलेम को 17(२) में डालने के मुद्दे को जमकर उठाया और देश भर के पत्रकारों के चेहरे पर एक बार फिर ख़ुशी ला दी। एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस ने 20 (जे) और वेरीयेबल पेय का मुद्दा उठाया। एडवोकेट परमानंद पांडे ने भी  जमकर अपना पक्ष रखा। माननीय सुप्रीमकोर्ट ने आज सभी लेबर कमिश्नरों को साफ़ कह दिया आप आरसी काटिये और मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश को लागू कराकर पूरी रिपोर्ट लेकर तीन महीने में आइये।

इस मामले में आज महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली, उत्तरांचल के लेबर कमिश्नरों को तलब किया गया था। इन लेबर कमिश्नरों ने दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और दूसरे बड़े अखबारों की मजीठिया वेज बोर्ड लागू ना करने की मंशा संबंधी रिपोर्ट दी है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को रखी गयी है जिसमें आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान और कर्नाटक सहित पांच राज्यों के लेबर कमिश्नरों को तलब किया गया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड से जुड़े कानूनी प्वाइंट पर एक रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान मौजूद रहे मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

मूल खबर…

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सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन और संजय गुप्ता को तलब किया

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न करने और सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानून, न्याय, संविधान तक की भावनाओं की अनदेखी करने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने आज दैनिक जागरण के मालिकों महेंद्र मोहन गुप्ता और संजय गुप्ता को अगली सुनवाई पर, जो कि 25 अक्टूबर को होगी, कोर्ट में तलब किया है. आज सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न किए जाने को लेकर सैकड़ों मीडियाकर्मियों द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई हुई.

कोर्ट ने आज के दिन कई प्रदेशों के लेबर कमिश्नरों को बुला रखा था. कोर्ट ने सभी लेबर कमिश्नरों से कहा कि जिन जिन मीडियाकर्मी ने क्लेम लगाया है, उसमें वे लोग रिकवरी लगाएं और संबंधित व्यक्ति को न्याय दिलाएं. कोर्ट के इस आदेश के बाद अब श्रम विभाग का रुख बेहद सख्त होने वाला है क्योंकि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही बरतने पर उत्तराखंड के श्रमायुक्त के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था.

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की याचिका का प्रतिनिधित्व करते हुए एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दैनिक जागरण की किसी भी यूनिट में किसी भी व्यक्ति को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से न तो एरियर दिया गया है और न ही सेलरी दी जा रही है.

साथ ही दैनिक भास्कर समूह के बारे में भी विस्तार से बताया गया. आज सुप्रीम कोर्ट ने जागरण के मालिकों को कोर्ट में आने के लिए आदेश कर दिया है ताकि उनसे पूछा जा सके कि आखिर वो लोग क्यों नहीं कानून को मानते हैं. चर्चा है कि अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भास्कर के मालिकों को तलब कर सकता है. फिलहाल इस सख्त आदेश से मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुंबई के पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह भी मौजूद थे. उन्होंने फोन करके बताया कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्ती दिखाई है उससे वे लोग बहुत प्रसन्न है और उम्मीद करते हैं कि मालिकों की मोटी चर्बी अब पिघलेगी. सैकड़ों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड से संबंधित अपने हक के लिए गाइड करने वाले पत्रकार शशिकांत सुप्रीम कोर्ट में हुई आज की सुनवाई की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं जिसे जल्द भड़ास पर प्रकाशित किया जाएगा.

अपडेटेड न्यूज (7-10-2016 को दिन में डेढ़ बजे प्रकाशित) ये है….

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सुप्रीम कोर्ट जजों के बौद्धिक स्तर पर जस्टिस मार्कंडेय काटजू का सवालिया निशान!

I think the time has come to tell Indians about the intellectual level and background of most Indian Supreme Court judges.
 While some of them have high intellectual level and character, like Justice Chalameshwar and Justice Nariman, the vast majority of the present Supreme Court Judges are people of very low intellectual level.
 
I can say this because I myself was a Supreme Court Judge for about five and a half years, and I was constantly interacting with my colleagues ( the present Supreme Court judges were only High Court judges when I was a Supreme Court judge ). The level of their conversation was usually about cricket or the weather, never on any intellectual subject..
 
Not once did I hear any discussion by Supreme Court judges about the theories of jurisprudence, e.g. the historical jurisprudence of Savigny and Sir Henry Maine, natural law, the positivists like Bentham, Austin, Hart and Kelsen,  the sociological jurists like Jhering, Ehrlich, Durkheim, Geny, Roscoe Pound, Frank, Llewelyn , Gray, etc. Probably most Indian Supreme Court judges have not even heard of their names, nor of Justices Holmes, Brandeis, Frankfurter, Douglas or Hugo Black, or of their contributions.
 
To be a good judge one of course must know the law and important precedents. But that is not enough. One must also have some knowledge of history, philosophy, economics, political science, literature, etc. I doubt that the Supreme Court judges,( except the two I have mentioned ) have this. In fact I doubt they have even good knowledge of law.
 
The present Chief Justice of India, Justice Thakur, in the BCCI case chose to ignore binding precedents that there is broad separation of powers in the Indian Constitution, and it is for the legislature, not the judiciary, to legislate. By acting thus he displayed total lack of judicial discipline, seeking only popular adulation, and  throwing the Constitution and the law to the winds. The number 2 in seniority, Justice Anil Dave openly said that the Bhagavad Gita should be made compulsory in all schools in India, thus violating his oath to uphold the secular Constitution. Justice Gogoi, who is in line to become the Chief Justice of India on the basis of seniority, has shown that he does not know an elementary principle of law, namely that hearsay evidence is not admissible ( see paragraph 16 of his judgment in the Soumya murder case ). I can go on and on about most of the present Supreme Court judges to show how low is their intellectual level, but that is not necessary. Suffice it to say that they have reached their positions not because of merit but only by dint of seniority. Justice Deepak Mishra, in line to become CJI, was appointed a Judge in Orissa High Court at a very young age because of the influence of his relative Justice Ranganath Mishra, former CJI, who was one of the most corrupt judges in India. Justice Ramanna, who is also in line to become CJI, was appointed as  a High Court Judge in Andhra Pradesh at a very young age due to his political connections, and later became Supreme Court Judge not because of merit but purely due to seniority.
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मजीठिया : बेहद सख्त सुप्रीम कोर्ट ने यूपी समेत पांच राज्यों के सचिवों को नए एक्शन रिपोर्ट के साथ 23 अगस्त को तलब किया

मीडिया मालिकों के कदाचार और सरकारी अफसरों की नपुंसकता से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अब एक एक को देख लेने का इरादा बना लिया है. अपना रुख बहुत सख्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यों से आई रिपोर्ट को एक साथ एक बार में नहीं देखा जा सकता और इसमें बहुत सारी बातें स्पष्ट भी नहीं है इसलिए अब यूपी समेत पांच राज्यों की समीक्षा होगी और समीक्षा के दौरान संबंधित राज्यों के सचिव सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहेंगे. शुरुआत में नार्थ इस्ट के पांच राज्य हैं जिनके सचिवों को अपनी नवीनतम एक्शन रिपोर्ट तैयार करके 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हाजिर रहने को कहा है.

बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब उन राज्यों के श्रम विभागों में हलचल शुरू हो जाएगी जहां क्लेम फाइल करने वालों को उनका वाजिब हक दिलाने की बजाय श्रम विभाग के अधिकारी मीडिया मालिकों की चमचागिरी करते हुए पूरे प्रकरण को लीपपोत कर अनिर्णय की स्थिति में डाले हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संबंधित पांच राज्यों के सचिव अपने यहां के सारे क्लेम और सारे दावों के निपटान की स्थिति लेकर 23 अगस्त को कोर्ट आएं. 23 अगस्त की सुनवाई के बाद ऐसे ही फिर अन्य पांच राज्यों के सचिवों को नवीनतम एक्शन रिपोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट बुलाया जाएगा. तो, इस पूरे घटनाक्रम और सुप्रीम कोर्ट के रुख से जाहिर है कि मामला मीडियाकर्मियों के पक्ष में है और मीडिया मालिकों व उनके चाटुकार अफसरों की चालबाजी सफल नहीं होने वाली है.

