Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

टीवी

सवाल पूछने भर से संतत्व काफूर हो रहा है तो योगत्व की प्रभावकारिता समझना आसान है…

पुण्य प्रसून और रामदेव विवाद : जब संत व्यापारी हो जाए तो सवाल उठेंगे ही… योग गुरू बाबा रामदेव जी पर मेरी गहरी आस्था है इसलिए नहीं कि वे हिन्दू संत हैं, गोया कि देश-दुनिया में भारतीय योग और स्वदेशी का ब्राण्ड बन चुके हैं. बाजार पतंजलि के उत्पादों से इस कदर भर गया है कि हिंदुस्तान लीवर जैसी कंपनियों के छक्के छूट गए हैं। बाबा की आलोचना को भी मैं दरकिनार करता आया हूं तो इसीलिए क्योंकि दुनिया की नजरों से तो भगवान भी नहीं बच सके थे, बाबा रामदेव तो महज एक इंसान हैं।

पुण्य प्रसून और रामदेव विवाद : जब संत व्यापारी हो जाए तो सवाल उठेंगे ही… योग गुरू बाबा रामदेव जी पर मेरी गहरी आस्था है इसलिए नहीं कि वे हिन्दू संत हैं, गोया कि देश-दुनिया में भारतीय योग और स्वदेशी का ब्राण्ड बन चुके हैं. बाजार पतंजलि के उत्पादों से इस कदर भर गया है कि हिंदुस्तान लीवर जैसी कंपनियों के छक्के छूट गए हैं। बाबा की आलोचना को भी मैं दरकिनार करता आया हूं तो इसीलिए क्योंकि दुनिया की नजरों से तो भगवान भी नहीं बच सके थे, बाबा रामदेव तो महज एक इंसान हैं।

लेकिन इस भरोसे पर तब कुठाराघात हुआ जब खबर आई कि योग गुरु से महज एक सवाल पूछने के आरोप में देश के ख्यातलब्ध पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की नौकरी चली गई. हो सकता है यह महज कयास भर हो. क्योंकि प्रसूनजी ने अपने इस्तीफे में ऐसी कोई वजह नहीं लिखी और न ही उनके मीडिया हाउस ने कोई स्पष्टीकरण दिया है. पर कुहांसे के जो बादल देश के आम मन में कुछ सालों से घिर आए हैं, उसी के मुताबिक इंटरव्यू में बाबा रामदेव से यह सवाल हुआ कि आपने टैक्स बचाने के लिए ट्रस्ट बना लिया..? सवाल सही था इसलिए वैसे ही जवाब की उम्मीद भी थी लेकिन जब प्रसूनजी ने सवाल के साथ यह जोड़ दिया कि स्वदेशी की बात करने वाले बाबा महंगी कार और चार्टर प्लेन में घूमते हैं, तब योग-गुरु उखड गए, फिर भी पतंजलि ग्रुप के जनक ने ऐसी लम्बी सफाई दी कि आरोप बेसिर-पैर का लगने लगा!

हालांकि प्रसून जी ने वही सवाल उठाया था जो बाबा के लाखों प्रशंसक या आलोचकों के मन में यदा-कदा घुमडता रहता है. किसी संत का आश्रम जब कार्पोरेट घराने में तब्दील हो जाए या 11 हजार करोड़ चैरिटी में खर्च कर रहा हो, उससे इसकी सफाई मांगने या देने में क्या हर्ज होना चाहिए भला. वैसे योग गुरु ने जो सफाई दी, उसने ऐसे आरोप की धज्जियां उड़ाकर रख दी। लेकिन बात बिगड़ती चली गई. दरअसल पत्रकारिता को बाजार के अधीन करने या मान लेने का जो षड्यंत्र पैर पसार रहा है, ताज़ा विवाद भी इसी की उपज है.

