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आज के अखबार : अपने अंदर के ‘राम’ को जगाने की अपील और बहुविवाह के खिलाफ कानून एक ही दिन

ज्यादातर अखबारों में एसआईआर से संबंधित कोई खबर या सूचना पहले पन्ने पर नहीं है। बंगाल से घुसपैठियों के भागने का सच्चा-झूठा प्रचार सोशल मीडिया पर खूब है लेकिन नाम-पता बदलने के लिए कोई कागज नहीं चाहिए – की खबर आज द टेलीग्राफ में है

संजय कुमार सिंह

आज द टेलीग्राफ को छोड़कर मेरे सभी अखबारों में प्रधानमंत्री के अयोध्या दौरे की खबर या फोटो पहले पन्ने पर एक कॉलम से ज्यादा में छपी है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी की राजनीति का भाग है और मीडिया उसका प्रचार कर रहा है। कहा जा सकता है कि खबर तो है ही। सच्चाई यह है कि इस खबर के कई पहलू छोड़ दिए गए हैं और जो छपा है वह सरकार का प्रचार भर है। वैसे तो यह कोई नई बात नहीं है लेकिन कुछ प्रसंग उल्लेखनीय हैं। खबर में इनका जिक्र नहीं होना पूरी खबर नहीं देना है या आधी अधूरी खबर देना ही है। इसके अलावा, यह संयोग ही होगा कि आज ही खबर है कि असम सरकार बहुविवाह के खिलाफ कानून बना रही है और अब यह अपराध होगा तथा इसके लिए सात वर्ष तक का जेल प्रावधान होगा। आज ही प्रधानमंत्री की यह अपील छपी है, अपने भीतर के राम को जगाएंदि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, “सदियों पुराने घाव भर रहे हैं; अपने  भीतर के राम को जगाएं: मोदी”। मैं नहीं जानता प्रधानमंत्री किस घाव की बात कर रहे हैं जो सदियों से है और अब क्यों-कैसे भर रहा है। मैं जानता हूं कि यह उनकी राजनीति है और मैं यहां खबरों की बात करता हूं। आप कह सकते हैं कि इस रिपोर्ट का विषय खबरों की राजनीति है। इसमें अपने भीतर के राम को जगाने की बात आई तो मुझे याद आया कि राम की पूरी कहानी उनके पिता के बहुविवाह (एक से ज्यादा) के कारण है। मुझे गलत नहीं समझा जाए इसलिए स्पष्ट करता चलूं कि हमें जो बताया गया है वह मोटे तौर पर यही है कि राजा दशरथ की एक से ज्यादा शादी थी और राजा दशरथ के बेटों में राम सबसे बड़े थे इसलिए राजगद्दी उन्हें मिलनी थी पर राम की दूसरी मां चाहती थीं कि गद्दी उनके बेटे को मिले।  

राम की कहानी का मूल यही है और अपने अंदर के राम को जगाने का एक मतलब यह भी है कि उनकी तरह भलमनसाहत को जगाया जाये, पिता का आदेश या सौतेली मां की इच्छा खुशी-खुशी पूरी की जाए भले। इसका मतलब निर्दोष पत्नी के साथ बनवास हो। अभी मुद्दा राम की कहानी नहीं है पर बहुविवाह तो है। हमारे आदर्श राम पिता के बहुविवाह के कारण ही आदर्श हैं। वरना वही राजा बनते और वनवास का कोई मामला ही नहीं होता। अब इतने वर्षों बाद असम की भाजपा सरकार जो वाशिंग मशीन वाले मुख्यमंत्री के नेतृत्व में है बहुविवाह के खिलाफ ऐसा कानून ला रही है तो निश्चित रूप से पुराने संदर्भों की चर्चा बनती है पर वह मुझे किसी अखबार में प्रमुखता से नहीं दिखी। इसका रिवाज तो नहीं ही है। लेकिन प्रधानमंत्री की धार्मिक यात्रा और राजनीति खबर है तो खबर समग्रता में होनी चाहिए वरना प्रचार ही होगा और मैं यही बताना चाहता हूं कि आज भी अखबारों ने प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी का प्रचार ही किया है। तथ्य यह भी है कि अयोध्या के कल के कार्यक्रम में अयोध्या के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को नहीं बुलाया गया था। सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा और सरकार से शिकायत थी, फिर भी आज मूल खबर में यह सब नहीं है। अगर खबर की बात करूं तो आज द हिन्दू में पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है लेकिन अयोध्या की फोटो तीन कॉलम में छपी है और कैप्शन ही खबर है।

