
संजय कुमार सिंह
जब कई निर्वाचित जनप्रतिनिधि बिना सबूत जेल में हैं, उससे होने वाला नुकसान खबर नहीं है तो पांच गिरफ्तारियां लीड बन गईं। पर पत्रकारों ने लोकतंत्र के मंदिर में अपने लिए बने पिंजरे की खबर नहीं दी है। राहुल गांधी के प्रयास से राहत मिली वह भी खबरों की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है। स्थितियां ऐसी ही रहीं तो कोचिंग बंद हो जायेंगे और यह वैसे ही होगा जैसे उद्योग धंधे बंद हुए हैं, नुकसान सर्वविदित है। आप जानते हैं कि नोटबंदी और बिना तैयारी जीएसटी लागू करने का अर्थव्यवस्था पर क्या असर हुआ है तथा तमाम छोटे बड़े कारोबार बंद हो गये या घाटे में चले गये। इस तथ्य को छिपाने के लिए सरकार ने प्रचार का सहारा लिया और महीनों जीएसटी के आंकड़े सार्वजनिक किये। इसका असर यह हुआ कि लोगों को बजट से ऐसी अपेक्षा हो गई जो संभव नहीं था तो इस महीने उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। अब कोचिंग इंस्टीट्यूट के मामले में वैसी ही राजनीति चल रही है। मुझे लगता है कि मामला वह नहीं है जो बनाया और प्रचारित किया जा रहा है। ऐसे में जो हो रहा है उसका नुकसान होगा और यह भी संभव है कि आईएएस कोचिंग महंगा हो जाये या बंद ही हो जाये।
केंद्र सरकार ने तमाम जतन से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को जेल में रखा हुआ है। जब भी मुख्यमंत्री का जेल में होना मुद्दा बनता है, सीबीआई और दूसरी सरकारी एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं। आज भी यही हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के अनुसार, सीबीआई ने आरोप लगाया है कि आबकारी शुल्क मामले में केजरीवाल की सीधी भूमिका थी। आप जानते हैं कि नीट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा रद्द नहीं की क्योंकि सबूत नहीं थे और सबूत नहीं होने का मामला अनुभवी चोर की स्थिति में होता है यह प्रधानमंत्री कह चुके हैं। इसका एक मतलब यह भी है कि केजरीवाल सबूत के बिना जेल में हैं और उसका कारण यह है कि उनके खिलाफ मामला पीएमएलए का बनाया गया है। कायदे से एक मुख्यमंत्री को अपराधी साबित हुए बिना जेल में रखने के लिए सबूत नहीं है तो उनके खिलाफ मामला साबित कर दिया जाता और तब पीएमएलए का मामला बनाया जा सकता है। अपराध घटित होने के बाद साबित नहीं हो तो मुख्यमंत्री को जेल में रखना कितना जरूरी और उपयुक्त है यह भले अदालत को तय करना हो पर ऐसा कोई कारण नहीं है कि सबूत पांच-दस साल बाद ही मिलता है।
प्रचारकों की सरकार इसका राजनीतिक नुकसान संभाल लेगी और बाकी नुकसान जनता को ही होगा। इसलिए समझना और झेलना दोनों जनता को है। यह दिलचस्प है कि इसने सीधे-सरल मामले को भी सरकार अपने पक्ष में घुमा लेती है। देश भर में सड़कों पर, मोहल्लों में पानी भरने से मौतें होती हैं। कार्रवाई जो हुई वह सबको पता है पर दिल्ली में हुई मौतें अगर प्रतिभाशाली छात्रों की थीं तो यह भी तय है कि इन्हीं स्थितियों में पढ़कर आईएएस बने (और जो नहीं बने वो भी) इस व्यवस्था को ठीक नहीं कर पाये या करने में दिलचस्पी नहीं