भड़ास4मीडिया की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए सैकड़ों अवमानना मामलों के वकील उमेश शर्मा ने भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह को फोन पर बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल सही रास्ता अख्तियार किया है. अब यूपी समेत जिन पांच राज्यों के सचिवों को 23 अगस्त को बुलाया गया है वो न सिर्फ वहां सारे मामले निपटा कर और सही रिपोर्ट लेकर पहुंचेंगे बल्कि इसका असर उन दूसरे राज्यों में होगा जहां मीडिया मालिकों और सरकारी अफसरों का गठजोड़ आम मीडियाकर्मियों के क्लेम को लटकाने में जुटे हुए हैं और गोलमोल रिपोर्ट बनाकर सुप्रीम कोर्ट को बरगलाने की कुत्सित मंशा रखते हैं. आने वाले दिनों में हर राज्य के श्रम अफसरों को पूरी सख्ती दिखाते हुए मीडियाकर्मियों को उनका हक दिलाना पड़ेगा वरना संभव है सुप्रीम कोर्ट में पेशी के दौरान खड़े खड़े उन्हें जेल भेजे जाने का आदेश उच्चतम न्यायालय दे दे. एडवोकेट उमेश शर्मा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश की लिखित कॉपी का इंतजार किया जा रहा है. उसके बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह का कहना है कि संविधान, सुप्रीम कोर्ट और कानून को ठेंगे पर रखने वाले देश द्रोही मीडिया मालिकों और चोरकट धूर्त अफसरों से निपट पाना कोई मामूली बात नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने पूरा मौका देने के बाद अब इन्हें सही से घेरना शुरू कर दिया है. मजीठिया वेज बोर्ड मामले की आज हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने पांच-पांच राज्यों के सचिवों को नवीनतम एक्शन रिपोर्ट के साथ जो तलब करना शुरू किया है और कहा है कि अपने साथ नवीनतम एक्शन रिपोर्ट लाकर बताओ कि कितनों को न्याय मिला और कितनों को नहीं मिला तो जाहिर है कि संबंधित राज्यों के सचिव खुद सुप्रीम कोर्ट में खड़े रहेंगे और इसका मतलब हुआ कि अगर अफसरों ने तनिक भी चालाकी दिखाई और मीडियाकर्मियों को उनका हक नहीं दिला पाए तो सुप्रीम कोर्ट में खड़े खड़े ही अफसरों को कोर्ट की अवमानना में गिरफ्तार कर के जेल भेजने की आदेश सुप्रीम कोर्ट दे सकती है. इसके ठीक बाद उस मीडिया मालिक को भी अरेस्ट करने का आदेश दे सकती है जिसने अपने कर्मी को उसका हक नहीं दिया. यानि अब मीडिया मालिकों और अफसरों के जेल जाने के दिन आने वाले हैं. तो हम लोग कह सकते हैं- ”अब भी तो सुधर जाओ हरामखोरों!”

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जानो कानून : : सुप्रीम कोर्ट का फैसला- फेसबुक पर किसी की आलोचना करना अपराध नहीं, एफआईआर रद्द करो

Facebook postings against police… criticising police on police’s official facebook page…. F.I.R lodged by police….

HELD – Facebook is a public forum – it facilitates expression of public opinion- posting of one’s grievance against government machinery even on government Facebook page does not by itself amount to criminal offence – F. I.R. Quashed.

(Supreme Court)
Manik Taneja & another – Vs- State of Karnataka & another
2015 (7) SCC 423

पूरी खबर…..

Comments on Facebook : Supreme Court quashes FIRs against couple

In a fillip for free speech on social media, the Supreme Court quashed FIRs registered by the Bengaluru Traffic Police for criminal intimidation against a couple for posting adverse comments on its Facebook page. A bench of Justices V. Gopala Gowda and R. Banumathi quashed the criminal prosecution against the couple in their judgment, observing that they were well within their rights to air their grievances in a public forum like Facebook.

“The page created by the traffic police on the Facebook was a forum for the public to put forth their grievances. In our considered view, the appellants might have posted the comment online under the bona fide belief that it was within the permissible limits,” the 10-page judgment observed.

‘End to harassment’

“The police sought to suppress free speech by intimidating us with serious charges…this judgment will have a larger impact. We had the resources to get our charges squashed, but many will find it hard to counter police harassment. I hope this will be an example to stop intimidation by the police,” said Manik Taneja, the petitioner.

On June 14, 2013, Manik Taneja and his wife Sakshi Jawa, were booked by the police under charges of using ‘assault or criminal force to deter a public servant from discharging his duty’ (Section 353 of the Indian Penal Code) and criminal intimidation (IPC 506).

The previous day, the couple were driving in their car, when they collided with an autorickshaw, resulting in a passenger being injured.

Though they had paid due compensation to the injured, Ms. Jawa – who had driven the car – was summoned to Pulakeshi Nagar Traffic police station where the police had allegedly misbehaved with her.

The couple then vent their anger on the police’s Facebook page, and even sent an email complaining about the alleged harassment to the police.

The police reacted by lodging a criminal complaint against the couple.

The Karnataka High Court had refused to intervene when the couple approached it for relief, following which they had moved the Supreme Court.

This judgment comes even as another bench of the Supreme Court is hearing the legality of Section 66A of the Information Technology Act, 2000, which prescribes arrest and three years imprisonment for social media comments considered to be of a “menacing character” by the authorities.

‘We had the resources to get our charges squashed, but many will find it hard to counter police harassment’

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जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है!

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर ‘चौथी दुनिया’ में छपी प्रभात रंजन दीन की ये बेबाक रिपोर्ट पढ़ें

जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है. जज अपने बेटों और नाते रिश्तेदारों को जज बना रहे हैं। और सरकार को उपकृत करने के लिए सत्ता के चहेते सरकारी वकीलों को भी जज बनाने की संस्तुति कर रहे हैं. न्यायाधीश का पद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के प्रभावशाली जजों का खानदानी आसन बनता जा रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई अद्यतन सूची में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बेटे से लेकर कई प्रमुख न्यायाधीशों के बेटे और रिश्तेदार शामिल हैं.

नेताओं को भी खूब उपकृत किया जा रहा है. वरिष्ठ कानूनविद्, उत्तर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के मौजूदा राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के बेटे नीरज त्रिपाठी, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर समेत ऐसे दर्जनों नाम हैं, जिन्हें जज बनाने के लिए सिफारिश की गई है.

जजों की नियुक्ति के लिए की गई संस्तुति की जो सूची सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, उसमें 73 नाम जजों के रिश्तेदारों के हैं और 24 नाम नेताओं के रिश्तेदारों के हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश का कार्यभार संभालने के पूर्व जो तकरीबन 50 नाम जजों की नियुक्ति के लिए भेजे उनमें भी अधिकांश लोग जजों के बेटे और रिश्तेदार हैं या सरकार के पैरवी-पुत्र सरकारी वकील हैं. अब जज बनने के लिए योग्यता ही हो गई है कि अभ्यर्थी जज या नेता का रिश्तेदार हो या सत्ता की नाक में घुसा हुआ सरकारी वकील. अन्य योग्य वकीलों ने तो जज बनने का सपना देखना भी बंद कर दिया है.

जब न्यायाधीश ही अपने नाते-रिश्तेदारों और सरकार के प्रतिनिधि-पुत्रों को जज नियुक्त करे तो संविधान का संरक्षण कैसे हो? यह कठोर तथ्य है जो सवाल बन कर संविधान पर चिपका हुआ है. यह पूरे देश में हो रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए विभिन्न हाईकोर्टों से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी जा रही हैं, उनमें अधिकांश लोग प्रभावशाली जजों के रिश्तेदार या सरकार के चहेते सरकारी अधिवक्ता हैं. वरिष्ठ वकीलों को जज बनाने के नाम पर न्यायपीठों में यह गैर-संवैधानिक और गैर-कानूनी कृत्य निर्बाध गति से चल रहा है, इसके खिलाफ सार्वजनिक मंच पर बोलने वाला कोई नहीं.

