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साहित्य

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्ता की किताब ‘आपातकाल से अमृतकाल’ कई मायनों में अलग है!

Six adults in an office pose together, each holding an open red-framed booklet with text and images on the pages.

जयशंकर गुप्ता-

दो दिन पहले प्रभाकर प्रकाशन में मेरी पुस्तक ‘आपातकाल से अमृतकाल’ के आवरण का विमोचन वरिष्ठ कवि, लेखक, साहित्यकार, संपादक मदन कश्यप, असित जोशी, प्रभाकर प्रकाशन के संपादक अंशु चौधरी, नीहारिका सिंह एवं अन्य लोगों की गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न हुआ। अब इस पुस्तक के शीघ्र पाठकों तक पहुंचने की प्रतीक्षा है।

‘आपातकाल से अमृतकाल’ के बारे में संक्षिप्त…

Older man with glasses holding up a large, red-bordered booklet featuring Hindi text in an office setting, facing the camera.

आपातकाल, पिछले पांच दशकों से चर्चा और विवाद का विषय रहा है। तकरीबन हर साल आपातकाल की बरसी पर कुछ लोग खासतौर से आज के सत्तारूढ़ लोग और उनके समर्थक इसे भारतीय लोकतंत्र पर हुए कुठाराघात, संविधान की हत्या के प्रयास के लिए याद करते हैं तो कुछ विपक्ष और ख़ासतौर से विपक्षी-कांग्रेस के लोग पिछले 12 वर्षों के मोदी काल-अमृतकाल को कई मायने में आपातकाल से भी भयावह, ‘अघोषित आपातकाल’ बताते हैं।

आपातकाल और उन 21 महीनों के कालखंड में भारतीय लोकतंत्र पर लगे अल्पकालिक ग्रहण, राजनीतिक विरोधियों, सरकार से असहमति व्यक्त करने वालों के दमन, उत्पीड़न, जबरन नसबंदी, मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता को कुचलने, प्रेस-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के स्वरों को दबाने के प्रयासों के बारे में आज भी याद करने और खासतौर से आज की उस पीढ़ी के लिए भी जानना बहुत जरूरी है जो उस समय पैदा भी नहीं हुई थी या फिर आपातकाल के मायने समझने के लायक नहीं थी।

आपातकाल और अमृतकाल को लेकर दो तीन सहज सवाल जिज्ञासु मन में उठते हैं। इंदिरा गांधी ने आपातकाल क्यों लागू किया था! और फिर जब उनके पास तकरीबन एक साल का समय बाकी था, उन्होंने लोकसभा का चुनाव मार्च, 1977 में

क्यों करवाया जिसमें वह और उनकी पार्टी भी सत्ता से बेदखल हो गई थी। यह भी कि क्या इंदिरा गांधी के आपातकाल और नरेंद्र मोदी के ‘अमृतकाल’ में किसी तरह की तुलना संभव है!

आपातकाल पर बहुत सारी पुस्तकें बाजार में हैं। ‘आपातकाल से अमृतकाल’ उनमें से एक नहीं बल्कि कई मायने में उनसे अलग है। समाजवादी छात्र-युवा आंदोलन में सक्रिय, आपातकाल के दौरान अपने पिता के साथ महीनों जेल में रहे वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त की इस पुस्तक में न सिर्फ इन सवालों के बेबाक, तथ्यपरक और तार्किक जवाब खोजने की कोशिश की गई है, आपातकाल और उससे पहले देश के सामाजिक, राजनीतिक माहौल का वर्णन-विश्लेषण

और बाद के पांच दशकों में हुए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक बदलावों का तथ्यपरक विश्लेषण भी किया गया है। यह बताने की कोशिश की गई है कि पिछले पांच दशकों में कितनी सरकारें आईं और गईं। उनके कार्यकाल और खासतौर से ‘मोदी काल’ में क्या-क्या हुआ।

लोकतंत्र और संविधान मजबूत हुआ या कमजोर! संवैधानिक संस्थाओं, प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्थिति क्या रही! इस पुस्तक में इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी के राजनीति में वर्चस्व के संघर्ष से लेकर प्रधानमंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली का तुलनात्मक विश्लेषण भी किया गया है। यह समझने और बताने की कोशिश की गई है कि आपातकाल किसी एक राजनीतिज्ञ की सनक भर नहीं बल्कि एक खास तरह की एकाधिकारवादी मानसिकता, राजनीतिक सोच और संस्कृति का परिचायक था जो आज भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के भी कमोबेश सभी राजनीतिक दलों और उनके शीर्ष नेताओं में भी विद्यमान है।

यह पुस्तक जेपी आंदोलन-आपातकाल से लेकर अमृतकाल में कॉकरोच (छात्र-युवा) आंदोलन तक के सत्ता के दमनकारी चरित्र का विश्लेषण भी करती है। बहुत सरल और बोलचाल की भाषा में लिखी गई यह पुस्तक पढ़ने लिखने में रुचि रखने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्र-युवाओं, इतिहास, राजनीति और पत्रकारिता के शोध छात्रों के लिए भी उपयोगी और संग्रहणीय साबित होगी।

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