ज्ञानेंद्र अवस्थी-
कॉर्पोरेट किले और राज्य की चुप सहमति.. अगर कोई कहे कि भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों के पास अपने किले हैं, ड्रोन हैं, हजारों सशस्त्र गार्ड हैं और एक इंटेलिजेंस नेटवर्क है—तो पहली प्रतिक्रिया यही होगी कि यह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट है। लेकिन यह स्क्रिप्ट नहीं, समकालीन भारत की वास्तविकता है। मुंद्रा पोर्ट पर हजार से अधिक सीआईएसएफ कमांडो तैनात हैं।
जामनगर रिफाइनरी पर दो हजार से अधिक। इनका वेतन और खर्च भारत सरकार नहीं, कॉर्पोरेट समूह उठाते हैं। कागज़ पर यह “क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर सिक्योरिटी” है। व्यवहार में यह राज्य की संगठित शक्ति का कॉर्पोरेट फंडिंग के ज़रिये निजीकरण है।
यहां तक कहानी साधारण लग सकती थी—अगर यह सिर्फ सुरक्षा तक सीमित रहती। लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है, क्योंकि यह सुरक्षा…
- हथियार निर्माण से जुड़ती है
- रक्षा अनुबंधों से जुड़ती है
- इज़राइली सैन्य तकनीक से जुड़ती है
- राजनीतिक फंडिंग से जुड़ती है
और अंततः सत्ता संरचना बन जाती है। 2008 के मुंबई हमलों ने देश को नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट भारत को झकझोरा।
उस रात के बाद एक सोच पैदा हुई—अगर राज्य हमें नहीं बचा सकता, तो हम खुद को बचाएंगे। लेकिन कुछ घरानों ने “बचाव” नहीं, सिस्टम बनाया।
सीआईएसएफ मॉडल के ज़रिये राज्य की वर्दी निजी परिसरों में आई। फिर ड्रोन, फेशियल रिकॉग्निशन, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर। फिर रक्षा निर्माण—ड्रोन, मिसाइल सिस्टम, सर्विलांस टेक।
यह सिर्फ सुरक्षा नहीं रही। यह वर्टिकल इंटीग्रेशन ऑफ पावर बन गई। जो ड्रोन सेना के लिए बनते हैं, वही पोर्ट पर उड़ते हैं। जो नेटवर्क सेना के लिए बिछता है, वही कॉर्पोरेट परिसरों को जोड़ता है।
जो कंपनी राजनीतिक चंदा देती है, वही नीतिगत छूट पाती है। और जब विरोध होता है—मछुआरे, किसान, स्थानीय समुदाय—तो सामने आता है सीआईएसएफ + निजी सशस्त्र सुरक्षा का संयोजन। यह कानून-व्यवस्था नहीं होती।
यह कॉर्पोरेट इंटरेस्ट का सशस्त्र संरक्षण होता है। इतिहास में यह नया नहीं है। ईस्ट इंडिया कंपनी भी व्यापार करने आई थी। फिर उसने निजी सेना बनाई। फिर उसने सत्ता खरीदी। और अंततः देश पर राज किया।
आज फर्क सिर्फ इतना है कि तोपों की जगह ड्रोन हैं, कंपनी के झंडे की जगह राष्ट्रध्वज की वैधता है, और जवाबदेही लगभग शून्य।
यह अडानी या अंबानी का व्यक्तिगत मामला नहीं है। यह उस सिस्टम का परिणाम है जहां पैसा, राज्य और सैन्य शक्ति एक ही सर्किट में घूमने लगते हैं।
यह जरूरी नहीं कि हर निजी रक्षा निवेश गलत हो। लेकिन जब पारदर्शिता शून्य हो, जब संसद की निगरानी न हो, जब “जो पैसा दे वही सुरक्षा पाए” का मॉडल बने—तो खतरा राष्ट्र को नहीं, लोकतंत्र को होता है।
इतिहास एक सवाल पूछता है—जब यह सब बन रहा था, तो नागरिक कहां थे? और भविष्य एक सवाल पूछेगा—क्या हमने इसे देखा नहीं, या देखने का साहस नहीं किया?
यूपीए सरकार के दौरान अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदे को लेकर कांग्रेस पर तीखे हमले करने वाली भाजपा के शासन में वही कंपनी अब लियोनार्डो नाम से अडानी डिफेंस की साझेदार बनकर भारत के रक्षा क्षेत्र में लौट आई है. इसी हफ्ते अडानी डिफेंस ने इस कंपनी के साथ भारत में हेलीकॉप्टर निर्माण का इकोसिस्टम स्थापित करने के लिए, मोदी सरकार के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया है. इंडिया अवेकेंड (एक्स)



