अरविंद कुमार सिंह-
अमर उजाला-77 साल के सफर में कुछ यादें अपनी भी! जीवन का सबसे महत्वपूर्ण एक दशक कब बीता पता नहीं चला। लेकिन देश के करीब हर कोने जाने का मौका मिला। विदेश में भी पहले क्षेत्रीय अखबारों में मालिक लोग जाते थे, पर मैं कई बार कई देश गया। कभी संसाधन की कोई दिक्कत संस्थान ने नहीं आने दी।
अमर उजाला में जो लिखा वह छपा। उसी तरह छपा, कभी भाव और तथ्यों से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई।
बहुत से नेता और अधिकारी नाराज हुए पर मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सके। हमेशा श्री अशोक अग्रवाल, श्री अतुल माहेश्वरी, अजय अग्रवाल और राजुल माहेश्वरीजी ने हमेशा साथ दिया, प्रोत्साहन दिया। हरि जोशी ने साप्ताहिक परिशिष्ट में इतना लिखवा लिया कि मूल अखबारों के साथ टैम्पू भर जाये।
अमर उजाला में ले जाने के प्रेरक श्री अतुल माहेश्वरी जी थे। उनसे मेरा परिचय 1986 में हुआ था और उन्होंने कई बार मुझे अमर उजाला के दिल्ली ब्यूरो में आने का आमंत्रण दिया था, पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित अखबार में जाने के लिए सभी मित्रों ने मना किया।
1989 में उन्होंने कई बार आग्रह किया तो मै दिल्ली में अमर उजाला के राजनीतिक ब्यूरो का हिस्सा बना। उन दिनों अमर उजाला के केवल चार संस्करण थे आगरा, बरेली, मेरठ और मुरादाबाद।
हम लोगों को वहां काम करने की पूरी आजादी थी। खबर किसी के खिलाफ हो, तथ्य हैं तो अमर उजाला ने छापने से परहेज नहीं किया। हल्ला बोल रहा हो, किसान आंदोलन या अयोध्या आंदोलन जो दिखा वो लिखा। वो छपा भी।
अमर उजाला में हमारे ब्यूरो प्रमुख प्रबालजी थे। साथी अतुल सिन्हा, अजीत अंजुम भी। बीच में कई लोग आए गए। पर हम बने रहे। बहुत सी खबरें ब्रेक की। टीवी में होती तो अलग बात थी। कई खबरें खुद अतुलजी को देर रात लिखवाई। उन्होने कापी बनाई और सुबह छपी।
बहुत सी छोटी-छोटी उपलब्धियों और यादें एक दशक में रहीं। एक दशक की अपनी उस यात्रा मं बदलते भारत को देखा। राजनीति के केंद्र बिंदु को देशा, सत्ताओं को देखा और सबसे बड़ी बात देश को देखा। गांव, गरीबों औऱ किसानों के हक में बहुत कुछ लिखा।
आज मैं जो कुछ हूं, उसमें अमर उजाला परिवार का बड़ा योगदान है। अपने पुराने साथियों को याद करते हुए अमर उजाला की मौजूदा टीम को बधाई देता हूं। कुछ यादें साझा कर रहा हूं।