सार्वजनिक मंच पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर जजों की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष रो सकते हैं, लेकिन जजों की नियुक्तियों में जो धांधली मचा कर रखी गई है, उसके खिलाफ कोई नागरिक सार्वजनिक मंच पर रो भी नहीं सकता. इस रुदन और उस रुदन के मर्म अलग-अलग हैं. रिश्तेदारों और सरकारी वकीलों को जज बना कर आम आदमी के संवैधानिक अधिकार को कैसे संरक्षित-सुरक्षित रखा जा सकता है और ऐसे जज किसी आम आदमी को कैसा न्याय देते होंगे, लोग इसे समझ भी रहे हैं और भोग भी रहे हैं. देश की न्यायिक व्यवस्था की यही सड़ी हुई असलियत है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने जजों की नियुक्ति के लिए जिन नामों की सिफारिश कर फाइनल लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी, उनमें से अधिकांश नाम मौजूदा जजों या प्रभावशाली रिटायर्ड जजों के बेटे, भांजे, साले, भतीजे या नाते रिश्तेदारों के हैं. बाकी लोग सत्ता सामर्थ्यवान सरकारी वकील हैं. चंद्रचूड़ यह लिस्ट भेज कर खुद भी सुप्रीम कोर्ट के जज होकर चले गए, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ पीठ के समक्ष यह सवाल छोड़ गए कि क्या जजों की कुर्सियां न्याधीशों के नाते-रिश्तेदारों और सत्ता-संरक्षित सरकारी वकीलों के लिए आरक्षित हैं? क्या उन अधिवक्ताओं को जज बनने का पारंपरिक अधिकार नहीं रहा जो कर्मठता से वकालत करते हुए पूरा जीवन गुजार देते हैं?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इलाहाबाद और लखनऊ पीठ के जिन वकीलों के नाम जज की नियुक्ति के लिए भेजे गए हैं उनमें मोहम्मद अल्ताफ मंसूर, संगीता चंद्रा, रजनीश कुमार, अब्दुल मोईन, उपेंद्र मिश्र, शिशिर जैन, मनीष मेहरोत्रा, आरएन तिलहरी, सीडी सिंह, सोमेश खरे, राजीव मिश्र, अजय भनोट, अशोक गुप्ता, राजीव गुप्ता, बीके सिंह जैसे लोगों के नाम उल्लेखनीय हैं. ये कुछ नाम उदाहरण के तौर पर हैं. फेहरिस्त लंबी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से तकरीबन 50 वकीलों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेजे गए हैं, जिन्हें जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. इसमें 35 नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के और करीब 15 नाम हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के हैं.

जो नाम भेजे गए हैं उनमें से अधिकांश लोग विभिन्न जजों के रिश्तेदार और सरकारी पदों पर विराजमान वकील हैं. इनमें ओबीसी, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का एक भी वकील शामिल नहीं है. ऐसे में, खबर के साथ-साथ यह भी जानते चलें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के निर्माण से अब तक के 65 साल में एक भी अनुसूचित जाति का वकील जज नहीं बना. इसी तरह वैश्य, यादव या मौर्य जाति का भी कोई वकील कम से कम लखनऊ पीठ में आज तक जज नियुक्त नहीं हुआ. बहरहाल, ताजा लिस्ट के मुताबिक जो लोग जज बनने जा रहे हैं, उनके विभिन्न जजों से रिश्ते और सरकारी पदों के सत्ताई-छत्र का तफसील भी देखते चलिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर को जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. अल्ताफ मंसूर उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता (चीफ स्टैंडिंग काउंसिल) भी हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को भी जज बनने योग्य पाया गया है. अब्दुल मोईन उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे ओपी श्रीवास्तव के बेटे रजनीश कुमार का नाम भी जज बनने वालों की सूची में शामिल है. रजनीश कुमार उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल भी हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे टीएस मिश्रा और केएन मिश्रा के भतीजे उपेंद्र मिश्रा को भी जज बनाने की सिफारिश की गई है. उपेंद्र मिश्रा इलाहाबाद हाईकोर्ट के सरकारी वकील हैं. पहले भी वे चीफ स्टैंडिंग काउंसिल रह चुके हैं. उपेंद्र मिश्र की एक योग्यता यह भी है कि वे बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा के भाई हैं. इसी तरह हाईकोर्ट के जज रहे एचएन तिलहरी के बेटे आरएन तिलहरी और जस्टिस एसपी मेहरोत्रा के बेटे मनीष मेहरोत्रा को भी जज बनने लायक पाया गया है. इनके भी नाम लिस्ट में शामिल हैं. लखनऊ बेंच से जिन लोगों के नाम जज के लिए चुने गए, उनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल (2) श्रीमती संगीता चंद्रा और राजकीय निर्माण निगम व सेतु निगम के सरकारी वकील शिशिर जैन के नाम भी शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे का नाम भी जज के लिए भेजा गया है. इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्वनामधन्य जज रहे जगदीश भल्ला के भांजे अजय भनोट और न्यायाधीश रामप्रकाश मिश्र के बेटे राजीव मिश्र का नाम भी जजों के लिए अग्रसारित सूची में शामिल है. अंधेरगर्दी की स्थिति यह है कि हाईकोर्ट के जज रहे पीएस गुप्ता के बेटे अशोक गुप्ता और भांजे राजीव गुप्ता दोनों में ही जज बनने लायक योग्यता देखी गई और दोनों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेज दिए गए. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सिटिंग जज एपी शाही के साले बीके सिंह का नाम भी अनुशंसित सूची में शामिल है. सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार के चीफ स्टैंडिग काउंसिल सीडी सिंह का नाम भी जजों के लिए चयनित सूची में शामिल है.

यह मामला अत्यंत गंभीर इसलिए भी है कि जजों की नियुक्ति की यह लिस्ट खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने तैयार की और अपनी संस्तुति के साथ सुप्रीम कोर्ट भेजी. चंद्रचूड़ अब खुद सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश हैं. उन्हें न्याय के साथ न्याय करने के लिए ही तरक्की देकर सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया होगा. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई संस्तुति ने उनकी न्यायिकता और उन्हें तरक्की देने के मापदंड की न्यायिकता दोनों को संदेह में डाला है. डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वाईवी चंद्रचूड़ के बेटे हैं.

वकीलों का यह सवाल वाजिब है कि क्या जजों की नियुक्ति के लिए किसी ताकतवर जज का रिश्तेदार होना या एडिशनल एडवोकेट जनरल, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल या गवर्नमेंट एडवोकेट होना अनिवार्य योग्यता है? क्या सरकारी वकीलों (स्टेट लॉ अफसर) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत वकील माना जा सकता है? संविधान के ये दोनों अनुच्छेद कहते हैं कि जजों की नियुक्ति के लिए किसी वकील का हाईकोर्ट या कम से कम दो अदालतों में सक्रिय प्रैक्टिस का 10 साल का अनुभव होना अनिवार्य है. क्या इसकी प्रासंगिकता रह गई है? भेजी गई लिस्ट में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने कभी भी किसी आम नागरिक का मुकदमा नहीं लड़ा. काला कोट पहना और पहुंच के बूते सरकारी वकील हो गए, सरकार की नुमाइंदगी करते रहे और जज के लिए अपना नाम रिकमेंड करा लिया.

वर्ष 2000 में भी 13 जजों की नियुक्ति में धांधली का मामला उठा था, जिसमें आठ नाम विभिन्न जजों के रिश्तेदारों के थे. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने जजों की नियुक्ति के लिए देशभर के हाईकोर्ट से भेजी गई लिस्ट की जांच का आदेश दिया. जांच में पाया गया कि 159 सिफारिशों में से करीब 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के बेटों या रिश्तेदारों के लिए की गई थीं. जांच के बाद अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद कानून मंत्रालय ने वह सूची खारिज कर दी थी.