प्रसूनजी तो आज के शिकार हैं, नवभारत रायपुर के संपादक स्वर्गीय बबन प्रसाद मिश्र को महज इसलिए इस्तीफा देना पडा था क्योंकि उन्होंने फ्रण्ट पेज पर ब्राम्ही आंवल केश तेल का विज्ञापन देने का विरोध किया था. तब मैं ट्रेनी हुआ करता था। मिश्रजी का मानना था कि पहले पेज पर खबरों का अधिकार बनता है, विज्ञापन का बाद में. सबसे तेज चैनल होने का दावा करने वाले न्यूज चैनल आजतक को पतंजलि ग्रुप करोड़ों के विज्ञापन देता है इसलिए दबाव तो आना ही था. प्रबंधन ने पहले प्रसूनजी के प्राइम टाइम बुलेटिन ’10तक’ को छोटा किया और उसके बाद बाजपेईजी ने सीधे इस्तीफा ही सौंप दिया. सुना है कि शवासन करने से मन चित्त और शांत रहता है, गुस्सा नही आता, फिर बाबा रामदेव दुर्वासा श्रृषि क्यों बन गए. संत तो बड़े उदार दिल के होते हैं. सिर्फ एक सवाल पूछनेभर से यदि संतत्व काफूर हो रहा है तो यह समझना आसान है कि योगत्व कितना प्रभावकारी होता है..!

रवीश कुमार जी ने कभी कहा था कि जिस लोकतंत्र में सवाल पूछना मना हो जाए, वह मरने लगता है. यहां मैं एनडीटीवी मीडिया हाउस के दृष्टिकोण की तारीफ करना चाहूंगा जिसने सरकारी—तोप से डरे बगैर, टीआरपी में सबसे नीचे गिर जाने के बावजूद रवीशजी की नौकरी नही खाई और उन पर भरोसा बनाये रखा हुआ है. एनडीटीवी से मेरे वैचारिक मतभेद हैं, बावजूद इसके मुझे यह चैनल सबसे ज्यादा पसंद है क्योंकि यहां सवाल उठाने की आजादी है, जनसरोकारों से जुडा चैनल लगता है.

एक दौर 1975 में इमरजेंसी का था. मीडिया घरानों में सरकारी अफसर पत्रकार बनकर बैठे हुए थे. तब बीबीसी का एक इंटरव्यू प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ तय हुआ. यह पहला मौका था जब ‘गूंगी गुडिया’, लोहिया जी ने इंदिरा गांधी को यही नाम दिया था, मीडिया के सवालों का जवाब देने आ रही थीं. पीएम निवास पर बीबीसी की टीम तैयार थी. अचानक इंदिराजी आईं और गुस्से में बोलीं, आपको यहां किसने बुलाया..आप जा सकते हैं.! बाद में मार्क टुली ने अपनी एक पुस्तक में खुलासा किया कि इंदिराजी बीबीसी के कई सवाल खड़े करने से नाराज थीं लेकिन हमने सिर्फ अपना फर्ज अता किया था क्योंकि देश उनसे कई सवालों के जवाब मांग रहा था.

तो चाहे मार्क टुली रहे हों, चाहे वो रवीश जी हों, प्रसून जी हों या बस्तर के सांई रेड्डी, सवाल आज भी जिंदा हैं और उसे पूछने वाले पत्रकार भी. सत्ता के सामने जो झुके हैं या रेंग रहे हैं, वे पत्रकार नही हैं. कल शाम को ही मैं सरकार के एक कैबिनेट स्तर के नेता के साथ था. फोन पर एक पत्रकार से बतिया रहे थे. पत्रकार एक ही सवाल बार-बार पूछ रहा था. अंततः नेता जी ने भद्दी सी गाली देते हुए फोन काट दिया. फिर मेरी ओर मुखातिब होते हुए बोले, अब आप जैसे लोग मीडिया छोड़ेंगे तो ऐसे ही चिरकुट राज करेंगे. बात अंदर तक हिला गई थी लेकिन मन खदबदा रहा है कि सवाल पूछना इतना बुरा क्यों लगता है..!

लेखक अनिल द्विवेदी छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09826550374 के जरिए किया जा सकता है.

पुण्य प्रसून द्वारा रामदेव से किए गए सवाल से संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

संबंधित खबरें…

xxx

xxx

Local News Community
2 Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन