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रूस-यूक्रेन युद्ध की आपदा में मोदी ने खोज लिया अवसर, पश्चिम के परम स्वार्थी बुद्धिजीवी भारत को कोसने लगे!

प्रकाश के रे

सीएनएन की साइट पर रिया मोगुल ने लिखा है कि रूस-यूक्रेन मसले पर भारत की कथनी और करनी में अंतर है. उनका कहना है कि मोदी शांति की बात कर रहे हैं, पर रूस से तेल, गैस, खाद आदि की भारी ख़रीद कर पुतिन को धन मुहैया करा रहे हैं. कुछ समय पहले गार्डियन के एक लेख में भारत (और चीन) को रूस का सहयोगी बताया गया था. मुख्यधारा की पश्चिमी मीडिया का धूर्तता का यह ताज़ा उदाहरण है. सच यह है कि इस मसले पर सबसे ईमानदारी और साफ़गोई से अगर किसी ने बात की है, तो वे भारत और चीन ही हैं.

याद करें, लड़ाई शुरू होने से पहले ही विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पेरिस में कहा था कि नाटो का जो तीस साल से हिसाब रहा है, वह इस तनाव का सबसे बड़ा कारण है. भारत उन देशों में है, जिन्होंने इस लड़ाई के अहम कारणों को रेखांकित किया है. साथ ही, वह शुरू से शांति और बातचीत की पैरोकारी करता रहा है.

अब रही बात ख़रीद की, तो क्या अमेरिका ने रूसी यूरेनियम पर रोक लगायी है? क्या यूरोप ने रूसी सोने-चाँदी पर रोक लगायी है? रॉकेट के इंजन कहाँ से आ रहे हैं? क्या आज भी रूस का तेल/गैस यूरोप नहीं जा रहा है? इन सब बातों पर सीएनएन, बीबीसी, गार्डियन, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट आदि का गला ख़राब हो जाता है. मामला तो यह भी है कि भारत और चीन जैसे जो देश सस्ते में रूस से ख़रीद कर रहे हैं, उसके बारे में ख़बरें आती रही हैं कि मुनाफ़े पर वो सब यूरोप को बेचा जा रहा है.

भारत को अपने हित में जहाँ से मन करे, ख़रीदना चाहिए. सीएनएन यह नहीं बताएगा कि यही भारत सरकार है, जिसने अमेरिका के कहने से ईरान से ख़रीद बंद की और अपना नुक़सान किया. वह ग़लती अब नहीं की जानी चाहिए. ईरान से भी तेल लेना चाहिए, रूस से भी लेना चाहिए. भारत तो वेनेज़ुएला से भी तेल ख़रीदता रहा है. इसमें बस एक शिकायत यह है कि निजी कंपनियों ने भारी मुनाफ़ा (रिपोर्टों के अनुसार 35 हज़ार करोड़ से अधिक) बनाया है, सरकारी कंपनियों के सामने संकट है, सरकार बेलआउट करने जा रही है तथा आम उपभोक्ता को सस्ते ख़रीद का फ़ायदा नहीं मिला है. सीएनएन और रिया मोगुल जैसे लोग यह तो बताएँ कि इस लड़ाई से सबसे ज़्यादा फ़ायदा किसे हुआ है.

यह बात भी अहम है, आज ईटी में प्रो गुलशन सचदेव ने रेखांकित भी किया है, कि अब जब लड़ाई युद्ध में तब्दील होने जा रही है, तो भारत के लिए बीच के रास्ते पर चलते रहना मुश्किल हो जाएगा. कल ही एक रिपोर्ट आयी कि ईरानी तेल ख़रीद को लेकर एक भारतीय कंपनी पर अमेरिका ने पाबंदी आयद कर दी है. ऐसी दादागिरी आगे बढ़ेगी. देखना यह है कि पहले की तरह भारत अमेरिकी दबाव में आ जाएगा या अभी के स्टैंड पर टिका रहेगा.

बहरहाल, कैटलिन जॉनस्टोन ने बहुत सही कहा है कि अगर रूस-यूक्रेन लड़ाई को ‘उकसावे’ का नतीज़ा नहीं माना जाएगा, तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती है. अमेरिका और यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान व राजनेता कहते रहे हैं कि रूस के साथ अमेरिका और नाटो को तमीज़ से पेश आना चाहिए. भारत मानता है कि तीन दशकों की पश्चिम की नीतियों ने रूस को उकसाया है. अमेरिका और पश्चिम को भू-राजनीतिक आसमान पर लिखी इबारत को अब तो पढ़ ही लेना चाहिए- दुनिया बदल रही है.

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