
संजय कुमार सिंह
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2023 की जनगणना के अनुसार 3.38 करोड़ की आबादी वाले देश घाना में हैं (थे) और आज सुबह-सुबह मुझे ट्वीटर (एक्स) पर उनकी पोस्ट दिखी। करीब साढे़ तीन मिनट के एक वीडियो के साथ अंग्रेजी में उन्होंने लिखा है, अक्रा घाना में बेजोड़ स्वागत। 11 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद चार करोड़ से भी कम की आबादी वाले देश में बेजोड़ स्वागत हो और 144 करोड़ की आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री को खुद एक्स पर लिखकर बताना पड़े तो यह खुशी या गर्व की बात नहीं है। बताने लायक तो बिल्कुल नहीं और खुद? तौबा-तौबा। देश में भारी बेरोजगारी (और गरीबी) है। नरेन्द्र मोदी से पहले के प्रधानमंत्री अपने साथ विमान में खाली सीटों पर पत्रकारों को ले जाते थे जो देश की जनता को ऐसी खबरें देते थे, अपने ढंग का वीडियो बनाते थे और रिपोर्ट लिखते थे। इसमें सरकार का कुछ खर्च नहीं होता था क्योंकि वहां उनके रहने की व्यवस्था कंपनी करती थी या मेजबान देश। फिर भी, नरेन्द्र मोदी ने पत्रकारों को साथ ले जाना बंद कर दिया। प्रचारकों ने कहा उन्हें इसकी जरूरत नहीं है। बाद में पता चला वे मित्र उद्योगपतियों को साथ ले जाते रहे हैं उन्हें काम दिलाने के लिये। अगर यह गलत भी हो तो आरोप लगाने वालों का मुंह बंद करने के लिए प्रधान मंत्री को चाहिये था कि अपने साथ पत्रकारों को ले जाना शुरू करते और अपने प्रचार का यह काम अपनी ट्रोल सेना की बजाय पेशेवरों से ही कराते। उन्हें भी सैर कराते। देश की आबादी का बड़ी हिस्सा विदेश यात्रा कर पाता। इससे रिपोर्ट करने वालों को अनुभव होता, वे काम सीखते और देश के लिये काम कर पाते। अपना घर चलाते। प्रधानमंत्री के परिश्रमी और ज्यादा काम करने में सक्षम होने का मतलब यह नहीं है कि सारा काम वे खुद करें और मंत्रियों को भी काम नहीं करने दें। आज सुबह ट्वीट देखकर मुझे बहुत बुरा लगा और यह पता चलते ही कि मैं ट्वीटर से कह सकता हूं कि मुझे ऐसे ट्वीट नहीं देखने हैं मैंने कह दिया। इन्हीं कारणों से मैं ट्वीटर पर प्रधानमंत्री को फॉलो नहीं करता। प्रचार का ओवरडोज हो जाता रहा है।
इसके बावजूद ‘सरकार’ का प्रचार करने वाली आज की यह खबर द हिन्दू की लीड है, ब्रिक्स एक ‘बहुध्रुवीय’ विश्व बनाने में मदद करेगा। आप जानते हैं कि ब्रिक्स उभरती राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के एक संघ का नाम है। ये देश हैं – ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं और इन्हीं देशों के अंग्रेज़ी नाम के पहले अक्षरों से मिलकर इस समूह का यह नाम रखा गया है। 2022 के मध्य में आयोजित 14वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा था कि ब्रिक्स देश एक “नई वैश्विक आरक्षित मुद्रा” जारी करने की योजना बना रहे हैं और सभी निष्पक्ष व्यापार भागीदारों के साथ खुले तौर पर काम करने के लिए तैयार हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कई बार ब्रिक्स पर निशाना साध चुके हैं और कहा है, अमेरिका चाहता है कि ब्रिक्स देश यह समझ लें कि वे अमेरिकी डॉलर को रिप्लेस नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी कहा था कि, अगर ऐसा होता है कि ब्रिक्स देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाया जाएगा। ऐसे में प्रधानमंत्री के घाना दौरे और वहां ब्रिक्स की मदद की चर्चा को इन तथ्यों के आलोक में देखा जाना चाहिये। द हिन्दू की खबर का उपशीर्षक है, प्रधानमंत्री पांच देशों के अपने दौरे की शुरुआत में घाना पहुंचे। उन्होंने कहा कि उनका दौरा वैश्विक दक्षिण में सहयोग को मजबूत करेगा। खबर के अनुसार वे ब्राजील में ब्रिक्स सम्मेलन में भी भाग लेंगे और द्विपक्षीय बैठक करेंगे। मेरे आठ अखबारों में आज यह खबर द हिन्दू के अलावा सिर्फ दि एशियन एज में लीड है। यहां इसका शीर्षक है, पांच देशों के दौरे की शुरुआत प्रधानमंत्री ने घाना से की।
आज जो खबर सबसे ज्यादा अखबारों में लीड है वह है पहलगाम के दोषियों को सजा मिले। यह हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और अमर उजाला में लीड है। पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन सिन्दूर और उसका युद्ध का रूप ले लेना फिर अचानक युद्ध विराम की घोषणा अमेरिका से होना और अब क्वाड में उसके दोषियों को सजा दिलाने की मांग पहलगाम हमले पर भारत सरकार के रुख की पोल खोल देता है। इसलिये यह खबर लीड के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अमर उजाला में इसका शीर्षक है, पहलगाम हमले के दोषियों को बिना देरी के मिले सजा। हिन्दस्तान टाइम्स में इसका इंट्रो है, जयशंकर ने कहा कि भारत आतंकवाद से अपना बचाव करेगा। उन्होंने हमले की स्थिति में कुछ देशों से समर्थन की कमी को रेखांकित किया। टाइम्स ऑफ इंडिया का इंट्रो है, संयुक्त बयान में हमलावर समूह का नाम नहीं है। अमर उजाला का एक उपशीर्षक है, संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों से इसमें मदद की अपील। पर साझा बयान में पाकिस्तान के नाम का जिक्र नहीं। इससे पहले, खबर थी कि चीन में एससीओ बैठक के साझा बयान में बलूचिस्तान में आतंकवाद की निंदा थी पर पहलगाम का नाम तक नहीं था! रक्षा मंत्री ने इसतपर दस्तखत नहीं किये थे। अब क्वाड समिट ने पहलगाम हमले की तो निंदा हुई लेकिन भारत सरकार द्वारा उसका प्रायोजक घोषित पाकिस्तान का नाम लिए बिना! आप समझ सकते हैं कि दूसरे देश भारत के मामले में कितने गंभीर या साथ हैं। अखबार में सीधे खबर नहीं छपने क मतलब सब चंगा सी नहीं होता है लेकिन अखबार भी सच कब तक कितना छिपा पायेंगे। जाहिर है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत अलग-थलग लगता है लेकिन अकेला सब पर भारी होने का दावा तो किया ही जा सकता है।
आज के अखबारों की तीसरी लीड है, इंडिया ब्लॉक ने चुनाव आयोग से कहा : बिहार में मतदाता सूची का पुनरीक्षण दो करोड़ से ज्यादा मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करेगा। इंडिया समूह के नेताओं ने कहा है कि इस काम के लिए समय बहुत कम है और लोगों को आवश्यक दस्तावेजों के लिये संघर्ष करना पड़ेगा। इस संदर्भ में इंडिया समूह का सवाल है कि 2003 की मतदाता सूची का पुनरीक्षण इतना जरूरी है तो क्या 2003 के बाद से हुए सभी चुनाव दोषपूर्ण हैं। अगर ऐसा नहीं है तो यह काम विधानसभा चुनाव