जजों की नियुक्ति में जजों द्वारा ही धांधली किए जाने का मामला बाद में जनेश्वर मिश्र ने राज्यसभा में भी उठाया. इसके जवाब में तब कानून मंत्री का पद संभाल चुके अरुण जेटली ने सदन को आधिकारिक तौर पर बताया था कि औपचारिक जांच पड़ताल के बाद लिस्ट खारिज कर दी गई. उस खारिज लिस्ट में शुमार कई लोग बाद में जज बन गए और अब वे अपने रिश्तेदारों को जज बनाने में लगे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन और जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. इम्तियाज मुर्तजा के पिता मुर्तजा हुसैन भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे. अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को जज बनाने के लिए संस्तुति सूची में शामिल कर लिया गया है.

इस प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जजों की नियुक्ति में धांधली और भाई-भतीजावाद के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक पांडेय द्वारा दाखिल की गई याचिका खारिज कर दी गई थी और अशोक पांडेय पर 25 हजार का जुर्माना लगाया गया था. जबकि अशोक पांडेय द्वारा अदालत को दी गई लिस्ट के आधार पर ही केंद्रीय कानून मंत्रालय ने देशभर से आई ऐसी सिफारिशों की जांच कराई थी और जांच में धांधली की आधिकारिक पुष्टि होने पर जजों की नियुक्तियां खारिज कर दी थीं.

अशोक पांडेय ने कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई मौजूदा लिस्ट में बरती गई अनियमितताओं के खिलाफ उन्होंने फिर से याचिका दाखिल की और फिर हाईकोर्ट ने उस पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई. अदालत ने एडवांस कॉस्ट के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश देते हुए कहा कि इसके बाद ही मामले पर सुनवाई की जाएगी. पांडेय चिंता जताते हैं कि संविधान और कानून से जुड़े इतने संवेदनशील मामले को 25 हजार रुपये के लिए अदालत ने लंबित रख दिया है. धांधली की यह सूची प्रधानमंत्री और कानून मंत्री को भेजने के बारे में अशोक पांडेय विचार कर रहे हैं, क्योंकि उनके द्वारा भेजी गई सूची पर ही तत्कालीन कानून मंत्रालय ने वर्ष 2000 में कार्रवाई की थी.

न्याय व्यवस्था को सत्ता-प्रभाव में लाने का चल रहा षडयंत्र

सरकारी वकीलों को जज बना कर पूरी न्यायिक व्यवस्था को शासनोन्मुखी करने का षडयंत्र चल रहा है. सीधे तौर पर नागरिकों से जुड़े वकीलों को जज बनाने की परंपरा बड़े ही शातिराना तरीके से नष्ट की जा रही है. कुछ ही अर्सा पहले अधिवक्ता कोटे से जो 10 वकील जज बनाए गए थे, उनमें से भी सात लोग राजीव शर्मा, एसएस चौहान, एसएन शुक्ला, शबीहुल हसनैन, अश्वनी कुमार सिंह, देवेंद्र कुमार अरोड़ा और देवेंद्र कुमार उपाध्याय उत्तर प्रदेश सरकार के वकील (स्टेट लॉ अफसर) थे. इनके अलावा रितुराज अवस्थी और अनिल कुमार केंद्र सरकार के लॉ अफसर थे.

वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता देने में भी भीषण अनियमितता हो रही है. नागरिकों के मुकदमे लड़ने वाले वकीलों को लंबा अनुभव हो जाने के बावजूद उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की मान्यता नहीं दी जाती, जबकि सरकारी वकीलों को बड़ी आसानी से वरिष्ठ वकील की मान्यता मिल जाती है. कुछ ही अर्सा पहले लखनऊ बेंच के चार वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी गई, जिनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल आईपी सिंह, एडिशनल एडवोकेट जनरल बुलबुल घोल्डियाल, केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल असित कुमार चतुर्वेदी और सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के वकील शशि प्रताप सिंह शामिल हैं. लखनऊ में अनुभवी और विद्वान वकीलों की अच्छी खासी तादाद के बावजूद हाईकोर्ट को उनमें कोई वरिष्ठ अधिवक्ता बनने लायक नहीं दिखता. ऐसे रवैये के कारण वकीलों में आम लोगों के मुकदमे छोड़ कर सरकारी वकील बनने की होड़ लगी हुई है. सब इसके जुगाड़ में लगे हैं और इससे न्याय की मूलभूत अवधारणा बुरी तरह खंडित हो रही है.

जजी भी अपनी, धंधा भी अपना…

जजों के रिश्तेदार जज बन रहे हैं और जजों के रिश्तेदार उन्हीं के बूते अपनी वकालत का धंधा भी चमका रहे हैं. न्याय परिसर में दोनों तरफ से जजों के रिश्तेदारों का ही आधिपत्य कायम होता जा रहा है. जजों के बेटे और रिश्तेदारों की आलीशान वकालत का धंधा जजों की नियुक्ति वाली लिस्ट की तरह कोई चोरी-छिपी बात नहीं रही. यह बिल्कुल सार्वजनिक मामला है. आम लोग भी जजों के रिश्तेदार वकीलों के पास ही जाते हैं, जिन्हें फीस देने से न्याय मिलने की गारंटी हो जाती है.

जजों के रिश्तेदारों की उन्हीं के कोर्ट में वकालत करने की खबरें कई बार सुर्खियां बन चुकी हैं. हाईकोर्ट की दोनों पीठों के दर्जनों नामी-गिरामी जजों के बेटे और रिश्तेदार वहीं पर अपनी वकालत का धंधा चमकाते रहे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन के भाई अब्दुल मोईन, जस्टिस अभिनव उपाध्याय के बेटे रीतेश उपाध्याय, जस्टिस अनिल कुमार के पिता आरपी श्रीवास्तव, भाई अखिल श्रीवास्तव और बेटे अंकित श्रीवास्तव, जस्टिस बालकृष्ण नारायण के पिता ध्रुव नारायण और बेटा ए. नारायण, जस्टिस देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे विशेष सिंह, जस्टिस देवी प्रसाद सिंह के बेटे रवि सिंह, जस्टिस दिलीप गुप्ता की साली सुनीता अग्रवाल, जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा के भाई रिशाद मुर्तजा और नदीम, जस्टिस कृष्ण मुरारी के साले उदय करण सक्सेना और चाचा जीएन वर्मा, जस्टिस प्रकाश कृष्ण के बेटे आशीष अग्रवाल, जस्टिस प्रकाशचंद्र वर्मा के बेटे ज्योतिर्जय वर्मा, जस्टिस राजमणि चौहान के बेटे सौरभ चौहान, जस्टिस राकेश शर्मा के बेटे शिवम शर्मा, जस्टिस रवींद्र सिंह के भाई अखिलेश सिंह, जस्टिस संजय मिश्र के भाई अखिलेश मिश्र, जस्टिस सत्यपूत मेहरोत्रा के बेटे निषांत मेहरोत्रा और भाई अनिल मेहरोत्रा, जस्टिस शशिकांत गुप्ता के बेटे रोहन गुप्ता, जस्टिस शिवकुमार सिंह के बेटे महेश नारायण और भाई बीके सिंह, जस्टिस श्रीकांत त्रिपाठी के बेटे प्रवीण त्रिपाठी, जस्टिस सत्येंद्र सिंह चौहान के बेटे राजीव चौहान, जस्टिस सुनील अम्बवानी की बिटिया मनीषा, जस्टिस सुरेंद्र सिंह के बेटे उमंग सिंह, जस्टिस वेद पाल के बेटे विवेक और अजय, जस्टिस विमलेश कुमार शुक्ला के भाई कमलेश शुक्ला, जस्टिस विनीत शरण के पिता एबी शरण और बेटे कार्तिक शरण, जस्टिस राकेश तिवारी के साले विनीत मिश्रा, जस्टिस वीरेंद्र कुमार दीक्षित के बेटे मनु दीक्षित, जस्टिस यतींद्र सिंह के पिता विकास चौधरी, भतीजा कुणाल और बहू मंजरी सिंह, जस्टिस सभाजीत यादव के बेटे पीपी यादव, जस्टिस अशोक कुमार रूपनवाल की बिटिया तनु, जस्टिस अमर शरण के भतीजे सिकंदर कोचर, जस्टिस अमरेश्वर प्रताप शाही के ससुर आरएन सिंह और साले गोविंद शरण, जस्टिस अशोक भूषण के भाई अनिल और बेटे आदर्श व जस्टिस राजेश कुमार अग्रवाल के भाई भरत अग्रवाल अपनी वकालत का धंधा अपने रिश्तेदार जजों के बूते ही चमकते रहे हैं.

