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आकाशवाणी और एमआर सिंघवी: सूचना प्रसारण मंत्री के ब्यूटी पॉर्लर की खबर रोक दे, आज किसी में हिम्मत है क्या?

मैं स्वयं इसका उदाहरण हूं। किसी दिन आकाशवाणी के अनुबंध पर समाचार अनुभाग के लिए लिखित परीक्षा हुई और एक दिन एकाएक घर पर आकाशवाणी से अनुबंध का पत्र आ गया। डिप्लोमा भले ही पत्रकारिता में कर लिया हो पर अनुभव के मामले में शून्य होने के बावजूद जिस तरह से सिंघवी जी ने मेरे जैसे को तराशा उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता…

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा-

मीडिया की विश्वसनीयता पर उठते सवालों के बीच आकाशवाणी और बाद में दूरदर्शन के शुरुआती वे दिन बरबस याद आ जाते हैं जब आकाशवाणी के नेशनल और प्रादेशिक समाचारों के प्रति आमजन के विश्वास को इसी से समझा जा सकता है कि चौराहों की चाय-पान की दुकानों पर खड़े होकर भी समाचार सुनने में किसी को कोई संकोच ना होकर गर्व महसूस होता था। आकाशवाणी के नेशनल समाचारों की बात हो तो सुबह 8 बजे और रात पौने नौ बजे के समाचार बुलेटिन की बेसब्री से प्रतीक्षा होती थी, तो प्रातःकालीन प्रादेशिक समाचार के साथ ही खासतौर से सायंकालीन सात बजे के प्रादेशिक समाचार को कोई भी प्रदेषवासी मिस नहीं करना चाहता था।

आकाशवाणी और दूरदर्शन का यह स्वर्णकाल इस मायने में कहा जा सकता है कि सरकारी नियंत्रण में होने के बावजूद आमआदमी तो क्या पक्ष और विपक्ष के नेतागण भी समाचारों की विश्वसनीयता पर प्रश्न नहीं उठा पाते थे। होता तो यहां तक था कि आकाशवाणी के कार्यक्रमों से लोग अपनी घड़ियों को मिलाया करते थे। विश्वसनीयता का यह कोई आसान काम नहीं था पर उस समय के दिग्गज मीडियाकर्मियों ने अपनी मेहनत, लगन और निष्पक्षता से सींचने का काम किया और उसका परिणाम यह रहा कि उस समय के मीडिया दिग्गजों को समूचे समाज में चाहे वह राजनीतिक स्तर हो, ब्यूरोक्रेटिक स्तर हो या फिर आमजन सभी जगह सम्मान से देखा जाता था।

यदि प्रादेशिक स्तर की बात की जाए तो आकाशवाणी जयपुर अजमेर के समाचार संपादक और बाद में दूरदर्शन जयपुर केन्द्र के समाचार एकांश के निदेशक मोहनराज सिंघवी जिन्हे मीडिया जगत में एमआर सिंघवी के नाम से जाना जाता रहा है की मेहनत, निष्पक्षता और मीडिया की स्वतंत्रता की पक्षधरता का ही परिणाम रहा कि मीडिया जगत में एमआर सिंघवी एक ब्राण्ड के नाम से पहचान बनाने में कामयाब रहे। पक्ष-विपक्ष के सभी नेता, समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधियों सहित आमजन में जिस तरह की छवि एमआर सिंघवी की बनी वह आज के मीडिया कर्मियों के लिए ईर्ष्या का कारण बन सकती है तो प्रेरणादायी भी है। बात में इतना दम की मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रीमण्डल के सदस्यगण और क्या ब्यूरोक्रेसी के कर्ताधर्ता एमआर सिंघवी की बात को कमतर समझने की भूल भी नहीं कर सकते थे।

यह आज के समय में अविश्वसनीय कल्पना ही हो सकती है कि 90 के दशक में एमआर सिंघवी के आकाशवाणी जयपुर पिंकसिटी पेट्रोलपंप के पास स्थित आवास पर मिलने वाले जरुरतमंद लोगों का जमावड़ा इस तरह से लगा रहता था जैसे किसी राजनेता के निवास पर लगा होता था। पीड़ित व्यक्ति के लिए एमआर सिंघवी एक सहारा रहे हैं। इसका कारण भी यह रहा कि यदि काम जायज है और हितकारक है तो सिंघवी जी आने वाले व्यक्ति के सामने ही संबंधित मंत्री से लेकर अधिकारी को फोन करने में किसी तरह का संकोच नहीं करते थे और आने वाले व्यक्ति की आंखें एहसान से बोझिल हो जाती तो काम भी आसानी से हो जाता था।

खास बात यह कि बिना जान पहचान भी कोई अपने दुख-दर्द को लेकर पहुंच जाता था तो सहयोग करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। मैं स्वयं इसका उदाहरण हूं। किसी दिन आकाशवाणी के अनुबंध पर समाचार अनुभाग के लिए लिखित परीक्षा हुई और एक दिन एकाएक घर पर आकाशवाणी से अनुबंध का पत्र आ गया। डिप्लोमा भले ही पत्रकारिता में कर लिया हो पर अनुभव के मामले में शून्य होने के बावजूद जिस तरह से सिंघवी जी ने मेरे जैसे को तराशा उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। मजे की बात यह कि एमआर सिंघवी पोलियों से ग्रसित होने के कारण चलने फिरने में असुविधा के बावजूद किसी के भी सहयोग के लिए उनके साथ जाने को तैयार हो जाते। विकलांगों के लिए उन्होंने संघर्ष करने के साथ ही स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के खेलों का आयोजन, संयोजन व प्रोत्साहन दिया। देवेन्द्र झाझड़िया तो एक उदाहरण मात्र है जिन्हें विश्वपटल पर पहचान सिंघवी जी की प्रेरणा-प्रोत्साहन और सहयोग से ही संभव हो सका।

