मोदी और केजरीवाल के चुनावी युद्ध वाली डॉक्यूमेंट्री ‘बैटल फॉर बनारस’ सेंसर में अटकी

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की युद्ध भूमि वाराणसी में हुई चुनावी लड़ाई को दिखाने वाली एक डॉक्यूमेंट्री सेंसर बोर्ड में अटक गई है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है डॉक्यूमेंट्री फिल्म नहीं होती – यह मौके पर रिकॉर्ड किए गए वास्तविक वीडियो का फिल्म के रूप में संकलन होता है और इसे फिल्म बनाने के लिए रचनात्मक आजादी भी लगभग नहीं ली जाती है। पर जाने-माने फिल्मकार, कमल स्वरूप ने दावा किया है कि पिछले साल के लोकसभा चुनाव में वाराणसी सीट पर चुनावी भिड़ंत पर आधारित उनकी एक डॉक्यूमेंट्री को सेंसर बोर्ड ने यह कहते हुए मंजूरी देने से इंकार कर दिया कि यह ‘उसके दिशा निर्देशों के अनुरूप नहीं बैठती है।’

यानी चुनाव प्रचार के दौरान जो सब हुआ जिसे देश दुनिया ने टीवी पर और अपनी नंगी, चश्मे और लेंस वाली आंखों से देखा वह सेंसर बोर्ड के दिशा निर्देशों के अनुरूप नहीं है। और सेंसर बोर्ड यह बात किसी आम आदमी को नहीं, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक कमल स्वरूप से कहा है। उन्होंने दावा किया कि बोर्ड ने अभी उन्हें इस बारे में लिखित रूप से अवगत नहीं कराया है, हालांकि उन्हें मौखिक रूप से बताया गया कि यह सेंसर बोर्ड के दिशानिर्देशों में फिट नहीं बैठती है।

समाचार एजेंसी भाषा और टीवी चैनल आजतक की खबरों पर यकीन करें तो ‘बैटल फॉर बनारस’ को हाल ही में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने देखा। इसमें वाराणसी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच के मुकाबले को दर्शाया गया है। पता नहीं डॉक्यूमेंट्री में जो दिखाया गया है वह आम उम्मीदवारों के स्तर की लड़ाई नहीं है या प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के स्तर की नहीं होने के कारण सेंसर बोर्ड इसपर बनी डॉक्यूमेंट्री को अपने दिशा निर्देशों के अनुकूल नहीं मान रहा है। वैसे, बात यहीं तक होती तो कुछ खास नहीं था। वैसे भी यह तीन दिन पुरानी खबर है। पर समस्या यह है कि बिहार चुनाव में सभी उम्मीदवार फिर उसी रूप में हैं। और भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री, महामहिम श्री नरेन्द्र मोदी पहले की ही तरह फिर मोर्चे पर हैं और अपने तमाम गोले बेधड़क दागे जा रहे हैं।

बाद में चुनाव आयोग इसपर बनने वाली डॉक्टूमेंट्री दिखाने की इजाजात नहीं देगा। इसलिए, प्रधानमंत्री और दूसरे नेता भी चुनाव प्रचार में जनता को जो मनोरंजन मुहैया कराते हैं उसे अगर आप मनोरंजन के रूप में ही देखना चाहते हैं तो अभी ही देख लें, रिकार्ड करके रख लें। बाद में सेंसर बोर्ड क्या करेगा और क्या कहेगा कोई नहीं जानता। वो तो गनीमत कहिए कि सेंसर बोर्ड इतने महान कार्य में व्यस्त है। वरना इन्हीं भाषणों को दिखाकर टीआरपी बटोरने वाले समाचार चैनलों को सेंसर बोर्ड के अधीन क्यों नहीं होना चाहिए। सेंसर बोर्ड खाली समय में इस ओर भी ध्यान दे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। तैयार हो जाइए।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.



 

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