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ग्राउंड रिपोर्ट : अतुल सक्‍सेना की मौत इसलिए हुई क्‍योंकि लुधियाना जागरण के सारे पत्रकार उनसे पहले ही मर चुके थे

अतुल सक्‍सेना की मौत इसलिए हुई क्‍योंकि लुधियाना जागरण के सारे पत्रकार उनसे पहले ही मर चुके थे। कल कोई उनके घर नहीं पहुंचा। जो पहुंचे, वे सभी गैर-पत्रकार थे जो खुदकुशी के कगार पर खड़े हैं। एक मशीनमैन बताते हैं कि दो कर्मचारियों का तो सुसाइड नोट फाड़ कर उन लोगों ने जबरन दोनों को उनके गांव भेजा है ताकि उनकी जिंदगी बची रह सके।

इस मौत में झांकने के लिए एक दरवाज़ा खुला है…

-अभिषेक श्रीवास्तव-

कल देर रात लुधियाना से लौटा। जाना बदा था नव करन की मौत का जायज़ा लेने, ले‍किन जाने का सबब बनी परसों शाम हुई एक और मौत- दैनिक जागरण के कर्मचारी अतुल सक्‍सेना की मौत। पुलिस रिकॉर्ड में यह खुदकुशी दर्ज है, नवकरन की ही तरह। रोहित वेमुला की राष्‍ट्रीय खुदकुशी के बाद इस मामूली स्‍थानीय मौत की चर्चा कोई नहीं करने वाला, सिवाय उनके जो अतुल को जानते थे या जो उनकी मौत के पीछे की वजह को समझते हैं। मेरे पास इस पर लिखने को एक छोटे उपन्‍यास जितनी सामग्री है, लेकिन लिखूंगा उतना ही जितना तात्‍कालिक और सार्वजनिक रूप से ज़रूरी है।

अतुल सक्‍सेना की मौत इसलिए हुई क्‍योंकि लुधियाना जागरण के सारे पत्रकार उनसे पहले ही मर चुके थे। कल कोई उनके घर नहीं पहुंचा। जो पहुंचे, वे सभी गैर-पत्रकार थे जो खुदकुशी के कगार पर खड़े हैं। एक मशीनमैन बताते हैं कि दो कर्मचारियों का तो सुसाइड नोट फाड़ कर उन लोगों ने जबरन दोनों को उनके गांव भेजा है ताकि उनकी जिंदगी बची रह सके।

इस मौत में झांकने के लिए एक दरवाज़ा खुला है…

-अभिषेक श्रीवास्तव-

कल देर रात लुधियाना से लौटा। जाना बदा था नव करन की मौत का जायज़ा लेने, ले‍किन जाने का सबब बनी परसों शाम हुई एक और मौत- दैनिक जागरण के कर्मचारी अतुल सक्‍सेना की मौत। पुलिस रिकॉर्ड में यह खुदकुशी दर्ज है, नवकरन की ही तरह। रोहित वेमुला की राष्‍ट्रीय खुदकुशी के बाद इस मामूली स्‍थानीय मौत की चर्चा कोई नहीं करने वाला, सिवाय उनके जो अतुल को जानते थे या जो उनकी मौत के पीछे की वजह को समझते हैं। मेरे पास इस पर लिखने को एक छोटे उपन्‍यास जितनी सामग्री है, लेकिन लिखूंगा उतना ही जितना तात्‍कालिक और सार्वजनिक रूप से ज़रूरी है।

अतुल बेहद साधारण आदमी थे। उम्र पचास में एक कम थी, लेकिन पचीस साल से जागरण के स्‍कैनिंग विभाग में काम कर रहे थे। नोएडा से उनका तबादला 2004 में लुधियाना हुआ था। तब उनकी शादी को महज दो साल हुए थे। याद है कि शादी के कुछ दिन बाद बरेली में जब हम उनके रिसेप्‍शन में पहुंचे थे, तब गोधरा में ट्रेन जली थी। गुजरात का कत्‍ल-ए-आम अगले दिन चालू हुआ था। इस पहली विस्‍तृत मुलाकात में जब पता चला कि वे अख़बार में हैं और दिल्‍ली में भी, तो मैंने उनसे वादा किया था कि मैं आ रहा हूं। पांच महीने बाद दिल्‍ली में मेरी पहली रिहाइश गली नंबर 3, मंडावली का उनका 800 रुपये महीने के किराये वाला वह दमघोंटू दड़बा बना जिसमें दंपत्ति बड़ी मुश्किल से अंटते थे। साल भर बाद वे वैशाली आ गए। उनसे बात-मुलाकात जारी रही।

