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‘रिपब्लिक भारत’ की महिला युद्ध रिपोर्टर दोहरी विक्टिम है!

रंगनाथ सिंह-

आज एक महिला टीवी रिपोर्टर की वीडियो क्लिप वायरल हुई थी। इस क्लिप को मीडिया के सूप और चलनी सभी शेयर कर रहे थे। कुछ तो पत्रकारिता की रक्षा में अपने अन्दर दबी स्त्री-विरोधी अश्लील सोच का नग्न प्रदर्शन करने लगे लेकिन सच पूछिए तो वह लड़की दोहरी विक्टिम है। मीडिया के मौजूदा मैनेजर उससे डांस करा रहे हैं। यह डांस फ्लोर जिन पुराने मैनेजरों का बनवाया हुआ है वो अब उसका डांस देखकर दाँत चियार रहे हैं।

ऐसी आलोचनाओं से मीडिया के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती क्योंकि आलोचना पर कान न देने का ट्रेंड टीवी मीडिया के पैदाइश के समय ही उसके कान में फूँक दिया गया है। डेढ़ दशक पहले जब हम पत्रकारिता की पढ़ायी कर रहे थे तब से लेकर साल 2014 तक जिन लोगों को टीवी मीडिया को बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार माना जाता था, 2014 के बाद उनमें से ही क्रान्तिकारी पत्रकार पैदा होने लगे।

2014 से पहले जिन्हें क्रान्तिकारी माना जाता था उनमें से कई को 2014 के बाद वही लोग दलाल कहने लगे जिन्हें 2014 से पहले दलाल समझा जाता था। ऐसा नहीं है कि सारे पुराने दलाल 2014 में क्रान्ति की राह पर चल पड़े। कुछ 2017 के बाद, कुछ 2019 के बाद क्रान्तिकारी हुए। देखते हैं 2022 के बाद वाली क्रान्तिकारियों की लिस्ट में किनके नाम आते हैं। कुल मिलाकर पापुलर डिस्कोर्स में क्रान्तिकारी और दलाल पत्रकार सत्ता बदलने के साथ इधर से उधर हो जाते हैं।

आज इलेक्ट्रानिक मीडिया उसी रास्ते पर चल रहा है जिस राह पर आज के क्रान्तिकारियों ने उसे दो दशक पहले भेजा था। पुराने दलालों को नया क्रान्तिकारी बताने वालों से कोई सहानुभूति रखना, अपने आप को धोखा देना है। जो लोग आज गंगा नहा रहे हैं उन्हीं लोगों ने कालांतर में टीवी मीडिया की बुनियाद में मंठा डाला है। जिनमें भी सम्भावना और स्वाभिमान था, उन सबको इंडस्ट्री से या तो बाहर कर दिया या फेंस पर फेंक दिया गया ताकि वो बाड़ पर पड़े-पड़े अंदर का तमाशा देख सकें।

सबसे ज्यादा दया तो उनपर आती है जिनका करियर इन सम्प्रति क्रान्तिकारी भूतपूर्व दलालों ने खराब किया, उनमें से कई लोग विचारधारा के नाम पर इन फरेबियों के पीछे खड़े होकर ताली बजाते यहाँ-वहाँ दिख जाते हैं।

मीडिया के भूतपूर्व मान्यवरों से इतना ही कहना है कि किसी नौजवान का मजा लेना आसान है। अपना अतीत याद रखना मुश्किल है। आप न भी रखें, अगली पीढ़ी आपका अतीत भूलने वाली नहीं है। मीडिया के नौजवान उसी जमीन पर पत्रकारिता की खेती कर रहे हैं जो उनके पुरखों ने उन्हें विरासत में सौंपी है। यदि नई पीढ़ी नई जमीन नहीं तोड़ पा रही है तो उसका हिसाब अगली पीढ़ी उससे लेगी। आज इतना ही। शेष, फिर कभी।

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