शीतल पी सिंह–
ठंड है और कुछ लोगों के पास न छत है न गर्म कपड़े । अमेठी में एक इंसान बोरी के टुकड़ों से ठंड और भूख का मुक़ाबला करने की कोशिश में मारा गया! और आज ही लोकसभा ने मनरेगा के वध करने का एकतरफ़ा फ़ैसला सुनाया, इसके सहारे भी पाँच छः करोड़ लोग ज़िंदा बने रहने का अहसास पाले रहते थे । आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के उदय के साथ दुनियां के मालिकों को इंसानों की भीड़ को ज़िंदा रखने की ज़रूरत नहीं रही ।
यह तस्वीर और इसके साथ चली खबर सिर्फ़ एक व्यक्ति की मौत नहीं बताती, यह हमारे समय की राजनीतिक–आर्थिक संवेदनहीनता का पोस्टमार्टम है। अमेठी में अमर बहादुर यादव—जिसके लिए तीन दिन की भूख और जूट का बोरा कफ़न बन गया—वह किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार नहीं हुआ। उसकी मौत नीतियों, उपेक्षा और एक सुनियोजित सामाजिक असमानता का नतीजा है।
ठंड, भूख और “विकास” का झूठ
देश में ठंड कोई नई चीज़ नहीं है। हर साल आती है। लेकिन हर साल कुछ लोग इसी ठंड में मर जाते हैं—क्योंकि उनके पास छत नहीं होती, कपड़े नहीं होते, और सबसे ज़रूरी—राज्य की उपस्थिति नहीं होती।
सरकारें अलाव, कंबल, शेल्टर होम की घोषणाएँ करती हैं, लेकिन ज़मीन पर व्यवस्था इतनी छिन्न-भिन्न है कि सबसे कमज़ोर व्यक्ति तक मदद पहुँचने से पहले ही उसकी साँसें थम जाती हैं।
अमर बहादुर यादव ने जूट के बोरे ओढ़े—यह दृश्य किसी पिछली सदी का नहीं, आज के “डिजिटल इंडिया” का है।
मनरेगा का वध और ज़िंदा रहने का आख़िरी सहारा
संयोग नहीं, बल्कि एक भयावह संकेत है कि जिस दिन यह खबर सामने आई, उसी समय लोकसभा ने मनरेगा को लगभग निष्प्रभावी बनाने वाला फैसला भी सुना दिया।
मनरेगा कोई “मुफ़्तख़ोरी” नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए ज़िंदा रहने की न्यूनतम गारंटी था—काम, मजदूरी और सम्मान का भ्रम ही सही, पर एक सहारा तो था।
पाँच–छह करोड़ लोग मनरेगा के सहारे यह महसूस करते थे कि वे इस देश के नागरिक हैं, सिर्फ़ आँकड़े नहीं। अब वह एहसास भी छीना जा रहा है।
AI का उदय और इंसानों की गैरज़रूरत
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और कॉरपोरेट टेक्नोलॉजी ने एक नई सच्चाई पैदा की है—
अब सत्ता और पूँजी को इतनी बड़ी श्रमिक आबादी की ज़रूरत नहीं।
मशीनें काम करेंगी एल्गोरिदम निर्णय लेंगे मुनाफ़ा बिना मजदूर के बढ़ेगा
ऐसे में गरीब, बेरोज़गार, बूढ़े, बीमार—एक “अनावश्यक बोझ” में बदल दिए जाते हैं।
कल्याणकारी राज्य की अवधारणा चुपचाप दफ़न की जा रही है, बिना यह घोषित किए कि अब यह देश सिर्फ़ “उत्पादक नागरिकों” के लिए है।
जूट का बोरा: हमारे समय का प्रतीक
अमर बहादुर यादव का जूट का बोरा सिर्फ़ ठंड से बचने की कोशिश नहीं था।
वह प्रतीक है—
राज्य के पीछे हटने का समाज की चुप्पी का और उस क्रूर व्यवस्था का, जिसमें मरना भी व्यक्ति की निजी विफलता बना दिया जाता है
हम इसे “दुर्घटना” कहकर आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन सच यह है कि यह एक नीतिगत हत्या है—धीमी, खामोश और बेआवाज़।
आख़िरी सवाल
अगर यह देश अपने सबसे ग़रीब नागरिक को ठंड से मरने देता है,
अगर काम का अधिकार छीना जाता है,
अगर तकनीक के नाम पर इंसानों को फ़ालतू घोषित किया जाता है—
तो फिर सवाल यह नहीं कि अमर बहादुर यादव क्यों मरा,
सवाल यह है कि अब अगला कौन है?
यह विश्लेषण किसी एक मौत पर शोक नहीं,
बल्कि उस व्यवस्था पर आरोप है
जो इंसान को खर्चीली ज़िम्मेदारी मानने लगी है।



शैलेश श्रीवास्तव
December 19, 2025 at 8:00 am
यह एक तमाचा है विपक्षी दलों पर जो केंद्र सरकार की अनाज योजना को एक भिखारी बनाने की योजना बोलकर उपहास उड़ाते हैं, देश के लगभग 80 करोड़ जनता इस अनाज योजना से लाभान्वित है। कोविड से शुरू हुई योजना ने करोड़ों परिवारों को भूख से मरने से बचाए रखा है, लेकिन यदि एक मौत भी होती है तो प्रशासन इसका उत्तरदाई होना चाहिए।