लेखक प्रभात रंजन दीन वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं. उनका यह लिखा चौथी दुनिया से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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मेरे गरीब चौकीदार पिता को इस जज ने नौकरी से निकाल दिया, अब घर कैसे चलेगा

Dear Sir,

I m pallvi from ambala city. I just want to say that My father Ramesh kumar was working in Haryana Court Ambala city as a chownkidar from 20 years under session judge (Mr.Jaiveer singh Hudda). Before 5 years, My father suspended by Mr. Jaivir Singh hUdda with wrong ellications. At that time my father was working in hudda’s Kothi. But in which document Mr. Hudda Said that everything wrong in court then he suspended my father. At that time 15 Employees suspended by Mr.Hudda. One person can make mistake. But 15 Peoples can’t do at same time.

My father is a very poor man. Then we caused in Chnadigarh high Court then My father won the cause from High court. But after Some time Mr. Hudda Said that u are Fail in your enquiry. Then we Caused again delhi Supreme court. Then Advocate Mr. Anand Mishra got 25,000/- from us for this cause. But Problem is not solved. After a long time Mr. Mishra said that your cause has been dismissed.

But in which Hudda’s Kothi My father was very harrsed by Mr. Hudda, and Mrs. Hudda. Even my father slapped by Mrs. Hudda. Mr. Hudda said that in his documents that broken the fans and glasses But its common sense when this was happening in the court, then Mr. HUdda also will complained in other department. But there are no any complaint regarding that. Everything prove that every elications are false against my father.

In which my family, There are 5 Members. My mother is a house wife. Now we want to again join this job. If its not possible then we want to retirement from this job. We will thankfull to you. Becoz I also want to higher study. If in which anything wrong, I m so sorry for that.

We have a great hope from you.

Thanking you

Pallvi Kashyap
pallvik3@gmail.com

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मजीठिया वेज बोर्ड : शपथ पत्र के इस प्रारूप को डाउनलोड कर सही विवरण भरें और दस्तखत करके भेजें

सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड की हालिया सुनवाई के दौरान इस बात का संज्ञान लिया कि मीडिया मालिक मजीठिया वेज बोर्ड की मांग करने वाले कर्मियों को विविध तरीके से प्रताड़ित कर रहे हैं. कोर्ट ने इस संबंध में पीड़ितों को अपनी बात और पीड़ा रखने का अनुरोध माना. कोर्ट ने वकीलों से कहा कि वे पीड़ित प्रताड़ित कर्मियों की बात कोर्ट के सामने ले आएं.

इसी संबंध में एडवोकेट उमेश शर्मा ने एक फार्मेट तैयार किया है जिसे भरकर वे सभी लोग उन्हें भेज दें जो उनके जरिए सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ रहे हैं. नीचे एफीडेविट का प्रारूप दिया गया है जिसे क्लिक कर डाउनलोड करें और फिर अपना सही विवरण भरने के बाद दस्तखत करें. इसके बाद भेज दें.

एफीडेविट का प्रारूप डाउनलोड करने के लिए इस पर क्लिक करें>

supreme court affidevit

उपरोक्त प्रारूप को सही तरीके से भर कर और हस्ताक्षर कर के इस पते पर डाक या कूरियर के जरिए भेज दें>

Advocate Umesh Sharma
(wage board case affidevit)
112, New Delhi House
27, Barakhambha Road
Connaught Place
New Delhi-110001


मूल पोस्ट>

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर जो लोग प्रताड़ित किए जा रहे, वे अपना डिटेल एडवोकेट उमेश शर्मा को भेजें

xxx

मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में हो रही देरी पर यशवंत ने मुख्य न्यायाधीश को भेजा पत्र

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Yashwant Singh Versus Salman Salim Khan

: सलमान खान को अवैध तरीके से जमानत दिए जाने के खिलाफ 13 मई 2015 को सुप्रीम कोर्ट में दायर PIL का संपूर्ण कंटेंट :

IN THE SUPREME COURT OF INDIA

(EXTRAORDINARY CRIMINAL WRIT JURISDICTION)

WRIT PETITION (CRIMINAL) NO. xxx 2015

In the matter of:

MEMO OF PARTIES

 …Petitioner

Yashwant Singh
S/o Sh. Lalji Singh,
R/o J-51, East Vinod Nagar,
Delhi-110092.                       

Versus

…Respondent No.1

1.Union of India
Through Its Secretary, Home,
South Block,
New Delhi.

…Respondent No.2.

2.Salman Salim Khan
S/o Salim Khan,
Age: 49 yrs.,
Occ. Cine Artist ,
R/o  Galaxi Apartment, B. J. Road,
Bandstand, Bandra (W.), Mumbai.

DRAWN AND FILED BY:

YASHWANT SINGH

PETITIONER IN PERSON.

IN THE SUPREME COURT OF INDIA

(EXTRAORDINARY CRIMINAL WRIT JURISDICTION)

WRIT PETITION (CRIMINAL) NO. xxx 2015

IN THE MATTER OF :

PUBLIC INTEREST PETETION

Yashwant Singh
S/o Sh. Lalji Singh,
R/o J-51, East Vinod Nagar,
Delhi-110092.                       
…Petitioner

Versus

1.Union of India
Through Its Secretary, Home,
South Block,
New Delhi.                       
…Respondent No.1

2.Salman Salim Khan
S/o Salim Khan,
 Age: 49 yrs.,
Occ. Cine Artist ,
R/o  Galaxi Apartment, B. J. Road,
Bandstand, Bandra (W.), Mumbai.       
…Respondent No.2.

PUBLIC INTEREST PETITION UNDER ARTICLE 32 OF THE CONSTITUTION OF INDIA FOR ISSUANCE OF A WRIT.

To

The Hon’ble The Chief Justice of India and His Lordship’s Companion

Justices of the Supreme Court of India;

The Humble petition of the Petitioner above named:

MOST RESPECTFULLY SHEWETH:

1. The Petitioner is constrained to invoke the extra ordinary, highly prerogative jurisdiction of the court by way of the present PIL as the present matter concerns larger public interest , credibility of the institution of judiciary and the justice dispensation system in India. That the petitioner is filing the present writ petition in public interest. The petitioner has no personal interest in the litigation and the petition is not guided by self-gain or for gain of any other person / institution / body and that there is no motive other than of public interest in filing the writ petition.

That the petitioner has based the instant writ petition from authentic information and documents obtained from various governments departments/portals/RTIapplications.

That the petition, if allowed, would benefit the citizens of this country generally as rule of law is essential for democracy and such brazen violation of law by the respondents can be stopped by the orders of this Hon’ble Court only. That the persons affected by such acts of the State are numerous and are not in a position to approach the Hon’ble Court hence the petitioner is filing the present PIL on behalf of such affected persons.

Question(s) of Law:

Whether the High Court of Mumbai can deviate from the standard prescribed judicial process and grant orders in a criminal appeal when the appeal itself has not been presented in the manner prescribed under the law and the process prescribed under the High Court rules of Mumbai and whether the entertaining of such petition by the High Court at the pre-mature stage would not amount to hostile discrimination with other such similarly situated appellants whose appeal has not been taken up by the High Court earlier?

Whether the High Court under exercise of its powers of appeal under the Criminal Jurisdiction can ignore the rules governing the listing of the criminal appeals before the bench and can grant orders in a criminal appeal which is neither filed properly nor has any extenuating circumstances leading to the exemption being granted by the High Court out of way?

Whether Article 14 of the Constitution of India is only a decorative legal provision for the courts dispensing justice and whether the High Court can discriminate in listing and hearing of a petition out of turn in gross violation of law when the said appeal is neither filed in proper format nor accompanied with the impugned judgement and sentence order against which he said appeal has been filed.

