रंगनाथ सिंह-
अमेरिकी वर्चस्व को पुनर्स्थापित करने वाला युद्ध! पिछले एक दशक से चीन-परस्त लोगों द्वारा यह नरेटिव बनाया जा रहा था कि अमेरिका अब उतना ताकतवर नहीं रहा जितना पहले था। वेनेजुएला से मादुरो के अपहरण और ईरान से अपने वायु सैनिक की निकासी के कारनामों से अमेरिका ने दुनिया में जितनी दहशत पैदा की है, उसका असर आने वाले वक्त में दिखेगा।
खबर आ रही है कि अमेरिका और ईरान में समझौते पर बातचीत चल रही है। यह समझौता जितना जल्दी हो जाए उतना अच्छा है लेकिन अमेरिका के इस हमले के बाद दुनिया के ज्यादातर बड़े देश अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाने की दौड़ में नई तेजी लाने को मजबूर होंगे। जिसके पास अपनी सीमा को सुरक्षित रखने की ताकत नहीं होगी वह इस तरह के हमले झेलने और फिर समझौता करने के लिए बाध्य होगा।
अमेरिका का ताजा हमला चीन की असलियत खुलने के लिए भी याद किया जाएगा। अब यह साबित हो गया है कि दुनिया में एक ही महाशक्ति है, अमेरिका। सोवियत रूस जब महाशक्ति हुआ करता था तब अमेरिका के अन्दर भी उसका भय दिखता था। पिछले कुछ सालों में ऐसा नहीं लगा कि अमेरिका को चीन का कोई भय है। चीन अब भी तैयारी के मोड में है। उसकी तैयारी जब पूरी होगी तब देखा जाएगा मगर अभी वह उस जगह नहीं है जहाँ अमेरिका को किसी अन्य देश पर हमला करने से रोक सके।
यूक्रेन और ईरान युद्ध ने आने वाले वक्त के युद्धों का एक खाका भी खींच दिया है। इंसान से ज्यादा मशीन युद्ध लड़ेंगे। मनुष्य मरेंगे। मशीनें नष्ट होंगी। स्थायी हार या जीत शायद किसी की न हो मगर जिसने दुश्मन को ज्यादा नुकसान पहुँचा दिया वह विजेता होगा। अमेरिकी हमले से ईरान कम से कम दो दशक पीछे चला जाएगा।
एपस्टीन ईरान शिफ्ट हो गया होता तो कानूनी रूप से नाबालिग बच्चियों से अधेड़ पुरुषों का मुताह करा पाता। अमेरिका रहने के कारण अधेड़ों और बूढ़ों की विकृतियों के तुष्टिकरण के लिए उसे जेल जाना पड़ा और अन्त में दुनिया से भी।
नितिन त्रिपाठी-
यह घमंड बस्टर पोस्ट है, भावनाएं आहत होंगी. कमजोर हृदय वाले, कट्टर जिहादी, कट्टर धार्मिक, कट्टर देशद्रोही, कट्टर किताबी देशभक्त अपने रिस्क पर पढ़ें. बीपी की दवा पहले ले लें.
प्रायः हिंदुस्तानियों की अमेरिका से जलन के कुछेक बेसिक होते हैं. पहला कारण सोशलिस्ट अपब्रिंगिंग है. बचपन से सिखाया गया दरिद्र नारायण. गरीब के पैर प्रधान मंत्री छूते हैं (ये नहीं पता उन्हें वोट चाहिए). दूसरा कारण होता है जलन. तीसरा कारण है उनके वो रिश्तेदार / सोशल मीडिया अमेरिकन मित्र जो उनसे कटते हैं कि ये ग्रीब लोग हमसे डिमांड न करें तो पहले हो बता देते हैं हम बहुत दुखी हैं यहाँ बड़ी मुसीबत है – अब इनसे कौन कहे कि भाई मुसीबत है तो वापस लौट जाओ किसने कहा कि हर साल लाइन में लग कर वीजा रिन्यू करवाओ. और अंतिम बड़ा कारण है अज्ञानता. गांव में बैठे व्यक्ति को पता ही नहीं होता कि उसका क्या फायदा है NRI कम्युनिटी या डॉलर से. उसे लगता है हमें तो पाँच किलो राशन में जीना है तो भाड़ में जाएँ ये – उसे किसी ने समझाया हो नहीं कि ये राशन / मुफ्त सिलेंडर / गैस में ये डॉलर भेजने वाले/ ये सॉफ्टवेयर में बैलग्लोर / दिल्ली/ गुरुग्राम / नूडा वालों का भी हाथ है.
