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सुख-दुख

आईसीयू में शोर नहीं मचता तो ये नेता मंत्री संतरी भागते दौड़ते नज़र नहीं आते!

Nitin Thakur : बहुत गलत किया। आईसीयू में शोर नहीं मचाना चाहिए था, लेकिन क्या कीजे… जब वहां शोर नहीं था तब आवाज़ आप तक भी नहीं पहुंच रही थी, और अब देखिए नेता, मंत्री, संतरी ऊंघते-भागते-स्कोर पूछते कम से कम दौड़ तो रहे हैं।

शोर मचाना गलत है, ये एकदम सही है। लेकिन जिस तरह की खामोशी बिहार में सरकार ने फैला रखी है और विपक्ष भी कहीं मर चुका, तब जितने पत्रकार हो सके वहां जाकर शोर मचाएं। आईसीयू में ना मचाकर बाहर मचाएं, इतना ध्यान रख लें, लेकिन अगर बच्चों की बेहतरी के लिए एकाध कानून तोड़ना पड़े तो तोड़िए। ज़रूरी हमारे बच्चों की जान है जो यूं भी व्यवस्था बनाने में जा ही रही है।

जिनके बच्चे अस्पताल में पड़े थे, उन्हें पत्रकारों की रिपोर्टिंग को देखकर आराम मिला होगा कि चलो टीआरपी के लिए ही सही लेकिन कोई तो आया उनकी बात कहने के लिए. आप जुगुप्साओं में रहिए और कानून के फालतू मीनमेख निकालिए जो आदर्श परिस्थितियों में फॉलो करने के लिए बने थे ना कि आपद्स्थितियों के लिए।

नियम कानून मर्यादा के तहत रिपोर्टिंग करने के पिचहत्तर तरीके हो सकते हैं लेकिन ये सब आदर्श स्थिति में बैठकर सूझता है। कभी कायदे के संवाददाता से पूछिएगा कि उसे एक रिपोर्ट आप तक पहुंचाने में कितने कानून तोड़ने पड़ते हैं वरना कानून की आड़ में तंत्र कब्ज़ाए लोग छिपे रहते हैं। हो सकता है कल यही पत्रकार खुद मानें कि थोड़ी ज़्यादती हो गई लेकिन अभी निजी तौर पर मेरे लिए अहम है कि चलो कुछ तो हुआ।

रवीश, अंजना या अजीत अंजुम सभी का संबंध बिहार से है। चमकी भी अस्सी के पूर्वार्ध से कहर बरपाता रहा है, दिल्ली के मीडिया में चरम पर बैठे किसी पत्रकार ने अब से पहले हल्ला नहीं बोला। अब अजीत जी, रवीश जी, अंजना जी पहुंची हैं लेकिन बाकी लगता है कि मुज़फ्फरपुर को भूल कर लॉर्ड्स पर नज़र जमाए बैठे हैं।

टीवी पत्रकार नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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