वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा का जलवा इन तस्वीरों के जरिए जानें

सत्ता से करीबी के मामले में हेमंत शर्मा को इस दौर का सबसे ताकतवर पत्रकार माना जाता है. ऐसा पत्रकार जिनकी बेटी की शादी में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक चलकर आते हों. हेमंत शर्मा इंडिया टीवी चैनल में न्यूज डायरेक्टर के पद पर थे. वे जनसत्ता अखबार, लखनऊ से हटने के बाद दिल्ली आए और इंडिया टीवी से जड़ गए. रजत शर्मा के संरक्षण में हेमंत शर्मा ने सफलता की नित नई सीढ़ियां चढ़ी. Continue reading

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इंडिया टीवी में जबरदस्त उथल-पुथल, संत प्रसाद का इस्तीफा

इंडिया टीवी चैनल की टीआरपी लगातार गिरने से चैनल में हड़कंप मचा हुआ है. रजत शर्मा एंड कंपनी धांय-धूंय पर आमादा दिख रही है. सबसे भारी दबाव में अजीत अंजुम हैं. अंजुम जी के खासमखास आउटपुट हेड संत प्रसाद ने इस्तीफा दे दिया है. उधर, चर्चा है कि शाजी जमां या विनोद कापड़ी में से कोई एक इंडिया टीवी आ सकता है.

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रजत शर्मा के सिर पर बालों की खेती अच्छी हो गई है!

Sanjaya Kumar Singh : इंडिया टीवी पर आप की अदालत में सोनू निगम थे। सोनू निगम के कारण आज मोदी वाले एपिसोड के बाद रजत शर्मा को देखा। बालों की खेती अच्छी हो गई है। पर फिलहाल मुद्दा यह है कि एक सवाल के जवाब में सोनू ने कहा कि मैं भिखारी बनकर यह देखना समझना चाहता था कि बिना प्रचार, ब्रांडिंग और माइक आदि के सिर्फ मेरी आवाज का क्या महत्व है। और सत्तर साल के एक भिखारी के रूप में मैंने महसूस किया कि मेरी आवाज वही कोई 12-14 रुपए की है जो उस दिन उसे मिले थे। जिसे सोनू निगम ने फ्रेम करवाकर ऑफिस में रखा है। सोनू ने स्पष्ट किया कि आदमी पर सिर्फ उसकी योग्यता का नहीं और भी बहुत सारी चीजों का असर होता है।

इस कार्यक्रम को देखने के बाद Raghwendra Singh की एक पोस्ट पढ़ने को मिली, जो इस प्रकार है-

आज किसी चैनेल पर लालूजी की जीवनी के बारे में बता रहा था। इससे पता चलता है की लालूजी तो मोदीजी से भी महान हैं। मोदीजी शहर में चाय बेचकर pm बन गये लालूजी उससे भी बुरी हालात में थे। मज़दूरी कर, काठ का सिलेट पर पढ़ाई की और भंगरैया से उसे मिटाते थे और भैंस पर चढ़कर स्कूल जाते थे और कई दिन भूखे रहे थे पर कभी भी गाला फाड़ का नहीं बोले मैं मज़दूरी कर cm बने। अगर ये भी अपनी पब्लिसिटी करते तो pm बन सकते थे।

भले ही यह पोस्ट लालू यादव या उस कार्यक्रम से असहमति में हो पर मुझे लगता है कि ब्रांडिंग का अपना महत्व तो है। वरना चार लाख का डिजाइनर सूट पहनने वाला क्यों कहता कि उसे प्रधान सेवक बना दिया जाए। क्यों सबके खाते में 15 लाख रुपए आने का सपना दिखाता? और अगर किसी ने यह सब नहीं किया तो वह कहे भी नहीं? वह भी तब जब चाय बेचने की कहानी सबको मालूम है। मालगाडियों में भी चाय बेचते थे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा यूं हैं :

Ambrish Kumar खेती? यह कैसे संभव हुई.

Sanjaya Kumar Singh पैसों का खेल है। काफी दिन से चल रहा था। खेती 2009 में ही शुरू हो गई थी। आलोक तोमर ने तब ये लिखा था-
इससे तो टकले ही अच्छे थे रजत शर्मा!
http://old.bhadas4media.com/tv/1299-alok-tomar.html

Alka Bhartiya प्रचार करने वाले सारे साधन खरीद लिए हैं उन्होंने और साधनों के मालिक हैं की उसके आगे हाथ जोड़े खड़े हैं

Sanjaya Kumar Singh मामला सिर्फ प्रचार का नहीं। अनैतिक होने और उसकी सीमा का है। कुछ लोग प्रचार में बिल्कुल अनैतिक नहीं होते और भाजपा इसकी कोई सीमा नहीं मानती।

Anil Saxena अलका जी आपकी बात सही है लेकिन भाजपा का संगठन बहुत मजबूत है और इसी लिये अफवाह फैलाने में भी इनका कोई मुकाबला नही।

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टीआरपी गिरने से बौखलाए अजीत अंजुम ने कई पत्रकारों को इंडिया टीवी से निकाल बाहर किया

इंडिया टीवी इन दिनों पागलपन के मोड में चला गया है. टीआरपी लगातार दो हफ्ते से क्या गिरी, चैनल में आंय बांय सांय फरमान आने लगे हैं जिसका खामियाजा आम पत्रकारों को भुगतना पड़ रहा है. पहले तो फाइव डे वीक को खत्म कर सिक्स डे वीक कर दिया गया. इस आदेश से कर्मी अभी उबरे भी नहीं थे कि करीब आधा दर्जन लोगों को बाहर निकालने का आदेश जारी कर दिया. जो लोग निकाले गए हैं वो इनपुट से हैं.

शमशेर सिंह जो आजतक से वरिष्ठ पोजीशन पर इंडिया टीवी आए थे, उनको भी हटाए जाने की खबर है. इंडिया टीवी चैनल के क्राइम हेड विमल कौशिक और क्राइम टीम के सदस्य आशीष सारस्वत को भी प्रबंधन ने बिना वजह अचानक हटा दिया है. बीजेपी दिल्ली बीट देख रहे रिपोर्टर अभिमन्यु को भी चैनल से हटाए जाने की सूचना है. इसी तरह दो अन्य पत्रकारों को भी चैनल से हटा दिया गया है जिनका नाम नहीं मालूम हो सका है.

सबसे मजेदार ये है कि चैनल के मालिक रजत शर्मा खुद पत्रकार रहे हैं और अब पत्रकार कम चैनल मालिक के रूप में दोहरी भूमिका निभा रहे हैं. उनके बाद जो दो लोग सबसे ताकतवर हैं चैनल में वो हैं अजीत अंजुम और हेमंत शर्मा. इन दोनों को भी सरोकार और मनुष्यता पर अक्सर लिखते पढ़ते भाषण देते देखा सुना जा सकता है. लेकिन जब इनके चैनल की बात आती है तो इनके मुंह पर ताला लग जाता है क्योंकि आखिर खुद के पेट पर लात पड़ने से डर किसको नहीं लगता. इसलिए ये लोग खुद ही प्रबंधन को खुश करने वाले राय मशविरे दिया करते हैं जिसमें छंटनी से लेकर छुट्टियां खत्म करने जैसी सिफारिशें होती हैं. देखना है कि इस छंटनी और छुट्टी रद्दीकरण से चैनल की टीआरपी पहले जैसी हो जाती है या नहीं.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें…

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‘इंडिया टीवी’ में काम करने वाली महिलाओं को मैटरनिटी बेनिफिट क्यों नहीं देते रजत शर्मा?

‘इंडिया टीवी’ न्यूज चैनल में अपने यहां काम करने वाली महिलाओं का हक मारने में सबसे आगे है. यहां महिलाओं का सबसे ज्यादा शोषण होता है. एक एंकर ने तो जान तक देने की कोशिश की थी लेकिन अपने उंचे रसूख के चलते रजत शर्मा एंड कंपनी का बाल तक बांका न हुआ और पूरा मामला दबा दिया गया. देश की मीडिया वैसे तो बड़ी बड़ी बातें करती है. दूसरों को न्याय दिलाने की जंग लड़ने का दावा करती है लेकिन खुद के यहां शोषितों की आवाज दबा कर रखी जाती है. इंडिया टीवी देश के बड़े चैनलों में शुमार है. इसके मालिक रजत शर्मा ना सिर्फ एक बड़े पत्रकार हैं बल्कि सत्ता के गलियारों में भी धमक रखते हैं.

चैनल की कर्ताधर्ता रजत जी की पत्नी रीतू धवन खुद एक महिला हैं लेकिन वह अपने यहां काम करने वाली उन महिलाओं की आवाज सुनने को कतई तैयार नहीं जिनका सपना होता है मां बनना, काम करने के साथ साथ बच्चों की देखभाल करना. देश के तमाम सरकारी से लेकर निजी संस्थान तक अपने यहां काम करने वाली महिलाओं को मातृत्व लाभ देते हैं जिसके तहत उन्हें तीन महीने की छुट्टी सैलरी के साथ मिलती है. इसे हाल ही में बढ़ाकर मोदी सरकार ने छह महीने कर दिया है. केंद्र सरकार ने मातृत्व लाभ अधिनियम में संशोधन को 10 अगस्त 2016 को मंजूरी दे दी जिसके बाद अब कामकाजी महिलाओं को 26 सप्ताह के मातृत्व अवकाश का लाभ मिल रहा है. मैटरनिटी बेनिफिट बिल को सदन की मंजूरी के साथ ही ये कानून सरकारी क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र पर भी लागू हो गया.

अभी तक कामकाजी महिलाओं को 12 सप्ताह यानी तीन महीने के मातृत्व अवकाश की सुविधा मिली हुई थी. बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने बिल पारित होने के बाद कहा था कि यूनिसेफ के अनुसार जन्म होने के सात महीने तक मां का बच्चे की देखभाल करना जरूरी होता है इसलिए इस कानून के दूरगामी परिणाम होंगे. लेकिन जरा इंडिया टीवी की संवेदनहीनता देखिए जिससे कभी खुद मेनका गांधी भी जुड़ी रहीं. ये संस्थान इस कानून को अंगूठा दिखाता है. क्या इंडिया टीवी पर इस देश का कानून लागू नहीं होता? आखिर क्यों चैनल की मालकिन रीतू धवन को ये समझ नहीं आता कि कामकाजी महिलाओं के लिए दोहरी चुनौती होती है. बच्चों की देखभाल करना भी और घर का खर्च चलाना भी.

छह महीने के लिए मातृत्व का लाभ ना भी दे संस्थान तो कम से कम पुराने कानून के मुताबिक 3 महीने ही पेड लीव दे दे. इस मीडिया इंडस्ट्री के कई चैनल अपने यहां काम करने वाली महिलाओं को ये सुविधा देते हैं लेकिन इंडिया टीवी चंद रुपए बचाने के लिए कामकाजी महिलाओं का हक मार रहा है. रजत शर्मा और रीतू धवन को अपने यहां काम करने वाली महिलाओं को तत्काल प्रभाव से मेटरनिटी बेनिफिट देने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए. यह मामला सिर्फ पैसे का नहीं बल्कि मनुष्यता और संवेदनशीलता का है.

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#IndiaTvExposed : अजीत अंजुम जी, चोर की दाढ़ी में तिनका इसी को कहते हैं!

इंडिया टीवी का इतनी जल्दी डिफेंस मोड में आ जाना चौंकाने वाला है…

Sanjaya Kumar Singh : इंडिया टीवी #IndiaTvExposed से डिफेंस मोड में क्यों है? मुझे कथित अभियान, साजिश की सूचना संपादक अजीत अंजुम की पोस्ट से मिली। इमरान शेख की चिट्ठी में एक सर्वज्ञात और सबसे साधारण (आज कल के हिसाब से) आरोप के अलावा कोई खास बात नहीं है। अभी तो उसने प्रधानमंत्री से मिलकर सारी बात बताने के लिए समय भर मांगा है। मुझे नहीं लगता कि किसी विशेष संबंध या कारण के इमरान शेख को प्रधानमंत्री से मिलने का समय मिल पाएगा। फिर भी इंडिया टीवी का इतनी जल्दी डिफेंस मोड में आ जाना चौंकाने वाला है। चोर की दाढ़ी में तिनका इसी को कहते हैं।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने उपरोक्त एफबी पोस्ट में अजीत अंजुम की जिस पोस्ट का जिक्र किया है, वो इस प्रकार है…

Ajit Anjum : इंडिया टीवी के खिलाफ सोशल मीडिया पर #IndiaTVExposed का हैशटैग क्रिएट करके बेबुनियाद और तथ्यहीन Propaganda चलाया जा रहा है .. इंडिया टीवी के खिलाफ मुहिम चलाने वाले लोग इंडिया टीवी के एक पूर्व रिपोर्टर इमरान शेख की एक चिट्ठी को हथियार बनाकर सोशल मीडिया में चैनल के खिलाफ झूठा और तथ्यहीन दुष्प्रचार कर रहे हैं इंडिया टीवी से बाहर होने के एक साल बाद इमरान शेख ने पीएम मोदी के नाम चिट्ठी लिखकर चैनल पर मनगढ़ंत आरोप लगाया है कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में False and Fabricated खबरें करने को कहा गया . इससे परेशान होकर उन्होंने चैनल छोड़ दिया . इसी चिट्ठी को मुद्दा बनाकर #IndiaTVExposed हैशटैग के जरिए दुष्प्रचार करने वालों के लिए कुछ जरुरी तथ्य…

1 ) इमरान शेख मुंबई में एक साल पहले तक इंडिया टीवी के क्राइम/लोकल रिपोर्टर थे . जो लोग न्यूज चैनल की Functioning को थोड़ा भी जानते हैं , उन्हें पता होगा कि मुंबई के क्राइम रिपोर्टर का पीएम और केन्द्र सरकार की खबरों से कोई लेना-देना नहीं होता..मुंबई का क्राइम रिपोर्टर पीएम के पक्ष में न तो कई खबर कर सकता है, न ही उसे करने को कहा जा सकता है.

2 ) इंडिया टीवी से बाहर होने के एक साल तक तो इमरान शेख ने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही. न ही ऐसा कोई आरोप लगाया. एक साल बाद अचानक ऐसा आरोप लगाना इस बात का सबूत है कि कुछ लोगों ने या तो उसे साजिश का मोहरा बनाया या फिर उनकी मंशा संदिग्ध है.

3 ) मुंबई ब्यूरो में काम करने के दौरान डियूटी में उनकी लापरवाही की कई बार शिकायत मिली थी और खबरें मिस करने पर इंडिया टीवी के सीनियर एडिटर्स की तरफ से उन्हें लिखित और मौखिक चेतावनी भी दी गई थी. बार –बार चेतावनी के बाद उन्हें 8 अक्तूबर 2015 को दो दिन के लिए सस्पेंड कर दिया गया था. फिर भी उनका रवैया नहीं बदला और वो अपने वरिष्ठ सहयोगियों से बदसलूकी करते रहे .

4 ) इमरान शेख को कई बार उनके काम न करने /अपनी साथियों के साथ बदसलूकी करने और डियूटी पर लापरवाही वरतने के लिए चेतावनी दी गई. ये सारे तथ्य सितंबर – अक्तूबर 2015 में दिल्ली और मुंबई के कई सहयोगियों के बीच मेल पर हुए Chain of communication में मैजूद है.

5) 17 अक्तूबर 2015 को इमरान शेख ने अपने वकील से माध्यम से एक नोटिस भेजा , जिसमें उन्होंने तीन वरिष्ठ सहयोगियों के खिलाफ परेशान करने का आरोप लगाया लेकिन उस नोटिस में भी ऐसी कोई बात नहीं लिखी गई जो इंडिया टीवी से बाहर होने के एक साल बाद उन्होंने सनसनीखेज ढंग से अपनी चिट्ठी में लिखी है. जो बात उन्होंने एक साल पहले के नोटिस और एडिटर को लिखी चिट्ठी में नहीं लिखी, वो आज क्यों लिख रहे हैं? इसके पीछे क्या साजिश है?

6 ) चिट्ठी से साफ पता चलता है कि इंडिया टीवी से अलग होने के एक साल बाद इमरान शेख किसी के इशारे पर बहकावे में आकर बिल्कुल आधारहीन आरोप लगाकर इंडिया टीवी को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा बन रहे हैं.

Under the hashtag #IndiaTvExposed, a baseless and malicious propaganda is being launched on social media by some vested interests against India TV. These people are circulating false and malicious allegations against the news channel on social media by using a purported open letter posted on Facebook by a former India TV reporter Imran Sheikh. In his purported open letter, Imran Sheikh has made baseless allegation that he was asked to file false and fabricated news in favour of Prime Minister Narendra Modi, because of which he resigned from the news channel. Here are some facts which clearly debunk the malicious propaganda being made by vested interests under the hashtag #IndiaTVExposed:

1) Imran Sheikh was a crime/local reporter for India TV in Mumbai till a year ago. Any news-conscious person, who knows the bare outline of how a news channel works, understands that a crime reporter posted in Mumbai has nothing to do with filing stories related to the Prime Minister and the central government. A crime reporter posted in Mumbai can neither do a TV story in favour of the Prime Minister, nor can he be asked to do so by his seniors.

2) After quitting India TV, Imran Sheikh did not level any allegation against the channel for more than a year. The very fact, that he levelled such an allegation a year after quitting the channel, indicates that some vested interests have used him as a pawn in a nefarious game or his intentions are suspect.

3) The Mumbai Bureau received several complaints of negligence in duty against Imran Sheikh, and he was given verbal and written warnings several times by senior editors at India TV for missing news stories. Following repeated warnings, he was suspended for two days on October 8, 2015, but his attitude did not change for the better, and he continued to misbehave with his senior colleagues.

4) Imran Sheikh was warned several times for not working properly/for misbehaving with his colleagues and for negligence in duty. All these facts exist as record in the chain of mail communications between him and several colleagues based in Delhi and Mumbai during October 2015.