आधी जिंदगी जागरण की सेवा में चुपचाप बिताने का कुल जमा उनके पास इतना भर था कि पिछले साल अक्‍टूबर में किस्‍त पर उन्‍होंने एक सस्‍ती मोटरसाइकिल खरीदी थी। पत्‍नी की नौकरी का सहारा था कि लुधियाना में देर से सही, एक पक्‍की रिहाइश का जुगाड़ भी हो गया था। जीवन पटरी पर था। परसों शाम अचानक खुदकुशी की ख़बर मिली, तो कुछ समझ नहीं आया कि माजरा क्‍या है। कल दिन में जब उनके घर के बाहर लुधियाना, जालंधर और नोएडा से दैनिक जागरण के कर्मचारियों की भीड़ उमड़ी, तो पूरी कहानी खुलकर सामने आई।

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू न किए जाने के खिलाफ वे भी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता थे। प्रबंधन का लगातार दबाव था कि वे केस वापस लें। पिछली बार आंदोलन हुआ, तो लुधियाना से 42 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया, लेकिन अतुल बच गए। बीमारी के कारण लंबी छुट्टी आदि दिए जाने के चलते जीएम के निजी अहसानों तले वे दबे हुए थे। बावजूद इसके उन्‍होंने न तो केस वापस लिया, न ही तीन बार दिया गया ट्रांसफर ऑर्डर स्‍वीकार किया। फिर उनका स्‍कैन विभाग बंद कर दिया गया और उन्‍हें पीटीएस विभाग में शिफ्ट कर दिया गया, जहां का काम उनके लिए बिलकुल नया था और उनका अधिकारी उनसे उम्र में काफी छोटा और दबंग था।

अब वे अवसाद में रहने लगे। चौतरफा इस्‍तीफे का दबाव बढ़ता गया। स्थितियां ऐसी बना दी गईं कि आदमी खुद छोड़कर चला जाए। पिछले दिनों उनकी मां का देहान्‍त हुआ, तो यह अवसाद और गहरा गया। उन्‍हें सिरदर्द रहने लगा। लिवर में दिक्‍कत महसूस हुई। करीब दो हफ्ते पहले उन्‍होंने दफ्तर जाना बंद कर दिया। पत्‍नी ने सारे मेडिकल परीक्षण करवाए, तो 7 फरवरी को आई रिपोर्ट में वे शारीरिक रूप से पूरी तरह स्‍वस्‍थ निकले। दो दिन बाद 9 फरवरी को उनकी शादी की सालगिरह थी। इसके जश्‍न में उन्‍होंने किसी को भी अपने भीतर उमड़ रहे सैलाब की भनक तक नहीं लगने दी। उस दिन अतुल ने पत्‍नी से कहा कि अगले दिन वे जाकर इस्‍तीफा दे आएंगे। अगले दिन यानी 10 को पत्‍नी जब स्‍कूल से वापस आई, तो उन्‍हें कमरे में लटका हुआ पाया।

अपने काम करने की स्थितियों के बारे में उन्‍होंने कभी किसी से कोई जि़क्र नहीं किया था। मरते वक्‍त भी अपने अन्‍नदाता को वे बरी कर गए। एक सुसाइड नोट तक नहीं छोड़ा। उनके घर पर उमड़ी निलंबित कर्मचारियों की भीड़ इस बात का पता दे रही थी कि कहीं कुछ गलत हुआ है। भीड़ के बीच कोई भी कर्मचारी ऐसा नहीं था जो फिलहाल कार्यरत हो, सिवाय चीफ रिपोर्टर, एड मैनेजर जैसों के। ये सारे कथित अधिकारी जीएम के पास गोल बनाकर उसकी हिफ़ाज़त सी करते दिख रहे थे और मैयत में पहुंचे इलाके के पार्षद के स्‍वागत में लगे थे। अतुल की मौत इसलिए हुई क्‍योंकि लुधियाना जागरण के सारे पत्रकार उनसे पहले ही मर चुके थे। कोई उनके घर नहीं पहुंचा। जो पहुंचे, वे सभी खुदकुशी के कगार पर खड़े हैं। एक मशीनमैन बताते हैं कि दो कर्मचारियों का तो सुसाइड नोट फाड़ कर उन लोगों ने जबरन दोनों को उनके गांव भेजा है ताकि उनकी जिंदगी बची रह सके।

