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बाबा रामदेव से मुश्किल सवाल पूछने के कारण पुण्य प्रसून बाजपेयी की नौकरी गई

मीडिया मालिकों द्वारा मोदी भक्ति में लीन होते जाने के इस दौर में खरी बात कहना-पूछना भी गुनाह बन गया है. खबर है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी की आजतक न्यूज चैनल से इसलिए छुट्टी कर दी गई क्योंकि उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बाबा रामदेव से कुछ मुश्किल सवाल पूछ लिए थे. इस सवाल से रामदेव भड़क गए थे. सूत्रों का कहना है बाद में बाबा ने आजतक के मालिकों से संपर्क साधा और चैनल को दिए जाने वाले सारे विज्ञापन बंद करने की धमकी देते हुए पुण्य प्रसून बाजपेयी को सबक सिखाने हेतु दबाव बनाया.

मीडिया मालिकों द्वारा मोदी भक्ति में लीन होते जाने के इस दौर में खरी बात कहना-पूछना भी गुनाह बन गया है. खबर है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी की आजतक न्यूज चैनल से इसलिए छुट्टी कर दी गई क्योंकि उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बाबा रामदेव से कुछ मुश्किल सवाल पूछ लिए थे. इस सवाल से रामदेव भड़क गए थे. सूत्रों का कहना है बाद में बाबा ने आजतक के मालिकों से संपर्क साधा और चैनल को दिए जाने वाले सारे विज्ञापन बंद करने की धमकी देते हुए पुण्य प्रसून बाजपेयी को सबक सिखाने हेतु दबाव बनाया.

चर्चा है कि प्रबंधन ने आनन-फानन में बैठक कर पुण्य प्रसून बाजपेयी को तलब कर लिया और उनसे जवाब मांगा गया. पुण्य प्रसून बाजपेयी के दस्तक नामक बुलेटिन को भी छोटा कर दिया गया. अंतत: ऐसा माहौल क्रिएट किया गया जिससे पुण्य प्रसून बाजपेयी के लिए काम करना मुश्किल हो गया. तब उन्होंने प्रबंधन को इस्तीफा थमा दिया.

पुण्य प्रसून इसके पहले भी आजतक छोड़ चुके हैं. वे तब सहारा और जी न्यूज की यात्रा करते हुए दुबारा आजतक लौटे थे. कहा जा रहा है कि पुण्य कई न्यूज चैनलों के मालिकों के संपर्क में हैं. उनकी बातचीत एबीपी न्यूज, इंडिया न्यूज समेत कई चैनलों के कर्ताधर्ताओं से चल रही है. फिलहाल आजतक न्यूज चैनल का कोई भी शख्स पुण्य प्रसून के इस्तीफे को लेकर कुछ भी आन द रिकार्ड बोलने के लिए तैयार नहीं है. भड़ास ने पुण्य प्रसून को फोन कर उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन उनने फोन नहीं उठाया.

पुण्य प्रसून बाजपेयी टीवी के ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें राइट विंग के नेता आंखों की किरकिरी के रूप में देखते हैं. पुण्य प्रसून बेबाक और तीखा बोलने के लिए जाने जाते हैं. नेता उनके सामने बोलते-इंटरव्यू देते खुद को असहज महसूस करने लगते हैं. आजकल की भक्ति पत्रकारिता के दौर में पुण्य प्रसून जैसे बेबाक पत्रकार थोड़े-से ही हैं जिन्हें सत्ता और प्रबंधन का गठजोड़ मिलकर किनारे लगा देना चाहता है.

बाबा रामदेव से वो कौन-सा तीखा सवाल पुण्य प्रसून बाजपेयी ने पूछ लिया जिसके कारण उनकी नौकरी चली गई… जानने के लिए नीचे दिए वीडियो लिंक पर क्लिक करें और वीडियो को बारह मिनट पैंतालीस सेकेंड से देखना शुरू करें….

https://www.youtube.com/watch?v=15WTQguDAxE&t=769s

पुण्य प्रसून ने पूछा- किसी पत्रकार ने इन दस्तावेजों को क्यों नहीं प्रकाशित या प्रसारित किया?

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जब रविशंकर प्रसाद चिल्लाने लगे पुण्य प्रसून वाजपेयी पर!

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पुण्य प्रसून वैसे तो ऐसे ही हैं, लेकिन कभी-कभी चुपचाप अपना काम कर जाते हैं

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पत्रकार अब लेफ्ट-राईट विचारधारा छोड़ कर नेता बनते जा रहे हैं : पुण्य प्रूसन बाजपेयी

