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तो क्या दो सप्ताह पहले ही अप्रैल फूल बना गये उप्पी बाबू!

सहारा मीडिया में कब क्या जो हो जाये, इसके बारे में कोई कुछ नहीं कहा जा सकता। सब चीजें समय से ही होंगी, इसकी भी कोई गांरटी नहीं है। कुछ चीजें देर से तो कुछ चीजें पहले भी हो सकती हैं। जैसे वेतन। एक तो वेतन मिल ही नहीं रहा है और मिल भी रहा है तो देर से मिल रहा है। लेकिन सहारा के बिग बास उपेन्द्र राय ने इस बार अपने कर्तव्ययोगियों को समय से पहले ही ‘अप्रैल फूल’ का गिफ्ट देकर प्रसन्न कर दिया। मौका था, राष्ट्रीय सहारा की देहरादून यूनिट से जुड़े लोगों को प्रेरणा देने के लिये बुलाये गये ‘प्रेरणा सम्मेलन’ का।

सहारा मीडिया में कब क्या जो हो जाये, इसके बारे में कोई कुछ नहीं कहा जा सकता। सब चीजें समय से ही होंगी, इसकी भी कोई गांरटी नहीं है। कुछ चीजें देर से तो कुछ चीजें पहले भी हो सकती हैं। जैसे वेतन। एक तो वेतन मिल ही नहीं रहा है और मिल भी रहा है तो देर से मिल रहा है। लेकिन सहारा के बिग बास उपेन्द्र राय ने इस बार अपने कर्तव्ययोगियों को समय से पहले ही ‘अप्रैल फूल’ का गिफ्ट देकर प्रसन्न कर दिया। मौका था, राष्ट्रीय सहारा की देहरादून यूनिट से जुड़े लोगों को प्रेरणा देने के लिये बुलाये गये ‘प्रेरणा सम्मेलन’ का।

मायावती स्टाइल में मंच पर रिवाल्विंग चेयर पर अकेले ही विराजमान उपेन्द्र राय यूनिट से जुड़े लोगों को दर्शनलाभ दे रहे थे। दर्शनों से अभिभूत करने के बाद राय साहब ने सहारियन को इतिहास की किताबों में लिखे राजा-महाराजाओं के त्याग-धैर्य-साहस के किस्से सुनाकर मनोरंजन किया। मछली की आंख पर निशाने की तरह से अपने मतलब की बात राय के मुंह से सुनने को तैयार सहारियन की आंखो में जब चमक आई जब राय साहब से वेतन के मुद्दे पर बात रखनी शुरू की।

राय साहब ने कर्मचारियों को होली का मौका होने का एहसास कराते हुये अगले चार दिन में सेलरी मिलने और भविष्य में नियमित सेलरी मिलने का आश्वासन दिया। बिग बास के इस आश्वासन ने सहारियन के मुरझाये चेहरों पर कुछ राहत आई। लेकिन सहारियन को जब मार्च माह के अंत तक सेलरी के दर्शन नहीं हुए तो उन्हें 1 अप्रैल को समझ आया कि उप्पी बाबू दो सप्ताह पूर्व ही 1 अप्रैल वाला त्योहार मनाकर चले जा चुके हैं।

बहरहाल हालत यह है कि देहरादून यूनिट के कर्मचारियों के बच्चों के स्कूल की पढ़ाई केवल इस वजह ये छूट चुकी है कि सहाराकर्मी अप्रैल में होने वाले नये सेशन का कोर्स तक नहीं जुटा सके। जिल्लत की जिन्दगी गुजार रहे सहाराकर्मियों के लिये भले ही संस्थान के पास धन की कमी हो लेकिन संस्थान के बड़े अधिकारियों की सुख-सुविधा में किसी प्रकार की कोई कटौती नहीं की जा रही है। देहरादून यूनिट के नये सम्पादक के लिये चालीस हजार रुपये महीने की कार का प्रस्ताव बनाकर मुख्यालय को भेजा जा चुका है। प्रस्ताव की मंजूरी मिलते ही नये सम्पादक नई गाड़ी में घूमते नजर आयेंगे, लेकिन जिनके बल पर वह सम्पादक बने हैं, उनकी बदहाली पर सम्पादक की नजर जायेगी, इसकी उम्मीद कम है।

देहरादून से एक सहारा मीडिया कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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2 Comments

2 Comments

  1. deepak

    April 17, 2016 at 2:33 pm

    सेवा में
    भड़ास फॉर मिडिया
    पत्रकारों के हित के लिए इसे प्रकाशित करें

    बित्तीय संकट से जूझ रही सहारा मिडिया ग्रुप के सामने फिर एक नई संकट पैदा हो गयी है, अपने खून पसीने की बदौलत सहारा बिहार/झारखण्ड चैनल को ऊंचाई तक पहुँचाने वाले 200 फिल्ड रिपोर्ट्स दाने-दाने की मोहताज हो गए हैं, सहारा ने डेढ़ साल से इन्हें फुटी कौड़ी तक नहीं दी है, इसके पूर्व हड़ताल करने वाले नियमित स्टाफर्स को देर सबेर पैसे मिलने लगे हैं , लेकिन फिल्ड रिपोर्टर की और किसी का भी ध्यान नहीं है, इससे आजिज होकर आज से बिहार / झारखण्ड के तमाम फिल्ड रिपोर्टर्स हड़ताल पर चले गए है, सबकी एक ही बात, जब तक बकाये की भुगतान नहीं, तबतक काम बन्द, चैनल ने यह मान लिया है , फिल्ड रिपोर्टर्स सहारा के लोगो चमकाकर अपना गुजर बसर कर लेगा एवं साथ में बिज्ञापन के नाम पर चैनल के लिए वसूली भी करता रहेगा, बेसक इसमें कोई दो राय नहीं , इनमे इक्के-दुक्के लोग हो सकते हैं , जिनका एक मात्र काम वसूली है, लेकिन इन चंद लोगों के चलते ईमानदारी से पत्रकारिता करने वालों के सामने आर्थिक तंगी छा गयी , केबल की डिजिटायजेसन के चलते दोनों राज्यों में चैनल ब्लैक ऑउट हो चुकी है, बावजूद इसके इस पंचायत चुनाव में केवल बिहार से 3 करोड़ के बिज्ञापन निकालने का लक्ष रखा गया है, लेकिन हालात ऐसे हो गए है, कि सहारा के रिपोर्टर को देखते चुनाव लड़ रहे मुखियाजी छिपने लगे हैं.

  2. arun

    April 17, 2016 at 2:35 pm

    लगता है कि सहारा मीडिया के दिन बहुरने वाले नहीं … मुख्यालय, छपने वाले जिलों के बाद अब ब्यूरों खाली होने लगे | जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय सहारा इलाहाबाद में कार्यरत साधना मिश्रा और देवेन्द्र सिंह को देहरादून भेजे जाने कि चरचा है. इसी तरह शिव त्रिपाठी और रमाकांत श्रीवास्तव, डी.एन श्रीवास्तव को कानपुर भेजे जाने की. ये सभी २०-२२ साल से एक ही जगह पर डटे थे …वाराणसी से इलाहबाद भेजे गए नरेंद्र श्रीवास्तव का कांट्रेक्ट आगे बढ़ाने के बजाय उन्हें घर बैठा दिया गया… गौरतलब है कि इस ब्यूरों को पिछले २ साल में १९ ने बाय-बाय कर दिया…

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