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उत्तर प्रदेश

सपा के ‘चरखी दांव’ से बनारस में बिगड़ा भाजपा का गणित

भाजपा के विषय में कहा जाता है की भाजपा के मास्टर स्ट्रोक के सामने विरोधी चारोखाने चित्त हो जाते हैं लेकिन भाजपा के सबसे कद्दावर नेता नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ अखिलेश यादव ने ऐसा ‘चरखी दांव’ खेला के भाजपा के चाणक्य देखते ही रह गए। जिस तरह से अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव 2019 में एक के बाद एक चुनावी दाव खेल रहें है उससे तो ऐसा लगता है कि अखिलेश अब नेताजी के सभी सियासी दांवपेंच में निपुण हो कर अब उनकी विरासत को विस्तार दे रहे हैं।

बनारस में समाजवादी पार्टी ने मोदी के खिलाफ चुनावी मैदान में अपने पूर्व घोषित उम्मीदवार की जगह निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरे तेज बहादुर यादव को नामांकन के आखिरी दिन अचानक अपना उम्मीदवार घोषित कर पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के रूप में पर्चा दाख़िल करा दिया। बनारस में जीत का अंतर बढ़ा रही बीजेपी को अब खेल बिगड़ता दिख रहां है, क्योंकि पूरे देश मे घूम घूम कर जवानों की वीरता के नाम पर सियासत करने वाली भाजपा के सामने अब जवान खड़ा है।

प्रधानमंत्री अपने भाषणों में राष्ट्रवाद, देशभक्ति और सेना का ज़िक्र करना नहीं भूलते।वो अक्सर कहते हैं कि उन्होंने सेना को मज़बूत किया, खुली छूट दी जिसकी बदौलत सेना सर्जिकल स्ट्राइक और एयरस्ट्राइक करने में कामयाब रही। बनारस के इस चुनावी संघर्ष में मोदी के ख़िलाफ़ कांग्रेस के उम्मीदवार अजय राय और सपा उम्मीदवार बीएसएफ़ के पूर्व जवान तेज बहादुर हैं।

बनारस में मोदी के खिलाफ प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की चर्चा खूब जोर शोर से रही लेकिन कांग्रेस ने अंत मे प्रियंका गाँधी की जगह अजय राय को मैदान में उतार दिया जिससे उफ़ान मारती बनारस का चुनावी माहौल जैसे थम सा गया था। लोगों को लगने लगा के मैच एकतरफा हो गया है।

बीएसएफ के पूर्व जवान तेज बहादुर यादव के निर्दलीय नामांकन के बाद,खबरों में सुर्खियाँ बन कर नहीं छाए लेकिन चर्चा कम भी नहीं रही। हां, जैसे ही बड़े नेताओं ने बनारस की ओर अपना रुख किया तेज बहादुर यादव चर्चा से गायब भी होने लगे थे। लेकिन जैसे ही बनारस में मोदी के खिलाफ नामांकन के आखिरी दिन अखिलेश यादव ने गुगली बॉल फेंकी भाजपा के चाणक्य खेलने के बाजय डिफेंस मोड में आ गए।

कहते हैं न राजनीति संभावनाओं का खेल है और राजनीति में कब-कौन किसके लिए ‘संभावना’ बन जाए, ये कहा कहा नहीं जा सकता। बीएसएफ का पूर्व जवान चंदे के भरोसे चुनावी मैदान में जीत-हार की रेस से बाहर रहकर आईना दिखाने की बात कहते हुए चुनावी दंगल में उतरा था। हवा का रुख बदला तो सभी विपक्षी दल जो आपस में एक दूसरे के समर्थन लेने देने से परहेज़ करते हैं, तेज बाहादुर यादव के समर्थन की बात करने लगे। अखिलेश यादव जो पहले से चाहते थे कि तेजबहादुर यादव सपा से चुनावी दंगल में उतरे और अंततः कामयाब रहें और तेज बहादुर यादव सपा के सिंबल पर चुनावी दंगल में उतरने को तैयार हो गए। सपा से पर्चा दाख़िल भी कर दिया। यह एक दाव ने शांत सा दिखने वाले चुनाव में ज्वार-भाटा ला दिया।

मीडिया में दिए गए बयान में बीएसएफ के पूर्व जवान तेज बहादुर यादव कहते हैं- ‘पिछले 70 साल में पहली बार एक सेना का जवान प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ चुनाव में खड़ा हुआ है. यह एक चिंगारी कैसे सैलाब बन जाएगी, आप देखते रह जाएंगे।’

पुलवामा हमले पर सवाल उठाते हुए वे कहते हैं, ”अगर प्रधानमंत्री मोदी का इतना ही डर दूसरे देशों में है तो पुलवामा जैसा बड़ा हमला कैसे हो गया? आज तक इतना बड़ा हमला सेना पर नहीं हुआ था। कहीं ऐसा तो नहीं है कि इन्होंने अपनी राजनीति के लिए खुद ही यह हमला करवा दिया हो।”

जीत-हार का फैसला तो भविष्य के गर्भ में सुरक्षित है लेकिन कांग्रेस द्वारा वाकोवर दिए जाने के बाद भाजपा के चाणक्य जिस जीत को यादगार बनाने की तैयारी में जुटे थे, उनको अब उन सवालों के जवाब तलाशना होगा जिनके पूछे जाने वाले को सेना विरोधी, पकिस्तानपरस्त और देशद्रोही तक कहने से नहीं चूकते थे। देखना दिलचस्प होगा कि सवालों के ज़वाब मिलते हैं या नहीं।

आपका
अब्दुल रशीद
लेखक, पत्रकार व स्तंभकार
सिंगरौली, मध्यप्रदेश
[email protected]

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2 Comments

2 Comments

  1. Manish

    April 30, 2019 at 5:13 pm

    बेबकूफ के तरह की रिपोर्टिंग । पत्रकार कम लग रहा है

  2. lav kumar singh

    April 30, 2019 at 6:38 pm

    कृपया सही कर लें। चुनाव में ‘जवान’ नहीं खड़ा है, अनुशासनहीनता और अन्य तमाम आरोपों में ‘बर्खास्त जवान’ खड़ा है।

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