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सियासत

इति युद्धम! : ईरान की लाचारी देखिए, अमेरिका का बदमाश माइंडसेट समझिए!!

दया शंकर शुक्ल सागर-

ईरान की लाचारी देखिए। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने कतर स्थित अमेरिकी एयरबेस पर कुछ मिसाइलें गिराईं और कहा-‘हमारा बदला पूरा हो गया।’ ईरान का भोलापन देखिए उसका तर्क है कि उसने कतर पर उतनी ही मिसाइलें दागी जितनी अमेरिका ने दागी थीं सो हिसाब बराबर। जबकि अमेरिका ने एक हमले ही में ईरान का परमाणु कार्यक्रम तबाह कर दिया जिसे उसने चालीस साल की मेहनत से तैयार किया था। जबकि ईरान के हमले से कतर में एक अमेरिकी चिड़िया तक नहीं मरी। शांति के मसीहा ने भारत-पाक की तर्ज पर इज़राइ्ल-ईरान, दोनों तरफ से सीज़फायर का एलान कर दिया है। अभी ईरान सीजफायर से ना नुकुर कर रहा है लेकिन शाम तक मान जाएगा। जाहिर है ईरान दूसरा यूक्रेन नहीं बनना चाहेगा। तो आप देख सकते हैं कि सत्ता कैसे-कैसे अदूरदर्शी और अहंकारी मूर्खों के हाथों में है।


नितिन त्रिपाठी-

इस समय मिडल ईस्ट वार परफेक्ट एग्जाम्पल है यहूदी, मजहबी और अमेरिकन माइंडसेट समझने के लिए. बैलेंस माइंड से देखिए – इजरायल ईरान झगड़ रहे थे. अमेरिका बीच में आया. बी टू बॉम्बर्स से ईरान के कई न्यूक्लियर अड्डे ठिकाने लगा दिए. खरबों का नुक़सान किया, दसियों साल पीछे चले गए आणविक ताक़त बनने में. और इस सबके बावजूद अगले ही दिन से शांति समझौता करा कर चौधरी बनने लग गए. आज कोई यहाँ तक कि ईरान भी नहीं पूछ रहा है भाई साहब आप वही हैं जो दो दिन पहले हमारे देश में घुस कर दीपावली मना कर गए थे. पिछले बीस सालों में किसी देश की ज़मीन पर घुस कर इस तरह से बमबारी किसी ने न की.

ईरान के एंगल से देखो अमेरिका ने हमसे रिक्वेस्ट की सीज फायर की जीत हमारी हुई.

थोड़ी नूरा कुश्ती भी हुई. ईरान ने बोला हमें कुछ न कुछ तो करना है. ये हुआ पहले बता देना है. एक घंटे पहले बता दिया अमेरिका को कतर में बेस पर एक घंटे में हमला करेंगे हटा लो सबको. इजरायल का था हमें अपनी सुप्रीमसी दिखानी है उस केस में भी लगभग सारी मिशायल हवा में गिरा दी. ईरान का कि माय बाप कुछ तो दो घमंड करने को अच्छा चलो एक मिशयाल जंगल में दाग दो उसे नहीं रोकेंगे. ईरान भी ख़ुश देखा हमने us बेस में एक मिशायल दाग दी. अमेरिका ख़ुश कि ईरान का इतना नुक़सान किया ये हमारा एक बूँद नुक़सान न कर पाये. इजरायल ख़ुश कि देखा हमारी शील्ड अच्छी है ईरान की एक भी मिशायल हमारी आँख से न बची.

मिडल ईस्ट में सीज फायर हवा हवा का है. पर मुद्दे की बात यह है कि इतना डेरिंग हमला कर अमेरिका चुप चाप निकल लिया. कुछ दिन शांति चलेगी फिर से ईरान इजरायल आरम्भ हो जायेंगे, अमेरिका फिर से जाकर अपने बम टेस्ट कर आयेगा. इन बिटवीन मौक़ा मिलते ही एकाध तेल रिफाइनरी पर भी कब्जा हो जाएगा. ईरान का घमंड भी क़ायम रहेगा देखा कह रहे थे चार पर कब्ज़ा करेंगे हमने एक पर ही करने दिया.