एक कर्मचारी सबके सामने जीएम को उलाहना देते हुए कहता है, ”सर, देखो इन लड़कों के चेहरों को।” जीएम मुस्‍कराते हुए कहता है, ”तुम्‍हें वापस आना हो तो वन टु वन बात करो। सबकी बात छोड़ो।” सबकी बात करना प्रबंधन की नजर में ‘राजनीति’ है। सामने रखी लाश के बीच जीएम सबको हिदायत दे रहा है कि इस संजीदा मौके पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। पूरी यूनियन पीडि़त परिवार के साथ है, लेकिन आदमी तो चुपचाप जा चुका है। जागरण के लोग कह रहे हैं कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी कर्मचारी की मौत की खबर अख़बार ने नहीं छापी हो। यह संस्‍थान की पहली ऐसी मौत है जो ख़बर नहीं बनी। मरने वाला न तो किसी राजनीतिक विचारधारा से ताल्‍लुक रखता था, न किसी संगठन से। न दलित था, न वामपंथी। एक ही नौकरी में जिंदगी काट देने वाले इस गुमनाम-बेआवाज़ अनागरिक ने केवल एक आवाज़ उठायी थी अपने हक़ के लिए। इस शख्‍स की हलक़ से आवाज़ पहली बार निकली थी। पहली ही बार में घोंट दी गई।

जानने वाले इसे हत्‍या कह रहे हैं। जिस कमरे के जंगलेदार रोशनदान में फंदा कसा था, उसका खुला दरवाज़ा चीख-चीख कर किसी साजि़श की गवाही दे रहा है। क्‍या कोई कमरे का दरवाज़ा खुला छोड़कर फांसी लगाता है? पहली मंजिल के कमरे के दरवाज़े के ठीक ऊपर एक रोशनदान है जिसमें ग्रिल लगी है। अतुल की पत्‍नी के मुताबिक इसी ग्रिल में वह फंदा अटका था जिससे अतुल ने फांसी लगाई। बाहर से दरवाज़ा धकेलते ही फंदा दरवाज़े से अड़कर-घिसकर खुल गया और देह फर्श पर आ गिरी। दरवाज़े के ऊपरी किनारे के बीच में घिसावट के दो निशान हैं बमुश्किल आधा इंच की दूरी पर। दरवाज़ा छह फुट ऊंचा है और ग्रिल बमुश्किल एक फुट चौड़ी यानी कुल ऊंचाई अधिकतम सात फुट। अतुल की लंबाई छह फुट से कुछ कम ही रही होगी। क्‍या साढ़े पांच या छह फुट का आदमी साढ़े छह या सात फुट की ऊंचाई से फंदा लगाकर जान दे सकता है? फंदे की लटकन एक फुट की हो, तो पैर ज़मीन पर आ टिकेगा। अगर एक फुट से कम हो, तो भी सिर ग्रिल से अटकेगा। मेरे जानने में यह पहली खुदकुशी है जो भीतर से कमरा लॉक किए बगैर खुले दरवाज़े के सहारे की गई है। दुनिया में जान देने के कई नायाब तरीके हैं और हर कोई सब से वाकिफ़ नहीं होता, इसलिए मैं इस सवाल को यहीं छोड़ा हूं। फिलहाल मुझे जो सवाल परेशान कर रहा है, वो कुछ और है।  

मां की मौत के बाद अतुल को उनकी अस्थियां प्रवाहित करनी थीं। मां की मौत से लौटने के बाद लगातार रह रहे अवसाद और बीमारी के चलते वे अब तक ऐसा नहीं कर सके थे। आज वे खुद इस दुनिया में नहीं हैं। लुधियाना की बड़ी हबवाल स्थित प्रेम नंगर की पहली गली के आखिरी मकान में आज दो अस्थि कलश रखे हैं। एक अतुल का है। दूसरा उनकी मां का। उनकी बच्‍ची गुनगुन मुझसे पूछती है, ”पापा तो चले गए, अब क्‍या?” किसी के पास इस सवाल का जवाब हो, तो ऊपर लिखे पते पर जाकर दे आवे।

लुधियाना से लौटे मीडिया एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव की रिपोर्ट. अभिषेक से संपर्क [email protected] या 8800114126 के जरिए किया जा सकता है. अभिषेक की यह रिपोर्ट उनके ब्लाग जनपथ से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित की गई है.


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