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पत्रकार आनंद पांडे की अग्रिम जमानत बहस में दो पत्रकारों अभिषेक उपाध्याय और अमित मौर्या के केस बने मिसाल, पढ़ें कोर्ट ऑर्डर

राजस्थान हाईकोर्ट में पत्रकार आनंद पांडे और दो अन्य आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान, दोनों पक्षों ने देश के दो पत्रकारों के मामलों, अभिषेक उपाध्याय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सरकार और अमित मौर्या बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, का हवाला देकर अपने-अपने पक्ष को मज़बूत करने की कोशिश की।

याचिकाकर्ता पक्ष का तर्क: “पत्रकारीय अभिव्यक्ति पर अंकुश नहीं लगना चाहिए”

पत्रकार आनंद पांडे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महावीर मीणा ने दलील दी कि –

आरोपियों ने किसी भी व्यक्ति से धन की मांग नहीं की है, पुलिस ने राजनीतिक दबाव में आकर कार्रवाई की, और यह मामला पत्रकारिता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने का प्रयास है।

उन्होंने इस क्रम में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले Abhishek Upadhyay vs State of Uttar Pradesh (Writ Petition No. 402/2024) का हवाला दिया।

उसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “लोकतांत्रिक देश में पत्रकार को अपने विचार व्यक्त करने और सरकार की आलोचना करने का मौलिक अधिकार है। केवल किसी रिपोर्ट या विचार के आधार पर आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता।”

आनंद पांडे के वकीलों ने दलील दी कि –

यह मामला “राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित” है, याचिकाकर्ता ने कोई उगाही या दबाव डालने का प्रयास नहीं किया, और मीडिया रिपोर्टिंग के आधार पर कार्रवाई लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

राज्य पक्ष का प्रत्युत्तर: “पत्रकारीय आड़ में उगाही बर्दाश्त नहीं”

वहीं, राज्य की ओर से उपस्थित अभियोजन अधिकारी विनोद रॉय ने सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय Amit Maurya @ Amit Kumar Singh vs State of UP (2024: AHC:45884) का हवाला दिया।

उसमें न्यायालय ने यह स्पष्ट कहा था कि —

“अगर कोई पत्रकार अपने मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का दुरुपयोग निजी लाभ या दबाव डालने के लिए करता है, तो यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि अपराध है।”

अदालत ने उस मामले में टिप्पणी की थी कि –

“पत्रकारिता का दायित्व जनता तक सत्य लाना है, न कि अपने मंच का उपयोग भय दिखाकर आर्थिक लाभ उठाने के लिए।”

राज्य पक्ष ने कहा कि आनंद पांडे और उनके सहयोगियों द्वारा भड़काऊ खबरें प्रकाशित कर, उनसे करोड़ों रुपये की मांग की गई।

राज्य ने इसे “extortion under the garb of journalism” बताया और कहा कि इस तरह के अपराध को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कवच नहीं दिया जा सकता।

बहस के अन्य मुख्य बिंदु

पुलिस की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में तीनों आरोपियों की मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार से घनिष्ठता और ऑनलाइन भड़काऊ कंटेंट का उल्लेख था। अभियोजन ने कहा कि आरोपियों को धारा 353(2), 356(3), 308(4), 351(3), 61(2)(B) IPC और IT Act की धाराओं में नामजद किया गया है। बचाव पक्ष ने कहा कि एफआईआर में तथ्यों का अभाव है, और किसी प्रकार का “direct demand” या धन-लेनदेन साबित नहीं हुआ। अदालत ने माना कि जांच अभी जारी है और सबूतों के मद्देनज़र अग्रिम जमानत देना उचित नहीं होगा।

अदालत का निष्कर्ष

अदालत ने कहा कि—

“जब प्रकरण में गंभीर आरोप हैं और प्रारंभिक साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि पत्रकारिता की आड़ में आर्थिक लाभ उठाने की कोशिश हुई है, तो अग्रिम जमानत देना न्यायहित में नहीं होगा।”

इस आधार पर अदालत ने आनंद पांडे, वक़्कास खान और दिनेश दुबे की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी।

कोर्ट ऑर्डर की पूरी फाइल पढ़ें-

https://drive.google.com/file/d/1L36x9mtZ7OShcMq_iS1LqkhO_Ci4yyFm/view?usp=drivesdk

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