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अवॉर्ड लौटाने वालों को ‘थके हुए लोगों’ की संज्ञा देने वाले शायर मुनव्वर राणा सोशल मीडिया पर घिरे

Mohammad Anas : ऊर्दू मुशायरों के मंच से देश के बिगड़ते हाल पर, मुसलमानों के साथ नाइंसाफी पर शाइरी करने वाले और साहित्य अकादमी अवार्ड पाने वाले मुनव्वर राना साहब ने अभी तक अपना मुंह क्यों बंद कर रखा है? क्या उनके लिए इंसानी जान सिर्फ शाइरी के अशआर और नोटों की गड्डियां हैं या फिर विरोध का प्रतीक भी। पनसारे, दाभोलकर और कलाबुर्गी की हत्या पर तो वे चुप रहे क्या वे अख्लाक़ की हत्या पर भी खामोशी अख्तियार करे रहेंगे जबकि उनको पता है कि एक बड़ी साज़िश के तहत मुसलमानों को इस मुल्क में परेशान किया जा रहा है।

Mohammad Anas : ऊर्दू मुशायरों के मंच से देश के बिगड़ते हाल पर, मुसलमानों के साथ नाइंसाफी पर शाइरी करने वाले और साहित्य अकादमी अवार्ड पाने वाले मुनव्वर राना साहब ने अभी तक अपना मुंह क्यों बंद कर रखा है? क्या उनके लिए इंसानी जान सिर्फ शाइरी के अशआर और नोटों की गड्डियां हैं या फिर विरोध का प्रतीक भी। पनसारे, दाभोलकर और कलाबुर्गी की हत्या पर तो वे चुप रहे क्या वे अख्लाक़ की हत्या पर भी खामोशी अख्तियार करे रहेंगे जबकि उनको पता है कि एक बड़ी साज़िश के तहत मुसलमानों को इस मुल्क में परेशान किया जा रहा है।

साहित्य अकॉदमी अवॉर्ड लौटाने वाले लेखकों और साहित्याकरों को राना साहब ने ‘थके हुए लोगों’ की संज्ञा दी। और पिछले चार पांच दिनों से कई तरह के फेसबुकिया स्टंट दिखा रहे हैं। मियाँ जिनको लौटाना था उन्होंने पहले बताया नहीं, आप तो बता बता कर भी लौटा नहीं रहे हैं। शर्म आती है कि मैं और मेरे जैसे लाखों लोग आपको इंक़लाबी शाइरी का अगुवा समझते रहे।

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

ये वो मूल पोस्ट हैं मुनव्वर राणा की जिनके बाद उनकी आलोचना सोशल मीडिया पर शुरू हो गई है>>

Munawwar Rana : हज़ारों चाहने वालों ने कमेंट्स किए, मेसेजेज़ भेजे, ट्वीट किए, सेकड़ों फ़ोन कॉल्स आए जिन्होंने अवार्ड वापसी के सिलसिले को देखते हुवे कहा “बाबा आप भी साहित्य अकादमी अवार्ड वापस कर दीजिए”, हमें अच्छा लगा..ये वो लोग हैं जो इस नाचीज़ से बे-इंतिहा मोहब्बत करते हैं, और हम भी इन्हीं मोहब्बतों की बदौलत अभी तक ज़िन्दा हैं! हमने कभी अवार्ड्स की ख्वाहिश ज़ाहिर नहीं की, कभी ओहदा नहीं माँगा, ना ही जी हुज़ूरी की, हमेशा अपने क़लम को हक़ और इंसाफ़ के लिए इस्तेमाल किया और हमेशा फ़कीरों सी ज़िंदगी गुज़ारी! हमने कहा की अभी हमारी क़लम में ताक़त है, इसे ज़ंग नहीं लगा है, इसलिए हम अवार्ड वापस नहीं करेंगे ! अवार्ड लौटाना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात यह है कि आप अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को सुधारें। लेकिन अगर हमारे अवार्ड वापस करने से ज़ुल्म, निर्दोषों की हत्या, साम्प्रदायिकता और दंगे रुक सकते हैं तो हम ना सिर्फ़ एक साहित्य अकादमी अवार्ड बल्कि ज़िन्दगी भर के सभी अवार्ड लौटाने को तैयार हैं !
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कैंडल मार्च से लुटी अस्मत वापस नहीं आती है| चीख़ पुकार करने से सफ़दर हाशमी वापस नहीं आए| बच्चों के रोने से और पत्नी के सुहाग मिटाने से गोविन्द पनसारे, डॉ. कलबुर्गी, दरोगा मनोज मिश्रा, छिम्मा, अखलाक़ और दंगों में मरने वाले भी आज तक वापस नहीं आ सके| मैं 15 बरस से चीख़ चीख़ कर कह रहा हूँ की अगर मरने वाले की क़ीमत ही मुक़र्रर करनी है तो कम से कम एक करोड़ मुक़र्रर की जाए| मरने वालों के परिवार को VVIP एरिया में फ़्लैट दिया जाए| मरने वालों के बच्चों को शहर के सबसे अच्छे स्कूल में मुफ़्त तालीम का इंतेज़ाम किया जाए|
बस तुम मेरी आवाज़ से आवाज़ मिला दो,
फिर देखो की इस मुल्क में क्या हो नहीं सकता!

