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सुख-दुख

राजीव मित्तल ने जिस किस्म की खानाबदोश जिंदगी जी वो कोई विरला ही जी सकता है!

Devpriya Awasthi-

काल राजीव मित्तल को भी लील गया। नवभारत टाइम्स, दिल्ली और जनसत्ता, चंडीगढ़ में साथ काम करने वाले राजीव के निधन की जानकारी देने वाली नवीन जोशी की पोस्ट उसके व्यक्तित्व का सही चित्रण करती है।

Naveen Joshi-

तो हमारा प्यारा राजीव मित्तल भी चला गया। कल शाम पूर्णिमा का फोन आया था कि राजीव की हालत बहुत गंभीर है। नर्सिंग होम में हैं, डॉक्टर ने 50-50 कहा है। कोई अच्छा चेस्ट स्पेशलिष्ट हो तो दिखवा दीजिए। फिर कई बार फोन नहीं उठा। रात साढ़े बारह की मिस्ड कॉल सुबह दिखी। मुकेश कुमार सिंह की पोस्ट ने यह बुरी खबर दी।

राजीव से हर दूसरे-तीसरे दिन बात होती थी। अद्भुत ही इनसान था वह, प्यारा, खिलंदड़ा, निर्मल मन और खूब लिखने-पढ़ने वाला। एकदम बिंदास और खरी-खरी कह देने वाला। पत्रकारिता पर जैसे किस्से वह लिख रहा था, किसी को भी न बख्शने वाले, वैसा वही लिख सकता था। उन संस्मरणों की किताब की तैयारी थी। हम खूब बातें करते थे। इधर जितेन्द्र भाटिया के संस्मरण और एक उपन्यास पढ़कर वह उन्हें सम्पूर्ण लेखक कह रहा था तो मैंने उसे भी यही कहा। वह खूब हंसा और खुश हुआ था।

राजीव जैसे इन्सान नहीं मिलते, पत्रकारों की क्या कहें।

विदा प्यारे!

Vir Vinod Chhabra-

अलविदा राजीव… राजीव मित्तल नहीं रहे. जैसे ही सुबह ये ख़बर असग़र मेहदी की पोस्ट से मिली तो दिल ने मानने को यक़ीन नहीं किया. एक नहीं दसियों दोस्तों से संपर्क किया, दिल्ली से प्रमोद जोशी से भी बात की, तब कन्फर्म हुआ कि सत्य को झुठलाना नामुमकिन है. राजीव एक विचित्र शख़्सियत के मालिक रहे, बिलकुल बिंदास, मस्तमौला. अच्छे को अच्छा कहा और ग़लत को ग़लत. चाहे कोई नाराज़ हुआ तो हुआ करे. उन्होंने जिस तरह की एक प्रकार से ख़ानाबदोशी वाली ज़िंदगी जी वैसी ज़िंदगी कोई विरला ही जी सकता है. कई अख़बारों में काम किया. हिंदुस्तान, स्वतंत्र भारत, जनसत्ता… अभी तो मुझे इतने ही याद आ रहे हैं. कभी लखनऊ तो कभी कानपुर, कभी दिल्ली तो कभी चंडीगढ़ तो कभी मुजफ्फरपुर तो कभी मेरठ. कई सम्पादकों से उनका पंगा रहा.

राजीव को मैं हाई स्कूल के दिनों से जानता रहा. वो हमारी मल्टी स्टोरी क्रिकेट टीम के फ़ास्ट बॉलर ठाकुर केदार नाथ सिंह के परम मित्रों में थे. चारबाग़ गुरूद्वारे के पीछे रहते थे. ये केदार सिंह भी अजीब आदमी था. उन्हें अपने नाम से पहले ठाकुर कहलवाना बहुत पसंद था. छह बार अटेंप्ट किया तब जाकर हाई स्कूल पास किया. मैं सोचता था राजीव जैसे संगीत प्रेमी आदमी ने भी कैसा आदमी पसंद किया.

