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सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव का अनुमान सटीक साबित हुआ!

शांति नोबेल, वेनेजुएला वाली मैडम और अमेरिका का अटैक!

अभिषेक श्रीवास्तव-

बीते 10 अक्टूबर को हम जो लिखे थे, आज पूरी दुनिया को दिख गया। जिन लोगों ने नोबेल विजेता मचाडो मैडम की उस वक्त भूरि-भूरि सराहना की थी, उनका हाल देखने अपन फ़ेसबुक पर लौट आए।

वैसे, मैडम आज बहुत खुश होंगी। ट्रम्प ठाकुर के दिए ईनाम का रिटर्न कामयाब हुआ है। मात्र दो महीने में।

तेल के कूएं लूटने के ही लिए चढ़ाई करनी थी तो लोकतंतर का मंतर काहे फूंक रहा था? एक ठो नोबेल काहे लिए अपनी चमची पे जियान किया? -चंद्रभूषण


मनीष सिंह-

डोनाल्ड ट्रम्प को एक्शन की ताकत मादुरो की सत्ता पर अवैध कब्जे से भी मिली है। सोशल मीडिया पर वेनेजुएला में हुए घटनाक्रम में मादुरो के लिए सहानुभूति की बहार है। किसी देश के राष्ट्रपति का अपहरण करके, उसे यूएस ले जाना, खुली गुंडई के सिवाय कुछ नही। निंदनीय है।

लेकिन मादुरो स्वयं एक सस्ते वोट चोर, और धोखेबाजी से गद्दी पर बैठे है, यह भी उतना ही सच है। अपने देश मे इलेक्शन रिगिंग औऱ प्रतिष्ठानो पर कब्जे के साथ विपक्ष को पूरी तरह कुचलने के वे दोषी है।

यह समझने के लिए, पिछले 20 सालो का इतिहास पलटना पड़ेगा। वेनेजुएला में ह्यूगो शावेज राष्ट्रपति थे। तानाशाह ही थे, मगर लोकप्रिय थे। तेल की दौलत से उन्होंने वेनेजुएला को विकसित किया, और दुनिया के दादाओं को आंखें दिखाई।

चुनाव वे जीतते थे। लेकिन कोई बेईमानी का आरोप न लगा सके, इसलिए पूर्ण पारदर्शी व्यवस्था रखी। यह भारत जैसा, मगर उससे बेहतर सिस्टम था।

इसमे आप अपनी पहचान पत्र दिखाकर, ईवीएम में वोट डालते। एक पर्ची निकलती जिसे चेक करके, एक डिब्बे में डालते। इसके बाद उसी जगह पर मशीन का आंकड़ा लिया जाता, जो प्रारंभिक परिणाम होता। अंतिम परिणाम, विविपेट पर्ची मिलान के बाद घोषित होता।

यह सारी गिनती, बूथ पर, लोगो के सामने होती। इसके बाद, शावेज की जीत को कोई फर्जी कह नहीं सकता था। उनकी मौत के बाद, मादुरो उनके उत्तराधिकारी थे। वे भी जीते। लेकिन 2024 तक हालात बदल चुके थे।

विपक्ष की मारिया कोरिना मचाडो, तेजी से लोकप्रिय हो रही थी। भयभीत मादुरो ने उनपर तमाम आरोप जड़े। इसमे विदेशी ताकतों के साथ षड्यंत्र करने का आरोप भी था। ठीक वैसा- जैसा आजकल हमारे यहां राहुल गांधी पर “देश विरोधी ताकतों” “विदेशी शक्तियो” से मिलने का आरोप लगाया जाता है।

और राहुल की तरह, मचाडो को भी डिस्क्वालिफाई कर दिया गया। 2025 में शांति का नोबेल जीतने वाली मचाडो यही हैं।

बहरहाल, मचाडो की जगह 2024 का चुनाव, एडमुब्डो गोंजालेज ने लड़ा। चुनाव हुए, वोट डले। पर्चियों का टोटल आया, गोंजालेज ने देश भर से पर्चियों का टोटल करके, एक17C नुमा फार्म, वेबसाइट पर डाल दिया। वे 80% वोट से विजयी थे।

लेकिन मशीन के नतीजों में मादुरो को विजयी बताया गया। सेना, ज्युडिश्ली, अखबार, टीवी सब उनके साथ। वे फिर से राष्ट्रपति बन गए।

लेकिन कल से उनकी गिरफ्तारी के बाद, वेनेज़ुएला में कोई शोर नही। सड़को पर लोग अपने लोकप्रिय राष्ट्रपति के अपहरण पर कोई विरोध नही जता रहे। उससे ज्यादा विरोध तो इंडिया मे दिख रहा है।

अमेरिका और ट्रम्प, वेनेजुएला में डेमोक्रेसी बचाने नही गए सब तेल का खेल है। मगर उन्हें यह अवश्य पता होगा कि वेनेजुएला में मादुरो का समर्थन क्षीण है।

वोट चोर, अवैध रूप से गद्दी पर कब्जा जरूर कर सकता है। वह नियमित चुनाव का भ्रम दिखाकर, अपनी सत्ता लेजिटमाईज कर सकता है। लेकिन आप कुछ लोगो को कुछ समय बेवकूफ बना सकते है, सभी लोगो को सारे समय मूर्ख नही बना सकते। वेनेजुएला की सम्प्रभुता पर हमला निंदनीय है। लेकिन मादुरो से भी किसी किस्म की सहानुभूति की आवश्यकता नही। वह लीगल प्रेजिडेंट नही। महज वोट चोर है।

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