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प्रहलाद पटेल का सवाल और रजत शर्मा की शाहखर्ची

यशवंत सर

मैं पहली बार कुछ भड़ास मीडिया पर लिख रहा हूं और मेरा नाम मदन झा है। मैं वर्तमान में एक न्यूज चैनल में काम करता हूं और पूर्व में कई बड़े अखबारों में भी काम कर चुका हूं। मैं यह बताना चाहता हूं कि हाल ही में दमोह सांसद प्रहलाद पटेल जी ने जो मीडिया कर्मियों से सबंधित मुद्दा उठाया है वह एक कड़वा सच है, जिसे हमारे जैसे युवा एवं देश के सभी पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों के लिए एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। अभी हाल ही में इंडिया टीवी के रजत शर्मा जी ने आपकी अदालत के 21 वर्ष पूरे होने पर जो कार्यक्रम किया, यह तमाम उन पत्रकारों के मुंह पर जूता मारने जैसा है जो जिलों और कस्बों में कड़ी मशक्कत कर रिपोर्ट कवरेज करते हैं और जिसका उन्हें सही मुआवजा तक नहीं दिया जाता है।

यशवंत सर

मैं पहली बार कुछ भड़ास मीडिया पर लिख रहा हूं और मेरा नाम मदन झा है। मैं वर्तमान में एक न्यूज चैनल में काम करता हूं और पूर्व में कई बड़े अखबारों में भी काम कर चुका हूं। मैं यह बताना चाहता हूं कि हाल ही में दमोह सांसद प्रहलाद पटेल जी ने जो मीडिया कर्मियों से सबंधित मुद्दा उठाया है वह एक कड़वा सच है, जिसे हमारे जैसे युवा एवं देश के सभी पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों के लिए एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। अभी हाल ही में इंडिया टीवी के रजत शर्मा जी ने आपकी अदालत के 21 वर्ष पूरे होने पर जो कार्यक्रम किया, यह तमाम उन पत्रकारों के मुंह पर जूता मारने जैसा है जो जिलों और कस्बों में कड़ी मशक्कत कर रिपोर्ट कवरेज करते हैं और जिसका उन्हें सही मुआवजा तक नहीं दिया जाता है।

इस कार्यक्रम पर खर्च किया गया खुद के चैनल में कार्यरत पत्रकारों व कर्मचारियों में बांट देते तो शायद वो ताउम्र जिंदगी भर याद रखते और कितनों का तो भला हो जाता, लेकिन रजत शर्मा जैसे लोग अब पत्रकारों के खुदा हैं, उन्हें कौन कहे। हां ये जरूर हो सकता है कि अगर यूपी या बिहार में कोई मंत्री अपना जन्मदिन मना ले तो वो जरूर हायतौबा का विषय बन जाएगा। खैर छोड़िए मेरे जैसे लिखने वाले कई लोगों ने इन तमाम मुद्दों  और विषयों पर चर्चा किए, लेकिन लोहा लेने वाला कोई आगे नहीं आया, लेकिन चिंगारी जहां जली है वहां तो हवा दीजिए ताकि कुछ कर सकें।

बड़ी उम्मीदें हैं और बड़ी ही शिकायतें हैं कौन सुने मन की बात। काश मोदी होता तो शायद अपने मन की बात रेडियों प्रसारण के माध्यम से ही कह पाता, लेकिन मैं तो वो भी नहीं हूं। बातें और दिल में भड़ास तो न जाने कितने हैं, लेकिन शायद यह कॉलम पढने के बाद कई लोग अलग अलग प्रतिक्रिया देंगे, लेकिन प्रतिक्रिया कुछ भी हो, लेकिन प्रहलाद पटेल जी का उठाया मुद्दा जीवन और मृत्यु के बाद पत्रकारों के लिए तीसरा सबसे बड़ा सच है।

मदन झा

9329021253


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2 Comments

2 Comments

  1. kulwant Happy

    December 20, 2014 at 7:04 am

    जब तक आप अपनी क्षमता को नहीं पहचानेंगे। तब तक आपका मोदी होना भी कुछ मायने नहीं रखता। पत्रकारों की बुरी दशा के लिए पत्रकार ही जिम्मेदार हैं। जब आप अपनी बात रखते हैं, तो कड़े शब्दों में क्यों नहीं, निवेदन के रूप में क्यों,

  2. kulwant Happy

    December 20, 2014 at 7:07 am

    हकों के लिए लड़ने के लिए यशवंत होना पड़ता है। जेल को कभी कभी जानेमन बनाना पड़ता है।

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