फिर बरसों गुज़र गए. राजीव संगीत की दुनिया से निकल कर अख़बार में आ गए. मैं उन्हें अस्सी के सालों में लखनऊ के नवभारत टाइम्स में मुद्दत बाद मिलने गया. यार, तुम इतना बढ़िया कैसे लिखते हो? उन दिनों मैं सिनेमा और क्रिकेट पर लिखता था और राजीव सिनेमा की समीक्षा लिखते थे और सिनेमा की बेहतरीन पर्सनॅलिटीज़ पर बिंदास लिखते थे, कई बार की बख़िया भी उधेड़ देते थे. वैसे ये उनके मुख्य विषय नहीं रहे. राजनीति, संगीत, पत्रकारिता की दुनिया में उछाड़-पछाड़, बाबरी मस्जिद के विध्वंस का आँखों देखा हाल, जाने क्या क्या नहीं लिखा. मंटो के ज़बरदस्त प्रेमी रहे. मस्त ज़िंदगी जी. जो मिला खा लिया, पी लिया, जहाँ जगह मिली सो लिए, रेलवे प्लेटफॉर्म की बेंच से लेकर हलवाई के तख़्त तक. लखनऊ से कानपुर डेली पसैंजरी सालों की. गाना-बाजाना उनका प्रमुख शौक रहा.

कुछ साल पहले मैंने उन्हें फेसबुक पर तलाशा. वो पहले हमारे जमावड़ा और फिर बैठकी ग्रुप में शामिल हुए. और पल भर में ही सबके चहेते हो गए. उनके बिना महफ़िल अधूरी रहने लगी. एक बार मैंने फेसबुक पर लिखा कि मैं राजीव के बिंदास और मस्तमौला अंदाज़ में लिखना चाहता था लेकिन लिख न सका. उनके एक मुरीद राजीव तिवारी ने मज़ाकिया कमेंट किया – शुक्र है राजीव की हैंडराइटिंग की कॉपी करने की कोशिश नहीं की. इन दिनों राजीव अपनी पत्रकारिता की ज़िंदगी के कड़वे-मीठे अनुभवों का संकलन कर रहे थे.

कोरोना की पहली लहर ढीली हुई तो बैठकी की रूबरू बैठकें हुईं. एक बैठक में राजीव आये लेकिन बाकी में नहीं. मैंने फोन किया तो पता चला तबियत ठीक नहीं है. आज बिभास श्रीवास्वत ने बताया कि पांच दिन पहले राजीव का जन्मदिन था. मुबारक़ देने के लिए फोन किया तो राजीव ने बताया कि अस्थमा का ज़बरदस्त अटैक आया है. फिर कभी बात करूँगा. मालूम न था कि अब राजीव कभी बात नहीं करेंगे.
सलाम राजीव.

नीचे चित्र में सबसे दाएं बैठे हुए हैं राजीव.

Anoop Mishra-

नहीं रहे राजीव सर. कल राजीव सर हमेशा के लिए विदा हो गए। 9 अप्रैल रात उन्होंने इलाज के दौरान आखिरी सांस ली। 11 की सुबह उनका अंतिम संस्कार हुआ। अस्थमा अटैक के चलते दो-तीन रोज लखनऊ घर पर ऑक्सीजन के सहारे इलाज हुआ। हालत बिगड़ने पर उन्हें हॉस्पिटल भर्ती कराया गया। मौजूदा भयावह स्थितियों के बीच उनके इलाज के लिये काफी मशक्कत करनी पड़ी।

सांस उखड़ने की तकलीफ के अलावा उन्हें कोई असहजता कभी उतनी नहीं हुई। 6 अप्रैल को हम दोनों की पैदाइश हुई थी। हर बार वो मुझे, और में उन्हें शुभकामना देते। इस बार वे तकलीफ बढ़ने पर बिस्तर से उठ न सके।

राजीव सर जैसा जिंदादिल बॉस, खांटी पत्रकार, दोस्त , बड़ा भाई मिलना मुश्किल है। वे कलम बेख़ौफ़ बादशाह, सब पर जान लूटने वाले हरदिल अजीज इंसान थे। उनके साथ एनसीआर, मेरठ में कई साल बिताए गए पल आज भी भूल नहीं पाया।

सर,

नमन,

आप बहुत याद आएंगे।

Girish Malviya-

फेसबुक के सभी मित्रों के लिए एक दुःखद खबर है Rajiv Mittal हमारे बीच नहीं रहे. एक बेहतरीन इंसान, एक जबरदस्त पत्रकार को हमने खो दिया. मैंने अपनी अब तक की जिंदगी में इतना खरा ओर इतना साफ बोलने वाला इंसान नही देखा. हमारे बीच उम्र का एक बड़ा फासला था लेकिन कभी उन्होंने इस फासले को हमारे बीच नहीं आने दिया. जब भी मैं उनको कमेन्ट बॉक्स में आदरणीय या सर कह के संबोंधित करता था वे हमेशा मुझे टोक दिया करते थे. राजीव जी का जाना, आज व्यक्तिगत क्षति के रूप में महसूस हो रहा है जिसकी पूर्ति कभी नहीं हो पाएगी.

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