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4 Comments

4 Comments

  1. Aazad Bharti

    March 7, 2018 at 11:47 am

    सत्ता के भोंपू के तौर पर ‘‘गोदी मीडिया’’ का तमगा हासिल कर चुके कारोबारी मीडिया जगत में सरोकारों और संवेदनाओं का कोई महत्व कहां रह गया है। ‘‘आज तक’’ लाख निष्पक्षता और तटस्थता के दावे करे लेकिन पुण्य प्रसून वाजपेयी की रूख्सती के बाद इस सच्चाई पर मुहर लग गई है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता करने वाले बडे बडे मीडिया ग्रुप पूरी तरह कारोबारी रंग में रंग चुके हैं। टीवी टुडे ने पिछले दिनों एकंर्स की भूमिका पर कटाक्ष करने वाली एक महिला पत्रकार को भी बाहर का रास्ता दिखाया था। अब पुण्य प्रसून वाजपेयी के अलग होने ने साबित कर दिया है कि जर्नलिज्म मिशन के बजाय बिजनेस बन चुका है। टीवी टुडे ग्रुप भी अछूता नहीं है।
    पुण्य प्रसून वाजपेयी को यंू भी सत्ता के मिजाज के खिलाफ बोलने वाले पत्रकार और एकंर्स के रूप में पहचाना जाता है। ऐसे में आज तक से उनकी विदाई अखरती है। जहां तक योगगुरू बाबा रामेदव की नाराजगी का सवाल है तो उनकी नाराजगी स्वाभाविक ही है। आखिर जिस मीडिया को वह करोड़ों रूप्ये सालाना का विज्ञापन देते हैं तो वह कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं कि कोई मीडियाकर्मी ऐसे तीखे सवाल करे जिससे उनकी वैश्विक छवि पर सवाल उठते हों। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने जो सवाल पूछा था वह सवाल तो पूरा देश पूछ रहा है कि आखिर जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करदाताओं की तादाद बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं तो फिर दस हजार करोड़ से ज्यादा के कारोबारी साम्राज्य को करमुक्त कर दिया गया! दूसरा सवाल यह है कि जब कुछ ट्रस्ट का है तो फिर उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण आमदनी के हिसाब साल दर साल कैसे धनपतियों की सूची में पायदान चढ़ते जा रहे हैं! तीसरा सवाल यह है कि अकेले रामदेव ही तो आयुर्वेद औषधियां नहीं बनाते देश में और भी सैकड़ों इकाईयां आयुर्वेद औषधियां बनाती हैं तो उन्हें भी कर मुक्त क्यों नहीं किया जाता! चुभते सवाल हैं और जब रामदेव से करोड़ों रूप्ये सालाना कमाने वाले मीडियाकर्मी चुभते सवाल पूछेंगे तो उन्हें भी पुण्य प्रसून वाजपेयी की तरह संस्थान छोड़कर जाने को मजबूर किया जायेगा। एक उदाहरण और देखिये कि ईडी ने पतजंलि की ओर से चीन भेजी निर्यात की जा रही चंदन की लकड़ी बरामद की लेकिन किस हिन्दी अखबार और चैनल ने इस खबर को ब्रेक किया! रही बात मीडिया की निष्पक्षता, तटस्थता और सरोकारी पत्रकारिता की तो सब ख्याली पुलाव के सिवा कुछ नहीं। मीडिया में बाथटब में तो झांकता है लेकिन उसी दिन बिहार में भाजपा नेता के वाहन से नौ बच्चे के कुचलने के समाचार को नजर अन्दाज कर देता है।
    मीडिया विश्लेषक एनके सिंह ने सही कहा कि वर्तमान मीडिया भांडगिरी करता प्रतीत हो रहा है। कुछ एंकर और पत्रकार सत्ता की चैखट पर नतमस्तक होकर प्रवक्ता की भूमिका में आ गये हैं। कुछ मामलों में जज की तरह नजर आते है यानि न खाता न बही जो हम कहे वही सही।
    (आजाद भारतीः जर्नलिस्ट एवं पूर्व समाचार सम्पादक दैनिक बद्री विशाल हरिद्वार)

  2. Ujjwal Ghosh

    March 8, 2018 at 8:58 am

    तो यह है बड़े-बड़े मीडिया हाउस का हाल ! अपने ज्ञान का बखान और लोगों को आजीवन निरोग बनाये रखने के उत्पाद बनाने का दावा करने वाले बाबा रामदेव खफा भी होते हैं ? उन्हें तो शालीन होना चाहिए जैसे फल लगे पेड़ों के डाल झुके होते हैं. एक सवाल के कारण पुण्य प्रसून वाजपेयी को इस्तीफा दैने का माहौल बनाया गया ? पुण्य प्रसून जी के कद में तो इससे इजाफा ही हुआ है. उनके चाचा स्व.वेद प्रकाश वाजपेयी जी के अधीनस्थ के रूप में मुझे भी कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. उनके तेवर और मिजाज का तो मैं कायल हो गया था.

  3. Narendra tripathi

    March 12, 2018 at 11:51 am

    बड़े अफसोस की बात है, महज एक सवाल से अगर किसी वरिष्ठ पत्रकार कलमकार को इस्तीफा देना पड़े या ऐसा माहौल बना दिया जाए कि संस्थान से रुख्सत होना पड़े तो समझ लेना चाहिए कि अब अवाम इसका जवाब देने को तैयार होने लगी है, याद करें अन्ना आंदोलन उस दौर में कुछ सत्ताधारी नेता अवाम को कीट पतंग समझने लगे थे। नतीजा 2014 में देखने को मिल गया। जब रावण का अहंकार नही चला तो बाकी सब तो इंसान है। खैर ईश्वर सद्बुद्धि दे बस अभी तो इतना ही बोल जा सकता है।

  4. अरुण श्रीवास्तव

    March 9, 2018 at 6:16 pm

    मीडिया में या इस तरह की नौकरियों में यह कोई नयी घटना नहीं है। हमें तो प्रिंट मीडिया का ही अनुभव है। हम पत्रकार उतनाही और उस तरह का ही लिख सकतेहैं/ दिखा सकते हैं जितना हमारा मालिक , मालिक का चमचा संपादक लिखने की छूट देता है। आजतख से पुण्य प्रशुन्न वाजपेयी के जाने में और जीटी से रोहित सारदाना के जाने में अंतर तो है ही।
    वाजपेयी जी अंजना ओम कश्यप रजत शर्मा और सुधीर चौधरी की मुस्कुरा – मुस्कुरा साक्षात्कार देने वाले की तारीफ करते तो शायद ही नहीं निश्चित आजतक का हिस्सा होते।
    उनका जाना अखर रहा है। वो जल्द ही किसी दूसरे चैनल पर दिखें खुशी होगी।

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