अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अवाम को गुमराह करता सहाफियों का गिरोह

सत्ता का अपना एक चरित्र होता है और सत्ताधारियों का अपना एक रंग। चुंकि खबरनवीसों और सहाफियों को स्वभावत सत्ता के करीब रह कर काम करने का अवसर मिलता है, ऐसे में उन पर सत्ता के चरित्र और सत्ताधारि यों के रंग का असर न पड़े हो ही नहीं सकता। आप होली में होली खेलने वाले गिरोहों के बीच रहे और आप पर रंग न उड़े यह भला कैसै मुमकिन है। निहितार्थ यह कि कुछ लोग मीडिया की आजादी को लेकर मोदी हुकूमत पर इसके उत्तपति काल से ही हमलावार है, और सीधे तौर पर कह रहे है देश की मीडिया बंट चुकी है, और यह बंटवारा स्पषट रूप से दिखाई दे रही है, और इन्हीं लोगों के प्रचंड हमलों को झेलते हुये इनकी आंखों के सामने ही मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री से हिन्दुस्तान के वजीरे आला तक पहुंचे है।

तो क्या ये सहाफी शुरु से ही मोदी का गलत आकलन कर रहे थे या फिर जानबूझ कर लोगों को गुमराह कर रहे थे, और आज भी कर रहे हैं ? यह सवाल इस लिए मौजू है क्योंकि कि विगत कुछ समय कुछ सहाफियों द्वारा मुल्क में अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा होने का राग लगातार अलापा जा रहा है। ऐसे में अभिव्यक्ति की आजादी को सही संदर्भ में समझने के साथ साथ सहाफियों के अधिकार के हकीकत की पड़ताल करने की जरूरत है।

गौरतलब है कि भारतीय संविधान में मीडिया की आजादी के बारे में अलग से कुछ नहीं कहा गया है। 19 ए के तहत अभिव्यक्ति की आजादी के जो अधिकार एक आम शहरी को हासिल है वही अधिकार मीडिया या फिर मीडियामैन को भी हासिल है। जब कोई शोर मचाता है कि मीडिया की आजादी खतरे में है तो इसका साफ मतलब है कि इस मुल्क के हर शहरी की आजादी खतरे में है। नाम निहाद कुछ चुनिंदा इलेक्ट्रॉनिक सहाफियों का गिरोह लगातार शोर मचा रहा है कि मरकजी हुकूमत उन्हें लोगों तक खबरों की रसाई करने से रोक रही है। उनके अभिव्यक्ति के हक को उनसे छिन रही है, उनके काम में अड़ंगा डाल रही है और उन्हें हर तरह से परेशान कर रही हैं। आज मरकजी हुकूमत सीधे मीडिया संस्थानों के मालिकों को गिरफ्त में लेकर किसी भी मीडिया मैन को बाहर का रास्ता दिखा रही है। ऐसे में उनके लिए काम करना दुस्वार हो गया है और उनकी अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा पैदा है।

अभिव्यक्ति की आजादी के इन नाम निहाद मुजाहिदीन के दावों की हकीकत को समझने से पहले सत्ता के यूनिवर्सल चरित्र को समझना जरूरी है। सत्ता का सीधा सा फंडा है, ताकत और उस ताकत का निरंतर इस्तेमाल। सैद्धांतिकतौर पर इस ताकत का इस्तेमाल अधिकतम लोगों की बेहतरी के लिए करने की बात लगभग सभी सियासी चिंतकों ने कही है, और अखलाकी नजरिये से सत्ता से यही उम्मीद भी की जाती है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर ऐसा नहीं होता है। इसे उदाहरण से समझा जा सकता है, जब फ्रांस में पहली बार 1789 में मध्यम वर्ग के लोग राजतंत्र के खिलाफ क्रांति करते हैं और राजा लुई 16 वां को उसके खानदान समेत मौत के घाट उतार कर शहरीयत पर मुस्तमल एक नई व्यवस्था का कायम करते हैं तो उसमें पहले के तमाम राजशाही कानूनों को न सिर्फ पूरी तरह से खारिज किया जाता है बल्कि शहरीयत पर मुस्तमल हकूक की हिफाजत के लिए धड़ अलग करने वाली गिलोटिन जैसे खतरनाक हथियार का इजाद भी किया जाता है। फिर तथाकथित हक आजादी का रहबर जज राब्सपीयर की कियादत में एक के बाद एक कई हजार लोगों को गिलोटिन पर सिर्फ इसलिए चढ़ा दिया जाता है कि राजशाही के खात्मे के बाद शहरीयत पर मुस्तमल नई व्यवस्था जो अभिव्यक्ति की आजादी की वकालत करती थी को बरकरार रखा सके।

