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भाजपा नेताओं द्वारा लेह के पत्रकारों को रिश्वत देने की खबर दबा गए ज्यादातर अखबार

लेह के पत्रकारों ने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं पर रिश्वत देने का आरोप लगाया है। अपने आप में यह अनूठा मामला है। इसके अलावा, इससे संबंधित कई और तथ्य हैं जो इस खबर को महत्वपूर्ण बनाते हैं। पांच मई को मैंने लिखा था कि टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर एक महत्वपूर्ण खबर है जो दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। हिन्दी में उस खबर का शीर्षक इस प्रकार होता – लेह की प्रेस क्लब ने चुनाव आयोग और पुलिस से शिकायत की है भाजपा नेताओं ने अनुकूल कवरेज के लिए रिपोर्टर्स को रिश्वत देने की पेशकश की। इस खबर को वैसी प्राथमिकता नहीं मिल रही है जैसी मिलनी चाहिए। आपने पढ़ी क्या? नहीं पढ़ी तो यहां पूरी खबर जानिए और सोचिए कि आपका अखबार आपको क्या पढ़ा रहा है।

ऐसा नहीं है कि यह खबर छिपी या छिपाई जा रही है। जब शिकायत है, जांच चल रही है तो नजर रखना अखबारों का काम है। टेलीग्राफ में आज पहले पन्ने पर खबर है, मीडिया ब्राइब प्लॉट थिकेन्स (मीडिया वालों को रिश्वत देने का मामला गर्माया)। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर चार कॉलम में खबर है, “प्रेस वालों को रिश्वत का मामला : लेह में चुनाव अधिकारी भाजपा के खिलाफ एफआईआर के हक में”। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है इस मामले में चुनाव अधिकारी अनवी लवासा 2013 बैच की जम्मू व कश्मीर कैडर की आईएसएस अधिकारी हैं और चुनाव आयुक्त, पूर्व आईएएस अशोक लवासा की बेटी हैं। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा ने यहां साल 2014 के चुनाव में पहली बार जीत दर्ज की थी। कांग्रेस उम्मीदवार महज 36 वोट से हार गए थे।

इंडियन एक्सप्रेस का आज का पहला पन्ना

ऐसे में उम्मीदवारों को पैसे बांटने और मीडिया में खबर को महत्व नहीं मिलने का अलग मतलब है। इसकी तुलना गलत करार दिए गए अमेठी में बूथ कब्जे की शिकायत को मिली महत्ता से कीजिए। इस मामले में इंटरनेट पर उपलब्ध जनसत्ता की खबर के अनुसार मामला इस प्रकार है : जम्मू और कश्मीर में पत्रकारों ने भाजपा नेताओं पर रिश्वत देने का आरोप लगाया है। लेह में प्रेस क्लब ने इस बात की शिकायत निर्वाचन आयोग से की है। क्लब का कहना है कि भाजपा नेताओं ने सोमवार को लद्दाख संसदीय क्षेत्र में मतदान से पहले भाजपा नेताओं ने पत्रकारों को रिश्वत देने का प्रयास किया। यह शिकायत जिला चुनाव अधिकारी एनवी लवासा के साथ ही पुलिस को भी दी गई है।

लेह के डिप्टी कमिश्नर ने टेलीग्राफ को बताया, ‘हां, हमें (शिकायत) मिली है। हम इस मामले की पड़ताल कर रहे हैं। यदि जरूरत पड़ी तो हम इस मामले में पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराएंगे। ‘यह गैर-संज्ञेय अपराध है और इसमें कोर्ट की तरफ से एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। लेह प्रेस क्लब के सदस्य रिंचेन एंगमो ने कहा कि भाजपा ने कथित रूप से उन्हें व अन्य तीन पत्रकारों को रिश्वत देने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि प्रेस क्लब ने पुलिस के पास भी शिकायत दर्ज करा दी है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने इस मामले में अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने लेह प्रेस क्लब की शिकायत के पत्र को ट्वीट किया।

पुलिस को दी शिकायत के अनुसार बृहस्पतिवार को एक होटल में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रविंदर रैना ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। शिकायत में बताया गया है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद प्रदेशाध्यक्ष भाजपा नेताओं रविंदर रैना और एमएलसी विक्रम रंधावा समेत भाजपा नेताओं ने लिफाफे में मीडिया कर्मियों को रिश्वत देने का प्रयास किया। पत्रकारों ने कहा कि हमनें यह पेशकश स्वीकार नहीं कि और इस प्रयास के प्रति अपना विरोध प्रकट किया। यहां चार उम्मीदवारों में मुकाबला है। लद्दाख में चार दलों को बीच मुकाबला है। भाजपा ने यहां से सेरिंग नामग्याल को टिकट दिया है। नामग्यला लेह स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद् के मुख्य कार्यकारी पार्षद भी हैं। वहीं कांग्रेस ने यहां से रिगजिन सपलबार को चुनाव मैदान में उतारा है।

सज्जाह हुसैन यहां निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। सज्जाद को नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी का समर्थन प्राप्त है। वहीं काग्रेंस ने यहां से बागी असगर अली करबलई को टिकट दिया है। यह मुस्लिम बहुल सीट है। इसलिए मुसलिम समुदाय को थोड़ी बढ़त हासिल है लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों ने बौद्ध उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है। करबलई का मानना है कि कांग्रेस के छद्म उम्मीदवार को मुस्लिम वोटों के बंटवारे के लिए उतारा गया है। भाजपा ने यहां साल 2014 के चुनाव में पहली बार जीत दर्ज की थी। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को महज 36 वोट से हराया था।

आज मैं अखबार नहीं देख पा रहा हूं इसलिए इतना ही। अगर मौका मिला तो बताउंगा कि वीवीपैट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आज टेलीग्राफ ने बताया है कि कुछ पर्चियों का मिलान समस्या का सही इलाज नहीं है और हरेक संसदीय चुनाव में कितनी पर्चियों के मिलान से सही नतीजा आएगा यानी ईवीएम से जो जीते वही वीवीपैट की गिनती से – तो जवाब यह होगा कि किसी भी चुनावक्षेत्र में ईवीएम की संख्या और वीवीपैट की गिनती के आधार पर जीत में अंतर से तय होगा। द टेलीग्राफ ने चेन्नई मैथमेटिकल इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर के हवाले से यह जानकारी दी पर निर्भर करेगा यह यह खबर भी किसी और अखबार में नहीं होनी है।

उदाहरण के लिए बताया गया कि किसी चुनाव क्षेत्र में जहां जीत का अंतर तीन लाख वोट है वहां छेड़छाड़ या गड़बड़ी की संभावना कम है। पर जहां जीत का अंत तीन हजार वोट ही है वहां इसकी संभावना ज्यादा है। नतीजा बदलने के लिए पहले मामले में तीन लाख के आधे यानी एक लाख 50 हजार एक वोट को इधर से उधर करना होगा जबकि दूसरे मामले में यह 1501 वोट ही होगा। हिन्दी अखबारों में इस पर कुछ होना नहीं है और बहुत सारे लोगों को बिना जाने-समझे अपनी राय देनी है।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट

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