5) On October 17, 2015, Imran Sheikh sent a notice through his lawyer in which he levelled charges of harrassment against three of his senior colleagues, but no mention was made of the charge that he has now levelled in his open letter posted on Facebook a year after quitting. The question arises: Why did he not write a letter to the Editor on this said issue or mention it in his lawyer’s notice? What could be the motive behind this?

6) The open letter by Imran Sheikh on his Facebook wall clearly indicates that he has become part of a falsehood campaign to denigrate India TV by levelling baseless allegation at the instigation of some vested interests.

अब पढ़ें इमरान शेख द्वारा प्रधानमंत्री को भेजी गई चिट्ठी…

 

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रजत शर्मा ‘आप की अदालत’ में योगी आदित्यनाथ को बिठाकर खुलेआम भारत के संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं!

Nadim S. Akhter : इंडिया टीवी पर रजत शर्मा वाले ‘आप की अदालत’ प्रोग्राम में सांसद योगी आदित्यनाथ खुलेआम मुसलमानों के खिलाफ आग उगल रहे हैं। कह रहे हैं कि तुम एक मारोगे तो हम सौ मारेंगे। मुस्लिमों को हिन्दू धर्म में वापस लाएंगे, ये घर वापसी है। और, स्टूडियो में मौजूद जनता आदित्यनाथ की हर बात पे ताली पीट रही है। इनमें कम उम्र की युवतियां भी शामिल हैं। बड़ा अजब माहौल है। खुलेआम भारत के संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इस तरह के भड़काऊ बयान वाले प्रोग्राम को न्यूज के नाम पर प्रसारित करके Rajat Sharma जी क्या संदेश दे रहे हैं? एडिटोरियल जजमेंट नाम की कोई चीज रह भी गई है कि नहीं इस देश में?

माना कि योगी आदित्यनाथ की जबान पे रजतजी का कंट्रोल नहीं लेकिन ऐसे भड़काऊ जहर उगलने वाले इंटरव्यू को प्रसारित किया जाए या नहीं, ये फैसला तो रजत जी ले ही सकते हैं। और मेरी ये जानने की तीव्र इच्छा है कि आदित्यनाथ के संविधान विरोधी बयानों पर स्टूडियो में ताली पीटने वाली जनता कहां से बुलाई गई थी? किसी हिंदूवादी संगठन से या फिर कहीं और से क्योंकि खून-खराबे की बात करने वाले गैरजिम्मेदार आदित्यनाथ की बातों पर ताली देश का कोई सामान्य नागरिक तो नहीं ही बजा सकता, ये कॉमन सेंस की बात है। या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि सबकुछ प्रायोजित था? हाथी के दांत दिखाने को और व खाने को और। क्यों रजत शर्मा जी?

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के एफबी वॉल से.

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कार्यकारी परिषद के लिए रजत शर्मा के नाम वाली फाइल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लौटा दिया

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के दफ्तर ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा भेजी गई एक फाइल को लौटा दिया है। इस फाइल में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की कार्यकारी परिषद में खाली पड़ी एक सीट पर नियुक्ति के लिए कुछ उम्मीदवारों के नाम दिए गए थे। राष्ट्रपति के दफ्तर से यह फाइल वापस मंत्रालय को भेजकर नियुक्ति के लिए संभावित उम्मीदवारों की सूची में अधिक नाम शामिल करने का निर्देश दिया गया है।

मंत्रालय ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में नियुक्ति के लिए जो नाम राष्ट्रपति के पास भेजे थे, उनमें इंडिया टीवी के प्रमुख संपादक रजत शर्मा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े एक संगठन विजनन भारती के प्रमुख विजय. पी. भटकार का नाम शामिल था। भटकार को भारत के पहले सुपरकंप्यूटर का वास्तुकार भी माना जाता है। विजनन भारती स्वदेशी विज्ञान आंदोलन के क्षेत्र में सक्रिय है। राष्ट्रपति की ओर से इस फाइल को लौटाते हुए मंत्रालय से कहा गया है कि वह कुछ और नाम भेजे। मालूम हो कि यूनिवर्सिटी में निर्णय लेना का सर्वोच्च अधिकार कार्यकारी परिषद के पास ही होता है। परिषद में कुल 28 सदस्य होते हैं। इनमें में 3 नामों का प्रस्ताव मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से किया जाता है, लेकिन नियुक्ति के लिए उम्मीदवार के नाम पर राष्ट्रपति की मुहर लगना अनिवार्य है। राष्ट्रपति ही केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपति होते हैं।

मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि उम्मीदवारों के नामों पर जल्द ही चर्चा होगी और नाम तय किए जाएंगे। इस प्रक्रिया में कुछ समय लगेगा। अब रजत शर्मा और भटकार के नामों पर फिर से विमर्श करने की संभावना नहीं है। यह पहला मौका नहीं है जब राष्ट्रपति ने मंत्रालय द्वारा चुने गए नामों पर सवाल खड़ा किया है। हाल ही में स्मृति ईरानी और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बीच विश्व भारती के उपकुलपति को हटाए जाने के मुद्दे पर विरोध था। राष्ट्रपति के दफ्तर ने मंत्रालय द्वारा उपकुलपति को हटाए जाने संबंधी प्रस्ताव की फाइल लौटाकर फिर से पूरे मसले की जांच करने का निर्देश दिया था।

इसी साल जनवरी में राष्ट्रपति ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपति के तौर पर जगदीश कुमार की नियुक्ति करते समय मानव संसाधन विकास मंत्री की अनुशंसा को नजरंदाज कर दिया था। मंत्रालय पहले से ही देशभर में यूनिवर्सिटी के नए केंद्रों की स्थापना के मुद्दे पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के साथ उलझा हुआ है। विपक्ष ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष का आरोप है कि मंत्रालय अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मामलों में गैरजरूरी दखलंदाजी कर रहा है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के उपकुलपति जमीरउद्दीन शाह ने गुरुवार को कहा था कि वह खुद पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। शाह ने कहा था कि केरल, बिहार और पश्चिम बंगाल में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नए केंद्र शुरू करने के मुद्दे पर स्मृति ईरानी के इनकार को लेकर पीएम के साथ बातचीत कर चीजें स्पष्ट करने की कोशिश करेंगे। ईरानी ने इन यूनिवर्सिटी केंद्रों को अवैध बताया था।

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रजत शर्मा, आपने बस्सी जी को बचने का मौका दिया तो कन्हैया को भी अपना पक्ष रखने का मौका दीजिए!

Sanjaya Kumar Singh : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राजनीति से पत्रकारिता में आए रजत शर्मा बुधवार, 17 फरवरी को अपने चैनल पर दिल्ली के पुलिस आयुक्त बीएस बस्सी से बातचीत दिखा रहे थे जिसमें बस्सी ने बार-बार पर सिर्फ यही कहा कि कन्हैया कुमार के खिलाफ “पर्याप्त सबूत” हैं। रजत शर्मा के साथ-साथ दुनिया जानती है कि सबूत होने पर ही गिरफ्तारी होती है और सबूत पर्याप्त या अकाट्य नहीं होते हैं, तभी अभियुक्त अदालत से छूटते रहते हैं। ऐसे में सबूत जुटाने वाले से ही पूछना या कहलवाना या उसे कहने का मौका देने का मतलब समझ में आता है। जिसे नहीं समझ में आता है, नहीं समझ में आएगा।

फिर भी रजत जी अगर निष्पक्ष हैं तो नैतिकता का तकाजा है कि एक बार किसी ऐसे व्यक्ति को मौका दें जो कन्हैया की तरफ से बताए कि उसे फंसाया गया है और कैसे सबूत निराधार हैं। “आप की अदालत” में ही फैसला होना है तो कन्हैया के वकील को भी मौका मिलना चाहिए ना? आपने बस्सी जी को बचने का मौका दिया तो कन्हैया को भी अपना पक्ष रखने का मौका दीजिए। कन्हैया तो जेल में है कहकर अपनी “अदालत” को खुद ही क्यों एकतरफा साबित कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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आजतक के पत्रकारों को तोड़ने में जुटा इंडिया टीवी, समीप राजगुरु गए

लगातार गिरती टीआरपी से परेशान इंडिया टीवी प्रबंधन अब आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत लोगों को तोड़ने में जुट गया है. लंबे समय से स्पोर्ट्स देख रहे आजतक के पत्रकार समीप राजगुरु अब इंडिया टीवी के हिस्से हो गए हैं. इन्हें अच्छे खासे पैकेज पर इंडिया टीवी लाया गया है. सूत्रों के मुताबिक अजीत अंजुम को ‘आपरेशन आजतक’ के लिए लगाया गया है. उन्होंने आजतक के दसियों पत्रकारों से बातचीत की. साथ ही कई अन्य चैनलों के पत्रकारों को भी इंडिया टीवी में लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं.

गौरतलब है कि इंडिया टीवी का बैंड सबसे ज्यादा खुद रजत शर्मा बजा रहे हैं जो इस चैनल के मालिक हैं और कभी पत्रकार हुआ करते थे. मोदी और भाजपा के भोंपू की छवि बना चुके इंडिया टीवी को सीरियस न्यूज चैनल के रूप में नहीं देखा जाता. खुद मोदी ने रजत शर्मा को साहित्य श्रेणी में पदम पुरस्कार देकर दुनिया को यह बता दिया कि रजत से मोदी की गहरी यारी है और दोनों एक दूसरे को ओबलाइज करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान रजत शर्मा ने मोदी का एक प्रायोजित इंटरव्यू ‘आपकी अदालत’ नामक शो में इंडिया टीवी पर दिखाया था. इस इंटरव्यू को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए थे क्योंकि इंटरव्यू में मोदी से कोई मुश्किल सवाल पूछा ही नहीं गया था. तब उस वक्त के इंडिया टीवी के न्यूज डायरेक्टर कमर वहीद नकवी ने इस शो पर आपत्ति करते हुए इस्तीफा दे दिया था. तब भी रजत शर्मा और इंडिया टीवी की काफी थू थू हुई थी लेकिन रजत शर्मा नहीं माने.

मोदी सरकार जब भारी बहुमत से सत्ता में आई तो इंडिया टीवी बढ़चढ़ कर मोदी और भाजपा की तारीफें दिखाने लगा. कई मोर्चों पर विफल मोदी सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा भड़कने लगा लेकिन रजत शर्मा व इंडिया टीवी ने मोदी का गुणगान जारी रखा. इसका नतीजा हुआ ये कि रजत शर्मा दर्शकों की नजर में बेहद अविश्वसनीय चेहरा बन गए और इनके शो का ग्राफ भी नीचे गिरने लगा. दूसरी तरफ अजीत अंजुम को प्राइम टाइम एंकरिंग से दूर रखा गया. साथ ही अजीत अंजुम को चैनल में सीमित आजादी दी गई जिसके कारण वह अपने मन मुताबिक कार्यक्रम शो नहीं बना रहे.

इन सभी कारणों से इंडिया टीवी की दुर्गति जारी है और कभी नंबर दो तो कभी नंबर एक कैटगरी का चैनल रहा इंडिया टीवी आजकल नंबर पांच पर लुढ़क गया है. अब आजतक और अन्य न्यूज चैनलों के पत्रकारों को तोड़कर टीआरपी हासिल करने की रणनीति बनाई गई है लेकिन इंडिया टीवी वालों को कौन समझाए कि चैनल अच्छे पत्रकारों के साथ-साथ अच्छी पालिसीज से भी आगे जाता है और पत्रकारिता की असली पालिसी तटस्थता होती है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: 09999 3300 99

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टीआरपी का नया सिस्टम : TAM खत्म, BARC शुरू, 5वें स्थान पर लुढ़का इंडिया टीवी

Vikas Mishra : चलिए कयास लगाने का वक्त खत्म हुआ। दरअसल ये खबर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टीआरपी नापने की नयी व्यवस्था की है। पहले टैम (TAM) नाम की संस्था, हर हफ्ते टीआरपी देती थी। अब टैम की जगह बार्क (BARC) नाम की एजेंसी ने टीआरपी देनी शुरू की है। पहले हफ्ते की टीआरपी आ गई है। इसके मुताबिक आजतक इस मंच पर भी न सिर्फ नंबर वन न्यूज चैनल है, बल्कि 25 प्रतिशत टीआरपी तो अकेले आजतक की ही है।

दूसरे नंबर पर 15 प्रतिशत की टीआरपी के साथ एबीपी न्यूज है। जी न्यूज तीसरे स्थान पर है। चौथे स्थान पर न्यूज नेशन है और इंडिया टीवी आश्चर्यजनक रूप से पांचवे स्थान पर खिसक गया है। आजतक के सहयोगी चैनल तेज का भी मार्केट शेयर 8.5 प्रतिशत है। अगर इन दोनों को मिला दिया जाए तो हिंदी न्यूज चैनलों के 33.5 प्रतिशत शेयर पर सिर्फ टीवीटुडे ग्रुप का ही कब्जा है। इससे पहले टैम की टीआरपी रेटिंग में आजतक 17 से 20 प्रतिशत के बीच रहता था, लेकिन बार्क की टीआरपी में आजतक के हिस्से में छप्परफाड़ टीआरपी आई है। शुक्रिया उन करोड़ों दर्शकों का, जो आजतक देखते हैं, आजतक पर भरोसा करते हैं।

आजतक न्यूज चैनल में एसोसिएट एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.


16वें हफ्ते की टीआरपी यहां है…

देखें टॉप 14 न्यूज चैनलों की टीआरपी लिस्ट… न्यूज नेशन ने जी न्यूज को बहुत पीछे धकेल कर पांचवें नंबर पर ला दिया

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Senior journalist Naqvi gives another setback to Rajat Sharma

New Delhi : Major Hindi News Channel India TV suffered a setback in an ongoing case filed against its former News Director QW Naqvi. India TV had filed a legal suit in the Delhi High Court demanding Rs 30 lakhs from Naqvi when he resigned in protest after a controversial interview of Narendra Modi was aired before Lok sabha polls last year. IndiaTV headed by Rajat Sharma  filed suit demanding Naqvi either to serve a three month notice period or pay 30 lakhs. Monday’s order of the High Court has come as setback for Rajat Sharma as arbitators were changed.

Naqvi’s resigning over Modi interview snowballed into controversy.Naqvi’s step had raised serious questions over the selection of  content in news organizations during polls  and also pointed out doubts over editorial motives. The timing of Naqvi’s  resignation created a furore inside and outside media industry and also raised serious concerns over Sharma’s channel’s credibility.Naqvi a former head of Aajtak channel is regarded as a senior hindi journalist having a hold on language.

India TV, which initially accepted the resignation, asked Naqvi to serve a notice period of three months, failing which the channel filed a legal suit. The suit demanded Naqvi either to serve a three month notice period or pay the money i.e. thirty lakh.

Speaking to media, Naqvi’s counsel Gopal Shankarnarayanan said, “His resignation was result of serious editorial differences.” In one of the two hearings related to the matter, the Delhi HC replaced the arbitrator Justice Poonam Srivastva (requested by India TV) with Justice CK Mahajan, to which both parties had agreed.

“Eight of the nine prayers by Mr Sharma’s channel have been disposed by the honourable court. The last prayers seek a stay on Mr Naqvi from making any defamatory statements against his former organization. Though, it does not carry any major legal weightage but we have conceded to this prayer,“ said Narayanan.

वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के न्यूज पोर्टल ‘इंडिया संवाद‘ से साभार.

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हिंदी टीवी न्यूज के मसखरेपन के लिए क्या वाकई उदय शंकर, रजत शर्मा और कमर वहीद नकवी जिम्मेदार हैं?

Nadim S. Akhter : दो बातें कहनी हैं. एक तो दिलीप मंडल जी ने हिंदी टीवी न्यूज के -मसखरेपन- के लिए उदयशंकरजी, रजत शर्मा जी और कमर वहीद नकवी जी को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार ठहराया है. उनके मन की बात पढ़कर उसका लम्बा-चौड़ा जवाब लिख मारा, लेकिन फिर पुरानी गलती दोहरा गया. सब कुछ ऑनलाइन फेसबुक वॉल पे ही लिख रहा था. अचानक से मेरा कम्प्यूटर बंद हुआ और सब गायब. फिर दुबारा लिखने का मूड सुबह से अब तक नहीं बना. सो हिंदी टीवी न्यूज की गंभीरता को खत्म करने वाली दिलीप जी की बात पर मेरा जवाब फिर कभी.

 

दूसरी बात. टाइम्स नाऊ के न्यूज आवर डिबेट में अर्नब गोस्वामी ने बहस के लिए जिस विषय को चुना, उस पर कुछ बोलना चाहता था, सुबह-सुबह. काम में उलझ गया और फिर लिख नहीं पाया. अभी देखता हूं कि कुछ वेबसाइट्स पर इससे सम्बंधी टिप्पणी प्रकाशित हुई है. मेरे एक मित्र ने तो ये तक कहा है (जाहिर है नीचे मेरी वॉल पे) कि मैं अर्नब का फैन हूं. तो मित्रों ! बात यहां अर्नब के फैन या एसी होने का नहीं है. अगर वे गलत करेंगे (मेरी-आपकी समझ के अनुसार) तो निंदा के भी पात्र होंगे. जैसे कल अर्नब ने अपने डिबेट में भारत की हार का जो विषय चुना, वह पूरी तरह हास्यास्पद था. पहली बार मैंने देखा कि अर्नब के पास बोलने के लिए कुछ नहीं था. वो गालथेथरी कर रहे थे और स्टूडियो में बैठे पैनालिस्ट, अरबाज खान व अतुल वासन, जमकर अर्नब का विरोध कर रहे थे. अर्नब कह रहे थे कि फलां बॉलर को पहले क्यों नहीं लाया, टीम के पास कोई स्ट्रैटेजी नहीं थी, यह शर्मनाक हार थी,..वगैरह-वगैरह.