Whether Article 14 of the Constitution of India does not mandate equal treatment of all before the courts ?

Whether the present case does not   call for interference by this Hon’ble Court in its wide powers as enshrined under Article 32 of the Constitution of India?

Whether the manner in which the Courts of Sessions and the High Court of Bombay has dealt with the present case are not bound to cause serious apprehensions in the minds of the general public that the judicial process in India is prone to be exploited and misused by the influential persons wherein the courts have also resorted to pick and choose instead of translating the maxim of “Eqaulity before law” into reality and give similar treatement to all accused/convicts irrespective of their social, economic status?
Whether the deviation by the Courts of Session in dealing with the present matter is not irregular and need the indulgence of this Hon’ble court for remedifying the wrong done and the dent caused to the entire judicial system of the country?

Whether the act of entertaining the criminal appeal by the High Court of Bombay is not irregular and against the established practice being followed since long?
Whether the act of Bombay High Court in listing the Criminal Appeal filed by the respondent No.2 for final disposal on 15/7/2015 is not a hostile discrimination with the persons whose appeals are awaiting listing since long and some of them are languishing in jail since years being convicted by the trial court?

Whether the act of the Court of Sessions , Bombay in deviating from the dictum of Allauddin Milan vs State of Bihar [1989 SCC (3) 5], without any valid reason has not caused serious irregularity in the criminal justice system and has ultimately helped the respondent No.2 in gaining benefit of suspension of sentence by the High court?
GROUNDS

Because, the High Court of Mumbai can not deviate from the standard prescribed judicial process and grant orders in a criminal appeal when the appeal itself has not been presented in the manner prescribed under the law and the process prescribed under the High Court rules of Mumbai and whether the entertaining of such petition by the High Court at the pre-mature stage would not amount to hostile discrimination with other such similarly situated appellants whose appeal has not been taken up by the High Court earlier.

Because, the High Court under exercise of its powers of appeal under the Criminal Jurisdiction can not ignore the rules governing the listing of the criminal appeals before the bench and can grant orders in a criminal appeal which is neither filed properly nor has any extenuating circumstances leading to the exemption being granted by the High Court out of way.

Because, Article 14 of the Constitution of India is not  a decorative legal provision for the courts dispensing justice and whether the High Court can discriminate in listing and hearing of a petition out of turn in gross violation of law when the said appeal is neither filed in proper format nor accompanied with the impugned judgement and sentence order against which he said appeal has been filed.

Because, Article 14 of the Constitution of India   mandate equal treatment of all before the courts.

Because,  the present case calls for interference by this Hon’ble Court in its wide powers as enshrined under Article 32 of the Constitution of India.
Because, the manner in which the Courts of Sessions and the High Court of Bombay has dealt with the present case it is bound to cause serious apprehensions in the minds of the general public that the judicial process in India is prone to be exploited and misused by the influential persons wherein the courts have also resorted to pick and choose instead of translating the maxim of “Eqaulity before law” into reality and give similar treatement to all accused/convicts irrespective of their social, economic status.
Because, the deviation by the Courts of Session in dealing with the present matter is  irregular and need the indulgence of this Hon’ble court for remedifying the wrong done and the dent caused to the entire judicial system of the country.

Because, the act of entertaining the criminal appeal by the High Court of Bombay is not irregular and against the established practice being followed since long.

Because, the act of Bombay High Court in listing the Criminal Appeal filed by the respondent No.2 for final disposal on 15/7/2015 is not a hostile discrimination with the persons whose appeals are awaiting listing since long and some of them are languishing in jail since years being convicted by the trial court.

Because, the act of the Court of Sessions , Bombay in deviating from the dictum of Allauddin Milan vs State of Bihar [1989 SCC (3) 5], without any valid reason has  caused serious irregularity in the criminal justice system and has ultimately helped the respondent No.2 in gaining benefit of suspension of sentence by the High court

AVERMENTS:
That the petitioner is constrained to approach this Hon’ble Court against the wide public outcry happening due to the arbitrary and irregular handling of the matter not only by the Sessions Court at Mumbai but also the High Court of Mumbai which is causing a serious doubt over the intention and conduct of the judicail system in India and the public at large is shocked and surprised to see the twisting of the law by the influential persons which makes a mockery of the rule of law in the country and more specifically the equality before law.

That the facts related to the present matter are such startling that will shake the judicail conscience.

That the respondent No.2 is a renowned film star and a celebrity which has influence the young generation of the country by his acting in the films and has innumerable number of fans in India as well as outside India. He behaved in most irresponsible and rash manner and caused a serious road accident while driving in the influence of liquir leading to the registration of FIR on 27/9/2002 wherein he killed one person on road and injured other four persons due to his conduct.

That the FIR was sent to trial before Sessions court at for Greater Bombay at Bombay and registered as case No. 240 of 2013 on the basis of CR No. 326/2002 at Ps Bandra, Mumbai. The court framed charges under Section 304, Part-II, 337,338IPC read with Section 134(A) (B), 187, 181, 185 MV Act.

That the court of session after a prolonged trial of the matter during which the respondent No.2 used all tactics to derail and delay the trial. The Sessions Court found the said respondent NO.2 guilty of all the charges framed against him and recorded the findings as under in the operative part of the judgement dated 6/5/2015:

“Hence in view of the documentary, ocular and expert evidence as referred above, clearly show that accused committed offence of culpable homicide not amounting to murder with the knowledge that the acts/injuries caused by him, seen in the light of manner in which he drove the car in rash and negligent manner, while taking right turn on the Hill Road from St. Andrews Road under the influence of the liquor would cause death or likely to cause death. In fact accused caused the death of Nurulla and also caused grievous injuries and simple injuries to the other labours. Hence I hold him guilty punishable under Section 304 (II), 338 and 337 of the IPC. Accused was not holding the valid license and therefore he also committed an offence punishable under Section 181 of the Motor Vehicles Act, 1988. Accused also failed to provide medical help to the injured and also failed to give information or report to the police about the incident thereby accused committed an offence punishable u/s 187 of Motor Vehicles Act, 1988. There was alcohol noticed to the extent of 0.062 % m.g., which is exceeding 30 m.g. per 100 m.l., therefore, accused also committed an offence punishable under Section 185 of Motor Vehicles, Act, 1988.’

That the court however adopted a peculiar and unconventional method and proceeded to pass the sentence order on the same day and sentenced him for a period of five years and few months under different sections of IPC and MV Act alongwith fine on the same day which is in variation of the established practice of sentencing the guilty on a subsequent day keeping in view the ratio of the judgement of this Hon’ble Court in Allauddin Milan vs State of Bihar [1989 SCC (3) 5], the copy of the juddgement and sentence order of the Court of Sessions, Greater Bombay, Bombay in Case No. 240/2013 dated 6/5/2015 is being filed herewith as ANNEXURE-P-1.

That the said sentencing was done till evening at around 4.00PM as reported in the media however the matter was mentioned by the counsel for the said respondent No.2 before the High Court of Mumbai on the same day in the evening and a spacious plea that the copy of the judgement was not handed over to the said respondent was taken however no prejudice being caused due the same was shown. The High Court strangely and giving the go bye to the established practice in such matters passed orders dated 6/5/2015 and granted suspension of sentence to the accused, the respondent No.2 despite the fact that the copy of the impugned judgement and sentence order was not placed before the court neither any appeal as per the format filed, the copy of the order dated 6/5/2015 in Criminal Appeal No. 572/2015 passed by the High Court of Bombay is being filed herewith as ANNEXURE-P-2.

That vide the orders dated 6/5/2015 , the High Court of Bombay has ordered for the placing of the Criminal Appeal for hearing on 8/5/2015 before the bench accordingly, the same was placed before the bench for hearing on 8/5/2015 and the court passed the orders dated 8/5/2015 thereby suspending the sentence of the respondent No.2, the copy of the orders dated 8/5/2015 in Criminal Appeal No. 572/2015 as passed by the Bombay High Court is filed herewith as ANNEXURE-P-3.