ठीक इसी तरह जब 1917 में ब्लादीमीर इलीयच उलियानोव (लेनिन) के नेतृत्व में रूस में बोलशेविकों की जमात असलहाबंद होकर सत्ता पर काबिज होती है और कामगारों के हक में इस तथाकथित इंकलाब की मुखालफत करने वाली सभी ताकतों को नेस्तनाबूद कर देती है। इंकलाब की हिफाजत के लिए बहुत बड़ी तादाद में बदस्तूर उन लोगों का कत्तेआम किया जाता है, जो मजदूरवादी नजरियात और खासतौर से लेनिनवादी बोलशेविक इंकलाब को नाजायज ख्याल करते थे और अभिव्यक्ति की आजादी की वकालत करते थे। बाद के दिनों में स्टालिन ने इस मुहिम को अपने तरीके से और भी क्रूरता के साथ चलाया। यानि मुखतलफ नजरियात के लोगों की हलाकत का सिलसिला चलता रहा।

एडोल्फ हिटलर की कियादत में नाजीवादियों ने भी जर्मनी से उनलोगों का सफाया करने में कोई कोताही नहीं बरती जो उनकी धारा से इतर खयाल रखते थे। हिटलर का प्रचार मंत्री गोवल्स साफतौर पर कहा करता था कि मैं प्रेस को प्यानों की तरह बजाता हूं। यानि प्रेस वही राग अलापता है जो मेरी उंगलियों से निकलते हैं।

हिन्दुस्तान में मीडिया और मीडिया की आजादी के ख्याल ब्रतानिया हुकूमत के दौरान ही परवान चढ़ी थी। हिक्की से लेकर आजादी तक का दौर ब्रतानिया हुकूमत द्वारा प्रेस का गला दबाते रहने का दौर रहा है। हालांकि ‘व्हाइट बर्डेन थ्योरी’ के वाहक अंग्रेज मुखतलफ विचारधारा वाले लोगों की हलाकत से तब तक गुरेज करते रहे। हुकूमत की मुखालफत करने वाले प्रेसों का मुंह बंद करने के लिए अपनी कारोबारी फितरत के मुताबिक उन्होंने अधिक से अधिक जुर्माना लगाने की नीति अख्तियार की।

आजाद भारत के शुरुआती दौर में नव तामीराती जज्बे की वजह से प्रेस और हुकूमत के दरमियान बेहतर संबंध रहे। मगरब परस्त पंडित जवाहर लाल नेहरू अभिव्यक्ति की आजादी के प्रबल समर्थक थे और उनका करिश्माई चरित्र भी उस वक्त सहाफत की दुनिया के नामचीन हस्तियों को मुतासिर किये हुये थे। लेकिन इमरजेंसी के दौर में इंदिरा गांधी ने अभिव्यक्ति की आजादी को पूरी तरह से धूल धूसरित कर दिया। अखबारों के दफ्तरों पर पैनी निगाहें रखी गई, सार्वजिनक सभाओं को मुस्तरद किया गया, और हर उस शख्स को सलाखों के पीछे धकेलने की कोशिश की गई जो श्रीमती गांधी कि कियादत में कांग्रेस की कारगुजारियों के खिलाफ मुंह खोलने की जुर्रत कर रहा था।

इन तमाम बातों का जिक्र करने का एक मात्र मकसद यह बताना है कि सत्ता का एक खास चरित्र होता है। अपनी मुखालफत के लिए उसके पास कोई जगह नहीं होती है। कबीर का निंदक नियरे राखिये का फलसफा सत्ता के फलसफे के ठीक विपरित होता है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि सत्ता खुद से संचालित होने वाली चीज नहीं है, इसे संचालित करने के लिए कुछ लोग चाहिए होते हैं और इसके संचालन की कुर्सी तक पहुंचने के लिए एक निश्चित रास्ते पर समय, काल और परिस्थिति के अनुसार चलना पड़ता है।

