
महक सिंह तरार-
— जिन लोगो को बिज़नेस व लूट की ABC नही पता वो USA में अडानी केस पर खुश हुए जा रहे है। पहली बात Indictment तथा Conviction में अंतर होता है।
— US डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस व SEC में जिस एन्टी ब्रिबेरी लॉ के तहत एक्शन की बात भारत मे कुछ एक्सपर्ट कर रहे है वो USA के सिटीजन पर विदेश में ब्राइब देने पर है ना कि विदेशी सिटीजन पर USA से बाहर रिश्वत देने पर।
— ग्रैंड ज्यूरी subpoenas (एक किस्म से गवाही के लिए बाध्य करना) सिर्फ USA के अंदर हो सकती है ना कि ज्यूरी दूसरे देश से बंदे को USA में बुला सकती है।
— अमरीकी जस्टिस विभाग के पास भी Allege बेस सबूतों के सहारे अडानी को फोर्स फुल्ली अदालत में आने या गवाही के लिए उपस्थित होने का अधिकार इस केस में नही है।
— अगर उनका न्यायविभाग भी गवाही के लिए सम्मन जारी कर दे ओर इधर से कोई वकील भी ना जाये तथा केस साबित भी हो जाये तो जज सेन्टेनसिंग कर सकता है।
— अगर चार्ज साबित भी हो जाये तो भी No Disclosure (दुनिया मे बिन किसी को बिन बताये) तथा बिना अपराध स्वीकार किये सेटलमेंट करने का रास्ता है।
— ऐसे मामले USA में पहले भी हुए है, वो लोग पैसे के पीर है व न्यायिक सेटलमेंट में भी बाकायदा पैसे लेके समझौते करवाने के कानूनी समाधान है।
(प्रैक्टिकली इसमे कुछ नहीं होना जाना, अधिकतम होगा भी तो पैसे भर के सेटलमेंट होगा ओर वो भी आम पब्लिक को ना बताने की कानूनी शर्तों अनुसार होगा)
अमेरिका में ही दुनिया के टॉप आंतकवादी संगठनो को हिंसात्मक गतिविधियों के लिए हवाला से कैश उपलब्ध कराने के आरोप लगे थे HSBC बैंक पर। बैंक ने चार्ज स्वीकार करके पेनाल्टी भर दी। कैश पेड, केस क्लोज। जनता आंतकी की गोली से मरे या सैनिक पुलिस की गोली से बिज़नेस मेन को फ़र्क़ नही पड़ता
ये मामला व्यवहारिक चारित्रिक तौर पर गलत है, रिश्वतखोरी का है, बईमानी से ठेके हड़पने का है, झूठ बोलकर साख बनाकर मार्किट से पैसा उठाने का है, नेताओ- अधिकारियों- व्यापारियों के नापाक गठजोड़ का है पर हम तो यहां इस तरह के गठजोड़ को रोज देखने के आदि है। बल्कि हमारे नेता-अधिकारी तो गुंडों से गठजोड़ करते है। हम तो धार्मिक भावनाओं को भड़का कर वोट के रास्ते सत्ता हथिया लेने वाले कि जय जयकार रोज सड़को पर देखते है।
आम हिंदुस्तानी आवाम बात कितने भी बड़े मोरल वैल्यू की करे पर वो इन सबको स्वीकार करता आया है। व्यापारियों द्वारा किये गए गलत काम की लिस्ट बनाओ तो कागज़ यहां से चांद तक पहुंच जायेगा। हासिल क्या हुआ !!??
अडानी को इस सब से फाइनेंसियल या धंधे का कोई नुकसान नही है। अच्छे इंस्टीट्यूशन्स/लोगो की नज़र में उसकी साख खराब होगी जिस कारण वो जो संभावित लाभ चंद सालों में हासिल करता अब वक़्त ज्यादा लगेगा।
बाकी उससे सौ गुणा गलत वो यहां रोज करते है क्या उखाड़ लिया तुमने. वैसे एक बात और बताता चलूं की भारत मे एक वर्ग ऐसा है जो जिले के सबसे बड़े गुंडे, शहर के सबसे अमीर आदमी, प्रशाशन के सबसे बड़े अधिकारी के साथ सांठगांठ करने/फ़ोटो खिंचाने में ग़र्क़ महसूस करता है।
ऐसा वर्ग ये समझ कर की अडानी पर साहेब का हाथ है उसके पास फिनांसियाल मदद करने भाग भाग कर जाएंगे। याद होगा कि कनाडा/अमेरिका वालो ने भारत के गृहमंत्री व मोदी के सबसे ताकतवर साथी के साथ भी अडानी टाइप एक्शन की बात की थी तो यहां का अंडभक्त समाज देश के बाहर देश के तथाकथित दुश्मनों को मारने के लिए शाह को हीरो घोषित कर रहे थे। ये बदनाम होने पर नाम होने के फायदे उठाने वाली सत्ता है। साथ मे सिर्फ ओर सिर्फ पैसों के लिए काम करने वाले व्यापारियों का रिश्वत देकर काम निकालने का पुराना सेट तरीका है।
मैं 99% व्यापारियों से मोरैलिटी की उम्मीद ही नही रखता।