That entire chain of events was being covered by the print media, electronic media and social media and the people were surprised by the manner in which the relief was granted to the respondent No.2 , bending the rules and going out of way which is in complete disregard of right to equal treatment to all in law. It is apparent that the respondent NO.2 was in a position to exploit the deliberate loopholes in the law hence was granted relief on flimsy grounds and by taking new routes in dispensation of justice.

That the people at large are shocked and surprised to see that even before the ink on the sentence order passed by the Court of Sessions was dry and even before the copy of the same could be served on the respondent No.2, the said order was challenged before the High Court of Mumbai and strangely enough the court entertained the Criminal Appeal filed without the copy of the judgement and odered for the suspension of sentence with promptness and the Court of Sessions remained waiting for the said order of suspension of sentence till late evening till 7.30 PM which is not the standard practice in the courts. It is strange and intriguing that the Court of Sessions remained waiting for the orders of the High Court till late in the evening despite the closing hours just because a celberity was involved .

That the Court of Sessions infact committed a serious irregularity of passing the judgement on the case and passing the sentencing order on the same day which is in violation of the ratio of the case mentioned above and to the knowledge of the petitioner the said Court of Sessions has not done so in any such case till date. The said irregularity was committed just because a celebrity was involved. This conduct of the court below makes the mockery of the equality before law and the general public is aghast to see the same. The mandate of this Court is reproduced hereunder for ready reference:

“We think as a general rule the Trial Courts should after recording the conviction adjourn the matter to a future date and call upon both the prosecu- tion as well as the defence to place the relevant material bearing on the question of sentence before it and thereafter pronounce the sentence to be imposed  on the offender. In the present case, as pointed out earlier, we are afraid that tile learned Trial Judge did not attach sufficient impor- tance to the mandatory requirement of sub-section (2) of Section 235 of the Code.”

That the social media is full of adverse comments on such a bending of the process which is bound to cast bad  impression on the general public on the impage of the judiciary.  Most of the comments on social media raise a finger towards the process of dispensation of justice which is dangerous for the country as the public at large is loosing faith in the judicial process and pointing out that the influential can manipulate and manage any relief for them by twisting the law.

That to the knowledge of the Petitioner the Court of Sessions Bombay has not passed the judgement of conviction and sentencing order of any accused on the same day earlier neither the court has ever waited for the orders from the High Court till 7.30 PM in the evening. The aforesaid behaviour of the Court of Sessions amounts to giving a special treatment to the case of the respondent No.2 and raises serious questions on the entire justice dispensation system.

That the petitioner being a social activist and a person with concern over the social issues is thus before the court seeking indulgence of the court in the matter so that the faith of the common man in the judicial system is maintained and the public at large does not loose their faith in the judicial system which will ultimately damage the rule of law in the country.

That the petitioner being a man of media has come across very hard hitting comments and outcry against the entire judicial system of the country where the people are casting serious aspersions on the entire judicial system not only in conventional medial but also on social media which has now become the mouthpiece of society. The petitioner has compiled some of such comments and is filing the same before the Court although the petitioner does not subscribe to the extreme views being expressed therein. The said views, comments are a stark reality of the society and need immediate attention by this Hon’ble Court so that the society at large does  not loose its faith in the entire jusicial system which will be very dangerious for the democracy. Some of the comments downloaded and printed by the petitioner after 8/5/2015 alongwith their printouts and true translated copies is being filed herewith as ANNEXURE-P-4.

That the present petitioner has not filed any other petition in any High Court or the Supreme Court of India on the subject matter of the present petition.

PRAYER

In the above premises, it is prayed that this Hon’ble Court may be pleased:

Issue, a writ, order or direction in the nature of Certiorari or any other appropriate writ, order or direction in favour of the petitioner and against the respondents thereby staying the orders dated 8/5/2015 passed by the Bombay High Court in Criminal Appeal No. 572/2015 filed by the respondent NO.2.

Issue, a writ, order or direction in the nature of Certiorari or any other appropriate writ, order or direction in favour of the petitioner and against the respondents thereby staying the suspension of sentence order dated 8/5/2015 passed by the High Court of Mumbai in Criminal Appeal No. 572/2015 and direct the respondent No.2 to surrender before the jail authorities in accordance with the rules.

To pass such other orders and further orders as may be deemed necessary on the facts and in the circumstances of the case.

FOR WHICH ACT OF KINDNESS, THE PETITIONER SHALL AS IN DUTY BOUND, EVER PRAY.

PETITIONER IN PERSON


मूल खबर:

सलमान खान को अवैध तरीके से जमानत दिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर

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सलमान खान को अवैध तरीके से जमानत दिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर

एडवोकेट उमेश शर्मा और पत्रकार यशवंत सिंह मीडिया को जनहित याचिका के बारे में जानकारी देते हुए.


एक बड़ी खबर दिल्ली से आ रही है. सलमान खान को मिली जमानत खारिज कर उन्हें जेल भेजे जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में आज एक जनहित याचिका दायर की गई. यह याचिका चर्चित मीडिया पोर्टल Bhadas4Media.com के संपादक यशवंत सिंह की तरफ से अधिवक्ता उमेश शर्मा ने दाखिल की. याचिका डायरी नंबर 16176 / 2015 है. जनहित याचिका के माध्यम से इस बात को अदालत के सामने लाया गया है कि सेशन कोर्ट बॉम्बे ने इस मामले में पहले से निर्देशित कानून का पालन जानबूझ कर नहीं किया जिसकी वजह से सलमान खान को बेल आराम से मिल गयी और इससे भारत के पढ़े-लिखे लोग सन्न है. हर तरफ कोर्ट पर सवाल उठाए जाने लगे. सोशल मीडिया पर कोर्ट के खिलाफ नकारात्मक टिप्पणियों की बाढ़ सी आ गई.

लोग सवाल उठाने लगे कि क्या किसी अदृश्य और बड़ी राजनीतिक ताकत के इशारे पर न्यायपालिका सिर के बल पलट गई और ऐसे ऐसे कारमाने किए कि न्यायपालिका पर से लोगों का भरोसा उठ गया. यह प्रश्न मूल रूप से उठाया गया है कि क्या कानून सभी के लिए बराबर है? अगर ऐसा है तो सेशन कोर्ट के जज साहब ने एक दिन में ही दोनों आदेश क्यों पारित किया जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 1989 में ही कहा था कि ऐसे मामलों में अदालत को दोनों आदेश दो दिनों में पारित करने चाहिये. Allauddin Mian vs State of Bihar [1989 SCC (3) 5] के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया प्रावधान इस प्रकार है-

“We think as a general rule the Trial Courts should after recording the conviction adjourn the matter to a future date and call upon both the prosecu- tion as well as the defence to place the relevant material bearing on the question of sentence before it and thereafter pronounce the sentence to be imposed on the offender. In the present case, as pointed out earlier, we are afraid that tile learned Trial Judge did not attach sufficient importance to the mandatory requirement of sub-section (2) of Section 235 of the Code.”

सेशन कोर्ट के जज साहब के ऐसा करने की वजह से आर्डर की कॉपी उसी दिन उपलब्ध नहीं हो सकी और हाई कोर्ट ने इसी तर्क के आधार पर बेल दे दिया. ऐसा प्रतीत होता है कि यह साब जान बूझ कर सलमान को फायदा पंहुचाने के लिए किया गया और उनको फायदा पंहुचा भी दिया गया. सेशन कोर्ट के जज साहब शाम को सात बजे तक अपने द्वारा जान बूझ कर की गई गलती से सृजित होने वाले बेल आर्डर का इंतजार क्यों करते रहे और क्या उन्होंने ऐसा पहले कभी किया है. क्या हाई कोर्ट बिना फैसले की कॉपी के अपील सुन सकती है और सजा टाल सकती है? कोई भी अपील हाई कोर्ट के सामने बिना फैसले के कॉपी को सलंग्न किए बिना अदालत के सामने रखी ही नहीं जाती है तो इसमें ऐसा क्यों किया गया और क्या पहले ऐसा किया गया है और क्या आगे ऐसा किया जायेगा? क्या हाई कोर्ट सलमान खान के अपील को पंद्रह जुलाई को फैसले के लिये भेज सकता है और इस बात की परवाह किये बिना कि हजारों अपीलें लाइन में लगी अपने सुनवाई का इंतजार कर रहीं हैं और उनके मुलजिम जेलों में बैठे हैं. क्या अदालतें जो समानता का अधिकार दिलवाती हैं वो खुद समानता के अधिकार का हनन कर सकती हैं. जनहित याचिका के साथ सोशल मीडिया में न्यायालय के खिलाफ की गईं नकारात्मक टिप्पणियों की प्रति भी संलग्न की गई है ताकि कोर्ट आइना देख सके.

