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अमृतकाल में लोकतंत्र : सवाल पूछने वाले अब सोशल मीडिया से चुपचाप दूर क्यों हो रहे?

राकेश कायस्थ-

अमृत काल आने दो… मैं आपसे जो कहने जा रहा हूं, वह बात थोड़ी लंबी हो सकती है। लेकिन जो लोग मुझे पढ़ते आये हैं, उनके धैर्य से परिचित हूं, इसलिए यह चर्चा आगे बढ़ाने जा रहा हूं। कई दोस्तों को लगता है कि मैं सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय हूं। लेकिन यह सिर्फ एक धारणा है, सच नहीं।

हकीकत ये है कि यह समय मेरे लिए बल्कि हम जैसे बहुत से लोगों के लिए सोशल मीडिया से आहिस्ता-आहिस्ता दूर होते चले जाने का है। बिहार की लंबी चुनावी प्रक्रिया और नतीजों तक मैंने सिर्फ एक पोस्ट लिखा और वह भी यह बताने के लिए कि राजनीतिक विषयों पर लिखना लगभग बंद कर देना कारण क्या है।

मुमकिन है, मैं बंगाल या ऐसे किसी भी चुनाव पर कुछ भी ना लिखूं। ना लिखने के पीछे कोई भय नहीं है और ना किसी मंडलीकरण से पैदा हुई कोई बंदर गुलाटी है। लगातार सोचने के बाद मेरी यह धारणा उत्तरोत्तर मजबूत हुई है कि भारत में लंबे समय तक सकारात्मक दिशा में कुछ भी बदलना संभव नहीं है।

पड़ोसी देश चीन दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका को अपदस्थ करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। वियतनाम, इंडोनेशिया और मेक्सिको जैसे प्रतियोगी एआई के साथ बदलती दुनिया में बन रहे मौकों को दोनों हाथों से लपकने को तैयार हैं। इन सबके बीच अपना अमृत ढूंढता भारत उल्टी दिशा में बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ लगा रहा है। रफ्तार इतनी तेज हो चुकी है कि मंजिल से पहले उसका रुकना असंभव है।

सरकार अमृतकाल लाने को वचनबद्ध है। अमृत अपने आप नहीं आएगा। इसके लिए समाज को मथना होगा, उसे स्थायी रूप से विभाजित करना होगा और सरकार यह काम युद्धस्तर पर कर रही है। आप यह सोच रहे हैं कि यह विभाजन सिर्फ धार्मिक स्तर पर है, तो आप गलत हैं। यूपी में जाटों को यादवों से लड़ाया जा रहा है तो हरियाणा में यादवों को जाटों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है। पूरे देश में यही चल रहा है।

कौमें लड़ाई जा रही हैं, पिछली सरकार की योजनाएं चुराकर उन्हें अपनी बताई जा रही हैं। वॉशिंग मशीन सिर्फ विरोधी दल के नेताओं के लिए नहीं है बल्कि सरकारी आंकड़ों के लिए भी हैं। अर्थव्यस्था के आंकड़े इतने ज़ोरदार हैं कि आईएमएफ कह रहा है कि नंबर तो बहुत अच्छे लाये हैं लेकिन माफ कीजियेगा हमें गिनना ही नहीं आता, इसलिए बता नहीं सकते कि असली है या फर्जी।

भारत पर असली अमृत 2047 में बरसेगा, ऐसी भविष्यवाणी है। इसका मतलब यह है कि कम से कम 22 साल और चाहिए। इसलिए विरोधी दल वालों को ईडी और सीबीआई से डरवाया जाएगा, कॉरपोरेट मीडिया से विपक्षी नेताओं का चरित्र हनन करवाया जाएगा। चुनाव आयोग के ज़रिये वोटर का नाम मनचाहे ढंग से जुड़वाया और कटवाया जाएगा और इन सब में कोई कमी रही तो न्याय करने के लिए तत्पर बैठे बड़े जज साहिबान का दरवाजा खटखटाया जाएगा। क्या आपको लगता है कि इतना सब होने पर कोई अमृतकाल आने से रोक सकता है?

ये कहा जाता था कि महानायक इतिहास बदलते हैं। मैं समझता था कि भविष्य बदलने से इतिहास बदल जाता है। लेकिन इस युग ने इतिहास बदलने का अनोखा फॉर्मूला दुनिया को दिखाया। बैक डेट में जाकर इतिहास बदला जा सकता है। जिस तरह एमए के बाद बीए वाली जाली डिग्री बनाई जा सकती है, उसी तरह टाइम मशीन में पीछे जाकर नेहरू और पटेल में सफलतापूर्वक झगड़ा करवाया जा सकता है और तो और अजित पवार की तरह पटेल और शास्त्री तक का दल-बदल भी करवाया जा सकता है। फुले और अंबेडकर का लिटरेचर मिटाकर उन्हें मंदिर में पूजे जाने वाला देवता बनाया जा सकता है।

जहां एक साथ इतनी कलाकारियां हों, जहां संविधान के अनुरूप आचरण की शपथ लेकर बैठी तमाम संस्थाओं की सरकार के साथ यारियां हों, वहां अमृतकाल आने से कौन रोक सकता है? सवाल तो यह उठता है कि रोक कौन रहा है? इल्जाम हम जैसे दस-बीस पचास या सौ लोगों पर हैं।

इल्जाम लगाने वाले वे देशभक्त हैं, जो छोटे-बड़े नेताओं के साथ सोशल मीडिया पर अपने फोटो चमकाते हैं और हमें कमेंट बॉक्स में आकर समझाते हैं “पछकार नहीं पत्रकार बनिये“ इस तरह का ज्ञान देने वालों में वो भी शामिल हैं, जिन्होंने पीआर या सरकारी दलाली के प्रोजेक्ट उठा रहे हैं या फिर ट्रांसफर पोस्टिंग के धंधे में मोटा माल काट रहे हैं।

जिन लोगों की नौकरियां लगवाईं और जिन्हें उधार देकर भूल गया उनमें से भी कई लोग आजकल बड़े नाराज़ हैं। उन्हें लगता है कि हम जैसे लोग उनके नेता का मनोबल तोड़ रहे हैं, लिहाजा अमृत कलश रास्ते में गिर गया तो उसका मुकदमा भी हम जैसों पर ही चलाया जाएगा।

आज़ादी के फौरन बाद सरदार पटेल ने अपने एक ऐतिहासिक भाषण में कहा था “अगर पाकिस्तान में स्वर्ग बन रहा है, तो हमें क्या दिक्कत होगी। उधर स्वर्ग बना तो ठंडी हवा इधर को भी आएगी।“ न्यू इंडिया के बारे में भी अपना यही विचार है। फरेब का ईंधन लेकर नफरत की पटरी पर दौड़ती बुलेट ट्रेन अगर विकसित भारत में पहुंची तो हम भी पहुंच ही जाएंगे।

मुझे लगता है कि जो लोग अमृतकाल ला रहे हैं, उस मार्ग में हम जैसे लोगों को रुकावट नहीं बनना चाहिए। कभी-कभार सरकार के कामकाज के बारे में अपनी राय जता देना और पांच साल में एक बार वोट डाल देना यही दो मुख्य रूकावटें हैं। मुझे लगता है कि इन गलतियों पर पुनर्विचार का समय लगभग आ चुका है।

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