पंकज मिश्रा-

यह किसे नही पता था कि ईरान जब युद्ध मे उतरेगा तो वह अकेला ही होगा | असद रिजीम के गिरने और वहां अल कायदा के इनामी आतंकी को सत्ता दिलाने के बाद सीरिया भी ईरान का दुश्मन ही हो चुका था |

इजिप्ट औऱ जॉर्डन , अमेरिका से सलाना 3 bn $ की मदद बरसो से पाते है | एक बचा इराक जिसे अमेरिका liberate करने आया था वह एक rump state में reduce हो चुका है | लगभग सारे अरब देशों में अमेरिकी सैनिक अड्डे है तो वह जुबान से चाहे कुछ भी कहें जमीर उनका अमेरिका की वजनदार तिजोरी में गिरवी पड़ा है |

याने ईरान की लड़ाई , अमेरिका और इसराइल के अलावा इन सारे मुल्कों से भी है | ईरान के मिसाइल और ड्रोन इस्राइल से पहले ये अरब मुल्क गिराते है , इनसे बच बचा कर ही वह इसराइल के आसमान में पहुंचती है |

ईरान अरब नही है फिलिस्तीन है | मगर ईरान इस्लामिक क्रांति के समय से ही फिलिस्तीन की मुक्ति के दृढ़ संकल्पित है |

ईरान शिया है और फलीस्तीन सुन्नी |
अधिकांश अरब सुन्नी है मगर फलस्तीन का सिर्फ मुंह से साथ देते है मोहब्बत से नही |

ईरान में डेमोक्रेटिक थियोक्रेसी है जबकि अधिकांश अरब में राजशाहियां है या अमीरात .. ईरान राजशाही को खत्म करके इस्लामिक बना है , आसमान से गिर कर खजूर पे अटक गया |

तमाम अरबी राजशाहियों को अपनी जनता से खतरा है जो फलस्तीन के साथ है इसलिए ये फिलस्तीन मुक्ति का नकाब चेहरे पर चढ़ाए फिरते है और भीतर भीतर इसराइल और अमरीका के गठजोड़ से डरते है , इसी भय से उनके प्रति प्रीति उपजती है और ईरान से नफरत भी क्योंकि वह फिलिस्तीन के साथ अविकल और अविचल खड़ा है | फिलिस्तीन का वास्तविक साथ अरब अमीरों को अमेरिका की गोद से बाहर फेंक देगा , यह धरती के स्वयम्भू माफिया की गोद से बाहर आने से डरते है | पूरी अरबी निजामत डर और नफरत और परस्पर जलन से भरे हुए लोगो का समुच्चय है |

एक तुर्की है जो 100 % दोगला है , वह सबके साथ है और किसी के भी नही , वह योरप होना चाहता है और उम्मत का नेता भी , वह nato का मेम्बर है और उम्मत का सदर भी होना चाहता है | वह भीतर से एशिया है पर योरप का रूप रंग , उसे भाता है और जिंदगी में वही ओढ़ता बिछाता है | योरप का छलकपट फरेब विश्वासघात सब उसमे कूट कूट कर भरा है |

सऊदी अरब अमीर है , पैसा भी है और तारीखी तौर पाक जमीन से मालामाल , वहां मक्का भी है और मदीना | लोग मदीने झोली भरने जाते है , सऊदी अरब के पास मदीना खुद है | वहां काबा है जहां दुनिया भर के जायरीन तवाफ़ करते है | इससे उसे यह भरम हो चला है कि पूरी उम्मत उसके गिर्द तवाफ़ करे , वह यूँ ही सबका सदर है पर कोई मानता क्यूं नही , इसी मलाल में वह कंभी हां कंभी ना में झूलता रहता है | हक की लड़ाई में हमेशा पशोपेश में रहता है मगर हज का रवायती फ़र्ज़ पर कोई समझौता नही करता |

तो उम्मत के लीडरी की दौड़ में तीन मुल्क है ईरान , सऊदी अरब और तुर्की | खल्क खुदा की होती है मुल्क बादशाह का और उम्मत ?

