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सियासत

जिनके दर पर देते थे बड़े-बड़े दस्तक, अब वह खड़े हैं दूसरों की चौखट पर!

अजय कुमार, लखनऊ

एक दौर था, जब नेहरू-गांधी परिवार की चौखट पर सियासत के बड़े-बड़े सूरमा माथा टेका करते थे।यहां तक कहा जाता था कि इस परिवार में कभी आम बच्चा नहीं, प्रधानमंत्री पैदा होता है। देश की राजनीतिक सोच यही से पलती-बढ़ती थी। करीब पांच दशकों तक अपवाद को छोड़कर इस परिवार को कभी कोई गंभीर चुनौती नहीं दे पाया, जिसने इस परिवार को आंख दिखाने का दुस्साहस भी उसका वजूद मिट गया। उसे पार्टी से धक्का मारकर निकला दिया जाता। पूरी दुनिया में यह इकलौता परिवार होगा, जिसने देश को तीन-तीन प्रधानमंत्री दिए।

इस परिवार के बिना कांग्रेस की हालात पतली हो जाती है। इस बात का अहसास तब हुआ जब राजीव गांधी की मौत के बाद सोनिया गांधी ने राजनीति में आने से इंकार कर दिया। कांग्रेस रसातल में जाने लगी। पार्टी में झगड़ा होने लगा। इस स्थिति में तभी बदलाव आया जब सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। नेहरू-गांधी परिवार की सियासी जड़े बेहद मजबूत थीं, यह परिवार देश की जनता की नब्ज जानता था। इसी के बल पर इस परिवार ने करीब छह दशकों तक देश पर राज किया। 2004 से लेकर 2014 तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर भले ही मनमोहन सिंह विराजमान रहे हों,लेकिन सत्ता का केन्द्र दस जनपथ (सोनिया गांधी का घर) ही हुआ करता था। यहां तक कहा जाता था कि दस जनपथ से समानांतर सरकार चला करती थी।

कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए की चेयरलेडी सोनिया गांधी भले ही विदेशी मूल की महिला रहीं हों,लेकिन सियासी रूप से उनका कद देश के तमाम नेताओं से काफी ऊंचा रहा। कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यानी आज के पीएम नरेन्द्र मोदी ने दिया। मोदी लहर के चलते कांग्रेस इतिहास के सबसे कमजोर मुकाम पर पहुंच गई। उसे मात्र 44 सीटें मिली। कांग्रेस कमजोर हुई तो सोनिया गांधी भी बीमार रहने लगी थीं।

बीमारी के चलते सोनिया गांधी धीरे-धीरे अपनी सियासी जिम्मेदारी अपने पुत्र राहुल गांधी के कंधों पर डालती जा रही थीं। राहुल गांधी को सोनिया की जगह पार्टी का अध्यक्ष भी बना दिया गया,लेकिन राहुल गांधी न तो अपने परिवार की सियासी विरासत बचा पाए, न ही राजनीति में अपनी जड़े जमा पाए। काग्रेस एक के बाद एक राज्य हारती गई। राहुल गांधी की काबलियत पर प्रश्न चिन्ह लगने लगे। तमाम दलों के नेता जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए कांग्रेस की बैसाखी का सहारा लेते थे,उन्होंने कांग्रेस से किनारा करना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं इन दलों के सूरमानों ने कांग्रेस की सियासी जमीन भी हड़प ली।

उत्तर प्रदेश की बात कि जाए तो यहां बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस के दलित वोट बैंक में सेंधमारी कर ली तो समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या विवाद के समय मुसलमान से हमदर्दी दिखाकर उनको अपने पाले में खींच लिया। उधर, कमंडल की राजनीति के बाद हिन्दुओं ने कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए बीजेपी का दामन थामन शुरू कर दिया। कांग्रेस की सियासी जमीन खिसकती जा रही थी, लेकिन कांग्रेस के कर्णधार राहुल गांधी बेफ्रिक नजर आ रहे थे। वह अनमने ढंग से सियासत कर रहे थे।उनकी सियासत में गंभीरता का अभाव था। तमाम खास मौकों पर वह बिना बताए देश से बाहर चले जाते। राहुल की काबलियत पर प्रश्न चिन्ह लगने लगे तो उनकी कमजोरी को भांप कर पार्टी के तमाम नेता प्रियंका गांधी को सियासत में लाने की मांग करने लगे।

परंतु सोनिया गांधी ने ऐसी किसी मांग को तरजीह नहीं दी। राहुल की नाकामयाबी का सिलसिला पिछले वर्ष मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ सहित पांच राज्यों में चुनाव से पूर्व तक चलता रहा था, लेकिन पिछले वर्ष के अंत में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए चुनाव में बीजेपी सरकार को उखाड़ कर यहां कांग्रेस की सरकार बनी तो राहुल गांधी की लोकप्रियता का ग्राफ भी बढ़ गया, लेकिन कहा यह भी जाने लगा कि कांग्रेस वहीं कामयाब हो सकती है, जहां कोई क्षेत्रीय क्षत्रप नहीं है। यह कहते हुए उड़ीसा,पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की चर्चा होने लगी,जहां क्षेत्रीय दलों का दबदबा है।