लेकिन अर्नब क्या बताएंगे कि धोनी के पास कोई स्ट्रैटेजी थी या नहीं थी, ये उन्हें मुंबई के स्टूडियो मैं बैठकर कैसे पता?? और फील्ड में जब कप्तान कोई डिसीजन लेता है, किसी बैॉलर-फील्डर को लगाता है तो उस वक्त उसके दिमाग में एक स्ट्रैटेजी चल रही होती है, उसी के तहत ये सब होता है ना. तो अगर इसी स्ट्रैटेजी के तहत अगर कल टीम इंडिया जीत जाती तब तो अर्नब गोस्वामी और पूरा मीडिया धोनी की तारीफों के पुल बांध देते. और जब हार गए तो पचास इल्जाम. कुल मिलाकर कहूं तो टाइम्स नाऊ के इतिहास में कल पहली बार मुझे अर्नब गोस्वामी और बहस के लिए उनके चुने गए विषय पर तरस आया. कई बार तो अर्नब बगलें झांकते भी नजर आए और एक बार तो वो अपनी बगल में बैठे बहस करते अरबाज खान का हाथ तक पकड़ने लगे. कल तो अर्नब ने हद ही कर दी. ज्यादातर मौकों पर गंभीर विषय चुनने वाले अर्नब गोस्वामी को ये सब करते देख कल अच्छा नहीं लगा.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर ने उपरोक्त पोस्ट दिलीप मंडल के इस स्टेटस के जवाब में लिखा है….

Dilip C Mandal : अरनब गोस्वामी ने अगर इंग्लिश TV न्यूज की हत्या की, जैसा कि Outlook वाले कहते हैं, तो हिंदी TV न्यूज चैनलों की उससे भी बुरी मौत के लिए कौन जिम्मेदार है? या फिर यह आत्महत्या का मामला है, जिसके लिए कोई दोषी नहीं है. आखिर किन की लीडरशिप में हिंदी TV न्यूज चैनलों ने मसखरा-युग में प्रवेश किया? जोकर क्यों बन गए पत्रकार… नागिन ने नाग की हत्या का बदला क्यों लिया… TV न्यूज को पीपली लाइव किसने बनाया? हिंदी NEWS चैनलों का डायन-तांत्रिक-मसखरा युग और उसके नायक या खलनायक…  न्यूज का एंटरटेनमेंट हो जाना ग्लोबल मामला है, लेकिन हिंदी न्यूज चैनलों में यह कुछ ज्यादा ही भोंडे तरीके से हुआ. न्यूज बुलेटिन में नागिन ने नाग की हत्या का बदला लिया, स्वर्ग को सीढ़ी तन गई, सबसे महंगी वैश्या की ऑन स्क्रीन खोज हुआ, बिना ड्राइवर के कार चली. मत पूछिए कि क्या क्या न हुआ. और जब ढलान पर चल ही पड़े तो फिर कितना गिरे और किस गटर में गिरे, इसकी किसे परवाह रही.

हिंदी न्यूज चैनलों को पीपली लाइव और हिदी के टीवी पत्रकारों को जोकर बनाने वाले दौर के तीन लीडर हैं. ये तीन नाम हैं – उदय शंकर, क़मर वहीद नकवी और रजत शर्मा. इस दौर पर मैं कभी डिटेल पेपर लिखूंगा. बाकी लोगों को भी लिखना चाहिए क्योंकि बात बिगड़ गई और बिगाड़ने वाला कोई नहीं हो, ऐसा कैसे हो सकता है. इनसे मेरा कोई निजी पंगा नहीं है. इनमें से दो लोग तो किसी दौर में मेरे बॉस रहे हैं. मुझे नौकरी दी है. उनके क्राफ्ट और कौशल पर भी किसी को शक नहीं होना चाहिए. मामला नीयत का भी नहीं है.

और जो एंकर-रिपोर्टर टाइप लोग स्क्रीन पर तमाशा करते नजर आते हैं, और इस वजह से अक्सर आलोचना के निशाने पर होते हैं, उनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि मैं उन्हें दोषी ठहराऊं. लेकिन इसमें क्या शक है कि इनके समय से चैनल जिस तरह से चलने लगे, उसकी वजह से आज की तारीख में हिंदी के टीवी पत्रकारों और चैनलों के नाम पर पान दुकानों और हेयर कटिंग सलून में चुटकुले चलते हैं. पत्रकारों का नाम आते ही बच्चे हंसने लगते हैं. इन चैनलों ने मसखरेपन की दर्शकों को ऐसी लत लगा दी कि आखिर में न्यूज चैनलों पर आधे-आधे घंटे के लाफ्टर चैलेंज शो चलने लगे.

होने को तो ये न भी होते और कोई और होता, तो भी शायद यही हो रहा होता, लेकिन जिस कालखंड में हिंदी टीवी चैनलों का “मसखरा युग” शुरू हुआ तब 3 सबसे महत्वपूर्ण प्लेफॉर्म की लीडरशिप इनके ही हाथ में थी. कहना मुश्किल है कि इसमें इनका निजी दोष कितना है, लेकिन अच्छा होता है तो नेता श्रेय ले जाता है, तो बुरा होने का ठीकरा किसके सिर फूटे? इन्होंने अगर नहीं भी किया, तो अपने नेतृत्व में होने जरूर दिया.

एस पी सिंह ने गणेश को दूध पिलाने की खबर का मजाक उड़ाकर और जूता रिपेयर करने वाले तिपाए को दूध पिलाकर भारतीय टीवी न्यूज इतिहास के सबसे यादगार क्षण को जीने का जज्बा दिखाया था. सिखाया कि अंधविश्वास के खंडन की भी TRP हो सकती है. लेकिन मसखरा युग में अंधविश्वास फैलाकर TRP लेने की कोई भी कोशिश छोड़ी नहीं गई. टीवी पर इंग्लिश न्यूज में भी तमाशा कम नहीं है. लेकिन वह तमाशा आम तौर पर समाचारों के इर्द गिर्द है. हिंदी न्यूज में तमाशा महत्वपूर्ण है. खबर की जरूरत नहीं है. न्यूज चैनल कई बार लंबे समय न्यूज के बगैर चले और चलाए गए. किसी ने तो यह सब किया है.

उदय शंकर, क़मर वहीद नकवी और रजत शर्मा ही क्यों? हिंदी न्यूज चैनलों के मसखरा युग में प्रवेश के तीन नायकों की मेरी इस शिनाख्त से कुछ लोग खफा है, तो कुछ पूछ रहे हैं कि यही तीन क्यों? दीपक चौरसिया, आशुतोष, विनोद कापड़ी जैसे लोग भी क्यों नहीं. जिनकी भावनाएं आहत हुई हैं मेरा स्टेटस पढ़कर, उनके लिए मुझे कुछ नहीं कहना. उनसे निवेदन है कि कमेंट बॉक्स में जाकर मेरा स्टेटस फिर से पढ़ लें. और जो जानना चाहते हैं कि “उदय शंकर, कमर वहीद नकवी और रजत शर्मा ही क्यों” उन्हें शायद मालूम नहीं कि हिंदी के न्यूज चेनलों ने जब “नागिन का बदला युग” या “महंगी वेश्या की खोज युग” में प्रवेश किया तो ये तीन लोग देश के सबसे लोकप्रिय तीन चैनलों के लीडर थे. TRP लाने की मजबूरी थी. सही बात है. लोग न देखें, तो चैनल क्यों चलाना.

लेकिन TRP लाने के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना, उसकी वजह से आज एक बच्चा भी टीवी पत्रकारों को जोकर और मदारी के रूप में देख कर हंसता है. दीपक चौरसिया, आशुतोष, विनोद कापड़ी जैसे लोग इसलिए नहीं क्योंकि वे स्क्रीन पर जरूर रहे लेकिन उस दौर में इनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि कटेंट को निर्णायक रूप से प्रभावित करें.

वे खुद अंधविश्वासी नहीं हैं, लेकिन आपको या आपमें से ज्यादातर को अंधविश्वासी मानते हैं!! उदय शंकर, क़मर वहीद नकवी और रजत शर्मा ने एक खास कालखंड में हिंदी टेलीविजन समाचार उद्योग को अंधविश्वास और मसखरा युग में पहुंचा दिया, लेकिन ये तीनों खुद आधुनिक विचारों के मॉडर्न लोग हैं. इसलिए समस्या इनकी निजी विचारधारा को लेकर नहीं है. बल्कि TRP पाने के लिए बनी उनकी इस सोच को लेकर है कि हिंदी चैनलों का दर्शक मूर्ख और अंधविश्वासी होता है.

इसे मनोरंजन उद्योग की भाषा में “Lowest common denominator” कहते हैं. इसकी परिभाषा यह है- the large number of people in society who will accept low-quality products and entertainment या appealing to as many people at once as possible. लेकिन इसका नतीजा यह भी हुआ कि आज एक बच्चा भी टीवी पत्रकारों को जोकर और मदारी के रूप में देख कर हंसता है.

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हम नसीब वाले हैं कि रजत शर्मा जैसा महान साहित्यकार और शिक्षाविद हमारे समय में पैदा हुआ!

Abhishek Srivastava :  मैं रजत शर्मा को ‘शिक्षा और साहित्‍य’ के लिए मिले पद्म पुरस्‍कार का तहे दिल से स्‍वागत करता हूं। प्रधानजी से मेरा अनुरोध है कि अगले पद्म पुरस्‍कारों में सामाजिक परिवर्तन के लिए ज़ी न्‍यूज़ के सुधीर चौधरी, साहित्‍य के लिए डॉ. नरेश त्रेहान, चिकित्‍सा के लिए कुमार विश्‍वास, अमन-चैन के लिए श्री प्रवीण तोगडि़या, विज्ञान के लिए साक्षी महाराज आौर पत्रकारिता के लिए सुश्री स्‍मृति ईरानी के नामों पर विचार किया जाए। इसके अलावा हिंदी भाषा में साहित्‍य अकादमी का पुरस्‍कार चेतन भगत और अमीश त्रिपाठी को संयुक्‍त रूप से दिया जाए तथा अंग्रेज़ी में साहित्‍य अकादमी का पुरस्‍कार श्री सुधीश पचौरी को दिया जाए। अगर संभव हो तो मैग्‍सेसे पुरस्‍कार के लिए भारत की ओर से राष्‍ट्रीय गोरक्षा समिति को नामित किया जाए तथा शांति के नोबेल पुरस्‍कार के लिए भारत सरकार की ओर से श्री अजित डोभाल का नाम प्रस्‍तावित किया जाए। दरअसल, मेरी हार्दिक इच्‍छा है कि दुनिया के तमाम पुरस्‍कारों पर से तमाम लोगों का भरोसा धीरे-धीरे उठ जाए।

Krishna Kant : हम नसीब वाले हैं कि ऐसा महान साहित्यकार और शिक्षाविद हमारे समय में पैदा हुआ. मैं इनके सभी डेढ़ दर्जन उपन्यास, पच्चीस कहानी संग्रह पढ़ चुका हूं. इनके जिस उपन्यास पर नोबेल मिला है, वह मेरे तकिए के नीचे रहता है. जिस किताब पर साहित्य अकादमी मिला, वह भी पूरी दुनिया में 30 भाषाओं में अनूदित हुई. यह विराट हिंदू साहित्य के क्षेत्र में भारतीय दोस्तोवस्की है. विज्ञान और शिक्षा पर इनकी किताब भी अब तक पांच करोड़ लोग प्रतिदिन पढ़ते हैं जिसमें नाग—नागिन सहवास, भूतनी का प्याज मांगना, शिव की लीला का साक्षात होना, रावण की कब्र का पता आदि विराट हिंदू ज्ञान उल्लिखित है. इनके रचे साहित्य पढ़कर भारत जरूर विश्वगुरु बनेगा. मोदी जी को भी दंडवत जिन्होंने इस महान विभूति की प्रतिभा को पहचान लिया.

Md Zafar Imam : रजत शर्मा (इंडिया टीवी )को पदमभूषण पदक से सम्मानित किया गया है प्लीज कोई किसी पार्टी की दलाली में मिला इनाम मत कहना ..

Jyotika Patteson :  शिक्षा के लिए रजत शर्मा जी ने क्या कार्य किया है जो इस पुरस्कार से नवाजे गये….. मुझे तो जानकारी नही है यदि आप लोगों को मालूम हो तो जरूर अवगत कराये… ज्ञान का विस्तार होगा….

नवीन रमण : रजत शर्मा जैसों का शुक्र गुजार हूँ कि इन जैसों ने न्यूज चैनल देखने बन्द करवा दिए। कितना टाइम बच जाता है फेसबुक के लिए और किताबें पढ़ने के लिए। सरकार जी इन्हें कोई भी भूषण दे दो रहेंगे ये बिना आभूषण के ही।

Dilip C Mandal : BREAKING NEWS यह है कि रजत शर्मा एक्जाम में कॉपी खाली छोड़कर गुस्से में घर लौट गए क्योंकि सवाल पूछा गया था कि साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में रजत शर्मा के योगदान पर 3 लाइन की टिप्पणी लिखें. ऐसे मुश्किल सवाल के जवाब में 3 लाइनें लिखना कोई आसान काम है क्या?

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एक्जाम में इस सवाल के जवाब में 0/10 नंबर पाने वाले बच्चे की कॉपी से. सवाल – शिक्षा और साहित्य के क्षेेत्र में रजत “पद्मभूषण” शर्मा के योगदान पर टिप्पणी लिखें. (10 नंबर). उत्तर- रजत शर्मा ने…धत्त! क्या लिखूं? (क्या आप इस सवाल का जवाब लिखने में बच्चे की मदद कर सकते हैं? वह अपना टिफिन आपके साथ शेयर करने के लिए तैयार है. बच्चा अभी तक कनफ्यूज है कि अगले साल यही सवाल आ गया, तो क्य़ा लिखेगा. क्लास के मास्टर यह सवाल पूछने पर पीटते हैं.)

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हंसना मना है. सख्त मना है. BLOCK कर दूंगा. पद्मभूषण शर्मा पर हंसना बिल्कुल मना है. “सीछा और सहीत्य” के लिए मिला है, इस बात पर हंसना और भी मना है. चाहें तो रो लीजिए. यह भारतीय गणराज्य का तीसरा सबसे बड़ा सम्मान है. आप लोग भी उनसे “सिछा” लीजिए. गूगल पर सर्च करने से ये “सिछा” मिल रही है.

Dayanand Pandey : इंडिया टीवी पर भूत प्रेत समेत दुनिया भर के अंध विश्वास परोसने वाले, टीवी जैसे सशक्त माध्यम से देश के लोगों की मानसिकता को प्रदूषित करने वाले, भाजपा का नित-नया गुणगान करने वाले, कभी विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता रहे और वित्त मंत्री अरुण जेटली के चिंटू, पत्रकारिता में दल्लागिरी के बादशाह और जाने क्या-क्या श्रीमान रजत शर्मा को कल मोदी सरकार ने पद्म भूषण से नवाजा। लेकिन उनके धत कर्म सो काल्ड पत्रकारिता के लिए नहीं बल्कि साहित्य और शिक्षा के लिए। अब साहित्य और शिक्षा में रजत शर्मा का क्या योगदान है, कोई मुझे बता सके तो मैं उसको खूब बड़ा-सा सैल्यूट करना चाहूंगा! दिलचस्प यह कि जनाब अपने पद्म भूषण की खबर को कल रात नौ बजे के प्राइम टाइम बुलेटिन में पहली और मुख्य खबर बना कर आत्म प्रशंसा की तमाम क्लिपिंग दिखा कर अपनी दुम ऊंची करते रहे। इतनी कि भारत रत्न मदन मोहन मालवीय की खबर दूसरे नंबर पर आई और कश्मीर में बाढ़ की मुख्य खबर तीसरे नंबर पर चली गई।

Mukesh Yadav : पद्म भूषण रजत शर्मा!! : रजत शर्मा को ‘भाड़े का रत्न’ पुरस्कार मिलना चाहिए था! अपने सम्मान की खातिर ‘शिक्षा’ और ‘साहित्य’ को भी डूब मरना चाहिए!

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव, कृष्ण कांत, मोहम्मद जफर इमाम, ज्योतिका पैटरसन, नवीन रमण, दिलीप मंडल, दयानंद पांडेय, मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

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भारतीय टीवी न्यूज इंडस्ट्री में बड़ा और नया प्रयोग करने जा रहे हैं दीपक शर्मा समेत दस बड़े पत्रकार

(आजतक न्यूज चैनल को अलविदा कहने के बाद एक नए प्रयोग में जुटे हैं दीपक शर्मा)


भारतीय मीडिया ओवरआल पूंजी की रखैल है, इसीलिए इसे अब कारपोरेट और करप्ट मीडिया कहते हैं. जन सरोकार और सत्ता पर अंकुश के नाम संचालित होने वाली मीडिया असलियत में जन विरोधी और सत्ता के दलाल के रूप में पतित हो जाती है. यही कारण है कि रजत शर्मा हों या अरुण पुरी, अवीक सरकार हों या सुभाष चंद्रा, संजय गुप्ता हों या रमेश चंद्र अग्रवाल, टीओआई वाले जैन बंधु हों या एचटी वाली शोभना भरतिया, ये सब या इनके पिता-दादा देखते ही देखते खाकपति से खरबपति बन गए हैं, क्योंकि इन लोगों ने और इनके पुरखों ने मीडिया को मनी मेकिंग मीडियम में तब्दील कर दिया है. इन लोगों ने अंबानी और अडानी से डील कर लिया. इन लोगों ने सत्ता के सुप्रीम खलनायकों को बचाते हुए उन्हें संरक्षित करना शुरू कर दिया.