याचिका को लेकर पत्रकार यशवंत सिंह और अधिवक्ता उमेश शर्मा के बयान इन वीडियो लिंक पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं: 1- https://goo.gl/efqsMc   xxx  2-  https://goo.gl/Q0xghP   xxx 3-  https://goo.gl/0lp1Vv    

ज्यादा जानकारी के लिए संपर्क करें:

Umesh Sharma, Adv: 09868235388; e-mail: legalhelplineindia@gmail.com

Yashwant Singh, Petitioner: 09999966466; email: yashwantdelhi@gmail.com

PRESS RELEASE

The present PIL (Diary No. 16176 / 2015) has been filed by Yashwant Singh, journalist who is concerned about the criminal justice system of India being manipulated by rich and influential persons. The petition raises an important question of equality before law being followed and practised by the courts in letter and spirit. Salman Khan, the famous film star was convicted and sentenced in 304, Part-II, 337,338 IPC read with Section 134(A) (B), 187, 181, 185 MV Act and punishment of 5 years and few months was awarded on him on 6/5/2015 by the Sessions Court Bombay. 

The Sessions Court passed the order of conviction and the order of sentencing on the same day which is in violation of judgement of Supreme Court of India which directs as under: Allauddin Mian vs State of Bihar [1989 SCC (3) 5]

“We think as a general rule the Trial Courts should after recording the conviction adjourn the matter to a future date and call upon both the prosecu- tion as well as the defence to place the relevant material bearing on the question of sentence before it and thereafter pronounce the sentence to be imposed on the offender. In the present case, as pointed out earlier, we are afraid that tile learned Trial Judge did not attach sufficient impor- tance to the mandatory requirement of sub-section (2) of Section 235 of the Code.”

High Court of Bombay entertaining the Criminal Appeal without the copy of the judgement and sentencing order in mentioning on the same day i.e. 6/5/2015 and granting a stay on surrender. Sessions court waiting for the order of the High Court till 7.30 PM in the evening in very unusual manner. Can the Session court cite any such example where it waited till 7.30 PM in the evening after sentencing the convict. It was done just because a celeberity was involved despite the fact that his guilt was established before the court and he was awarded the severiest punishment by the Sessions Court. Another irregularity is the fixing of the Criminal Appeal filed by Salman Khan for final disposal on 15 July, 2015 despite the fact that several appeals are awaiting listing and hearing since long and some of the convicts are languishing in jail for years.

This all violates the equal treatment of all before the law and is an example of hostile discrimination to the poor masses of the country who can not afford expensive lawyers and remain suffering. The rich and influential can manipulate the law for their benefit which is evident from this case.

For more details contacts

Umesh Sharma, Adv: 09868235388; e-mail: legalhelplineindia@gmail.com

Yashwant Singh, Petitioner: 9999966466; email: yashwantdelhi@gmail.com


जनहित याचिका में क्या कुछ लिखा गया है, यह जानने-पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें:

Yashwant Versus Salman

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भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सबसे बड़े गड़बड़झाले के बारे में होगा खुलासा, आप भी आइए

अगर आप फेसबुक पर हैं, अगर आप ट्वीटर पर हैं, अगर आप ब्लागर हैं, अगर आप न्यूज पोर्टल संचालक हैं, अगर आप अखबार में हैं, अगर आप मैग्जीन में हैं, अगर आप न्यूज चैनल में हैं, अगर आप किसी भी रूप में मीडियाकर्मी हैं, अगर आप सिटीजन जर्नलिस्ट हैं, अगर आप सोशल एक्टिविस्ट हैं, अगर आप जनसरोकारी हैं, अगर आप न्यायपालिका के वर्तमान चाल चरित्र से नाखुश हैं तो आप का इस आयोजन में पहुंचना बनता है. आयोजन यानि एक नए किस्म की प्रेस कांफ्रेंस. इसमें कारपोरेट मीडिया हाउसों के पत्रकार साथियों के अलावा ब्लागरों, सोशल मीडिया के यूजरों समेत अन्य सोच-समझ वाले लोगों को भी बुलाया गया है.

भारतीय न्यायिक व्यवस्था के सबसे बड़े गड़बड़झाले और इसके खिलाफ शुरू एक मुहिम के बारे में सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा और Bhadas4Media.com के संपादक यशवंत सिंह करेंगे खुलासा।

आप सभी आमंत्रित हैं… आइए, सुनिए समझिए और अपनी-अपनी कलम चलाइए, आवाज उठाइए ताकि ताकतवर लोगों के हाथों की कठपुतली बनती जा रही न्यायपालिका के पतन पर लगाम लगाया जा सके…

Date: 13 /05 /15
Time: 12.30 pm
Venue: 112, New Delhi House
27, Bara Khambha Road
(At gate No. 6, Metro Station Barakhambha) Connaught place.
(Parking inside the building on request)

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मजीठिया वेज बोर्ड के लिए अब भी कोई सुप्रीम कोर्ट में केस करना चाहता है तो स्वागत है : एडवोकेट उमेश शर्मा

(File Photo Advocate Umesh Sharma)

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा से भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने वो सवाल पूछा जिसे देश भर के कई मीडियाकर्मी आपस में एक दूसरे से पूछ रहे हैं. सवाल यह कि क्या सुप्रीम कोर्ट में कोई मीडियाकर्मी अब भी मजीठिया वेज बोर्ड का अपना हक पाने के लिए केस कर सकता है? एडवोकेट उमेश शर्मा ने बताया कि बड़े आराम से केस कर सकता है. चलते हुए केस में पार्टी बना जा सकता है, चाहें खुलकर या गोपनीय रहकर. इसके लिए वनटाइम फीस सात हजार रुपये देने होंगे.

याचिका दायर करने के लिए दिल्ली आने की भी जरूरत नहीं है. अगर खुल कर अपने नाम पता के साथ याचिका करना चाहते हैं तो आपको वकालतनामा का फार्मेट आनलाइन भेजा जाएगा जिस पर हस्ताक्षर करके आपको मेल से ही भेज देना होगा. जो गोपनीय रूप से लड़ना चाहते हैं उन्हें अथारिटी लेटर भेजा जाएगा जिस पर वह अपना डिटेल लिखकर भेज सकते हैं.  एडवोकेट उमेश शर्मा से यशवंत की बातचीत को सुनने के लिए नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक पर क्लिक कर सकते हैं..

https://www.youtube.com/watch?v=PlqZrf-_LBY

अगर आप मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर गोपनीय तरीके से या खुलकर सुप्रीम कोर्ट में केस डालना चाहते हैं तो अपना नाम, अपने संस्थान का नाम, पद, कार्यअवधि आदि का विवरण लिखकर भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह को उनकी मेल आईडी yashwant@bhadas4media.com पर मेल कर सकते हैं. भड़ास एडिटर यशवंत आपकी मेल को एडवोकेट उमेश शर्मा के साथ गोपनीय तरीके से डिस्कस करेंगे, तदुपरांत आपको मेल के जरिए या फोन के जरिए सूचित करेंगे. आप चाहें तो सीधे एडवोकेट उमेश शर्मा से भी संपर्क कर अपना केस डाल सकते हैं. एडवोकेट उमेश शर्मा से उनकी मेल आईडी legalhelplineindia@gmail.com या उनके आफिस के फोन नंबर 011-2335 5388 या उनके निजी मोबाइल नंबर 09868235388 के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

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मजीठिया वेज बोर्ड, 28 अप्रैल और सुप्रीम कोर्ट : क्या हुआ, क्या करें… वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा का इंटरव्यू

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