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सुख-दुख

जिस जिस सूफ़ी/संत ने किसी स्त्री को अपने क़रीब किया, उसकी मिट्टी पलीत हो गयी.. ओशो को देख लीजिए!

~सिद्धार्थ ताबिश

बुद्ध जब कहते हैं कि “औरत अगर किसी धर्म मे आ जायेगी तो वो उसे संक्रमित और तबाह कर देगी”

तो क्या आप जानते हैं कि बुद्ध ऐसा क्यों कह पाते हैं? वो इसलिए ऐसा कह पाते हैं क्योंकि उन्हें किसी “बदनामी” का डर नहीं होता है.. जो उन्हें सही लगता है बोल देते हैं क्योंकि उन्हें किसी स्त्री की “हमदर्दी” नहीं चाहिए होती है.. इसीलिए नारीवादी औरतें बुद्ध को पसंद नहीं करती हैं.. वो नारा लगाती हैं कि अपनी पत्नी को छोड़कर बुद्ध बने वो.. बुद्ध ऐसे थे वैसे थे.. जबकि बुद्ध को अपने जीते जी घंटा फ़र्क नहीं पड़ता था ऐसी बातों से.. क्योंकि उन्हें किसी की निगाह में अच्छा नहीं बनना था.. किसी की फ़ेसबुक पोस्ट पर “नाइस पिक डिअर” नहीं लिखना था

महाप्रजापति को सन्यास देने से बुद्ध ने तीन बार इनकार किया.. फिर “आनंद” के बाद दिया.. वो भी अपनी माँ और बाक़ी लोगों द्वारा बहुत दबाव दिए जाने पर ही महाप्रजापति को पहली भिक्खुनी बनाया.. बुद्ध इस बात के लिए क्लियर थे कि उन्हें क्या करना है.. मेरे हिसाब से अगर इतना दबाव न होता तो उन्होंने औरतों को संघ में कभी भी न लिया होता.. ये बुद्ध का अपना फ़ैसला था और ये उनके हिसाब से बिल्कुल सही रहा होगा

सास बहू की ज़िंदगी तबाह किये रहती है.. बहु सास की.. दहेज सास को ही चाहिए होता है और पुत्र भी.. सास अपने बेटे को जिस तरह का चाहे वैसा इंसान बना सकती है क्योंकि लड़के पूरी तरह से अपनी माँ के “गिनी पिग” होते हैं.. पूरी उम्र ज़्यादातर माएँ अपने बेटों का दोहन करती हैं.. और औरत से उसकी दुश्मनी करवाती हैं.. वही बताती हैं कि बहु से उसको कैसे निपटना है.. लड़कों की परवरिश में बाप का योगदान लगभग ज़ीरो होता है.. अपने बेटे के “पुरुषत्व” को उसकी माँ “जीती” है और पुरुष की ताक़त और पॉवर का आनंद लेते हुवे अपनी ही जाति की औरतों पर उसेसे ज़ुल्म करवाती है.. फिर वही औरत पुरुषों को गाली देती है

ओशो को अंत मे एक औरत ने ही बदनाम किया.. मा शीला ने.. और आज भी वो बीबीसी में बैठ अनाप शनाप उनके बारे में बकती है.. जबकि एक भी पुरुष शिष्य ने ओशो की छवि को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया.. मां शीला ख़ुद ओशो के प्रेम में दीवानी थी मगर जब उसे वो न मिल पाया जिसकी उसे “हवस” थी तब वो ओशो को बर्बाद करने के लिए जुट गई और आज तक क्रांतिकारी बनकर ओशो के ख़िलाफ़ “मी टू” कैंपेन चला रही है.. सारा स्टेज ओशो ने सेट किया, बीच मे आ के ये शो लूट रही है

बुद्ध ने बहुत सही किया जो अपने जीवन के एकदम अंतिम चरण में औरतों को संघ में स्वीकारा.. सोचिए कि जैसे आंनद बुद्ध की परछाईं बनकर उनके साथ रहते थे, जहां बुद्ध सोते थे वो वहीं सोते थे.. एक मिनट बुद्ध को अकेला नहीं छोड़ते थे.. उसकी जगह महाप्रजापति होती तो आज बुद्ध का हाल ओशो जैसा ही होता और ये नारीवादी औरतें महाप्रजापति को बुद्ध से ऊपर रखकर उसका महिमामंडन कर रही होती

जिस जिस सूफ़ी/संत ने किसी स्त्री को अपने क़रीब किया, उसकी मिट्टी पलीत हो गयी.. वो आध्यात्म छोड़कर जाने किस किस बेवकूफ़ी और बदमनी में फंस गया और उसे जो संसार को देना था वो न दे सका

फ़ेसबुक के तमाम नारीवादी पुरुषों का यही हाल है.. इनमें से कितने बुरी तरह से बदनाम हुवे, हनी ट्रैप में फंसे, मिट्टी पलीत हुई इनकी मगर चूंकि इनकी ठरक इनके मस्तिष्क पर हावी होती है और इन्हें भविष्य में औरतों की पोस्ट पर “नाइस पिक डिअर” लिखना होता है इसलिए ये छाती पीटते हुवे मुझे गाली देते हैं..जबकि ये जानते हैं कि मैं सही लिख रहा हूँ

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1 Comment

1 Comment

  1. आशीष

    May 12, 2022 at 4:11 pm

    हैं आपकी बात सत्य है लेकिन संत और महापुरुषों को कई दुष्ट व्यक्ति जो उनसे सामने से मुकाबला नही कर पाते वो भ्रष्ट स्त्रियों का साथ लेकर बदनाम करते रहे हैं येकोई नई बात नही ,लेकिन झूठ उड़ तोंसकता है लेकिन चल कभी नही सकता या भी सत्य है
    इसी प्रकार का दुष्प्रचार विवेकानंद के लिए भी किया गया लेकिन अंततः सब सामने है क्युकी सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं यही विधि का विधान है

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