इन लोगों ने जनता के हितों को पूंजी, सत्ता और ताकत के आगे नीलाम कर दिया. नतीजा, परिणति, अंततः कुछ ऐसा हुआ कि देश में करप्शन, लूटमार, झूठ, दलाली का बोलबाला हो गया और बेसिक मोरल वैल्यूज खत्म हो गए. इसी सबको लेकर कुछ पत्रकारों ने सोचा कि जनता का कोई ऐसा मीडिया हाउस क्यों न बनाया जाए जो अंबानी और अडानी के लूटमार पर खुलासा तो करे ही, करप्ट और कार्पोरेट मीडिया के खलनायकों के चेहरे को भी सामने लाए. ऐसा सपना बहुतों ने बहुत बार देखा लेकिन कभी इस पर अमल नहीं हो पाया क्योंकि मीडिया को संचालित करने के लिए जिस न्यूनतम पूंजी की जरूरत पड़ती है, वह पू्ंजी लगाए कौन. पर सपने मरते नहीं. दौर बदलता है, तकनीक बदलती है तो सपने देखने के तौर-तरीके और स्वप्नदर्शी भी बदल जाते हैं.

इस बदले और परम बाजारू दौर में अब फिर कुछ अच्छे और सच्चे पत्रकारों के मन में पुराने सपने नए रूप में अंखुवाए हैं. इनने मिलकर एक जनता का मीडिया हाउस बनाने का फैसला लिया है. दस बड़े टीवी और प्रिंट पत्रकारों ने मिलकर जो सपना देखा है, उसे मूर्त रूप देने का काम बहुत तेजी से किया जा रहा है. आजतक न्यूज चैनल से इस्तीफा देने वाले चर्चित पत्रकार दीपक शर्मा इस काम में जोर शोर से लगे हैं. अमिताभ श्रीवास्तव भी इसके हिस्से हैं. एक तरफ चिटफंडियों और बिल्डरों के न्यूज चैनल हैं जो विशुद्ध रूप से सत्ता पर दबाव और दलाली के लिए लांच किए गए हैं तो दूसरी तरफ जनता की मीडिया के नाम पर धन बनाने की मशीन तैयार कर देने वाले मीडिया मालिक हैं. इनके बीच में जो एक बड़ा स्पेश जनपक्षधर मीडिया हाउस का है, वह लगातार खाली ही रहा है.

हां, इस बदले नए दौर में न्यू मीडिया ने काफी हद तक जन मीडिया का रूप धरा है लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं. इन सीमाओं को लांघने का तय किया है दस पत्रकारों ने. एक नेशनल सैटेलाइट न्यूज चैनल जल्द लांच होने जा रहा है. यह चैनल मुनाफे के दर्शन पर आधारित नहीं होगा. यह सहकारिता के मॉडल पर होगा. नो प्राफिट नो लॉस. काम तेजी से चल रहा है. लग रहा है कि मीडिया में भी एक क्रांति की शुरुआत होने वाली है. लग रहा है मीडिया के जरिए मालामाल और दलाल हो चुके लोगों के चेहरों से नकाब खींचने का दौर शुरू होने वाला है. आइए, इस नए प्रयोग का स्वागत करें. आइए, भड़ास के सैटेलाइट वर्जन का स्वागत करें. आइए, बेबाकी और साहस की असली पत्रकारिता का स्वागत करें.

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संपादक हैं. संपर्क: 09999966466


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स्वप्न दासगुप्ता, रजत शर्मा और रामबहादुर राय को पद्म पत्रकारिता के नाम पर मिलता तो खुशी होती

Shambhunath Shukla : जिन तीन पत्रकारों को पद्म पुरस्कार मिला है उनका योगदान साहित्य व शिक्षा क्षेत्र में बताया गया है। मगर तीनों में से किसी ने भी जवानी से बुढ़ापे तक कोई चार लाइन की कविता तक नहीं लिखी। यहां तक कि नारे भी नहीं। ये तीन पत्रकार हैं स्वप्न दासगुप्ता, रजत शर्मा (दोनों को पद्म भूषण) और रामबहादुर राय को पद्म श्री। पत्रकारों को पद्म पत्रकारिता के नाम पर मिलता तो खुशी होती।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

Umesh Chaturvedi : जयप्रकाश आंदोलन के अगुआ… शुचिता की पत्रकारिता के पैरोकार… ईमानदार कलम… जयप्रकाश नारायण के शिष्य… गांधी विचार के प्रबल अनुयायी…. चंद्रशेखर, वीपी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रधानमंत्रियों के नजदीकी होने के बावजूद राजनीति के आंगन में सहज निर्विकार शख्सियत… यथावत पाक्षिक के संपादक… रामबहादुर राय के लिए कई और विशेषण हो सकते हैं. उन्हें पद्मश्री मिलने पर हार्दिक बधाई. यह बात और है कि वे इससे भी कहीं ज्यादा के हकदार हैं.

पत्रकार उमेश चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

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दूरदर्शन ने फिर से ओम थानवी को बुलाना शुरू कर दिया

Om Thanvi : मुद्दत बाद आज दूरदर्शन के कार्यक्रम में गया। चुनाव के नतीजों पर चर्चा थी। बीच में पहले भी कई बार बुलावा आया, पर मना करता रहा। आज तो और चैनलों पर भी जाना था। फिर भी अधिक इसरार पर हो आया। जाकर कहा तो वही जो सोचता हूँ! बहरहाल, पता चला कि कोई सरकारी निर्णय बुलाने न-बुलाने को लेकर नहीं रहा, कोई अधिकारी समाचार प्रभाग में आईं जो अपने किसी लाभ के लिए नई सरकार को इस तरह खुश करने की जुगत में थीं कि भाजपा या नरेंद्र मोदी के आलोचकों को वहां न फटकने दें!

Om Thanvi : रजत शर्मा की अदालत को इक्कीस साल हो गए, उन्हें बधाई। उनके जलसे के वक्त बाहर था, अभी उसकी रेकार्डिंग देखने को मिली चैनल पर। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, नेता-अभिनेता सब नामी लोग थे। मजेदार अदालत होती है, आयोजन भी मनोरंजक था। रजत शर्मा अच्छा बोले। दिल से। नरेंद्र मोदी भी, जो बहुत सहज और ईमानदार थे: बोले चुनाव के दौर में हुई बातचीत उनके लिए बहुत मददगार रही। बहरहाल, रजत ने सबको याद किया, मगर अपने कार्यक्रम की तीसरी अहम कड़ी जजों का जिक्र करना शायद भूल गए। आप जानते हैं वहां जनता सामने होती है और इधर ‘वकील’ और ‘मुजरिम’ के बाद तीसरा बड़ा पात्र ‘जज’ होता है, जो बेचारा घंटे भर से ज्यादा की जिरह सुनते-सुनते कान खुजाने लगता है। आठ-दस बार मैं ही ‘जज’ की नाटकीय भूमिका कर आया हूँ – अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, फ़ारुख़ अब्दुल्ला, शत्रुघ्न सिन्हा … सिन्हा ने तो मेरे ‘फैसले’ (कि अब नेतागीरी में अभिनेता का अंदाज छोड़ो!) की तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत से दोस्ताना शिकायत कर डाली थी! जो हो, हिंदी टीवी संसार में मनोरंजन भरी गुफ्तगू के इस लम्बे और बेहद सफल सिलसिले की रजत शर्मा को बधाई! मैंने महज ‘लंबी अवधि’ के कार्यक्रम और उसकी ‘सफलता’ की बधाई दी है। सफलता में क्या शक जो पूरा चैनल ही खड़ा हो गया। बाकी रजत शर्मा की राजनीति, रणनीति क्या रहती है हम सब जानते हैं। चैनल के ‘योगदान’ पर मैं पहले लिख चुका हूँ। अब वहां जाता भी नहीं हूँ। अदालत के लिए मनोरंजन शब्द एकाधिक बार जान-बूझ कर लिखा है। पीछे की बात नरेंद्र मोदी की टिप्पणी में ही उजागर है। मनोरंजन के साथ इस ‘खेल’ के लिए भी अदालत को जब-तब देखता हूँ – भले अब वहां जाने से सदा इनकार करता हूँ और करता रहूँगा। खासकर अपने मित्र ख़ुर्शीद अनवर पर चैनल की गैर-जिम्मेदार भूमिका देखने के बाद मन और भी क्षुब्ध रहा है। फिर भी कार्यक्रम देखा तो बधाई दे दी, इसे बस अपनी दरियादिली समझिए। जज के नाते तो कभी फिक्स नहीं अनुभव किया। कभी फैसले से खेल बिगाड़ भी आया। बाकी फिक्सिंग या प्रयोजन विशेष में स्वैच्छिक प्रस्तुति को देखकर ही समझा जा सकता है। जज कौन हो यह भी तो आखिर वही तय करते हैं। जजी में कोई दखल नहीं होता। पर जज तय तो वही करते हैं। कभी-कभी “मुजरिम” भी कर लेता है। हरियाणा के एक मुख्यमंत्री अपनी पसंद का जज चंडीगढ़ से लिवा लाए थे, यह मैं निजी तौर पर जानता हूँ – मुख्यमंत्रीजी ने खुद बताया था।

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

मूल पोस्ट…

मोदी राज आने के बाद ओम थानवी को परिचर्चा के लिए नहीं बुलाता दूरदर्शन

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प्रहलाद पटेल का सवाल और रजत शर्मा की शाहखर्ची

यशवंत सर

मैं पहली बार कुछ भड़ास मीडिया पर लिख रहा हूं और मेरा नाम मदन झा है। मैं वर्तमान में एक न्यूज चैनल में काम करता हूं और पूर्व में कई बड़े अखबारों में भी काम कर चुका हूं। मैं यह बताना चाहता हूं कि हाल ही में दमोह सांसद प्रहलाद पटेल जी ने जो मीडिया कर्मियों से सबंधित मुद्दा उठाया है वह एक कड़वा सच है, जिसे हमारे जैसे युवा एवं देश के सभी पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों के लिए एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। अभी हाल ही में इंडिया टीवी के रजत शर्मा जी ने आपकी अदालत के 21 वर्ष पूरे होने पर जो कार्यक्रम किया, यह तमाम उन पत्रकारों के मुंह पर जूता मारने जैसा है जो जिलों और कस्बों में कड़ी मशक्कत कर रिपोर्ट कवरेज करते हैं और जिसका उन्हें सही मुआवजा तक नहीं दिया जाता है।

इस कार्यक्रम पर खर्च किया गया खुद के चैनल में कार्यरत पत्रकारों व कर्मचारियों में बांट देते तो शायद वो ताउम्र जिंदगी भर याद रखते और कितनों का तो भला हो जाता, लेकिन रजत शर्मा जैसे लोग अब पत्रकारों के खुदा हैं, उन्हें कौन कहे। हां ये जरूर हो सकता है कि अगर यूपी या बिहार में कोई मंत्री अपना जन्मदिन मना ले तो वो जरूर हायतौबा का विषय बन जाएगा। खैर छोड़िए मेरे जैसे लिखने वाले कई लोगों ने इन तमाम मुद्दों  और विषयों पर चर्चा किए, लेकिन लोहा लेने वाला कोई आगे नहीं आया, लेकिन चिंगारी जहां जली है वहां तो हवा दीजिए ताकि कुछ कर सकें।

बड़ी उम्मीदें हैं और बड़ी ही शिकायतें हैं कौन सुने मन की बात। काश मोदी होता तो शायद अपने मन की बात रेडियों प्रसारण के माध्यम से ही कह पाता, लेकिन मैं तो वो भी नहीं हूं। बातें और दिल में भड़ास तो न जाने कितने हैं, लेकिन शायद यह कॉलम पढने के बाद कई लोग अलग अलग प्रतिक्रिया देंगे, लेकिन प्रतिक्रिया कुछ भी हो, लेकिन प्रहलाद पटेल जी का उठाया मुद्दा जीवन और मृत्यु के बाद पत्रकारों के लिए तीसरा सबसे बड़ा सच है।

मदन झा

9329021253


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रजत शर्मा और सुभाष चंद्रा : पत्रकार का मालिक और मालिक का पत्रकार होना

अखबारों और केबल की दुनिया में यह बात आम है, लेकिन सेटेलाइट चैनलों की दुनिया में इसे अजूबा ही कहा जाएगा कि मालिक पत्रकार की तरह बनना चाहे और मालिक पत्रकार की तरह। रजत शर्मा का करियर पत्रकार के रूप में शुरू हुआ और आज वे इंडिया टीवी के सर्वेसर्वा है। दूसरी तरफ सुभाष चंद्रा है जिन्होंने बहुुत छोटे से स्तर पर कारोबार शुरू किया और पैकेजिंग की दुनिया से टीवी की दुनिया में आए। रजत शर्मा कभी इनके चैनल पर कार्यक्रम प्रस्तुत किया करते थे। इतने बरसों में यह अंतर आया है कि रजत शर्मा सुभाष चंद्रा की तरह मालिक बन गए और सुभाष चंद्रा रजत शर्मा की तरह टीवी प्रेजेंटर बनने की कोशिश कर रहे है। चैनलों का मालिक होने का फायदा सुभाष चंद्रा को जरूर है, लेकिन इससे वे रजत शर्मा की बराबरी नहीं कर सकते।

दोनों ही शख्सियतें अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। कहा जा सकता है कि दोनों ‘सेल्फ मेड’ है। कहते है कि सुभाष चंद्रा ने अरबों रुपए के कारोबार वाले एस्सेल ग्रुप केवल १७ रुपए् की जमापूंजी से शुरू किया था। व्यापार में कामयाबी पाने वाली हर चतुराई वे आजमा चुके है। चावल के निर्यात से लेकर एस्सेल वर्ल्ड  जैसे थीम पार्क का निर्माण और मल्टीप्लेक्स का धंधा भी। अंग्रेजी अखबार भी उन्होंने शुरू किया और एक बाद एक सैकड़ों कम्पनियाँ  बनाकर अपने साम्राज्य को विश्वस्तर पर फैलाया।  अपने व्यवसाय चातुर्य से उन्होंने जी टेलीफिल्मस् लिमिटेड कंपनी  अक्टूबर १९९२ में शुरू की थी, जो भारत की पहली निजी सेटेलाटि चैनल चलाने वाले कंपनी   थी। टीवी के दर्शक दूरदर्शन के एक रस कार्यक्रमों में से हटकर जी टीवी की तरफ आकर्षित हुए।

आज सुभाष चंद्र गोयल डॉ. सुभाष चंद्रा बन गए है। जैसे सुब्रत राय सहाराश्री बन गए। वैसे वे चंद्रा बन गए। गोयल शब्द उन्होंने अपने नाम में से हटा लिया। अपने संयुक्त परिवार की मदद से साम्राज्य स्थापित करने के बाद उन्होंने उसे विभाजित कर लिया और अपने भाइयों को अलग तरह के व्यवसाय में स्थापित कर दिया। उनका बड़ा बेचा पुनीत ६ साल से मीडिया का साम्राज्य संभाल रहा है और उससे छोटा अमित इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काम कर रहा है। इसके अलावा सुभाष चंद्रा आजकल अमेरिका में ‘वेलनेस बिजनेस’ संभाल रहे है। भारत में सुभाष चंद्रा ने ९ सेक्टर में कारोबार शुरू किया था, जिसमें से २ सेक्टर में वे विफल रहे। एक इंडियन क्रिकेट लीग और दूसरा सेटेलाइट प्रोजेक्ट। दुनिया के अनेक बड़े-बड़े मीडिया संस्थान भारत आ रहे है और भारत का जी मीडिया विदेश जा रहा है। जी टेलीविजन की स्थापना के बाद उन्होंने न्यूज, सिनेमा और अन्य चैनलों के साथ ही केबल और डीटीएच का कारोबार भी शुरू किया। फोब्र्स पत्रिका ने सुुभाष चंद्रा की तुलना धीरूभाई अंबानी से की है। आज जी टीवी का कारोबार ६८ चैनलों के जरिए १६९ देशों में पैâला हुआ है। उनका बनाया हुआ एस्सेलवर्ल्ड भारत का पहला प्रमुख एम्युजमेंट पार्क माना जाता है। सेटेलाइट कम्युनिकेशन, ऑनलाइन गेमिंग, एज्युकेशन, पैकेजिंग आदि के क्षेत्र में उन्होंने भारत को स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

सुभाष चंद्रा का मानना है कि वे गीता में बताए गए कर्म में विश्वास करते है। अगर कामयाबी न मिले तो भी वे कभी निराश नहीं होते। अपने जीवन में उन्होंने बहुत बड़े-बड़े थपेड़े खाए। १२वीं के बाद उन्हें अपनी नियमित पढ़ाई छोड़नी पड़ी। परिवार की जिम्मेदारी उनके सिर पर थी और आजकल उनमें एक नया कीड़ा प्रवेश कर गया है और वह कीड़ा है टेलीविजन के कार्यक्रम पेश करने का। इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा बरसों तक उनके जी टीवी पर आपकी अदालत कार्यक्रम पेश करते रहे, उन्हें लगता है कि आज रजत शर्मा सत्ता के गलियारों में ज्यादा पहुंच रखते है क्योंकि वे टीवी पर कार्यक्रम पेश करते है जबकि इतने चैनलों के मालिक और खरबपति होने के बावजूद सुभाष चंद्रा की बातों का वो वजन नहीं है, इसलिए उन्होंने जी टीवी पर अपने नाम से ही एक शो शुरू कर दिया।

रजत शर्मा ने पिछले दिनों जब आपकी अदालत कार्यक्रम की 21वीं सालगिरह बनाई, तब उसमें देश की लगभग सभी प्रमुख हस्तियां मौजूद थी। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री उनके कार्यक्रम में आए। ऐसे मौके दुर्लभ ही होते है जब किसी गैर सरकारी कार्यक्रम में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री एक साथ नजर आए। इसके अलावा इस कार्यक्रम में खेल, फिल्म, कारोबार, राजनीति, समाज सेवा आदि क्षेत्रों से भी लगभग सभी प्रमुख हस्तियां मौजूद थी। फिल्मी दुनिया के तीनों प्रमुख खान शाहरुख, आमिर और सलमान इस कार्यक्रम में नजर आए। इसके पहले यह तीनों धर्मेन्द्र के एक कार्यक्रम में भी नजर आए थे।