इस सवाल का हल जब तक नही मिलता , पश्चिम एशिया में वह कुछ होता रहेगा जो होता आया है |

( यह एक angle है , और भी कई एंगल है पश्चिम एशिया में सबका इन्टरप्ले जारी है , फिर कभी मन हुआ तो लिखूंगा फिलहाल इतने से काम चलाइये )


सुशोभित-

पिछले दिनों दुनिया में दो पारम्परिक शत्रुओं के बीच दो युद्ध लड़े गए। एक 4 दिन चला, दूसरा 12 ​दिन। दोनों ही युद्धों के लिए जो तर्क दिया गया था, वह वैसा था जिसे अनेक जन व्यापक पैमाने पर सच मानते थे (वाइडली पर्सीव्ड ओपिनियन) किन्तु वह अकाट्य तथ्यों द्वारा प्रमाणित नहीं था, यह कि पाकिस्तान ने पहलगाम में हमला करवाया था या यह कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है।

दोनों ही युद्धों में महाशक्तियों ने अपने मोहरों के ज़रिये ताक़त दिखाने की कोशिश की, पाकिस्तान के ज़रिये चीन, इज़राइल के ज़रिये अमेरिका ने। दोनों ही युद्धों में एक-एक मुल्क अकेला पड़ गया, पहले भारत, फिर ईरान। दोनों ही युद्धों में ज़मीनी संघर्ष के बजाय मिसाइलों और ड्रोन से हमले बोले गए- रात का आकाश भयावह कंदीलों से सज गया- और बचाव का दारोमदार एयर-डिफ़ेंस सिस्टमों पर रहा, मसलन भारत में एस-400, इज़राइल में आयरन डोम। दोनों ही युद्धों में डॉनल्ड ट्रम्प ने बिन बुलाए मेहमान की तरह मध्यस्थता करने की कोशिश की और सीज़फ़ायर करवाने का श्रेय लिया। दोनों ही युद्धों में शासकों ने घरेलू मोर्चे पर अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए राष्ट्रीय शौर्य की शरण ली।

एक और कमाल की बात इन दोनों युद्धों में हुई। यह सोशल मीडिया पर दोगुने जोशोख़रोश से लड़े गए। युद्ध में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणाएँ कीं। दोनों ने अपने दमखम का बखान किया। समाचार नामक संस्था ध्वस्त हो गई। तटस्थ पर्यवेक्षक खरी-ख़बरों के लिए हैरान-परेशान होते रहे। नैरेटिव की लड़ाइयाँ लड़ी गईं। दोनों ही युद्धों में एक इस्लामिक-मुल्क शामिल था, इसलिए यूट्यूबरों और सोशल मीडिया इंफ़्लुएंसरों ने वस्तुस्थिति का वर्णन करने के बजाय उनके दर्शक जो सुनना चाहते थे, उसका बखान किया। एक नैरेटिव के तहत इज़राइल-अमरीका गठजोड़ ने ईरान के सैन्य आलाकमान का सफ़ाया करते हुए उसके परमाणु ठिकानों को ध्वस्त कर दिया तो दूसरे नैरेटिव के मुताबिक़ ईरान ने अकेले ही इन दोनों मुल्कों से जमकर लोहा लिया और उन्हें नाकों चने चबवा दिए। किसी ने ख़ामेनेई को पश्चिमी साम्राज्यवाद से जंग लड़ने वाले पूर्व के मसीहा तो किसी ने उन्हें आतंक के पोषक और मानवाधिकारों को रौंदने वाले साम्प्रदायिक तानाशाह की तरह चित्रित किया।

अमरीकी धरती पर बारूद का एक कण भी नहीं गिरा, ना ही किसी अमरीकी को खरोंच आई, इसलिए डॉनल्ड ट्रम्प दोनों युद्धों में पूरे समय मखौल के मूड में रहे और डींगें हाँकते रहे। कुछ​ दिनों पूर्व यूक्रेन को जमकर डाँट लगाने कि तुम तीसरे विश्वयुद्ध की सम्भावना से खेल रहे हो, वे ख़ुद ईरान पर हमला करके वैसा कर बैठे। इससे टीवी और सोशल मीडिया को बहुत कंटेंट मिला। प्रेक्षकों की रीढ़ें पूरे समय त​नी रहीं। जिन इलाक़ों में बम बरस रहे थे और जहाँ के लोग अपनी जानें गँवा रहे थे, उन्हें छोड़कर शेष सबके लिए ये युद्ध रोमांच और कौतूहल का विषय बने रहे।

ये 21वीं सदी के, पोस्ट-ट्रुथ वाले युग में, सच्चाई और अफ़वाह और नैरेटिव की संधिरेखा पर लड़े गए युद्ध थे। इन युद्धों में- इस सदी की हर चीज़ की तरह- अर्द्धसत्यों का बड़ा बोलबाला था!

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