मसलन, मुगलों के दौर में सत्ता पर दाखिल खारिज करने के लिए अपनों का लहू बहाना जरूरी था। षडयंत्रों और साजिशों के मुसलसल सिलसिले के बाद एक ही खानदान के कई दावेदार सर्वोच सत्ता के लिए आपस में भीड़ते थे, लहू की नदियां बहाने के बाद इसको हासिल करके अपने लोगों को इसका हिस्सेदार बनाकर कुछ दान-पुण्य करते हुये अवाम में मकबूलियत हासिल करते थे। मध्ययुगीन भारत में सत्ता हासिल करने की इस पूरी प्रक्रिया में अभिव्यक्ति की आजादी जैसे फलसफा का दूर-दूर तक अता-पता नहीं था। सत्तासीन लोग इस तरह के लोगों को सहन करने के लिए कतई तैयार नहीं थे। जरा सा शक वो सुबहात की हालत में किसी भी शख्स को उसके अहलखाना के साथ जहन्नुम रसीद कर दिया जाता था।

1776 में अमेरिका की आजादी और 1789 में फ्रांसीसी क्रांति के साथ ही दुनिया भर में जम्हूरी इंकलाब की शुरुआत हुई और इसके साथ ही शहरीयत और अभिव्यक्ति की आजादी को पूरे आलम में मजबूती से स्थापित करने की मुहिम चल निकली। मध्ययुग की राजशाही सत्ता के फससफों के मद्द मुकाबिल जम्हूरियत और आजादी के हक में बड़े-बड़े फलसफे दिये गये। मांटेस्क्यू ने व्यवस्थापिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के तौर पर सत्ता को विकेंद्रित करने का फलसफा दिया और फिर दुनिया इस पर गामजन हुई। इस दौर में जनता की वकातल करने की वजह से ही सहफात ने चौथे खंभे का दर्जा हासिल किया, हालांकि अंदरखाते विचारधारा के आधार पर सहाफियों के दरमियान खेमेबाजी चलती रही, जो आज भी चल रही है।

पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई पटना में एक कार्यक्रमके दौरान चीख चीखकर कह रहे थे कि देश के पत्रकार अब दो गिरोहों में लामबंद हैं। एक गिरोह पीएम मोदी और उनकी नीतियों के हक में खड़ा है तो दूसरा गिरोह उनकी मुखालफत कर रहा है। अब निरपेक्ष पत्रकारों के दिन लद गये हैं। कुछ इसी तरह की बात वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी एबीवीपी से निकाले जाने के बाद लगातार कह रहे हैं। रवीश कुमार भी इसी लाइन पर अपनी टीआरपी बनाये रखने की कोशिश करते हुये निडर भारत बनाने की बात कर रहे हैं। इस अघोषित गिरोहबंदी के हक में पत्रकारों और चिंतकों का एक समूह खड़ा है।यह समूह डेमोक्रेटिक वसूलों की बात करता है, धर्मनिरपेक्षता की बात करता है और अभिव्यक्ति की आजादी की बात करता है। हालांकि यह समूह अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तय नहीं करता है।

आजादी के आला पैरोकार और पाश्चात्य चिंतक जॉन स्टुर्अट मिल ने आजादी के हक में वकालत करते हुये इसकी सीमा भी तय की थी। अपनी पुस्तक ‘ऑन फ्रीडम’ में उसने लिखा है, आजादी से अच्छी कोई चीज नहीं होती, लेकिन व्यक्ति तभी तक आजाद है जबतक कि उसकी आजादी किसी अन्य व्यक्ति की आजादी में बाधा नहीं बनती।अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मुल्क को टुकड़े-टुकड़े करने का नारा लगाने का अधिकार किसी को क्योंकर मिलना चाहिए इस सवाल पर यह अभिव्यक्ति की आजादी की पैरोकारों का यह गिरोह पूरी तरह से खामोशी अख्तियार कर लेता है। लेकिन जब इनकी नौकरी पर आंच आती है तब तुरंत देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे का धुन छेड़ देते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि इनके इस धुन पर अब नाचेगा कौन ?