ली। वास्तविकता को नहीं समझ रहे हैं या बता नहीं रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली में हुई मौतें मुद्दा है तो इसलिए कि राजनीति है, हेडलाइन मैनेजमेंट है। जबरदस्त दबाव और गंभीर मामला होने के बावजूद अगर उस समय के सांसद बृजभूषण सिंह की गिरफ्तारी नहीं हुई तो आज छात्रों की मौत के मामले में पांच लोगों की गिरफ्तारी का मतलब समझना मुश्किल नहीं है। आज यह खबर कई अखबारों में लीड है और कल राहुल गांधी ने संसद में सरकार, बजट और वित्त मंत्री की जो धुलाई की वह सेकेंड लीड है।

मैने कल यहां लिखा था कि मामला सिर्फ दिल्ली का नहीं है। मामला कोचिंग संस्थान की लाइब्रेरी बेसमेंट में होने या उसमें पानी भरने का भी नहीं है। मामला यह है कि सड़क पर पानी भरेगा तो बेसमेंट में भी भरेगा, बेसमेंट में लाइब्रेरी होना खतरनाक है और इसके बावजूद था क्योंकि कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाने लायक जगह वाजिब किराये पर उपलब्ध नहीं है। इसपर ध्यान नहीं दिया गया, इसकी जरूरत नहीं समझी गई। जहां तक बेसमेंट में लाइब्रेरी का सवाल है, पूरी दिल्ली में कितने ही ऑफिस, अस्पतालों के ओपीडी, वकीलों, डॉक्टरों के क्लिनिक चल रहे हैं और नियमानुसार चल रहे हैं। अगर मोहल्ले की सड़कों पर पानी भरेगा तो वहां भी भरेगा। संभव है लोग नहीं मरें, नुकसान तो होगा ही पर क्या उसे रोक दिया जायेगा, रोका जा सकता है? मेरे ख्याल से नहीं। ऐसी हालत में समस्या को समग्रता में देखा जाना चाहिये और बलि का बकरा ढूंढ़ना हेडलाइन मैनजमेंट है क्योंकि दस साल में इस दिशा में कुछ किया ही नहीं गया। मीडिया का काम यह सब उजागर करना है तो उसकी हालत यह है कि उसे ही लोकतंत्र के मंदिर में कैद करने की व्यवस्था कर दी गई है। राहुल गांधी की अपील पर राहत मिली लेकिन उसकी खबर आज पहले पन्ने पर नहीं है। अपने लिये पिंजरा बनाये जाने की हिमाकत या कृपा बताने के लिए भी नहीं। यह खबर भी सिर्फ टेलीग्राफ में है।
दूसरी ओर, द हिन्दू में आज शहर की खबरों के पन्ने पर एक खबर है, सांस लेना मुश्किल होता है पर बेसमेंट से ऊपर के कमरों का किराया नहीं चुका सकते। इस खबर का उपशीर्षक है, मुखर्जी नगर, ओल्ड रजिन्दर नगर जैसे कोचिंग केंद्रों में सिविल सेवा के उम्मीदवार कहते हैं कि वे बिना खिड़की वाले बेसमेंट पीजी में रहते हैं जो भारी बारिश में पानी से भर जाता है क्योंकि ऐसे कमरों का किराया भूतल और जमीन से ऊपर के कमरों के मुकाबले आधा होता है। जाहिर है, बेसमेंट में लाइब्रेरी ही नहीं थी, लोग रहते भी हैं लेकिन मुद्दा इसे नहीं बनाया गया है। जनहित में मुद्दा यह होना चाहिये यूपीएससी के उम्मीदवारों के लिए अगर कायदे की पीजी सुविधा नहीं है तो आम लोगों का क्या हाल होगा। लोग किन स्थितियों में किराये पर रह रहे होंगे। मजदूरों का क्या हाल होगा आदि। सीएसआर और लोकोपकार करने वाले ऐसे छात्रों के लिए पीजी या हॉस्टल नहीं चलाते हैं। क्या ऐसा पीएम केयर्स या इलेक्टोरल बांड के कारण है। कहने की जरूरत नहीं है कि देश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी नहीं है इसलिए कोचिंग की जरूरत है और कोचिंग का बाजार है इसलिए जैसे-तैसे चल रहा है और पैसा है इसलिए भ्रष्टाचार व बेईमानी है।