जी टीवी में कार्यक्रम पेश करते-करते रजत शर्मा को आपकी अदालत कार्यक्रम का महत्व समझ में आ गया था। यह महत्व तो सुभाष चंद्रा को भी मालूम था जब उन्होंने जी टीवी पर इसकी शुरुआत होने दी और कुछ ही साल बाद इस कार्यक्रम की सालगिरह के बहाने अनेक मुख्यमंत्रियों, नौकरशाहों और अनेक महत्वपूर्ण लोगों को बुलाकर उनसे निकटता कायम करने की कोशिश की। शायद वहीं घटना रही होगी कि 21  साल होने पर रजत शर्मा ने उससे कहीं बड़ा और ज्यादा भव्य कार्यक्रम अपने बूते पर किया। इस बार सुभाष चंद्रा उनके बॉस नहीं थे, बल्कि वे खुद अपनी वंâपनी के बॉस थे। उनके कार्यक्रम की खूबी यह है कि वे कार्यक्रम में चुटीलापन, हाजिरजवाबी और हल्के-फुल्के सवालों के साथ ही दर्शकों को भी उससे जोड़े रखते है।

रजत शर्मा ने पत्रकारिता में बहुत पापड़ बेले है। रिपोर्टिंग भी की है और संपादन भी। जब उन्होंने टीवी की दुनिया में प्रवेश किया तब कई लोगों को लगता था कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके सिर पर गिने-चुने बाल हो और नाक किसी केरिकेचर की तरह नुकीली वह टीवी की दुनिया में क्या प्रभाव जमाएगा, लेकिन सुभाष चंद्रा ने न केवल अपनी पत्रकारिता से बल्कि अपनी व्यवसाय बुद्धि से भी चमत्कार कर दिखाया और इंडिया टीवी जैसी टीआरपी बटोरु चैनल खड़ी कर ली। इंडिया टीवी कई बार विवादों में घिरा रहा। कभी उस पर पक्षपात के आरोप लगे कभी महिला कर्मचारी के व्यवहार को लेकर रजत शर्मा को ही कटघरे में खड़ा किया गया। कभी उनके निजी जीवन पर, उनके वैवाहिक संबंधों पर सवाल खड़े किए गए, लेकिन वे दृढ़ता से अपनी जगह बने रहे। ब्रेविंâग न्यूज नामक उनका दैनिक कार्यक्रम भी बरसों तक चला, लेकिन बाद में से बंद कर दिया गया।

रजत शर्मा का एक पत्रकार से मीडिया मुगल बनना किसी चमत्कार से कम नहीं। जिस चतुराई से वे इस साम्राज्य के सिंहासन पर बैठे, वह किसी के लिए भी ईष्र्या का विषय हो सकता है और शायद सुभाष चंद्रा के लिए है भी। वरना वे सुभाष चंद्रा शो लेकर अपने चैनल पर नहीं आते। इसमें कहीं न कहीं ईर्ष्यां की गंध जरूर है।

लेखक प्रकाश हिन्दुस्तानी वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लॉग Prakashhindustani.Blogspot.in से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. प्रकाश हिंदुस्तानी से संपर्क 09893051400 के जरिए किया जा सकता है.

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रजत शर्मा पत्रकार नहीं, एक सफल एंटरटेनर हैं… (संदर्भ: आपकी अदालत के 21 साल)

‘आपकी अदालत’ के 21 साल पूरे होने पर रजत शर्मा द्वारा आयोजित महामहोत्सव पर मैंने कुछ नहीं लिखा, इस बात की कई लोगों ने मेल करके शिकायत की है. कुछ साथियों ने फैक्टशीट भी भेजी है इस महाउत्सव को लेकर. आज सोच रहा हूं लिख ही डालूं क्योंकि न लिखने के पीछे जो मूल कारण था, इस महाउत्सव की कवरेज को न देख पाना, उससे कल निजात पा गया. कल एक साथी के घर पर इंडिया टीवी खुला तो वहां पर महाउत्सव की पुरानी रिकार्डिंग आ रही थी, कुछ उसी तरह जैसे कभी एक खास एंटरटेनमेंट चैनल खोल लो तो कामेडी विथ कपिल का पुराना एपिसोड चालू दिखेगा, या कोई दूसरा एंटरटेनमेंट चैनल खोल लो तो सावधान इंडिया की साजिशें उदघाटित होती मिलेंगी.

‘आपकी अदालत’ के 21 साल होने के मेगा इवेंट यानि महा आयोजन की रिकार्डिंग पहली बार जब कल इंडिया टीवी पर देख रहा था तो उसी कार्यक्रम में आमिर खान ने रजत शर्मा को बधाई देते हुए कहा कि ”आप यूं ही सबको एंटरटेन करते रहें”.

मैं ‘एंटरटेन’ शब्द पर अटक गया.

अटका तो बहुत सारे शब्दों पर. जैसे शाहरूख ने बताया कि ”ये रजत शर्मा फिल्म वालों का खूब प्रमोशन करते हैं”.

तो, आपकी अदालत द्वारा प्रमोशन और एंटरटेनमेंट का जो 21 साल लंबा पुराना सिलसिला चला आ रहा है, उस पर अगर आप पत्रकारीय लिहाज से लिखने बैठेंगे तो क्या लिख पाएंगे, यह भी एक बड़ा सवाल है. कुछ वैसे ही जैसे ‘कामेडी विथ कपिल’ के 11 साल होने पर कोई ग्रैंड महोत्सव हो तो उस पर क्या लिखा जा सकता है. यही सब लिखा जाएगा कि बहुत बड़े-बड़े लोग आए और खूब मस्ती आई छाई प्रोग्राम में. पर रजत शर्मा और कपिल शर्मा में बड़ा हैं. रजत शर्मा पत्रकारिता और सरोकार के नाम की खाते हैं तो कपिल शर्मा विशुद्ध एंटरटेनमेंट करके कमाते हैं. ऐसे में दोनों को एक ही तराजू पर तौल कर रखना देखना पाप होगा.

एक साथ ने मेल करके मुझसे पूछा है कि– ”यशवंत जी, बालीवुड के तीन खानों के साथ रजत शर्मा के डान्स को बारे में क्या कहेंगे, क्या ये सब शोभा देता है एक पत्रकार को. मुझे विश्वास है कि आप इस विषय पर ज्यादा असरकारक लिख सकेंगे. तस्वीर भी भेज रहा हूं.”

एक दूसरे साथी ने फैक्टशीट मेल करते हुए प्वाइंटवाइज बताया है कि— ”What is the reason & meaning Rajat Sharma Show on the 21st year of his AAP Ki Adaalat. It should or such kind of functions are arranged after 100, 500, 1000 the episode or after 25th, 50th or after such period. Since Rajat Sharma is close to Modi so he was confident of PM’s participation in his function that is he only reason for the celebration of his function. If anyone else would be the PM then there is no possibility of such function by Sharma. Only Modi sympathisers were invited in the function whether they are politicians, business tycoons or film stars. Nitish Kumar was nowhere in sight in function. Only certain Congress Party leaders were invited while Sonia baiter Natwar Singh was among the invitees. None of the prominent Communist, Trinamool or Modi opposition leaders were in sight. It was like a film award ceremony as was witnessed. This was for the TRP of the programme. Since cricketers are away in Australia otherwise cricketers like Dhoni would share stage with film stars on the dais to enrich the TRP of the program.”

पहले तो दोनों साथियों को धन्यवाद कि उन्होंने इस सब्जेक्ट की तरफ मेरा निजी तौर पर ध्यान दिलाया.

रजत शर्मा की पत्रकारीय सोच-समझ के बारे में एक जमाने में आलोक तोमर लिखा करते थे, जमकर लिखा करते थे. वो लिंक अगर मिल जाएगा तो मैं नीचे उपलब्ध कराता हूं. मोटा मोटी मुझे जो रजत शर्मा के बारे में समझ में आता है वो ये कि इस शख्स ने पत्रकारिता के नाम पैसा खूब पैदा किया. पत्रकारिता को लायजनिंग, टीआरपी, पीआर का जरिया बनाया. पत्रकारिता के नाम पर मिली शोहरत, बढ़े कद के जरिए ताकतवर लोगों से मजबूत रिश्ते गांठे. और, आखिरकार पत्रकारिता का ही गला रेतकर यह शख्स आज यह बताने लगता है कि मेरे पिता जी ने कभी कहा था कि किसी दूसरे को देखने किसी तीसरे के घर जाने से बेहतर है कि कुछ ऐसा करो कि लोग तुझे टीवी पर देखें. रजत शर्मा से कोई पूछे कि उन्होंने ढेर सारा धन और खूब प्रसिद्धि हासिल करके क्या देश के सभी गरीब बच्चों के सपनों को पूरा कर दिया या खुद अपने सपने पूरे कर बाकी सबको डूब मरने को छोड़ दिया. जिस पत्रकारिता की डगर पर चलकर रजत शर्मा आज यहां तक पहुंचे हैं, उस पत्रकारिता का यह तकाजा था कि रजत शर्मा देश के हर गरीब बच्चे की आंखों में पल रहे सपने के पूरा होने में आ रही दिक्कतों को एक्सपोज करते और सत्ता-सिस्टम से मुकाबिल होते. यानि सत्ता-सिस्टम की पोल खोलकर वह असल जनपक्षधर पत्रकारिता करते और आम जन के समृद्ध सुखी स्वस्थ शिक्षित होने में बाधक बन रहे कारणों का खात्मा करते. पर शर्मा जी ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने अपनी कंपनी का टर्नओवर बढ़ाया. अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाई. अपने पीआर और लायजनिंग को ग्लोबल कर दिया. इस तरह लकदक चकमक एक निजी साम्राज्य खड़ा कर लिया. मीडिया के ऐसे ‘नव साम्राज्यवादी’ केवल शर्मा जी ही नहीं हैं. बहुत सारे हैं. राजीव शुक्ला को ले लीजिए. ढेर सारे नाम मिलेंगे. अब तो मीडिया के माध्यम से साम्राज्य विस्तार की ताकत देख अंबानी तक इस विधा में पूरी क्षमता से कूद चुके हैं. ऐसे में रजत शर्मा का आपकी अदालत के 21 साल पूरे होने पर महाउत्सव करना और पीएम, राष्ट्रपति तक को इनवाइट कर लेना चौंकाता नहीं है.

सही लिखा इस साथी ने. महाजश्न 100 या 500 या 1000 एपिसोड पूरे होने पर किए जाते हैं, 21 साल पूरे होने पर नहीं. कायदे से तो 25 साल पर किया जाना चाहिए, अगर साल गिनकर आयोजन करना था. लेकिन रजत शर्मा थोड़ा जल्दी में हैं. उन्हें मोदी के पीएम बन जाने से जो ताकत उर्जा मिली है, वही मेन ड्राइविंग फोर्स बन गई है. इस उर्जा ताकत को दुनिया को दिखाना था ताकि उनके चैनल इंडिया टीवी का ब्रांड वैल्यू बढ़ जाए. रजत शर्मा पुराने संघी रहे हैं और छात्र दिनों में एबीवीपी से जुड़े रहे हैं. अरुण जेटली समेत नरेंद्र मोदी से रजत शर्मा का पुराना वैचारिक याराना किसी से छिपा नहीं है. नरेंद्र मोदी के लिए रजत शर्मा ने इंडिया टीवी के माध्यम से जो पत्रकारिता के सभी पैमानों-नैतिकताओं को ताक पर रखकर जो काम किया, जो एहसान किया, उसे भला नरेंद्र मोदी कैसे भुला सकते हैं. सो, नरेंद्र मोदी आए और रजत शर्मा के एहसान गिना कर उनका आभार भी व्यक्त कर गए.

कुल मिलाकर आज के बाजारू दौर में ताकतवरों की एकता ही सबसे बड़ा मंत्र है. इसीलिए ताकतवर और भ्रष्ट नौकरशाह के ताकतवर व भ्रष्ट मीडिया मालिक से रिश्ते होते हैं और ताकतवर व भ्रष्ट मीडिया मालिक अपनी जड़ों को मजबूती देने के लिए ताकतवर व भ्रष्ट नेताओं से उर्जा ग्रहण करता रहता है. अकूत पैसे और प्रसिद्धि से पागल खिलाड़ी और फिल्मी सितारों की मजबूरी है कि वह ताकतवर व भ्रष्ट नेताओं, मीडिया मालिकों और अफसरों की यश गान करें ताकि उनके निजी संकट (मसलन कर चोरी, पियक्कड़ी करके किसी को गाड़ी से कुचल देना, फिल्म रिलीज पर छूट, फिल्म शूटिंग में मदद, सेंसर बोर्ड से फिल्म पास कराने में सुविधा, अपराधियों से रक्षा आदि इत्यादि) के दिनों में यह ताकतवर व भ्रष्ट तिकड़ी काम आ सके. इन दिनों सब कुछ पैसे से तय हो रहा है. जज से लेकर अफसर तक की क्रीम जगह पर पोस्टिंग हो या खबर छापने से लेकर प्रमोट करने तक का मीडिया का खेल. हर जगह पैसा मेन सब्जेक्ट है. नेता और नौकरशाह अपने ताकत का पूरा का पूरा इस्तेमाल अधिक से अधिक धन कमाने इकट्ठा करने में करते रहते हैं. इस काले धन के जरिए चुनाव विचार आयोजन गिरोहबंदी का खेल पूरे ताकत से खेला जाता है जिसे नंगी पुंगी जनता टुकुर टुकुर निहारती रहती है और काले धन के इस या उस खेल का मौखिक नैतिक समर्थन कर देती है, बैलेट के जरिए. इस तरह फिर पैसे बनाने और ताकतवर लोगों की एकता जमाने का खेल अगले पांच सालों तक निर्बाध खेला जाता रहता है. हमारे आपके लिए हैं ढेर सारे मोरल ग्राउंड, नैतिक नियम, सुभाषितानि, संवेदना, मनुष्यता, संविधान, कानून आदि इत्यादि, पर उनके लिए कुछ नहीं है. क्योंकि वे सब ताकतवर लोग एक हैं और ताकतवर लोग अपनी सुविधा के हिसाब से नियमों में अपवाद खोज लेते हैं, एक दूसरे को मदद राहत देने के लिए. रजत शर्मा ताकतवरों के गिरोह का एक ऐसा ही मजबूत नाम है जो मीडिया और पत्रकारिता का टैग लगाकर उर्जा धन यश ग्रहण कर खुद का साम्राज्य दिनों दिन फैलाता रहेगा….

इस मौके पर रजत शर्मा के चैनल इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा के साथ हुए घृणित घटनाक्रम को जरूर याद दिलाना चाहूंगा. वो लड़की तनु शर्मा अब भी न्याय नहीं पा सकी है. रजत शर्मा जैसे ताकतवरों के आगे तनु शर्मा जैसे आम घरों की लड़कियों को न्याय मिलना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव भी है. रजत शर्मा सच्चे पत्रकार होते तो तनु शर्मा की कहानी को अपने चैनल पर दिखाए होते और खुद रोए होते. रजत शर्मा सच्चे पत्रकार होते तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आपकी अदालत के नरेंद्र मोदी वाले एपिसोड की फिक्सिंग (उन दिनों रजत शर्मा के चैनल के संपादक कमर वहीद नक़वी इसी फिक्सिंग के कारण इस्तीफा देकर चले गए थे) के बारे में जरूर सच्चाई बताते दिखाते. दर्जनों ऐसे अपने चैनल, उनके घर के मामले हैं, जिन पर रजत शर्मा के बोल नहीं फूटते, रजत शर्मा की अदालत नहीं लगती. ये वो डार्क एरियाज हैं, काले धब्बे हैं, जिनका उल्लेख करके शायद रजत शर्मा अपने महोत्सव का मजा किरकिरा नहीं करना चाहते, सो नहीं किया. हां उन्होंने शेखी खूब बघारी. अपने चेहरे की चमक को लेकर, मिलने वाली धमकी को लेकर, आंख में आंसू आ जाने को लेकर, गरीबी को लेकर, ईमानदारी को लेकर, पत्रकारिता का लेकर….। रजत शर्मा शायद एक बात बताना भूल गए. वो ये कि उन्होंने अपने सिर के बाल करोड़ों रुपए खर्च करके और लंदन जाकर ट्रीटमेंट कराके दुबारा उगाए हैं ताकि उनकी निजी ब्रांड वैल्यू बनी रहे. सलमान खान, आमिर खान, शाहरूख खान जैसे एंटरटेनर भी यही सब करते हैं, चेहरे से लेकर बाल तक की लगातार सर्जरियां कराई जाती हैं ताकि उनकी फिल्में, उनके शोज हिट हो सकें… 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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पूंजीपरस्त याराना का यह अद्भुत नजारा और ताकतवर होते मीडिया की अनकही कहानी … (16 मई के बाद मीडिया पार्ट-2)

: जो लोकशाही के निगहबान थे, वे बन गए चारण : बरस भर पहले राष्ट्रपति की मौजूदगी में राष्ट्रपति भवन में ही एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने अपने पच्चीसवें जन्मदिन को मना लिया। वहीं हर तरह के कद्दावर तबके को आमंत्रित कर लिया। तब कहा गया कि मनमोहन सिंह का दौर है कुछ भी हो सकता है। एक बरस बाद एक न्यूज चैनल ने अपने एक कार्यक्रम के 21 बरस पूरे होने का जश्न मनाया तो उसमें राष्ट्रपति समेत प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट के अलावे नौकरशाहों, कारपोरेट, बालीवुड से लेकर हर तबके के सत्ताधारी पहुंचे। लगा यही कि मीडिया ताकतवर है। लेकिन यह मोदी का दौर है तो हर किसी को दशक भर पहले वाजपेयी का दौर भी याद आ गया । दशक भर पहले लखनऊ के सहारा शहर में कुछ इसी तरह हर क्षेत्र के सबसे कद्दावर लोग पहुंचे और तो और साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी समेत पूरा मंत्रिमंडल ही नहीं बल्कि संसद के भीतर एक दूसरे के खिलाफ तलवारे भांजने वाला विपक्ष भी सहारा शहर पहुंचा था। और इसी तर्ज पर संसद के भीतर मोदी सरकार को घेरने वाले कांग्रेसी भी दिल्ली के मीडिया समारोह में पहुंचे।