यहां के क्षेत्रीय क्षत्रपों के सहारे कांग्रेस ने अपनी नैया पार करने की काफी कोशिश की,लेकिन उसे किसी ने घास नहीं डाली। खासकर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश जहां से 80 सांसद आते हैं,वहां कांग्रेस की खस्ता हालात के चलते कांग्रेस की सत्ता में वापसी की उम्मीदें भी धूमिल हो रही थीं।उसकी यहां अपनी कोई सियासी जमीन है नहीं? पहले तो कांग्रेस ने सपा-बसपा से गलबहियां करनी चाहीं। कांग्रेस को लगता था कि सपा-बसपा से गठबंधन के सहारे उनकी सियासी जमीन पर बैटिंग करके वह यूपी में अपनी ‘लाज’ बचा सकते हैं। इसके लिए समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव तैयार भी हो गए,लेकिन बसपा सुप्रीमों मायावती ने अखिलेश से साफ कह दिया कि वह कांग्रेस के साथ कोई समझौता नहीं करेंगी।

इसके बाद अखिलेश ने भी अपने कदम पीछे खींच लिए। माया-अखिलेश की सियासी चौखट से कांग्रेस की झोली में कुछ नहीं डाला गया तो कांग्रेस के दिग्गज नेतागण प्रियंका वाड्रा, ज्योतिरादित्य सिंधिया और उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राजबब्बर आदि कांग्रेसी नेताओं ने छोटे-छोटे दलों पीस पार्टी के डा. अयूब, प्रगतिशील समाजवादी मोर्चा के शिवपाल यादव, निषाद पार्टी के डा. संजय कुमार निषाद और महान दल के केशव प्रसाद मौर्या जैसे नेताओं के ‘दर’ पर ‘दस्तक’ देना शुरू कर दिया। इन छोटे-छोटे दलों की सियासी विरासत के सहारे प्रियंका गांधी कांग्रेस का कितना भला कर पायेंगी, यह तो अतीत का विषय है, लेकिन कांग्रेसियों के हौसले थमे नहीं हैं।

इसीलिए तो प्रियंका गांधी गुजरात के गांधीनगर से हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर को अपने पाले में खींचने की कोशिशों के बाद सीधे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ के एक अस्पताल में भर्ती भीम सेना के चन्द्रशेखर से मिलने पहुंच जाती हैं। जहां प्रियंका वाड्रा की हैसियत की चिंता किए बिना भीम सेना कार्यकर्ताओं द्वारा उन्हें चन्द्रशेखर के कमरे में जाने से रोक दिया था। 05 मई 2017 को महाराणा प्रताप की जयंती पर निकाली गई शोभा यात्रा में बवाल के बाद भीम सेना और उसके चीफ चन्द्रशेखर का नाम चर्चा में सामने आया था।चन्द्रशेखर को रासुका के तहत जेल में भी रखा गया था।इसी वजह से वह भाजपा और मोदी-योगी से चिढ़े हुए हैं।

गौरतलब हो, भीम सेना के चीफ चन्द्रशेखर 13 अप्रैल को देवबंद में पदयात्रा निकाल रहे थे, जिसे आचार संहिता का हवाला देते हुए जिला प्रशासन ने रोक दिया था। चन्द्रशेखर नहीं माने तो पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था। हिरासत में ही उनकी तबीयत खराब हो गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

बहरहाल, मेरठ के अस्पताल में पहुंची प्रियंका की करीब दस मिनट का इंतजार कराने के बाद चन्द्रशेखर से मुलाकात हो पाई। प्रियंका ने चन्द्रशेखर से बनाया भाई-बहन का रिश्ता। प्रियंका के साथ मौजूद थे सिंधिया और राजब्बर। प्रियंका राजनैतिक रोटियां सेंकने यहां आईं थी,लेकिन मीडिया के सामने वह यही रट लगाती रहीं कि वह बीमार चन्द्रशेखर को देखने आई हैं। इस लिए सियासत की बात नहीं की जाए।

उधर, प्रियंका से मुलाकात के बाद चन्द्रशेखर के कांग्रेस के टिकट पर नगीना संसदीय सीट से चुनाव लड़ने की चर्चा होने लगी,लेकिन चन्द्रशेखर ने अपने पत्ते नहीं खोले। वह मीडिया से यही कहते रहे कि उनके खून का एक-एक कतरा बहुजन समाज के हित में काम आएगा। उन्होने हमेशा की तरह मायावती के प्रति वफादारी दिखाई।लोकसभा चुनाव में बसपा को पूरा समर्थन देने की बात भी कही,लेकिन पूर्व की तरह चन्द्रशेखर के प्रति माया के तेवर में काई नरमी नहीं आई। माया यही चाहती हैं कि यदि चन्द्रशेखर उनके प्रति वफादार हैं तो बसपा में शामिल हो जाए,तभी आगे बात हो सकती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने की इच्छा जताई। बोले मेरा मकसद सिर्फ मोदी को हराना। चन्द्रशेखर से मुलाकात से प्रियंका और कांग्रेस को क्या हासिल हुआ यह तो वह जाने लेकिन, प्रियंका-चन्द्रशेखर मुलाकात से मायावती का पारा जरूर चढ़ गया। उन्होंने अखिलेश को बुलाकर बात की। बसपा की तरफ से संकेत आने लगे कि अमेठी और रायबरेली से मायावती अपना प्रत्याशी उतार सकती हैं।

बसपा सुप्रीमों इस मुलाकात से क्यों तिलमिला गईं थीं? इसकी तह में जाया जाए तो ऐसा लगता है कि चन्द्रशेखर अगर कांग्रेस के साथ चले जाते हैं तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित वोटों में बिखराव हो सकता है। पश्चिमी यूपी में मायावती की हमेशा अच्छी पकड़ रही है। वह नुकसान से डरी हुई हैं। लब्बोलुआब यह है कि जिस नेहरू-गांधी परिवार के दर पर बड़े-बड़े दस्तक दिया करते थे, उसकी ही चौथी पीढ़ी के नेता अब अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए दूसरों के दरवाजे खटखटा रही हैं।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अजय कुमार की रिपोर्ट.

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