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सियासत

23 को मोदी सरकार रिपीट होगी या नहीं?

Manish singh : मीडिया का फैसला वही है जिसकी उम्मीद थी। यहां तक कि tv9 की भाषा भी अपने फाउंडर सीईओ को खेद दिए जाने के बाद जी न्यूज जैसी हो गयी है। तो मीडिया के ताजे इतिहास को देखते हुए एग्जिट पोल के ऐसे आंकड़े अचम्भे की बात नही है। सवाल तो अब भी मौजूं है कि 23 को मोदी सरकार रीपीट होगी या नहीं होगी।

पिछले 2-3 साल मैंने खुलकर मोदी सरकार की कार्यशैली की आलोचना की है। मेरी जिम्मेदारी थी, क्योंकि इस सरकार को लाने में मेरा मत भी शामिल था। 2014 का वो मत upa की पॉलिसी पैरालिसिस, भ्रस्टाचार, ढुलमुलपन के खिलाफ था। साथ ही साथ वो मत, नरेंद्र मोदी के एक नए अवतार का स्वागत भी था।

2002 का “घृणा का नायक” ( कर्टसी- इंडिया टुडे ) अब “सबके साथ-सबके विकास” के बदले हुए कलेवर में था। ऐसा लगा कि शायद 2002 से 2014 तक गुजरात का प्रशासनिक अनुभव एक व्यक्ति को नई चीजें सिखा गया हो। नई वे चीजे जिसे बाजपेयी ने राजधर्म कहा था। नई वे चीजें , जो निर्णय के ऊंचे सिँहासन ने अलगू चौधरी और जुम्मन शेख को मिनटों में सिखा दिया था। तो यहां तो उस सिंहासन पर 12 लम्बे साल मिले। लर्निंग जरूर हुई होगी। 2014 के और भी वादे थे। राजनीति से अपराधियों का निष्काशन, स्पेशल कोर्ट और साल भर में फैसला, इकॉनमी को नए सिरे से संवारना, जॉब्स, एजुकेशन के सुधार, काले धन पर अंकुश और वापसी.. तो मोदी को लाना बनता था।

मगर जो हुआ वो भौचक करने वाला था। अमित शाह का आगमन, पार्टी के भीतर के सीनियर्स को मार्गदर्शक मंडल में भेजना, केबिनेट के सहयोगी स्कूली बच्चों की तरह मीटिंग में खड़े, कांग्रेस को विपक्षी दल के दर्जे से महरूम, ढाई लोंगो के हाथ सत्ता, संवेधानिक निकायों, एजेन्सियों, विश्वविद्यालयों में एक सिरे से कब्जा, रॉ विजडम के बेपरवाह फैसले, टैलेंट और संस्थानों का मज़ाक और अपमान, मीडिया पर एकाधिकार। चलिए, माना …जिसे हमने सत्ता दी वो अपना सिस्टम सेटअप कर रहा है। शायद हमारा नेता इसके बाद कुछ करेगा।

किया, जरूर किया। फैसले क्लास के लिए, मास के लिये भाषण किया। गरीब को नए सिम्बल दिए। शौचालय, गाय, मन्दिर,पाकिस्तान, मुसलमान, अगड़ा,पिछडा, गाली, इमोशन … पांच साल निकल गए। नेता चुनाव दर चुनाव लडता रहा, जनता चुनाव दर चुनाव जिताती रही। चुनाव चुनाव खेलते पता ही न चला कि कब 5 साल गुजर गये। अंतहीन चुनाव का सिलसिला जाने कब ” सबका साथ – सबका विकास” के चीफ को फिर “डिवाइडर इन चीफ” के ओरिजन पॉइंट पर लौटा लाया।

पीएम ने इस बार कोई मुखोटा नही पहना। उनने न विकास की बात की, न कोई नरेटिव दिया, न कोई झूठा जाल बुना। न अर्थव्यवस्था की बात की, न समरसता का दिखावा किया, न नेतृत्व के समावेशी होने का ढोंग रचा। धन, ताकत, नेटवर्किंग, प्रोपगण्डा और आक्रामकता का खुला मुजाहिरा इस बार किया है। जी हां, इस बार मोदी सरकार आपसे खुलकर वह होने के लिए लाइसेंस मांग रही थी, जो कि वो है।

लोकतँत्र को नई दिशा का वादा करने वाला सुषमा, राजनाथ, गडकरी, सुमित्रा महाजन, मुरली मनोहर की जगह प्रज्ञा, गोडसे, साक्षी महाराज, हंस राज हंस, निरहुआ की टीम के साथ आता है। एग्जिट पोल या 23 के परिणाम चाहे चीख चीख कर कहें कि देश ने इस हुलिग्निज्म को बम्पर स्वीकार्यता दी है मगर मैंने इसे नकारा है। मैंने मोदी को नही चुना।

आप कहे कि मैं या मुझ जैसे लोग कांग्रेसी है, आपियन हैं, वामी है, सिकुलर हैं। अच्छी बात …. । आप हमारे लिखे शब्दो से आहत थे, चिढ़े थे। चलिये, खुश होइए, कि हमारी आलोचना की जिम्मेदारी घट गई है। इसलिए कि हम नही ठगे गए। हमें अच्छे से पता है कि हमने क्या नकारा, किस चीज को रोकने की कोशिश की।

ठगे तो आप भी नही गए। पूरे सिस्टम को नकार कर एक व्यक्ति की पालकी ढोने को पूरा देश अगर राजी है, तो लोकतंत्र नतमस्तक है, संविधान नतमस्तक है। जो आपने चुना है, वह भरपूर मिले। पेट पर भीगा कपड़ा बांध कर पाकिस्तान और मुसलमानों को सबक सिखाते रहिये। नए सिरे से इतिहास लिखिए, देश को नई पहचान दीजिये।

हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी ख्वाहिश अगर यही है, तो फिर गाय गोडसे और गंडासे के देश में आपका स्वागत है।

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1 Comment

1 Comment

  1. uday mohite

    May 21, 2019 at 10:19 pm

    Salute Manishji..ek imandar alochana !

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