सवाल हो सकता है कि मीडिया को ताकत सत्ता के साथ खडे होकर मिलती है या फिर सत्ता को ताकत मीडिया का साथ खड़ेहोने से मिलती है। या फिर एक दूसरे की साख बनाये रखने के लिये क्रोनी कैपिटलिज्म का यह अद्भूत नजारा समाज में ताकतवर होते मीडिया की अनकही कहानी को कहता है। हो जो भी लेकिन मीडिया को बार बार अपने तरीके से परिभाषित करने की जद्दोजहद सत्ता भी करती है और सत्ता बनने की चाहत में मीडिया भी सरोकार की भाषा को नये तरीके से परिभाषित करने में रम जाता है । इस मुकाम पर विचारधारा के आसरे राजनीति या आम -जन को लेकर पत्रकारिता या फिर न्यूनतम की लड़ाई लडते देश को चकाचौंध के दायरे में समेटने की चाहत ही मीडिया को कैसे बदलती है यह 16 मई के जनादेश के बाद खुलकर सामने आने भी लगा है। जाहिर है ऐसे में मीडिया की भूमिका बदलने से कही आगे नये तरीके से परिभाषित करने की दिशा में बढ़ेगी और ध्यान दें तो 16 मई के जनादेश के बाद कुछ ऐसे ही हालात हो चले हैं। 16 मई के जनादेश ने मीडिया के उस तबके को दरकिनार कर दिया जो राजनीति को विचारधारा तले परखते थे। पहली बार जनादेश के आइने में मीडिया की समूची रिपोर्टिंग ही पलटी और यह सीख भी देने लगी कि विचारधारा से आगे की जरुरत गवर्नेंस की है, जो मनमोहन सरकार के दौर में ठप थी और जनादेश ने उसी गवर्नेंस में रफ्तार देखने के लिये नरेन्द्र मोदी के पक्ष में जनादेश दिया। यह जनादेश बीजेपी को इसलिये नहीं मिला क्योंकि गवर्नेंस के कठघरे में बीजेपी का भी कांग्रेसीकरण हुआ। इसी लिये नरेन्द्र मोदी को पार्टी से बाहर का जनादेश मिला। यानी देश के भीतर सबकुछ ठप होने वाले हालात से निपटने के लिये जनादेश ने एक ऐसे नायक को खोजा जिसने अपनी ही पार्टी की धुरधंरों को पराजित किया । और पहली बार मीडिया बंटा भी। बिखरा भी। झुका भी। और अपनी ताकत से समझौता करते हुये दिखा भी। यह सब इसलिये क्योंकि राजनीति के नये नये आधारों ने मीडिया की उसी कमजोर नसों को पकड़ा जिसे साधने के लिये राजनीति के अंतर्विरोध का लाभ मीडिया ही हमेशा उठाता रहा। सरकारी सब्सिडी के दायरे से न्यूज प्रिंट निकल कर खुले बाजार आया तो हर बडे अखबारों के लिये हितकारी हो गया। छोटे-मझौले अखखबारो के सामने अखबार निकालने का संकट आया। समझौते शुरु हुये। न्यूज चैनल का लाइसेंस पाने के लिये 20 करोड़ कौन सा पत्रकार दिखा सकता है, यह सवाल कभी किसी मीडिया हाउस ने सरकार से नहीं पूछा। और पत्रकार सोच भी नहीं पाया कि न्यूज चैनल वह पत्रकारिता के लिये शुरु कर सकता है।

पैसे वालों के लिये मीडिया पर कब्जा करना आसान हो गया या कहें जो पत्रकरिता कर लोकतंत्र के चौथे खम्मे को जीवित रख सकते थे वह हाशिये पर चले गये। इस दौर में सियासत साधने के लिये मीडिया ताकतवर हुआ। तो सत्ता के ताकतवर होते ही मीडिया बिकने और नतमस्तक होने के लिये तैयार हो गया। और जो मीडिया कल तक संसदीय राजनीति पर ठहाके लगाता था वही मीडिया सत्ता के ताकतवर होते ही अपनी ताकत भी सत्ता के साथ खड़े होने में ही देखने समझने लगा। और पहली बार मीडिया को नये तरीके से गढने का खेल देश में वैसे ही शुरु हुआ जैसे खुदरा दुकाने चकाचौंध भरे मॉल में तब्दील होने लगी। याद कीजिये तो मोदी के पीएम बनने से पहले यह सवाल अक्सर पूछा जाता था कि मीडिया से चुनाव जीते जाते तो राहुल कब के पीएम बन गये होते। यह धारदार वक्तव्य मीडिया और राजनीतिक प्रचार के बीच अक्सर जब भी बोला जाता है तब खबरों के असर पडने वाली पत्रकारिता हाशिये पर जाती हुई सी नजर आने लगती। लेकिन पत्रकारिता या मीडिया की मौजूदगी समाज में है ही क्यों अगर इस परिभाषा को ही बदल दिया जाये तो कैसे कैसे सवाल उठेंगे। मसलन कोई पूछे, अखबार निकाला क्यों जाये और न्यूज चैनल चलाये क्यों जाये।

यह एक ऐसा सवाल है जिससे भी आप पूछेंगे वह या तो आपको बेवकूफ समझेगा या फिर यही कहेगा कि यह भी कोई सवाल है । लेकिन 2014 के चुनाव के दौर में जिस तरह अखबार की इक्नामी और न्यूज चैनलों के सरल मुनाफे राजनीतिक सत्ता के लिये होने वाले चुनावी प्रचार से जा जुडे है उसने अब खबरों के बिकने या किसी राजनीतिक दल के लिये काम करने की सोच को ही पीछे छोड़ दिया है। सरलता से समझे लोकसभा चुनाव ने राह दिखायी और चुनाव प्रचार में कैसे कहा कितना कब खर्च हो रहा है यह सब हर कोई भूल गया । चुनाव आयोग भी चुनावी प्रचार को चकाचौंध में बदलते तिलिस्म की तरह देखने लगा। तो जनता का नजरिया क्या रहा होगा। खैर लोकसभा चुनाव खत्म हुये तो लोकसभा का मीडिया प्रयोग कैसे उफान पर आया और उसने झटके में कैसे अखबार निकलाने या न्यूज चैनल चलाने की मार्केटिंग के तौर तरीके ही बदल दिये यह वाकई चकाचौंध में बदलते भारत की पहली तस्वीर है। क्योंकि अब चुनाव का एलान होते ही राज्यों में अखबार और न्यूज चैनलों को पैसा पंप करने का अनूठा प्रयोग शुरु हो गया है। लोकसभा के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र में चुनाव हुये और फिर झारखंड और जम्मू कश्मीर । महाराष्ट्र चुनाव के वक्त बुलढाणा के एक छोटे से अखबार मालिक का टेलीफोन मेरे पास आया उसका सवाल था कि अगर कोई पहले पन्ने को विज्ञापन के लिये  खरीद लेता है तो अखबार में मास्ट-हेड कहां लगेगा और अखबार में पहला पन्ना हम दूसरे पन्ने को माने या तीसरे पन्ने को जो खोलते ही दायी तरफ आयेगा। और अगर तीसरे पन्ने को पहला पन्ना मान कर मास्टहेड लगाते हैं तो फिर दूसरे पन्ने में कौन सी खबर छापे क्योकि अखबार में तो पहले पन्ने में सबसे बड़ी खबर होती है। मैंने पूछा हुआ क्या । तो उसने बताया कि चुनाव हो रहे हैं तो एक राजनीतिक दल ने नौ दिन तक पहला पन्ना विज्ञापन के लिये खरीद लिया है। खैर उन्हें दिल्ली से निकलने वाले अखबारों के बार में जानकारी दी कि कैसे यहां तो आये दिन पहले पन्ने पर पूरे पेज का विज्ञापन छपता है। और मास्ट-हेड हमेशा तीसरे पेज पर ही लगता है और वही फ्रंट पेज कहलाता है । यह बात भूलता तब तक झारखंड के डाल्टेनगंज से एक छोटे अखबार मालिक ने कुछ ऐसा ही सवाल किया और उसका संकट भी वही था। अखबार का फ्रंट पेज किसे बनायें। और वहां भी अखबार का पहला पेज सात दिन के लिये एक राजनीतिक दल ने बुक किया था। यानी पहली बार अखबारों को इतना बड़ा विज्ञापन थोक में मिल रहा है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन बात सिर्फ विज्ञापन तक नहीं रुकी।

अगला सवाल था कि इतने विज्ञापन से तो हमारा साल भर का खर्च निकल जायेगा। तो इस पार्टी के खिलाफ कुछ क्यों छापा जाये। बहुत ही मासूमियत भरा यह सवाल भी था और जबाव भी। और संयोग से कुछ ऐसा ही सवाल और जबाब कश्मीर से निकलते एक अखबार के पहले पन्ने पर उर्दू में पूरे पेज पर विज्ञापन छपा देखा। जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर के साथ घाटी का चेहरा बदलने का सपना था। अजीबोगरीब लगा। उर्दू के शब्दों के बीच मोदी और पूरे पेज के विज्ञापन के लालच में संपादक का सवाल, क्या करें। इतना बड़ा विज्ञापन। इससे तो अखबार के सारे बुरे दिन दूर हो जायेंगे। और विज्ञापन छाप रहे हैं तो पार्टी के खिलाफ कुछ क्यों लिखें। वैसे भी चुनाव तो होते रहते हैं। नेता बदलते रहते हैं। घाटी में कभी तो कुछ बदला नहीं। तो हम किसी से कुछ मांग तो नहीं रहे सिर्फ विज्ञापन चुनाव तक है। पैसे एंडवास में दे दिये गये हैं। सरकारी विज्ञापनों के तो पैसे भी मांगते मांगते मिलते हैं तो हमने सोचा है कि घाटी में क्या होना चाहिये और जनता किन मुश्किलों में है और इसी पर रिपोर्ट फाइल करेंगे। यानी नेता भ्रष्ट हो या आपराधिक छवि का। पार्टी की धारा कुछ भी हो। पार्टी की धारा कुछ भी हो। आतंक के साये से चुनावी उम्मीदवार निकला हो या आतंक फैला कर चुनाव मैदान में उतरा हो। बहस कही नहीं सिवाय सपने जगाने वाले चुनाव के आइने में लोकतंत्र को जीने की। असर यही हुआ कि पूंजी कैसे किसकी परिभाषा इस दौर में बदल कर सकारात्मक छवि का अनूठा पाठ हर किसी को पढ़ा सकती है, यह कमोवेश देश के हर मीडिया हाउस में हुआ। इसका नायाब असर गवर्नेंस के दायरे में भ्रष्ट मीडिया हाउसों पर लगते तालो के बीच पत्रकार बनने के लिये आगे आने वाली पीढ़ियो के रोजगार पर पड़ा। मनमोहन सिंह के दौर की आवारा पूंजी ने चिटफंड और बिल्डरों से लेकर सत्ता के लिये दलाली करने वालों के हाथो में चैनलों के लाइसेंस दिये। मीडिया का बाजार फैलने लगा। और 16 मई के बाद पूंजी, मुनाफा चंद हथेलियों में सिमटने लगा तो मीडिया के नाम पर चलने वाली दुकाने बंद होने लगी। सिर्फ दिल्ली में ही तीन हजार पत्रकार या कहें मीडिया के कामगार बेरोजगार हो गये। छह कारपोरेट हाउस सीधे मीडिया हाउसों के शेयर खरीद कर सत्ता के सामने अपनी ताकत दिखाने लगे या फिर मीडिया के नतमस्तक होने का खुला जश्न मनाने लगे। जश्न के तरीके मीडिया के अर्द्ध सत्य को भी हडपने लगे और सत्ता की ताकत खुले तौर पर खुला नजारा करने से नहीं चूकी। यानी पहली बार लुटियन्स की दिल्ली सरीखे रेशमी नगर की तर्ज पर हर राज्य की राजनीति या तो ढलने लगी या फिर पारंपरिक लोकतंत्र के ढर्रे से उकता गयी जनता ही जनादेश के साये में राजनीति का विकल्प देने लगी । और मीडिया हक्का बक्का होकर किसी उत्पाद [ प्रोडक्ट ] की तर्ज पर मानने लगा कि अगर वह सत्ता के कोठे की जरुरत है तो फिर उसकी साख है । यानी जिन समारोहों को, जिन सामाजिक विसंगतियों और जिस लोकतंत्र के कुंद होने पर मीडिया की नजर होनी चाहये अगर वह खुद ही समारोह करने लगे। सामाजिक विसंगतियों को अनदेखा करने लगे और लोकतंत्र के चौथे पाये की जगह खुद को सत्ता की गोद में बैठाने लगे या खुद में सत्ता की ठसक पाल लें, तो सवाल सिर्फ पत्रकारिता का है या देश का। सोचना तो पड़ेगा।

लेखक पुण्य प्रसून वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका लिखा यह विश्लेषण जनसत्ता अखबार में छप चुका है.

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‘आपकी अदालत’ के 21 साल : ये जश्न उस ‘सेल्फी फंक्शन’ का अपडेटेड वर्जन ही तो है…

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इंडिया टीवी का खर्चीला प्रोग्राम यानि मीडिया के भ्रष्टाचार पर कोई जुबान क्यों नहीं खोलता?

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‘आपकी अदालत’ के 21 साल : ये जश्न उस ‘सेल्फी फंक्शन’ का अपडेटेड वर्जन ही तो है…

: गठजोड़ का सबसे बड़ा जश्न या क्रोनी जर्नलिस्म का नमूना? : दफ्तर में काम कर रहा हूं और मेरे ठीक सामने चल रहे टीवी में एक न्यूज चैनल अपने एक कार्यक्रम की सालगिरह के आयोजन की तस्वीरें दिखा रहा है. पूरे आयोजन का टीवी के किसी कार्यक्रम का ‘सबसे बड़ा जश्न’ बताया जा रहा है. राष्ट्रपति, पीएम, कई राज्यों के सीएम, विपक्ष के नेता, बॉलीवुड के हीरो-हीरोइन, संगीतकार, गायक, शायर, पत्रकार, बिजनेसमैन…. सब उस 21 साल पुराने अद्भुत कार्यक्रम के गुणगान में लगे हैं… बतौर मेहमान, मेजबान की एंकरिंग का महिमा मंडन किया जा रहा है…

ऐसा लग रहा है जैसे पत्रकारिता जगत में अब तक के सबसे महान पत्रकार (जो हो सकते हैं) वो ही हैं। सवाल यहां महिमामंडन से कुछ ज्यादा का है… क्या ये जश्न उस ‘सेल्फी फंक्शन’ का अपडेटेड वर्जन नहीं है… बिलकुल है… साथ ही इस जश्न के जरिए सत्ता-मीडिया के उस गठजोड़ का सार्वजनिक प्रदर्शन भी किया गया है, जिसे अब सामाजिक-व्यावसायिक स्वीकृति मिल चुकी है… क्या ये सही नहीं होता कि इस कथित महान टीवी शो सालगिरह में पुराने एपिसोड में किए दावों-वादों और बयानों पर जवाब मांगा जाता…

क्या सही नहीं होता कि सालगिरह के मौके पर नेताओं से महान कार्यक्रम में किए गए वादों की जमीनी हकीकत दिखाई जाती… क्या ये बेहतर नहीं होता कि इस मौके पर सड़क पर चल रही जनता को एक ऑडिटोरिम में बुलाकर उनकी दिक्कतें फिर से जानी जातीं… पर ये नहीं हो पाया… हो सकता भी नहीं है, क्योंकि अब पत्रकारिता और पीआर कॉकटेल पीना मजबूरी है… क्रोनी जनर्लिज्म को ही पत्रकारिता मान लिया गया है…. ये भी ठीक है… लेकिन एक एंकर को आत्महत्या पर मजबूर होना पड़ा था, और एक महान पत्रकार का गुणगान करते नेता उस वक्त खामोश थे, क्योंकि मसला पत्रकारिता और अभिव्यक्ति का नहीं, बल्कि एक पीत गठजोड़ का था… क्या टीवी पर जश्न की तस्वीरें देख रही जनता ये समझ रही है…. उसे समझना चाहिए… 

सुमित ठाकुर का विश्लेषण. संपर्क: sumeetashok@gmail.com

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इंडिया टीवी का खर्चीला प्रोग्राम यानि मीडिया के भ्रष्टाचार पर कोई जुबान क्यों नहीं खोलता?

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इंडिया टीवी का खर्चीला प्रोग्राम यानि मीडिया के भ्रष्टाचार पर कोई जुबान क्यों नहीं खोलता?

Mohammad Anas : INDIA TV पर जश्न का माहौल है। मौका है नाटकीय और पहले से तय सवाल जवाब वाले शो ‘आपकी अदालत’ के 21 साल पूरे होने के। हर क्षेत्र के दिग्गज मौजूद हैं। पूरे प्रोग्राम पर अमूमन कितना खर्च हो रहा है, यह मेहमानों की लिस्ट देख कर आप अंदाजा लगा सकते हैं। पैसे की बर्बादी पर क्या कोई चैनल टूटेगा या फिर आज़म की बग्घी और यादव सिंह की चटाई के नीचे छिपे नोट पर ही लोटपोट होना आता है? मीडिया के भ्रष्टाचार पर कोई ज़ुबान क्यों नहीं खोलता।

 

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Amit Ranjan Chitranshi : भाई उन्हें जश्न मनाने दें, हम तो इस बात का जश्न मना रहे कि संस्कृति के रक्षक ‘जादों’ की संस्कृति जुबां तक आ गयी!!!