मीडिया कामगारों का एक बड़ा तबका दूर दराज के कस्बों और शहरों और देहातों में चप्पल घिस रहा है। इनमें ज्यादातर लोग आर्थिकतौर पर अनिश्चितता की स्थिति में काम कर रहे हैं। मोटी सैलरी पर पलने वाले तथाकथित अभिव्यक्ति की आजादी के जेहादियों ने कभी इनके बारे में मीडिया माध्यमों में लिखने या फिर इन पर बात करने की जुर्रत की। इतना ही नहीं इनके कार्यरत रहते हुये खुद इनके मीडिया हाऊसों से कई लोगों को कॉस्ट कटिंग के नाम पर पैदल कर दिया गया, लेकिन इन लोगों ने न सिर्फ अपने लब सील लिये, बल्कि टीम मैनेजमेंट के नाम पर इस तरह कार्यों का तावन भी किया। पंडित नेहरू के नाम पर सेक्यूलरिज्म खेती करके अपना चूल्हा चलाने वाले इन सहाफियों को डेमोक्रेसी के संदर्भ में कहे गये नेहरू के यह अल्फाज भी याद नहीं रहे कि एक भूखे व्यक्ति के लिए जनतंत्र का कोई मतलब नहीं होता।

मजे की बात तो यह है कि कब ये अपने सहाफी के किरदार से निकलकर डिक्टेटर बनकर अवाम द्वारा चुनी गई हुकूमत को ही डिक्टेड करने की कोशिश करने लगते हैं खुद इन्हें भी पता नहीं चलता। यह भूल जाते हैं कि सरकार का चयन हर पांच साल पर यहां की जनता करती है जबकि ये सिर्फ मासिक दरमाहा के एवज में किसी मीडिया हाऊस की नौकरी बजाने का काम करते हैं। जितना इनको अपनी बात कहने का हक है उतना ही मीडिया हाऊसों के मालिक को भी इनको पैदल करने का हक है। यदि ये लोग इसे अभिव्यक्ति की आजादी के लिए खतरनाक करार देते हुये एक सुर से टर्राते हैं तो, इनके टर्राहट पर हर नुक्ता नजरिया से रोशनी डालने का हक एक अदने से व्यक्ति को भी है।

दरहकीकत सोशल मीडिया के विस्तार ने हर शख्स को एक सहाफी बना दिया है। हर रोज असंख्य रिपोर्ट, आलेख और टिप्पणियां सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट किये जा रहे हैं। एक तरह से सोशल मीडिया ने गिरोहबाज सहाफियों के वर्चस्व को चकनाचूर कर दिया है। विभिन्न धंधों और पेशों के लोग सोशल मीडिया का कारगर इस्तेमाल अपने-अपने तरीके से सच्चाई को सामने लाने और साथ ही सच्चाई पर पर्दा डालने के लिए कर रहे हैं। एक तरह से सोशल मीडिया ने लोगों को सच और झूठ की परख करने के लिए बेहतर तरीके से प्रशिक्षित भी किया है। अब कोई यह कह कर लोगों को गुमराह नहीं कर सकता है कि हुकूमत उनकी अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट रही है। सोशल मीडिया पर काबू पाना किसी भी हुकूमत के बूते की बाहर की बात है।

विद्रोह और क्रांति में बस एक डग का फासला होता है।जब कोई क्रांति वर्तमान हुकूमत के द्वारा दबा दी जाती है तो वह विद्रोह होता है और जब कोई विद्रोह तात्कालिक व्यवस्था को ध्वस्त करते हुये किसी नये व्यवस्था की जानब गामजन होती है तो वह क्रांति कहलाती है। इसे भारत में पहली आजादी की लड़ाई यानि 1857 के सिपाही विद्रोह से समझा जा सकता है। अंग्रेज लोग इस लंबे समय तक विद्रोह कहते रहे, क्योंकि अपनी जंगी सलाहियतों का इस्तेमाल करते हुये इसे बड़ी क्रूरता से दबाया था और अपने सरकारी गजटों में इसे लगातार विद्रोह की करार देते रहे, जबकि भारतीय चिंतक और इतिहासकार इसे 1857 की क्रांति के रूप में चित्रित करते रहे। तात्पर्य यह कि इतिहास हुक्मरानों के इशारे पर लिखे जाते रहे हैं। फिलहाल मोदी मरकज में इकतदार में है,और नाम निहाद सेक्यूलरवादी सहाफियों के गिरोह का एक मात्र धर्म मोदी को फिर से सत्ता में आने से रोकना है, लेकिन इसके लिए उन्हें सहाफत को गुमराह करने का हक नहीं दिया जा सकता है।

लेखक आलोक नंदन वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क alok.nandan72@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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