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बरखा मैम! पत्रकारिता का ‘सोलो जर्नलिज्म’ वाला रूप उत्साह में नगाड़े पीटने का नहीं, बल्कि कई भयावह संकेतों की तरफ सोचने का भी कारण है!

ओम थानवी-

पत्रकारिता करना पहले से आसान हो गया, लेकिन पत्रकारिता में पत्रकारिता कितनी रह गई? दैनिक भास्कर में छपी, बरखा दत्त की मुनासिब चिंता।


विनीत कुमार-

आप जिन्हें कभी मीडिया का (फिलहाल पत्रकारिता की न भी कहें तो) आदर्श मानते रहे हों, ऐसे चेहरे जब दोहरी बात करने लग जाएं तो आप साफ-साफ शब्दों में यह कहने से अपने को रोक नहीं पाते कि आपका अपने हिस्से का सच क्या है!

बरखा मैम! आप जो बात कह रही हैं वो दरअसल Solo Journalism की बात का एक हिस्सा है जिसकी चर्चा दुनियाभर में हो रही है. पत्रकारिता का यह रूप उत्साह में नगाड़े पीटने का नहीं, उन भयावह संकेतों की तरफ सोचने का है जिनके भीतर से लोकतंत्र के एक मजबूत संस्थान के तौर पर पत्रकारिता ध्वस्त हो रही है. आपने दर्जनभर ऐसी तस्वीरें ख़ुद साझा की है जो मोजो टीम के नाम से आपकी चुनावी रिपोर्टिंग के दौरान साथ रहे.

आपने प्रॉपर एडिटिंग के लिए एक टीम हायर किया हुआ है. आपको ये पहलू भी सामने रखना चाहिए और रखते हुए ये बताना चाहिए कि अब बीट के हिसाब से, मुद्दे के हिसाब से, एजेंसी की ख़बरों को लेकर संस्थान के स्तर की छानबीन और खोजी पत्रकारिता का क्या भविष्य रह गया है?

इस सच को स्वीकार करने का साहस हमारे भीतर कब पैदा होगा कि पत्रकारिता बड़ी तेजी से बदल नहीं, मर रही है और दुर्भाग्य से सोलो जर्नलिज्म बहुत चाहकर भी उसके बड़े हिस्से को बचा नहीं सकता. आप “न्यू अरॉवल” को सेलेब्रेट करती हैं लेकिन ये तो कहना ही होगा कि इस नयी पत्रकारिता में कितनी पत्रकारिता बची रहेगी या फिर वो उसी मॉडल की तरफ नहीं जा रहा जिसकी चिंता आप कर रही हैं?

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