Farhan Khan : अच्छे दिनों के घटिया होने का एक सबूत यह भी है कि लोगों की नज़र में हर मयार पर हद दर्जा गिरे हुए चेंनेल की अचानक पूछ होने लगी …

Vivek Mehra : पब्लिक इतना जान जाती तो यूपी के आज ये हाल ना होते

माधो दास उदासीन : सियासत किस हुनरमंदी से सच्चाई छुपाती है… कि जैसे सिसकियों का ज़ख्म शहनाई छुपाती है।

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चार नवम्बर के बाद टूट जायेगा ‘अपना दल’

अजय कुमार, लखनऊ

अपना दल 04 नवंबर को वाराणसी में 19वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। स्थापना दिवस को लेकर तैयारी भी चल रही है, लेकिन अपना दल के संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय सोनेलाल पटेल की विरासत संभाले उनकी पत्नी और पुत्रियों के बीच मची राजनैतिक होड़ ने स्थापना दिवस का रंग फीका कर दिया है। कार्यकर्ता गुटों में बंट गये हैं। पारिवारिक झगड़े के कारण अपना दल के स्थापना दिवस समारोह की कामयाबी पर ग्रहण लग गया है। सोनेलाल पटेल की मौत के बाद काफी तेजी के साथ राजनैतिक क्षितिज पर उभरी उनकी तीसरे नंबर की पुत्री अनुप्रिया पटेल के खिलाफ मॉ कृष्णा पटेल ने अपनी दूसरी बेटी पल्लवी पटेल को साथ लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया है।

वैसे तो घर में मनमुटाव की खबरें काफी पहले से आ रही थीं, लेकिन यह झगड़ा उस समय सड़क पर खुल कर सामने आ गया जब अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने अनुप्रिया की मर्जी के खिलाफ दूसरे नंबर की बेटी पल्लवी पटेल को पार्टी उपाध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी। कृष्णा पटेल यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए अनुप्रिया पटेल को महासचिव के पद से भी हटा दिय। कृष्णा पटेल का आरोप था कि अनुप्रिया अपने आप को पार्टी से ऊपर समझती हैं और उनके पति की दखलंदाजी पार्टी में काफी बढ़ गई है। अनुप्रिया के पति पार्टी में तोड़फोड़ कर रहे हैं जो पार्टी हित में नहीं है। जबकि अनुप्रिया का कहना था कि उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है।

जो हालात बन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि पारिवारिक कलह के कारण दो गुटों में बंटता जा रहा अपना दल कभी भी टूट का शिकार हो सकता है। इसका नजारा स्थापना दिवस के बाद दिखाई पड़ जाये तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दरअसल, अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल  ने सभी पदाधिकारियों कौर कार्यकताओं को स्थापना दिवस कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने को कहा है, वहीं अनुप्रिया गुट की तरफ से ऐसे संकेत आ रहें हैं कि वह (अनुप्रिया) स्थापना दिवस के कार्यक्रमों से दूरी बना कर रखेंगी।

बात राजनैतिक परिपक्वता की कि जाये तो ऐसा लगता नहीं है कि अनुप्रिया के बिना अपना दल का वजूद कृष्णा पटेल बचा पायेंगी। अनुप्रिया पटेल अपने पिता के समय से राजनीति में शिरकत कर रही हैं और कई आंदोलन भी चला चुकी हैं। सोनेलाल पटेल की मौत के बाद अनुप्रिया ने ही चाहरदीवारी से बाहर निकाल कर मॉ कृष्णा पटेल को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया था। अनुप्रिया ने पार्टी को नई पहचान दी। 2012 में वह वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक चुनी गईं और इसके बाद भाजपा के साथ मिलकर उन्होंने मिर्जापुर से संसदीय चुनाव लड़ा और सांसद बन गईं।

भाजपा के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ने जैसा अहम फैसला अनुप्रिया ने ही लिया था। अनुप्रिया के इस्तीफे से रिक्त हुई रोहनिया सीट से सोनेलाल पटेल की पत्नी चुनाव लड़ीं, लेकिन उन्हें जीत नसीब नहीं हुई। इस पर कहा यह गया कि अनुप्रिया अगर पूरा दमखम लगाती तो कृष्णा पटेल यह चुनाव जीत जातीं। इस तरह के आरोप कृष्णा पटेल ने भी अपनी बेटी पर लगाये। गौरतलब हो, पूर्वांचल की लगभग एक दर्जन लोकसभा सीटों पर अपना दल हार-जीत के समीकरण बदलने की ताकत रखता है। भारतीय जनता पार्टी 2017 के विधान सभा चुनाव भी अपना दल के साथ मिलकर लड़ना चाहती है, लेकिन फिलहाल वह दर्शक की भूमिका में नजर आ रही है।

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अजय कुमार की रिपोर्ट.

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ब्रेकिंग न्यूज… सुधीर चौधरी की सेल्फी… ब्रेकिंग न्यूज… दीपक चौरसिया का हालचाल …

मैं आज के दिन को मीडिया के लिहाज से शर्मनाक दिन कहूंगा. पत्रकारिता के छात्रों को कभी पढ़ाया जाएगा कि 25 अक्टूबर 2014 के दिन एक बार फिर भारतीय राजनीति के आगे पत्रकारिता चरणों में लोट गई. धनिकों की सत्ता भारी पड़ गई जनता की आवाज पर. कभी इंदिरा ने भय और आतंक के बल पर मीडिया को रेंगने को मजबूर कर दिया था. आज मोदी ने अपनी ‘रणनीति’ के दम पर मीडिया को छिछोरा साबित कर दिया. दिवाली मिलन के बहाने मीडिया के मालिकों, संपादकों और रिपोर्टरों के एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए. देश, विदेश, समाज और नीतियों पर कोई बातचीत नहीं हुई. सिर्फ मोदी बोले. कलम को झाड़ू में तब्दील हो जाने की बात कही. और, फिर सबसे मिलने लगे. जिन मसलों, मुद्दों, नारों, आश्वासनों, बातों, घोषणापत्रों, दावों के नाम पर सत्ता में आए उसमें से किसी एक पर भी कोई बात नहीं की.

सुधीर चौधरी सेल्फी बनाने लगे. दीपक चौरसिया हालचाल बतियाने लगे. रिपोर्टरों में तो जैसे होड़ मच गई सेल्फी बनाने और फोटो खिंचाने की. इस पूरी कवायद के दौरान कोई पत्रकार ऐसा नहीं निकला जिसने मोदी से जनता का पत्रकार बनकर जनहित-देशहित के मुद्दों पर सवाल कर सके. सब गदगद थे. सब पीएम के बगल में होने की तस्वीर के लिए मचल रहे थे. जिनकी सेल्फी बन गई, उन्होंने शायद पत्रकारिता का आठवां द्वार भेद लिया था. जिनकी नहीं बन पाई, वो थोड़े फ्रस्ट्रेट से दिखे. जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, एक बार भी पूरी मीडिया के सामने नहीं आए और न ही सवाल जवाब का दौर किया. शायद इससे पोल खुलने, ब्रांडिंग खराब होने का डर था. इसीलिए नया तरीका निकाला गया. ओबलाइज करने का. पीएम के साथ फोटो खिंचाने भर से ओबलाइज हो जाने वाली भारतीय मीडिया और भारतीय पत्रकार शायद यह आज न सोच पाएं कि उन्होंने कितना बड़ा पाप कर डाला लेकिन उन्हें इतिहास माफ नहीं करेगा.

जी न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी ने पीएम के साथ सेल्फी बनाई. इंडिया न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया का प्रधानमंत्री ने हालचाल पूछा. महंगाई, बेरोजगारी और बदहाली से कराह रही देश की जनता का हालचाल यहां से गायब था. दिवाली की पूर्व संध्या पर सुसाइड करने वाले विदर्भ के छह किसानों की भयानक ‘सेल्फी’ किसी के सामने नहीं थी. सबके सब प्रधानमंत्री से मिलने मात्र से ही मुस्करा-इतरा रहे थे, खुद को धन्य समझ रहे थे.

रजत शर्माओं और संजय गुप्ताओं जैसे मीडिया मालिकों के लिए पत्रकारिता पहले से ही मोदी परस्ती रही है, आज भी है, कल भी रहेगी. इनके यहां काम करने वालों से हम उम्मीद नहीं कर सकते थे कि वो कोई सवाल करेंगे. खासकर तब जब ये और इन जैसे मीडिया मालिक खुद उपस्थित रहे हों आयोजन में. सुभाष चंद्राओं ने तो पहले ही भाजपा का दामन थाम रखा है और अपने चैनल को मोदी मय बनाकर पार्टी परस्त राष्ट्रीय पत्रकारिता का नया माडल पेश किया है. अंबानियों के आईबीएन7 और ईटीवी जैसे न्यूज चैनलों के संपादकों से सत्ता से इतर की पत्रकारिता की हम उम्मीद ही नहीं कर सकते हैं. कुल मिलाकर पहले से ही कारपोरेट, सत्ता, पावर ब्रोकरों और राजनेताओं की गोद में जा बैठी बड़ी पूंजी की पत्रकारिता ने आज के दिन पूरी तरह से खुद को नंगा करके दिखा दिया कि पत्रकारिता मतलब सालाना टर्नओवर को बढ़ाना है और इसके लिए बेहद जरूरी है कि सत्ता और सिस्टम को पटाना है. होड़ इस बात में थी कि मोदी ने किसको कितना वक्त दिया. मोदी ने कहा कि हम आगे भी इसी तरह मिलते जुलते रहेंगे. तस्वीर साफ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कभी कोई कड़ा बड़ा सवाल नहीं पूछा जा सकेगा. वो जो तय करेंगे, वही हर जगह दिखेगा, हर जगह छपेगा. वो जो इवेंट प्लान करेंगे, वही देश का मेगा इवेंट होगा, बाकी कुछ नहीं.

ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरियों और फिक्सर पत्रकार दीपक चौरसियाओं से हमें आपको पहले भी उम्मीद न थी कि ये जन हित के लिए पत्रकारिता करेंगे. दुखद ये है कि पत्रकारिता की पूरी की पूरी नई पीढ़ी ने इन्हीं निगेटिव ट्रेंड्स को अपना सुपर आदर्श मान लिया है और ऐसा करने बनने की ओर तेजी से अग्रसर हैं. यह खतरनाक ट्रेंड बता रहा है कि अब मीडिया में भी दो तरह की मीडिया है. एक दलाल उर्फ पेड उर्फ कार्पोरेट उर्फ करप्ट मीडिया और दूसरा गरीब उर्फ जनता का मीडिया. ये जनता का मीडिया ही न्यू मीडिया और असली मीडिया है. जैसे सिनेमा के बड़े परदे के जरिए आप देश से महंगाई भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते, उसी तरह टीवी के छोटे परदे के जरिए अब आप किसी बदलाव या खुलासे या जन पत्रकारिता का स्वाद नहीं चख सकते. दैत्याकार अखबारों जो देश के सैकड़ों जगहों से एक साथ छपते हैं, उनसे भी आप पूंजी परस्ती से इतर किसी रीयल जर्नलिज्म की उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि इनके बड़े हित बड़े नेताओं और बड़े सत्ताधारियों से बंधे-बिंधे हैं. दैनिक जागरण वाले अपने मालिकों को राज्यसभा में भेजने के लिए अखबार गिरवी रख देते हैं तो दैनिक भास्कर वाले कोल ब्लाक व पावर प्रोजेक्ट पाने के लिए सत्ताओं से डील कर अखबार उनके हवाले कर देते हैं.

ऐसे खतरनाक और मुश्किल दौर में न्यू मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. न्यू वेब में वेब मीडिया शामिल है. सोशल मीडिया समाहित है. न्यूज पोर्टल और ब्लाग भी हैं. मोबाइल भी इसी का हिस्सा है. इन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी. कार्पोरेट मीडिया, जिसका दूसरा नाम अब करप्ट मीडिया या पेड मीडिया हो गया है, इसको एक्सपोज करते रहना होगा. साथ ही, देश के सामने खड़े असल मुद्दों पर जनता की तरफ से बोलना लिखना पड़ेगा. अब पत्रकारिता को तथाकथित महान पत्रकारों-संपादकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. ये सब बिक चुके हैं. ये सब चारण हो गए हैं. ये सब कंपनी की लायजनिंग फिट रखने और बिजनेस बढ़ाने के प्रतिनिधि हो गए हैं. इतिहास बताता है कि इंदिरा ने मीडिया से झुकने को कहा था तो मीडिया वाले रेंगेने लगे थे. अब कहा जाएगा कि मोदी ने मीडिया को मिलन के बहाने संवाद के लिए कहा तो मीडिया वाले सेल्फी बनाने में जुट गए.

फेसबुक पर वरिष्ठ और युवा कई जनपक्षधर पत्रकार साथियों ने मीडिया की इस घिनौनी और चीप हरकत का तीखा विरोध किया है. वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक Om Thanvi लिखते हैं :  ”जियो मेरे पत्रकार शेरो! क्या इज्जत कमाई है, क्या सेल्फियाँ चटकाई हैं!

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dhananjay Singh बताते हैं एक किस्सा : ”एस.सहाय जी स्टेट्समैन के संपादक हुआ करते थे,उनके पास इंदिरा जी के यहाँ से कोई आया सूट का कपड़ा लेकर की खास आपके लिए प्रधानमंत्री ने भेजा है,साथ में टेलर का पता भी था.उन्होंने धन्यवाद के साथ उसे लौटा दिया.कुछ समय बाद प्रधानमंत्री ने बंगले पर संपादकों को डिनर दिया.सहाय जी के अलावा बाकी सभी क्रांतिकारी संपादक एक जैसे सूट में थे…सब एक दूसरे की तरफ फटी आँखों से देखने लगे … इंदिरा जी का अलग ही स्टाइल था……. समय बदला है अब तो खुद ही सब दंडवत हुए जा रहे हैं….. हाँ सहाय जी के घर रघु राय की उतारी एक तस्वीर दिखती थी की संसद की सीढ़ियों के पास एक भिखारी कटोरा लेकर खड़ा है (शायद तब सिक्योरिटी इतनी नहीं रही होगी)………… सहाय जी के पास अंतिम समय में खटारा फिएट थी और वो अपने बच्चों के लिए भी ‘कुछ भी’ छोड़ कर नहीं गए.

कई मीडिया हाउसों में काम कर चुके आध्यात्मिक पत्रकार Mukesh Yadav लिखते हैं: ”सवाल पूछने की बजाय पीएम साब के साथ सेल्फी लेने के लिए पत्रकारों, संपादकों में होड़ मची है!! शर्मनाक! धिक्कार! निराशा हुई! सवाल के लिए किसकी आज्ञा चाहिए जनाब?

सोशल एक्टिविस्ट और युवा पत्रकार Mohammad Anas कहते हैं: ”लोकतंत्र में संवाद कभी एक तरफा नहीं होता। एक ही आदमी बोले बाकि सब सुने। साफ दिख गया लोकशाही का तानाशाही में कन्वर्जन। मनमोहन ने एक बार संपादकों को बुलाया था, सवाल जवाब हुए थे। कुछ चटुकारों और दलालों ने पत्रकारिता को भक्तिकाल की कविता बना डाला है। वरना करप्टों, झूठों और जनविरोधियों के लिए पत्रकार आज भी खौफ़ का दूसरा नाम है।

कई अखबारों में काम कर चुके जोशीले पत्रकार Rahul Pandey सोशल मीडिया पर लिखते हैं :

आज पत्रकारों के सेल्‍फी समारोह के बाद पि‍छले साल का कहा मौजूं है… आप भी गौर फरमाएं

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।

करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं।

वरिष्ठ अंग्रेजी पत्रकार Vinod Sharma लिखते हैं : ”Facebook flooded with selfies of media persons with our PM. A day to rejoice? Or reflect?

कई अखबारों में काम कर चुके पत्रकार Ashish Maharishi लिखते हैं :  ”हे मेरे देश के महान न्‍यूज चैनलों और उसके कथित संपादकों, प्रधानमंत्री ने आपको झुकने के लिए कहा तो आप रेंगने लगे। क्‍या देश में मोदी के अलावा कोई न्‍यूज नहीं है। ये पब्‍लिक है, सब जानती है…हमें पता है कि मोदी की न्‍यूज के बदले आपको क्‍या मिला है….

वरिष्ठ पत्रकार Arun Khare लिखते हैं :  ”मीडिया ने कलम को झाड़ू में बदल दिया –मोदी । मोदी जी आपने इस सच से इतनी जल्दी परदा क्यों उठा दिया । कुछ दिन तो मुगालते में रहने देते देश को।

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dharmendra Gupta लिखते हैं : ”जिस तरह से मीडिया के चम्पादक आज मोदी के साथ सेल्फी खिंचवा कर के उस को ब्रेकिंग न्यूज बना रहे है उस से लगता है की अब लड़ाई भ्रष्ट राजनीतिको के साथ भ्रस्ट मीडिया के खिलाफ भी लड़नी होगी.

