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उत्तर प्रदेश

19 साल बाद फिर जिंदा हुआ अनुच्छेद 224A, इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच एडहॉक जज

रमेश कुमार-

भारत के संविधान के अनुच्छेद 224A जिसका अभी तक बहुत कम इस्तेमाल किया गया है और जो किसी भी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को यह शक्ति देती है कि मुकदमो की पेंडेंसी बढ़ जाने से वह प्रेसिडेंट की पूर्वानुमति से हाई कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश इच्छा से एडहॉक न्यायाधीश नियुक्ति किया जा सकता है! इस तरह नियुक्ति किये न्यायमूर्तियों के वेतन भत्ते सुविधाएं राष्ट्रपति द्वार तय किये जायेंगे और ये जज अपने कार्यकाल के दौरान सिटिंग जजो की तरह सशक्त होंगे!

अब तक आज़ाद भारत के न्यायिक इतिहास में तीन ऐसे मौके आये जब एडहॉक जज नियुक्ति किये गए-

  • 1972: Justice Suraj Bhan was appointed to the Madhya Pradesh High Court for one year to hear election petitions.
  • 1982/1983: Justice P. Venugopal was appointed to the Madras High Court, with a one-year renewal in 1983.
  • 2007: Justice O.P. Srivastava was appointed to the Allahabad High Court for the Ayodhya title suit.
  • 3 फरवरी 2026: पांच न्यायमूर्तियों को दो वर्ष हेतु इलाहाबाद हाईकोर्ट का एडहॉक जज नियुक्ति किया गया है! गौरतलब है कि ये पांचों जज, बेंच यानी डिस्ट्रिक्ट जज से हाइकोर्ट के जज बने थे!

तहरीर, चिक एफआईआर व जीरो एफआईआर?

अगर फुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है -बशीर बद्र

जब कोई आपराधिक घटना घटित होती है तो पीड़ित अथवा उसका कोई सगा संबंधी या अन्य व्यक्ति उक्त आपराधिक घटना के संबंध में एक लिखित प्रार्थना पत्र संबंधित थाना अध्यक्ष को देता है जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में “तहरीर” कहा जाता है।

ऐसी तहरीर के आधार पर चिक रसीद रजिस्टर पुलिस प्रारूप संख्या 341 पर प्राथमिकी दर्ज की जाती है। इस प्रकार दर्ज की गई प्राथमिकी को ही “चिक F.I.R.”कहा जाता है और तहरीर में दी गई घटना के आधार पर धाराएं लगाई जाती हैं। चिक एफ आई आर तीन प्रतियों में तैयार की जाती है जिसकी मूल प्रति यानी चिक एफ आई आर की पहली कॉपी संबंधित मजिस्ट्रेट को भेजी जाती है चिक एफ आई आर की दूसरी प्रति प्राथमिकी दर्ज कराने वाले इंफोर्मेन्ट को दी जाती है और चिक एफआईआर की तीसरी प्रति थाने में सुरक्षित रखी जाती है। इस संबंध में उत्तर प्रदेश पुलिस रेगुलेशन के पैरा 97, 98 एवं 99 में स्पष्ट प्रावधान किया गया है।

जब पीड़ित कोई तहरीर नहीं देता है बल्कि मौखिक रूप से घटना का बयान करता है, तो उसके मौखिक बयान के आधार पर चिक एफ आई आर दर्ज की जाती है। जब घटना की सूचना किसी ऐसे थाने पर दी जाती है, जिसकी अधिकारिकता में घटना क्षेत्र या घटनास्थल नहीं आता है तो ऐसी स्थिति में “जीरो एफआईआर” दर्ज की जाती है इसमें केस क्राइम नंबर 0जीरो डालकर, उसे उस थाने पर भेज दी जाती है जिस थाने के अंतर्गत घटनास्थल आता है।

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