द हिन्दू ने असम की खबर को इस खबर के साथ लीड बनाया है। शीर्षक है, असम ने बहुविवाह के लिए जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान किया। उपशीर्षक है, “विधानसभा में विधेयक पेश, ‘महिलाओं की रक्षा और समाज को व्यवस्थित करने’ का प्रयास करता है; राज्य में रहने वाले वैसे लोग भी इसके तहत आएंगे जो राज्य के बाहर दूसरी शादी करते हैं लेकिन यह अनुसूचित जाति तथा छठी अनुसूची के क्षेत्रों में लागू नहीं होगा। जाहिर है, भाजपा नेता और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब लोगों से अपने अंदर के राम को जगाने और सदियों पुराने जख्मों के भरने की बात कर रहे हैं तो वाशिंग मशीन में धुले उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री बहुविवाह के खिलाफ कानून बनाकर, ‘महिलाओं की रक्षा और समाज को व्यवस्थित करने’ के प्रयास कर रहे हैं। मुझे लगता है कि इसका कारण यही है कि हमें बचपन में राजा दशरथ के बहुविवाह के बारे में तो नहीं बताया जाता है लेकिन मुसलमानों की चार शादियों के बारे में जरूर बताया जाता है। नतीजा यह होता है कि हम मुसलमानों को जानते हों या नहीं, उनकी चार शादियों के बारे में जरूर जानते हैं लेकिन अपने यहां की एक से ज्यादा शादियों पर चुप रहने का पाठ पढ़ चुके होते हैं। इसका असर खबरों और खबर लिखने वाले पत्रकारों-संपादकों पर भी दिखता है।

ऐसे में आज नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, प्रदूषण पर केंद्र गंभीर। मोटा-मोटी यह इंडियन एक्सप्रेस की कल की ही खबर है। आप इसे उसके बाद का विस्तार भी मान सकते हैं। प्रधानमंत्री के दौरे ने जब अखबारों में धर्म और आस्था की खबरों को पहले पन्ने पर ला ही दिया है तो नवोदय टाइम्स में चार कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, राष्ट्रपति मुर्मू ने मत्था टेका, भावुक हुईं सीएम रेखा गुप्ता। साथ छपी फोटो का कैप्शन है, गुरु तेग बहादुर साहिब के 350वें शहीदी दिवस पर मत्था टेकने पहुंची राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, सीएम रेखा गुप्ता व एलजी वीके सक्सेना। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, चुनाव आयोग अब निष्पक्ष नहीं रहा। ऐसी ही खबर द टेलीग्राफ की लीड है। लेकिन प्रधानमंत्री का दौरा हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए भी है और आज दूसरे अखबारों में (पहले पन्ने पर) एसआईआर पर खबर नहीं है जबकि एसआईआर तो छोड़िए मुंबई स्थित बीएमसी के चुनाव के लिए जो मतदाता सूची बनी है उसमें भी ढेरों गलतियां हैं। लाखों नाम एक से ज्यादा बार हैं और फर्जी वोटर की भरमार है। खबर उसकी भी पहले पन्ने पर तो नहीं है। देशबन्धु में राष्ट्रपति और शहीदी दिवस की खबर तो नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री की खबर चार कॉलम में है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री मोदी ने राम मंदिर में धर्म ध्वजा फहराई। नवोदय टाइम्स में यह दो कॉलम में टॉप पर है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रधानमंत्री की अयोध्या की खबर चार कॉलम की लीड है। शीर्षक प्रधानमंत्री के उच्च विचार को ही बनाया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स  में यह चार कॉलम की फोटो के साथ चार कॉलम की लीड है। शीर्षक से बताया गया है कि मोदी ने धर्म पताका फहराया और इस तरह अयोध्या परियोजना औपचारिक तौर पर पूरी हुई। मोहन भागवत ने कहा है और हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर लीड के साथ दो कॉलम की खबर है, राम मंदिर के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वालों को अब शांति मिली होगी क्योंकि मंदिर के ऊपर भगवा पताका फहराना इस मंदिर की औपचारिक पूर्णता का प्रतीक है। हालांकि, दिल्ली में प्रदूषण की खबर भी हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रमुखता से है। शीर्षक है, ‘बेहद खराब’ एक्यूआई का दौर 20 दिनों से जारी। अयोध्या की खबर इंडियन एक्सप्रस में भी हिन्दुस्तान टाइम्स वाली फोटो के साथ चार कॉलम की फोटो और चार कॉलम की ही लीड है। शीर्षक भी वही, प्रधानमंत्री का हेडलाइन मैनेजमेंट वाला – प्रधानमंत्री ने कहा, सदियों के जख्म ठीक हो रहे हैं  है, राम को देश से जोड़ा। 