संपादक और साहित्यकार गिरीश पंकज इन हालात पर एक कविता कुछ यूं लिखते हैं :

पत्रकारिता का सेल्फ़ीकरण
———–
कई बार सोचता हूँ
बिलकुल सही समय पर
मर गए पत्रकारिता के पुरोधा,
नहीं रहे तिलक और गांधी,
नहीं रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर
गणेश शंकर विद्यार्थी भी
हो गए शहीद
राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी
का भी हो गया अवसान।
आज ये ज़िंदा होते तो
खुद पर ही शर्मिन्दा होते
पत्रकारिता की झुकी कमर
और लिजलिजी काया देख कर
शोक मनाते
शायद जीते जी मर जाते
सुना है कि दिल्ली में
‘सेल्फिश’ पत्रकारिता अब
‘सेल्फ़ी ‘ तक आ गयी है
हमारी खुदगर्ज़ी
हमको ही खा गयी है

जो भक्त लोग हैं, उन्हें मोदी की हर स्टाइल पसंद है. वे मोदी की कभी बुराई नहीं करते और मीडिया की कभी तारीफ नहीं करते. इन्हें ऐसी ही चारण मीडिया चाहिए, जिसे गरिया सकें, दुत्कार सकें और लालच का टुकड़ा फेंक कर अपने अनुकूल बना सकें. सवाल उन लोगों का है जो आम जन के प्रतिनिधि के बतौर मीडिया में आए हैं. जिन्होंने पत्रकारिता के नियम-कानून पढ़े हैं और मीडिया की गरिमा को पूरे जीवन ध्यान में रखकर पत्रकारिता की. क्या ये लोग इस हालात पर बोलेंगे या मीडिया बाजार के खरबों के मार्केट में अपना निजी शेयर तलाशने के वास्ते रणनीतिक चुप्पी साधे रहेंगे. दोस्तों, जब-जब सत्ता सिस्टम के लालचों या भयों के कारण मीडिया मौन हुई या पथ से विचलित हुई, तब तब देश में हाहाकार मचा और जनता बेहाल हुई. आज फिर वही दौर दिख रहा है. ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम सब वह कहें, वह बोलें जो अपनी आत्मा कहती है. अन्यथा रामनामी बेचने और रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं क्योंकि पैसा तो दोनों से ही मिलता है और दोनों ही धंधा है. असल बात विचार, सरोकार, तेवर, नजरिया, आत्मसम्मान और आत्मस्वाभिमान है. जिस दिन आपने खुद को बाजार और पूंजी के हवाले कर दिया, उस दिन आत्मा तो मर ही गई. फिर आप खुद की लाश ढोकर भले इनसे उनसे मिलते रहें, यहां वहां टहलते रहें, पर कहा यही जाएगा कि ”मिस्टर एक्स, आप बेसिकली हरामजादे किस्म के दलाल हैं, पत्रकारिता में तो आप सिर्फ इसलिए हैं ताकि आप अपनी हरमजदई और दलाली को धार दे सकें”.

शायद मैं कुछ ज्यादा भावुक और आवेश में हो रहा हूं. लेकिन यह भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को पत्रकारिता में ले आई. ये भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को कारपोरेट और करप्ट मीडिया में देर तक टिका नहीं पाई. यह भावुकता और आवेश ही तो http://Bhadas4Media.com जैसा बेबाक पोर्टल शुरू करने को मजबूर कर गया और इस न्यू मीडिया के मंच के जरिए सच को पूरे ताकत और पूरे जोर के साथ सच कहने को बाध्य करता रहा जिसके नतीजतन अपन को और अपन जैसों को जेल थाना पुलिस कोर्ट कचहरी तक के चक्कर लगाने पड़े और अब भी यह सब क्रम जारी है. शरीर एक बार ही ठंढा होता है. जब सांसें थम जाती हैं. उसके पहले अगर न भावुकता है और न ही आवेश तो समझो जीते जी शरीर ठंढा हो गया और मर गए. मुझे याद आ रहे हैं पत्रकार जरनैल सिंह. सिख हत्याकांड को लेकर सवाल-जवाब के क्रम में जब तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने लीपापोती भरा बयान दिया तो तुरंत जूता उछाल कर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया. जरनैल सिंह अब किसी दैनिक जागरण जैसे धंधेबाज अखबार के मोहताज नहीं हैं. उनकी अपनी एक शख्सियत है. उन्होंने किताब लिखी, चुनाव लड़े, दुनिया भर में घूमे और सम्मान पाया. मतलब साफ है कि जब हम अपने दिल की बात सुनते हैं और उसके हिसाब से करते हैं तो भले तात्कालिक हालात मुश्किल नजर आए, पर आगे आपकी अपनी एक दुनिया, अपना व्यक्तित्व और अपनी विचारधारा होती है.

करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के इस दौर में पत्रकार की लंबाई चौड़ाई सिर्फ टीवी स्क्रीन तक पर ही दिखती है. उसके बाहर वह लोगों के दिलों में बौना है. लोगों के दिलों से गायब है. उनका कोई नामलेवा नहीं है. अरबों खरबों कमा चुके पत्रकारों से हम पत्रकारिता की उम्मीद नहीं कर सकते और यह नाउम्मीदी आज पूरी तरह दिखी मोदी के मीडिया से दिवाली मिलन समारोह में. बड़ी पूंजी वाली करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के बैनर तले कलम-मुंह चला रहे पत्रकारों से हम उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपनी लंबी-चौड़ी सेलरी को त्यागने का मोह खत्म कर सके. इसी कारण इनकी ‘सेल्फी पत्रकारिता’ आज दिखी मोदी के मीडिया मिलन समारोह में.

आज राजनीति जीत गई और मीडिया हार गया. आज पीआर एजेंसीज का दिमाग सफल रहा और पत्रकारिता के धुरंधर बौने नजर आए. आइए, मीडिया के आज के काले दिन पर हम सब शोक मनाएं और कुछ मिनट का मौन रखकर दलाल, धंधेबाज और सत्ता परस्त पत्रकारों की मर चुकी आत्मा को श्रद्धांजलि दे दें.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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रजत शर्मा को मोदी सरकार ने दिया दीपावली से पहले ही तोहफा

मोदी सरकार ने देश के पहले प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती को सरकारी जयंती मनाने का निर्णय किया है। इसके लिए एक आयोजन समिति का गठन किया है। समिति में इंडिया टीवी के प्रमुख रजत शर्मा को भी शामिल किया गया है। उनका चैनल लोकसभा चुनावों से ही मोदी की खबरें प्रमुखता से दिखा रहा था। उसका ही उनको इनाम दिया गया है। रजत शर्मा द्वारा संचालित इंडिया टीवी को लोग मोदीमय न्यूज चैनल भी कहने लगे थे।

चुनावों से पूर्व जब नरेंद्र मोदी का एक प्रायोजित कार्यक्रम आपकी अदालत पेश हुआ तो रजत शर्मा पर कई आरोप लगे थे कि उन्होंने मोदी से वही सवाल पूछे, तो मोदी ने उनको पूछने को कहा था।  प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी एक प्रेस नोट में कहा गया है कि रजत शर्मा देश के बड़े पत्रकारों में एक हैं। उनको समिति का प्रचार-प्रसार का काम सौंपा जा रहा है। मीडिया में काम करने वाले हम सभी पत्रकारों को इस बात अंदाजा पहले से ही था कि रजत शर्मा को जल्द ही केंद्र में मोदी सरकार में कोई न कोई भूमिका अदा करने का ऑफर जरूर दिया जाएगा। रजत शर्मा के लिए इसके साथ ही राज्यसभा में जाने का भी रास्ता अब पूरी तरह से खुल गया है। समिति में पूर्व पत्रकार एवं भाजपा के प्रवक्ता एमजे अकबर को भी सदस्य बनाया गया है।

रमेश ठाकुर

विश्लेषक एवं युवा पत्रकार

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इंडिया टीवी और रजत शर्मा के खिलाफ दस मुकदमे

लखनऊ : नगर विकास व अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मो. आजम खां ने एक बार फिर सफाई दी कि दिल्ली में उनके पास से असलहा मिलने की खबर पूरी तरह बेबुनियाद है। उनके पास न तो कोई बैग था और न ही ब्रीफकेस। उन्होंने कहा कि यह सब उन्हें राजनैतिक रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। वहीं, आजम खां के खिलाफ भ्रामक खबरें चलाने के आरोप में सपाइयों ने अलग-अलग थानों में इंडिया टीवी न्यूज चैनल और इसके मालिक रजत शर्मा के खिलाफ दस मुकदमे दर्ज कराए हैं।

सपाइयों ने गंज कोतवाली, सिविल लाइंस कोतवाली, कोतवाली और सैफनी में न्यूज चैनल के खिलाफ तहरीर दी थी। पुलिस ने गंज कोतवाली में चार, पटवाई में एक, सिविल लाइंस में एक, कोतवाली में एक, शहजादनगर, सैफनी और मिलक में एक मुकदमा दर्ज किया है। तहरीर में आरोप लगाया है कि न्यूज चैनल ने प्रदेश के नगर विकास मंत्री के खिलाफ भ्रामक खबरें चलाकर उनकी छवि को धूमिल करने की कोशिश की गई है। पुलिस ने न्यूज चैनल के खिलाफ कई एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया है। मिलक में पालिका के नामित सभासद इकरार हुसैन ने चैनल के संपादक, एंकर, मालिक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है।

उल्लेखनीय है कि बृहस्पतिवार शाम दिल्ली एयरपोर्ट पर सुरक्षा कारणों से रोक लिया गया। तलाशी के दौरान एक हैंडबैग में चार कारतूस मिलने के बाद सीआईएसएफ के अधिकारियों ने उन्हें रोक कर पूछताछ की। जांच में पता चला कि जिस बैग से कारतूस मिले हैं वह उनके साथ लखनऊ जा रहे विधायक सरफराज खान का है। विधायक के लाइसेंस दिखाने के बाद पुलिस ने उनका लाइसेंस और कारतूस कब्जे में लेकर उन्हें जाने की अनुमति दे दी। इसके बाद वे लखनऊ रवाना हो गए।

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सपाइयों ने फूंका ‘इंडिया टीवी’ और रजत शर्मा का पुतला

रामपुर।  नगर विकास मंत्री मोहम्मद आजम खां के खिलाफ गलत न्यूज चलाने से खफा सपाइयों ने इंडिया टीवी न्यूज चैनल और इसके मालिक रजत शर्मा का पुतला फूंका। शाहबाद में सपाई वाहिद बेग के प्रतिष्ठान पर जमा हुए और जुलूस के रूप से न्यूज चैनल के खिलाफ नारेबाजी करते हुए बिलारी चौराहे पर पहुंचे, जहां प्रदर्शन के बीच न्यूज चैनल का पुतला फूंका। अश्फाक अहमद, कदीर खां, रामौतार यादव, आफताब बेग, अजीज उर्र रहमान खां, जहीन खां, छोटे अंसारी, शाकिर हुसैन, भोजराज, रंजीत यादव आदि मौजूद रहे।

उधर टांडा में सपा की हाजी मोहम्मद जमील के आवास पर बैठक में न्यूज चैनल की निंदा की गई। बैठक में सभासद हाजी मोहम्मद शफी, महमूद नायक, अब्दुल हकीम अंसारी, हाजी फरजंद अली, लियाकत नवाज, खुर्शीद एडवोकेट, रिवायत अली, इमरान पाशा, रईस मास्टर, अकबर अली, डा. मोहम्मद आरिफ, जाहिद अली, हाजी यामीन आदि मौजूद रहे।

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जिस रजत शर्मा ने कभी एनबीए को गैरजरूरी और टीवी टुडे नेटवर्क की जागीर बताया था, वही अब इसके प्रेसिडेंट हैं

Vineet Kumar : जिस रजत शर्मा के इंडिया टीवी ने साल 2008 में मुंबई आतंकवादी हमले की कवरेज के दौरान दुनिया की मशहूर आतंकवादी मामलों की विशेषज्ञ फरहाना अली को आतंकवादी बना दिया था और जिसके कारण एनबीए ने चैनल पर एक लाख रूपये का जुर्माना लगाया..रजत शर्मा ने ऐसा किए जाने पर एनबीए को गैरजरूरी, अविश्वसनीय और टीवी टुडे की जागीर बताया, अब वही रजत शर्मा इस एनबीए के प्रेसिडेंट है..वो इस हैसियत से टेलीविजन कंटेंट को बेहतर करने के लिए प्रेस रिलीज जारी करेंगे..देश के न्यूज चैनलों को नसीहतें देंगे कि क्या प्रसारित करना राष्ट्रहित में है, क्या नहीं..

इंडिया टीवी के एडिटर इन चीफ उसी रजत शर्मा को न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन का प्रेसिडेंट बनाया गया है जिन्होंने साल 2008 में मुंबई बम धमाका मामले एनीबीए की ओर से एक लाख का जुर्माना लगाए जाने के बाद इस संगठन को गैरजरूरी और मनमानी करनेवाला करार दिया था और इंडिया टीवी को इससे अलग कर लिया था. हुआ यों था कि 26/11 के मुंबई हमले के दौरान इंडिया टीवी ने पाकिस्तान मूल की फरहाना अली जो कि आतंकवादी मामलों की जानकार हैं और सेंट्रल इन्टलीजेंस एजेंसी, यूएसए से जुड़ी रही हैं, उन्हें चैनल ने आतंकवादी मामलों के विशेषज्ञ के बजाय जासूस करार दे दिया जिसका आशय था कि वो आतंकवादी गतिविधियों में शामिल है. इंडिया टीवी ने ये इंटरव्यू रॉयटर से बिना क्रेडिट दिए प्रसारित किया था और जिसमे फरहाना अली की छवि पूरी तरह डैमेज कर दी थी.

इस बात की शिकायत फरहाना अली ने एनबीए से की और उसके बाद इस संगठन ने एक लाख रुपये का जुर्माना और रात के आठ से नौ के बीच लगातार पांच दिनों तक खेद की अलग से पट्टी चलानी थी..लेकिन चैनल ने ऐसा करने के बजाय एनबीए को टीवी टुडे नेटवर्क की जागीर बताते हुए खुद को इससे 10 अप्रैल 2009 को अलग कर लिया. बाद में 17 जुलाई 2009 को इंडिया टीवी ने प्रेस रिलीज जारी करते हुए दोबारा से सदस्यता लेने की घोषणा की..इस शर्त के साथ इंडिया टीवी और रजत शर्मा वापस गए कि चैनल के तत्कालीन मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी को प्रमुख संपादक की श्रेणी में रखा जाए और रजत शर्मा को स्थायी सदस्य के रूप में स्वीकार किया जाए. एनबीए ने ये मांगे मान ली और इंडिया टीवी की छाती चौडी रह गई.

वैसे तो अपने गठन के बाद से एनबीएन ने जिस तरह के फैलले दिए हैं और जैसी हरकतें की हैं, उस हिसाब से देखें तो रजत शर्मा का चेयरमैन होना हैरानी की बात नहीं है. ये आज न कल होना ही था..लेकिन ऐसे समय में जबकि उनका चैनल और स्वयं वो खुद भी मौजूदा सरकार के बजाय उनके प्रधान सेवक के भक्त बन गए हैं… दो चीजें तो बेहद स्षप्ट और अघोषित ही सही लेकिन तय है- एक तो ये कि एनबीए के चेयरमैन की हैसियत से अब वो इस भक्ति को खुल्लाखेल फरुर्खाबादी बनाने में सक्रिय होंगे. दूसरा किसी भी चैनल या कार्यक्रम को लेकर सवाल नहीं किए जाएंगे जो कि सरकार के पक्ष में किए जाने के बावजूद पत्रकारिता के मानदंड को ध्वस्त करते हों और उन चैनलों और खबरों को कसने की पूरजोर कोशिश होगी जो मोदी सरकार के खिलाफ जाते हैं..कुल मिलाकर आप चाहें तो एनबीए की भूमिका आनेवाले समय में उन चैनलों के लिए सरकारी नियंत्रण जैसी होगी जो मोदी सरकार की गतिविधियों से असहमत होते हैं..वहीं उन चैनलों के लिए आश्वस्त करेंगे कि आप उनके नाम की चाहे जितनी उंची सुर चाहो, लगा सकते हो.. रहा मामला इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा द्वारा एफआइआर करके चैनल पर उत्पीड़न का मामला दर्ज किए जाने का तो एबीए जैसी संस्था इस तरह की नैतिकता को कब मानता आया है जो इंडिया टीवी मामले में अलग से माने..

मूल खबर :

रजत शर्मा बने न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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इंडिया टीवी एंकर तनु शर्मा प्रकरण पर उत्तर प्रदेश सरकार को एनएचआरसी ने भेजा नोटिस

: यौन उत्पीड़न व इंडिया टीवी, कारपोरेट और राजनेताओं के बीच गठजोड़ पर जेयूसीएस की शिकायत पर जांच शुरू :  लखनऊ । इंडिया टीवी एंकर तनु शर्मा प्रकरण पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की तरफ से उत्तर प्रदेश शासन को भेजे गए नोटिस पर कोतवाली कैसर बाग, लखनऊ के जांच के अधिकारी ने आज जर्नलिस्ट्स यूनियन फार सिविल सोसाइटी (जेयूसीएस) के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य अनिल यादव से लाटूश रोड, लखनऊ स्थित कार्यालय पर मुलाकात की। अनिल यादव ने बताया कि उन्होंने तनु शर्मा प्रकरण और उससे उभरने वाले सवालों जिनमें इंडिया टीवी, कारपोरेट और राजनेताओं के बीच अनैतिक गठजोड़ के पूरे प्रकरण की सीबीआई से जांच कराने की मांग को फिर से जांच अधिकारी के सामने दोहराया। उन्होंने यूपी सरकार से मांग की कि वो इस पूरे प्रकरण पर सीबीआई जांच की संस्तुति करे।

जेयूसीएस नेता राघवेन्द्र प्रताप सिंह और लक्ष्मण प्रसाद ने कहा कि इंडिया टीवी एंकर तनु शर्मा प्रकरण पर लगातार प्रदेश की अखिलेश सरकार इंडिया टीवी संस्थान के आरोपी कर्मियों को बचाने की हर संभव कोशिश कर रही है। क्योंकि तनु शर्मा ने इंडिया टीवी के उस चेहरे को बेनकाब किया जो उन्हें कारपोरेट और राजनेताओं के यहां भेजने की कोशिश कर रहे थे। यह प्रकरण सिर्फ यौन उत्पीड़न तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह भी साफ कर रहा है कि इंडिया टीवी, कारपोरेट और राजनेताओं के बीच मुनाफेखोरी का कोई गठजोड़ काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के दरम्यान का यह पूरा प्रकरण है जो साफ कर रहा है कि लोकसभा चुनावों में इस स्तर तक गिरकर कारपोरेट और राजनीतिक दलों ने मीडिया का इस्तेमाल किया, इस मसले पर चुनाव आयोग की चुप्पी भी आपराधिक है।

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