के बाद भी हो सकता है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लीड है और इसके साथ की एक खबर का शीर्षक है, भाजपा के बिहार सहयोगी भी असहज हैं और डर रहे हैं कि सही मतदाता भी छूट जायेंगे। बात सही है। असली मामला यही है कि चुनाव आयोग जो करना चाहता है वह उसके अधिकार की बात नहीं है और सिर्फ नागरिकों को मतदाता बनाने की आड़ में वह न तो मनमानी कर सकता है और न भाजपा के फायदे वाले काम कर सकता है। ऐसे में जो करना चाहता है वह मुश्किल है। सबके लिए की जा रही आदर्शवादी कोशिशों का नुकसान भाजपा को हो ही सकता है और अगर भाजपा को समझ में आ गया है तो चुनाव आयोग के रुख में बदलाव हो सकते है और हमें उसके लिए तैयार रहना चाहिये या उसका इंतजार करना चाहिये। हालांकि, आज की इस खबर से जुड़ा एक सत्य देशबन्धु में छपा है और लीड है। बिहार में मतदाता सूची पर समीक्षा बैठक को लेकर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला – फ्लैग शीर्षक के साथ मुख्य शीर्षक है, केवल पार्टी प्रमुखों की सुनेंगे बात। निश्चित रूप से यह बड़ा मामला है और चुनाव आयोग के ‘विकास’ का असर लगता है।
चौथी और आज की सबसे अलग लीड, द टेलीग्राफ की है। वैसे, यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में भी प्रमुखता से है और दलाई लामा के उत्तराधिकरी के चयन से संबंधित है। द टेलीग्राफ में सात कॉलम में छपी है। और कई अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। शीर्षक के अनुसार दलाई लामा ने कहा है कि उनके तहत एक ट्रस्ट उनका उत्तराधिकारी चुनेगा। खबर है कि इसे लेकर दलाई लामा और चीन में मतभेद है। दि एशियन एज ने शीर्षक में ही बताया है कि दलाईलामा के अनुसार उनके उत्तराधिकारी के चयन में चीन की कोई भूमिका नहीं होगी और जैसा द टेलीग्राफ की खबर है, मामला उनके उत्तराधिकारी के चयन का नहीं, उनके ‘पुनर्जन्म’ का है जो दि एशियन एज के शीर्षक में है। उपशीर्षक के अनुसार, बीजिंग ने इस कदम को खारिज कर दिया है और मंजूरी के अधिकार का दावा किया है। दूसरी खबर यह भी है कि दिल्ली ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है। नवोदय टाइम्स की लीड भी दूसरे सभी अखबारों से अलग है और शीर्षक है, जीएसटी में राहत देने की तैयारी। देशबन्धु ने कल जीएसटी पर लीड छापी थी और वह जीएसटी के आठ साल पूरे होने पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया थी। दूसरे अखबारों ने जब प्रधानमंत्री का यह दावा छापा था कि जीएसटी एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में सामने आया है और भारत के आर्थिक परिदृश्य को नया आकार दिया है को राहुल गांधी ने कहा था कि आर्थिक अन्याय का आधार बना जीएसटी। देश की एक महत्वपूर्ण और नई टैक्स प्रणाली का जब विरोध करके लागू करने वाले प्रधानमंत्री अच्छा और विपक्ष के नेता आर्थिक अन्याय का हथियार बता रहे हैं तो दोनों खबर है और बराबर महत्व की। लेकिन प्रधानमंत्री की बात तो छपी राहुल गांधी की नहीं। यह देश की मीडिया का हाल है। ऐसे में आज नवोदय टाइम्स की लीड का मतलब है कि राहुल गांधी के विरोध के बाद सरकार (जीएसटी कौंसिल) कर की दर कम करने जा रही है। सच्चाई यह भी है कि जीएसटी कौंसिल में जब भाजपा का बहुमत था तो मनमानी चल रही थी अब विरोध है तो दर कम की जा रही है। इससे पहले नियमों की ढील दी जा चुकी है। पर मीडिया का बताने का अपना अंदाज है।