आकाशवाणी का यह वह जमाना था जब टेलीप्रिंटर और टेलीफोन ही प्रमुख माध्यम होते थे। सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय से समाचारों की डाक आती थी वहीं प्रादेशिक समाचारों में समूचे प्रदेश के प्रमुख समाचारों का समावेश महत्वपूर्ण होता था। ऐसे में लगभग प्रतिदिन समाचार संपादक होने के बावजूद बिना किसी संकोच के फोन से समाचार लेने व स्वयं लिखने तक में संकोच नहीं करने के कारण ही मीडिया जगत में पहचान और विश्वसनीयता बनी। बुलेटिन में खबरों के चयन से लेकर प्रसारण तक तनावरहित वातावरण में काम करना और नए लोगों को प्रोत्साहित करना यही तो सिंघवी जी की पहचान रही। हिम्मत यह कि जयपुर दूरदर्शन निदेशक समाचार रहते हुए तत्कालीन केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्व. गिरिजा व्यास के जयपुर में एक ब्यूटीपार्लर के उद्घाटन के समाचार प्रसारित करने के दबाव के बावजूद मीडिया मानदंडों के विरुद्ध बताते हुए प्रसारित नहीं करना सिंघवी जैसे विरले ही कर सकते हैं।

इसी तरह से तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया के पिताजी के देहावसन के समाचार प्रसारण के लिए लाख दबाव के बावजूद विनम्रता से नीति विरुद्ध जाकर समाचार प्रसारित नहीं करने का निर्णय कोई सिंघवी जैसा ही ले सकता है। आज तो केन्द्रीय मंत्री वो भी स्वयं का माईबाप यानी कि स्वयं के विभाग का हो तो उसकी खबर तो क्या आगे पीछे सेवा सुश्रुषा में ही लगे रहने में गर्व महसूस करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि एमआर सिंघवी कोई ऐसे ही नहीं बनता, कोई ऐसे ही राजनेताओं, पक्ष विपक्ष के छोटे से लेकर बड़े नेताओं, ब्यूरोक्रेट्स सभी के लिए सम्मानजनक अपनी कार्यशैली, निष्पक्षता, निष्ठा और मेहनत से ही बना पाता है। प्रदेश का संभवतः कोई छोटा-बड़ा नेता या अधिकारी ऐसा नहीं होगा जो एमआर सिंघवी के नाम, पहचान और उनकी कार्यशैली का कायल नहीं होगा।

इतने विस्तृत कैनवास पर पहचान और विश्वसनीयता कोई ऐसे नहीं बन जाती बल्कि यह ईमानदारी, निस्वार्थता और सहायता और सहयोग की भावना के कारण ही हो पाता है। यही सिंघवी जी की पूंजी मानी जा सकती है। समाचार में समाचारत्व है तो उसे बिना किसी पक्षपात के स्थान मिलता वहीं तत्कालीन राज्यपाल जोगेन्द्र सिंह द्वारा रिकार्ड वाइस ओवर प्रसारित कराने के दबाव के बावजूद स्तरीय नहीं होने से प्रसारित नहीं करने का साहस कोई एमआर सिंघवी ही कर सकता है।

यह सब इसलिए कि आज मीडिया की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में खड़ी हो गई है। खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की विश्वसनीयता पूरी तरह से दांव पर लग चुकी है। चैनलों पर बेसिरपैर की चर्चा और आरोप-प्रत्यारोप का मंच बनना आज आम हो गया है। रही सही कसर सोशियल मीडिया ने कर दी है जहां अपलोड सामग्री भ्रम पैदा करने का काम करने के साथ ही उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ी कर देती है यही कारण है कि चैनलों पर समाचार प्रसारित होते समय वीडियो की विश्वसनीयता पर स्वयं चैनल द्वारा सवाल खड़े किया जाना आम है। होना तो यह चाहिए कि जब तक समाचार संपादक स्वयं संतुष्ट नहीं हो जाए तब तक केवल टीआरपी के चक्कर में ऐसे समाचार व वीडियो को प्रसारित ही नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह सवाल दर्शकों के विश्वास को बनाए रखने का हो जाता है। एक समय था जब कोई भी बड़ी घटना हो जाती थी तो लोग आकाशवाणी के आगामी समाचार बुलेटिन पर कान लगाकर पुष्टि होने पर ही विश्वास करते थे। आज अपुष्ट समाचार आम होते जा रहे हैं।

आकाशवाणी के पुराने दिनों और एमआर सिंघवी जैसे व्यक्तित्व व संपादकों के बहाने आज मीडिया की विश्वसनीयता का वहीं पुराना युग देखने का प्रयास किया जाना चाहिए। प्रसारित समाचार की विश्वसनीयता पर कोई सवाल उठता है तो फिर यह मीडिया के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होना चाहिए। मीडिया जगत को आज एमआर सिंघवी जैसे मीडिया दिग्गज की आवश्यकता महसूस हो रही है ताकि मीडिया चाहे इलेक्ट्रॉनिक हो या प्रिंट उस पर प्रसारित या प्रकाशित समाचार को वेदवाक्य की तरह विश्वसनीय माना जाए। बदलते हालात में आज यह आवश्यकता अधिक हो गई है क्योंकि समाज आज भ्रमित अधिक हो रहा है तो मीडिया और सोशल मीडिया ने विश्वसनीयता को ही प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया है। समाचार पर प्रश्न उठने की कोई संभावना ही नहीं होनी चाहिए।

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