सोशल मीडिया पर कल सुधीर चौधरी का एक वीडियो देखा जिसमें वह दिखा रहा था और छात्र शिकायत कर रहे थे कि मैगी (खाने के लिए तैयार) 50 रुपए का मिलता है। कीमत मांग और पूर्ति से तय होती है और अगर कोई दुकान में कर्मचारी रखकर पूरी व्यवस्था करके कुछ बेचता है तो खर्च भी होगा और मुनाफा भी कमाना है। उसमें पुलिस और नगर निगम को रिश्वत देने की बात थी और यही व्यवस्था है। मैगी बेचकर अपना घर चलाने वाले का काम सीएसआर या सबसिडी देना नहीं है। छात्र यह भी बता रहे थे कि रात में कीमत बढ़ जाती है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह भी डिमांड एंड सप्लाई का मामला है। रात में दुकान खुली रखने के खर्चे बढ़ जायें तो कीमत भी बढ़ जायेगी और ऐसी महंगी सेवा नहीं लेने का विकल्प छात्रों के पास है कि वे घर से टिफिन लेकर आयें। पर सबको पता है कि वे पढ़ने के लिए अकेले दिल्ली में रहते हैं, खाना बनाने की व्यवस्था नहीं होती है और नहीं कर सकते हैं। जाहिर है, इसकी जरूरत है तो सुविधा सरकार को मुहैया करना चाहिये और सुविधा मुहैया कराना व्यवसाय होगा तो जो करेगा वह कमायेगा। कोचिंग की सुविधा भी एक व्यवसाय है। मैंने कल लिखा था कि आदर्श स्थितियां नहीं हों तो कोचिंग नहीं चलाने का विकल्प हमेशा है। पर वैसी स्थिति में किसका भला होगा?
सड़क पर पानी भरने से बेसमेंट में लाइब्रेरी बनाने के अपराध में अगर कोचिंग के संचालक को गिरफ्तार किया जायेगा, मुआवजा मांगा जायेगा तो कोचिंग चलाने के लिए बीमा कराना होगा, लागत बढ़ेगी तो फीस बढ़ेगी। या कोचिंग बंद जायेंगे। राजनीति होगी तो उसकी स्थितियां बनेंगी। मैंने इसपर भी पहले लिखा है। आज खबर है कि एमसीडी ने दो दिन में 19 कोचिंग सेंटर के बेसमेंट सील कर दिये हैं। पुलिस चाहे तो गिरफ्तारी भी कर सकती है। लेकिन उससे होगा क्या? कोचिंग चलाने के लिए जगह उपलब्ध नहीं होगी, बेसमेंट सील हो जायेंगे और छत पर आग लगने से मौत हो जायेगी तो भी कोचिंग मालिक गिरफ्तार होगा तो जाहिर है कोई कोचिंग चलाने की हिम्मत नहीं करेगा। इससे सरकार की कौशल विकास योजना के लाभार्थी बढ़ेंगे और आईएएस सिर्फ बड़े लोग कर पायेंग। अभी भी पैसे वाले ही कर पाते हैं। उनके लिए स्थिति और मुश्किल हो जायेगी। मुझे ताज्जुब इस बात का है कि आईएएस करने वाले छात्र इसे नहीं समझ पा रहे हैं। संभव है यह परीक्षा देने वालों के प्रतिभा और मनःस्थिति का मामला हो। पर वह अलग मुद्दा है।
अभी हादसे से संबंधित मामला मोटे तौर पर तो यही है कि मुख्यमंत्री जेल में हैं, उनकी अनुपस्थिति में कौन काम देखेगा यह तय नहीं है। अखबारों की खबरों के अनुसार उपराज्यपाल यानी एलजी देख रहे हैं। फिर भी हादसा हुआ, शिकायत पर कार्रवाई नहीं हुई तो एलजी जिम्मेदार हैं। दिल्ली सरकार, नगर निगम और दिल्ली के विधायक अपना काम करें – इसे सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी होनी चाहिये या होगी – कार्रवाई उसके खिलाफ होना चाहिये। जहां तक निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की बात है, उनका काम संतोषजनक नहीं रहा तो जनता उन्हें दोबारा नहीं चुनती है। चुनाव में वोट नहीं देकर हरा सकती है। यही व्यवस्था रही है और चलती आई है। केंद्र की भाजपा सरकार ने (सीबीआई और ईडी के जरिये) दिल्ली सरकार की निगरानी का काम अपने हाथ में लिया है और अदालतों से मुख्यमंत्री को जमानत नहीं मिली है या जब मिली तो न सिर्फ जज को ट्रोल किया गया, रातों-रात हाईकोर्ट में अपील की गई और हाईकोर्ट ने जमानत को स्टे भी कर दिया। केंद्रीय गृहमंत्री ने फैसले के खिलाफ, विशेष ट्रीटमेंट जैसी टिप्पणी की थी सो अलग।
ऐसे में दिल्ली राज्य मुख्यमंत्री के बिना है और जाहिर है जो काम उसे करना था या वह कर सकता था वह कानूनी स्थिति के कारण करने में अक्षम है। रही बात मुख्यमंत्री कार्यालय की तो उनका सहायक भी जेल में है और यह सबको पता है। ऐसे में सरकार का मुखिया कौन होगा यह तय हुए बिना सरकार से काम की अपेक्षा करना व्यर्थ है और अगर सरकार काम नहीं कर पाई इसलिए जिम्मेदार है तो वह मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में काम देख रहे एलजी हो सकते हैं या एलजी को जो निर्देश देता है उसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिये। मुख्यमंत्री, विधायक, नगर निगम, पार्षद को जिम्मेदार ठहराने का कोई मतलब नहीं है। उनकी जिम्मेदारी तो वैसे भी जनता हर चुनाव में तय करती है। ईवीएम के कारण हो पाता है कि नहीं वह अलग मुद्दा है पर अभी तो यही माना जाये। आज इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, भाजपा द्वारा कार्रवाई नहीं किये जाने के आरोप पर आम आदमी पार्टी ने कहा है कि अधिकारियों पर एलजी का नियंत्रण हैं और यही मुख्य मुद्दा है।
मुझे लगता है कि तीन लोगों की मौत पर यह राजनीति एकछत्र राज करने की भाजपा की राजनीति का नतीजा है वरना पानी तो देश भर में भरता है और सड़क पर डूब कर लोग मरते ही रहते हैं। मुंबई में तो पता है कि बारिश होती है, वर्षों से लोग मर रहे हैं, परेशान हो रहे हैं, भूतल के घरों में पानी भर जाता है फिर भी वहां होने वाली मौतों पर ऐसी राजनीति नहीं होती है क्योंकि वहां भाजपा को टक्कर देने वाली आम आदमी पार्टी नहीं है। बारिश का पानी भर जाना, सीवर का इंतजाम नहीं होना और इससे होने वाला नुकसान अपने आप में बड़ी समस्या है और ऐसा पटना में भी हो चुका है। तब की तस्वीरें याद कीजिये और नुकसान की कल्पना कीजिये। क्या वह क्षम्य था? क्या पीड़ितों को सरकार की तरफ से मुआवजा नहीं मिलना चाहिये था? सरकार के खिलाफ कार्रवाई तो जनता अगले चुनाव में कर सकती है, करती भी है लेकिन सरकार को कार्रवाई करनी हो तो अधिकारियों के खिलाफ करनी चाहिये। राजनेताओं के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार जनता के पास पहले से है। केंद्र में सत्तारूढ़ होने और सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा चाहती है कि उसका विरोध हो ही नहीं और सभी विरोधियों को सत्ता की ताकत से कुचल दिया जाये। इस मामले में भी यही हो रहा है।