Munawwar Rana : अगर आप सम्मान लौटा रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप थक चुके हैं, आपको अपनी क़लम पर भरोसा नहीं है… कन्नड़ विद्वान एमएम कलबुर्गी की हत्या व सांप्रदायिक सदभाव में कमी के विरोध में कई साहित्यकारों के पुरस्कार व नागरिक सम्मान लौटाने पर मशहूर शायर मुनव्वर राना ने कहा, इसका मतलब है कि आप थक चुके हैं। अपनी कलम पर भरोसा नहीं है। केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए देश भर में बड़ी संख्या में साहित्यकार साहित्य अकादमी पुरस्कार और नागरिक सम्मान लौटा रहे हैं, लेकिन राजधानी के मशहूर शायर मुनव्वर राना ने विरोध के इस तरीके पर सवाल उठाया है। राना कहते हैं, लेखक का काम समाज को सुधारना है। हमें समाज की चिंता करनी चाहिए। अपनी पुस्तक ‘शाहदाबा’ के लिए 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (उर्दू भाषा) से सम्मानित मुनव्वर राना ने मंगलवार को ‘अमर उजाला’ से बातचीत में कहा कि अगर आप सम्मान लौटा रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप थक चुके हैं। अपनी कलम पर आपको भरोसा नहीं है। लाख-डेढ़ लाख रुपये का सम्मान लौटाना बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात यह है कि आप अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को सुधारें। उन्होंने कहा कि जिन घटनाओं के विरोध में सम्मान लौटाए जा रहे हैं, वे समाज के अलग-अलग समूहों ने की हैं। हमारा विरोध समाज के उन लोगों से है, न कि हुकूमत से। राना ने कहा कि सम्मान लौटाने को विचारधारा से जोड़ना गलत है। विचारधारा कोई भी हो, अंतत: साहित्यकार जिन मूल्यों के लिए काम करते हैं, वे भिन्न नहीं हैं। उन्होंने कहा, साहित्य अकादमी स्वायत्तशासी संगठन है। यह पूरी तरह सरकारी संस्था नहीं है। अगर सरकार ऐसी संस्था में दखल देती है तो यह गलत है। मैंने ऐसे ही दखल के खिलाफ उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी से इस्तीफा दिया था। via- Amar Ujala

मुनव्वर राणा को लेकर कुछ अन्य प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं>>

Mohd Imran Khan हम भी मुनव्वर साहब के चाहने वाले हैं…….और मुनव्वर साहब के बयान से आहत भी हैं ! कल हमने इसीलिये एक पोस्ट भी लिखी है !! शायद मुनव्वर साहब हम बच्चों की बात मान लें…..!!!

Mohammad Anas इमरान प्रतापगढ़ी साहब, मालूम चला कि आपने अख़लाक के परिवार को दिल्ली मुशायरे के बाद मिला सारा पैसा दे दिया। शुक्रिया मेरे दोस्त। हम भी राना साहब के दिवाने हैं लेकिन उनके पोस्ट विरोधाभासी से लगते हैं। वो क्या कह और कर रहे हैं उसमें फर्क नज़र आने लगा है।

धीरज यादव आप आवार्ड क्या लौटायेंगे साहब….. बेशक आप बहुत अच्छे शायर हैं लेकिन सिर्फ अच्छे शायर ही हैं। और आप आवार्ड इसलिए नहीं लौटा रहे हैं क्योंकि आवार्ड आपको आपकी शायरी के लिए मिला है इंसानियत के लिए नहीं।

Ameeque Jamei जो कुछ लिखते हैं वह लौटाते… जिनकी शायरी दरबार की ज़ीनत हो, वह क्या लौटायेंगे!

Ameeque Jamei हबीब जालिब की दो लाइनें उन तमाम “साहित्यकारों” के लिए जो सम्मान वापिस करने वाले साहित्यकारों का विरोध कर रहे हैं..
“ऐ मेरे वतन के फ़नकारो, ज़ुल्मत पे ना अपना फ़न वारो
ये महल सराओं के बासी, क़ातिल हैं सभी अपने यारो”
Via – मोहम्मद ज़ाकिर रियाज़ मियां

Mohammad Aarif शायर ज़मीनी हक़ीक़त को सिर्फ शायरी में पेश करने तक महदूद हैं, अमली ज़िन्दगी से इन्हें कोई सरोकार नहीं होता। और रहा नामवर शायरों का अवार्ड लौटाने का सवाल, तो मुझे यकीन है कि इन से ऐसी उम्मीद रखना ला हासिल है क्योंकि यह “तमगे” को हासिल करने के लिए “क्या कुछ” नहीं करते?

Iqbal Rediscovered मनव्वर राणा भरोसे मंद शायर नहीं है यही वजह है की मैं उनका कभी फैन नहीं रहा.. कुछ साल पहले या शायद बाजपेयी के ज़माने में कई बार भाजपा दफ्तर के चक्कर लगाने की खबर सुन चूका हूँ. कुछ दिन पहले दैनिक हिंदुस्तान में उनकी आपबीती आ रही थी जिसमे उन्होंने अपने वामपंथी इतिहास के बारे में बताया और वो कलकत्ता में वामपंथ के सक्रीय कार्यकर्त्ता रह चुके हैं उन्हें आज भी उस वामपंथी इतिहास पर पर नाज़ है.

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1 Comment

1 Comment

  1. Kapil Kumar

    October 17, 2015 at 3:31 pm

    shame shame

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