एसआईआर का हाल – बंगाल में

द टेलीग्राफ में आज सरनेम (उपनाम), पता बदलने के लिए कोई कागज नहीं चाहिए; एसआईआर में पुराने ज़माने की ज़िंदगी समा गई – शीर्षक से खबर छपी है। कलकत्ता डेटलाइन से स्नेहमय चक्रवर्ती की इस खबर के अनुसार, झारग्राम के चंदबिला सबर पारा में 46 साल के अश्विनी मलिक को अपना एसआईआर एन्यूमरेशन फ़ॉर्म भरने में एक मुश्किल समस्या का सामना करना पड़ा। उनके डॉक्युमेंट्स में उनके पिता का नाम संभू मलिक लिखा है। लेकिन 2002 के इलेक्टोरल रोल में, उनका नाम संभू सबर लिखा है। आप जानते हैं कि 2002 की मतदाता सूची में यह नाम न सिर्फ़ अश्विनी के वोटर के तौर पर एनरोलमेंट के लिए बल्कि नागरिक के तौर पर उनके स्टेटस के लिए भी ज़रूरी है। एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि सबर समाज के लोग, जो मुख्य रूप से बंगाल और झारखंड के जंगल महल ज़िलों में रहने वाले आदिवासी समूह हैं, अक्सर आधिकारिक प्रक्रिया के दौरान अपने सरनेम को लेकर दिक्कतों का सामना करते हैं। इसका कारण यह है कि इनमें जरूरी कागजों या दस्तावेज के बिना अपने सरनेम बदलने का चलन है। स्थानीय बीएलओ (बूथ-लेवल ऑफिसर) और एक क्लब, चांद अबिला शिबाजी संघ के सदस्यों ने अश्विनी को कोर्ट में एफिडेविट जमा करने की सलाह दी, जिसमें कहा गया हो कि शंभू मलिक और शंभू सबर एक ही व्यक्ति हैं। कानूनी गलतियों के लिए उन्हें ₹200 देने पड़े। अगर नाम समस्या हो सकती है, तो गरीब और ज़्यादातर अनपढ़ सबरों के बीच पता भी समस्या हो सकती है। स्थानीय क्लब के सदस्य कौशिक मजूमदार ने कहा, “कई सबर अपने परिवारों के साथ रोजी-रोटी के लिए एक टोले से दूसरे टोले में जाते रहते हैं। वे अस्थायी, बस्तियों में बिना किसी कागज के रहते हैं। इससे पते की दिक्कत होती है।” खबर के साथ अखबार में झारग्राम के चांदबिला शिबाजी संघ क्लब में सबर समाज के सदस्यों की फोटो छपी है। इसमें वे एसआईआर के एन्यूमरेशन फॉर्म भर रहे हैं।

मुंबई में बीएमसी चुनाव के लिए बनी मतदाता सूची को लेकर हंगामा

मतदाता सूची पहले 14 नवंबर को जारी की जानी थी लेकिन 20 नवंबर को जारी की गई। बाद में देखा गया कि उसपर तारीख 14 नवंबर ही है। निश्चित रूप से यह एक तकनीकी गड़बड़ी है और मामूली नहीं है। लेकिन चुनाव आयोग इसे नहीं मान रहा है और कह रहा है कि यह विवाद निराधार है। जो भी हो, 20 नवंबर को बनी या जारी सूची पर 14 नवंबर की तारीख होने का क्या मतलब है और इससे संबंधित शिकायत निराधार नहीं हो सकती है। फिर भी इसे छोड़ दूं तो 1) ड्राफ्ट लिस्ट में लगभग 1.10 मिलियन (11 लाख) ऐसे मतदाताओं की पहचान हुई है जिनके नाम एक से ज़्यादा वार्ड में दर्ज हैं। 2) यह कुल ड्राफ्ट लिस्ट (~10.34 million वोटर) का लगभग 10.6% है। 3) विपक्ष (मुख्य रूप से शिवसेना यूबीटी के आदित्य ठाकरे) ने इस संख्या को “सिस्टमेटिक वोट चोरी” की साजिश का हिस्सा कहा है। 4) आरोप है कि कुछ पते “दुकान, शौचालय” आदि हैं, जहां एक ही पते पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के पंजीकरण हैं। इस संबंध में महाराष्ट्र चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि नगर निगम चुनावों के लिए सार्वजनिक की गई ड्राफ्ट सूची एक जुलाई 2025 की विधानसभा मतदाता सूची को आधार के रूप में उपयोग कर बनाई गई है। इस प्रक्रिया में “नामों या पतों में सुधार” की आपत्तियाँ-प्रस्ताव स्वीकार किए जा रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि यह एसआईआर है। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि कोई भी राजनीतिक दल मतदाता सूची में खुद बदलाव नहीं कर सकता है; सब सुधार निर्धारित प्रपत्रों और आधिकारिक प्रक्रिया से हो रहे हैं। जाहिर है इसकी मुश्किल प्रक्रिया है और इसमें समय लगेगा। चुनाव आयोग कह देता रहा है कि आवेदन नहीं आए या विपक्ष की भागीदारी नहीं रही। तथ्य यह है कि वह मतदाता सूची में नाम का दोहराव रोकने के लिए उपलब्ध सॉफ्टवेयर का उपयोग चुनाव आयोग नहीं कर रहा है। 

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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