लीड के अलावा आज की सबसे महत्वपूर्ण खबर है, संसद की सुरक्षा में सेंध : हाईकोर्ट ने दो आरोपियों को जमानत दी। यह द हिन्दू का शीर्षक है और सिंगल कॉलम में छपा है। खबर के पहले पैरे में जमानत की शर्त बताई गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर सिंगल कॉलम में है। इसका शीर्षक है, संसद की सुरक्षा में सेंध लगाने के 2023 के मामले में दो आरोपियों को जमानत। जमानत की शर्त प्रेस से या सोशल मीडिया पर इस हमले की चर्चा करने से मना करना है। देशबन्धु में यह खबर दो कॉलम में है। शीर्षक है, संसद की सुरक्षा में सेंध के आरोपी नीलम-महेश को राहत। इसके अलावा यह खबर किसी अखबार में है या नहीं या किस शीर्षक से है उससे पता चलता है कि सूचना कितनी दी गई है और जो सूचना दी गई है वह सरकार की मनमानी को छिपाकर दी गई है या उसे साफ-साफ गलत बताया गया है जैसा अदालत ने कहा है। हेडलाइन मैनेजमेंट में खबरों के चयन के साथ-साथ उसका शीर्षक ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है और संभव है कि पहले पन्ने की खबरें शीर्षक या अनुकूल शीर्षक की संभावना या कारण से तय होते हों। इनमें जनहित की खबरें सरकार का प्रचार ही मानी जायेंगी। हालांकि सरकार ऐसे काम करती ही बहुत कम है। इस लिहाज से आज इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक उल्लेखनीय है। हिन्दी में यह शीर्षक कुछ इस तरह होगा, संसद की सुरक्षा में सेंध के मामले में दो को जमानत मिली, हाईकोर्ट ने कहा प्रतीकात्मक विरोध आतंकी कार्रवाई नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि शीर्षक का दूसरा हिस्सा जरूरी नहीं था पर यही खबर है और चार लाइन के इस शीर्षक का पहला हिस्सा शीर्षक में नहीं होता तो सिर्फ दूसरे हिस्से का वह प्रभाव नहीं होता जो पूरे का है और इस शीर्षक से अखबार ने अदालत का पक्ष सार्वजनिक कर दिया है जो सरकार की सोच या व्यवहार से बिल्कुल उलट है। इसका उपयोग हमेशा नजीर के रूप में किया जा सकता है। खबर में बताया गया है कि प्रतीकात्मक विरोध की यह कार्रवाई सख्त यूएपीए के तहत भी नहीं आ सकती है। यह अलग बात है कि व्यवस्था ठीक नहीं होने और पुलिसिया मनमानी के कारण इन लोगों को डेढ़ साल जेल में रहना पड़ा और पूरी नहीं तो जरूरत भर सजा हो ही गई जो तमाम बलात्कारियों, अपराधियों और यौन शोषकों की नहीं हुई है या होती है। इंडियन एक्सप्रेस में ही आरटीआई के हवाले से एक खबर है जो बताती है कि उत्तराखंड के चौरासी कुटिया आश्रम के पुनरुद्दार के लिए बिमल पटेल के नेतृत्व वाले अहमदाबाद की कंपनी का चुनाव राज्य पयर्टन विभाग ने टेंडर के बिना किया था। खबर में बताया गया है कि ऐसा दूसरे राज्यों में दूसरी परियोजनाओं के लिए भी हुआ है। हम जानते हैं कि इसकी जांच नहीं होगी। जांच सिर्फ विपक्षियों की होती है या उन्हीं की जिन्हें वाशिंग मशीन में धोना होता है। इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता अघोषित इमरजेंसी का भी विरोध कर पा रही है।