आज भारत का वार्षिक रेमिटेंस 135 बिलियन डॉलर है. NRI यह अमाउंट विदेश से भेजते हैं जिसके एवज में आपको उन्हें कुछ नहीं देना होता. यह रकम bihaar जैसे बड़े प्रदेश की जीडीपी से ज्यादा है जिसके एवज में आपको इतने बड़े प्रदेश के भोजन से लेकर सुरक्षा देनी होती है. ऊपर से ये कमाई डॉलर में है. जिससे आप तेल ख़रीदते हो. अमेरिका इकलौता ऐसा बड़ा देश है जिसे आप निर्यात ज़्यादा करये हो आयात कम. और हाँ ये न बताना कि फ़ेसबुक, गूगल आपके पैसे से चलते हैं. उनकी वार्षिक कमाई का पाँच प्रतिशत भी आपके यहाँ से नहीं है. हाँ आपकी बड़ी IT कंपनियों जैसे टीसीएस इंफ़ोसिस का मेजर रेवन्यू अमेरिका से ही है.
फिर भारतीय it इंडस्ट्री – भारत ने कोई गूगल फेसबुक माइक्रोसॉफ्ट बनाया नहीं है. पर हाँ नोएडा गुड़गांव बैंगलोर हैदराबाद में करोड़ लोग सॉफ्टवेयर कंपनियों में उच्च सैलरी में इन्हीं अमेरिकन कंपनियों के लिए काम करते हैं. आपमें ज्यादातर ने ओरेकल का नाम न सुना होगा उसने स्टाफ में कटौती मात्र की भारत का वार्षिक हज़ार करोड़ का नुक़सान है. हो सकता है आप सॉफ़्टवेयर में न हों डायरेक्ट, पर इन शहरों के रेस्टोरेंट, रियल एस्टेट, होटल, पान की दुकान तक इसी कमाई से चलते हैं. भारत में अभी भी सामान्य प्राइवेट नौकरी पंद्रह हज़ार की होती है – इन कंपनियों ने 50-60-90,000 – लाखों महीने की नौकरी दे रखी है.
ये जो अभी ai समिट हुई थी जिसमें गलगोटिया ने चीनी कुत्ता दिखा कर नाक कटाई थी – वहाँ कुछ भारतीय कंपनियां स्टार्ट अप थे AI के जिन्होंने नाम रोशन किया था. सर्च करके देख लेना ऐसे हर स्टार्टप के पीछे अमेरिकन निवेशक होंगे. ये जो paytm से लेकर ओला तक भारतीय टेक्नोलॉजी महान है बताते हो मोस्टली यह अमेरिकन डॉलर से ही भारत में आई होती है. इतना ही नहीं शेयर बाज़ार में 700 बिलियन डॉलर लगे हैं विदेशी.
ये जो फेसबुक पर एंड्राइड पर हिंदी में टाइप करते हो न ये सब भी किसी अमेरिकन कंपनी का ही है.
और इतने के बावजूद अगर शिकायत है कि अमेरिकन तानाशाह है तो चेक कर लेना ईरान में इंटरनेट पर कौन कितने लिख सकता है. और यकीन मानिए जितना अमेरिकन डॉलर आपकी इकॉनमी में हैं उसका दस प्रतिशत भी आप चाइनीज़ मुद्रा पर निर्भर होते तो लंका की तरह चाइना आपके बंदरगाह गिरवी रखवा लेता.
तो भाइयों जो हाथ पैसे खिला रहा है उस पर जलन वस थूकना बंद करें.


