तनु शर्मा के आरोपों पर मीडिया की चुप्पी को लेकर बीबीसी ने की कवरेज

दिन रात चिल्लाने बोलने चीखने वाले भारतीय न्यूज चैनलों को अपने ही एक एंकर के आरोपों का जवाब देते नहीं बन रहा और लगभग सभी को सांप सूंघ गया है. संगीन आरोपों के घेरे में फंसा इंडिया टीवी प्रबंधन तो अपने पीड़ित एंकर को ही अपराधी बनाने पर तुला है और उसे जेल भिजवाने को तत्पर है. पूरे मामले में नेताओं, अफसरों और मीडिया मालिकों की भयंकर सांठगांठ व आपराधिक एकजुटता दिखाई दे रही है. यही कारण है कि आत्महत्या के लिए उकसाने वाले एफआईआर में पीड़िता द्वारा नाम लिखे जाने के बावजूद इंडिया टीवी की मालकिन का नाम एफआईआर में नहीं आया, और उल्टे पीड़िता तनु शर्मा पर इंडिया टीवी की तरफ से कई मुकदमे ठोंक दिए गए. फिल्म सिटी में कल लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किया और तनु को न्याय दिलाने की बात की. पर पूरे प्रकरण में मेनस्ट्रीम मीडिया की चुप्पी शर्मशार करने वाली है. इन्हीं सवालों को लेकर बीबीसी हिंदी की तरफ से एक रिपोर्ट का प्रकाशन बीबीसी की वेबसाइट पर किया गया है. बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य की रिपोर्ट के शुरुआती हिस्से यहां दे रहे हैं और आखिर में बीबीसी की स्टोरी का लिंक, ताकि आप पूरी कवरेज पढ़ सकें.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

दिल्ली सटे नोएडा में एक टीवी एंकर की दफ़्तर के बाहर आत्महत्या की कोशिश वैसी सुर्ख़ी नहीं बन सकी, जैसा कि ऐसे क्लिक करें दूसरे मामलों में बनती है. टीवी एंकर तनु शर्मा ने अपने एम्प्लॉयर पर क्लिक करें प्रताड़ना का आरोप लगाया है, और इंडिया टीवी ने उन पर काम में कोताही का.

इस मामले में पुलिस केस दोनों तरफ़ से दर्ज हुए हैं. इसकी मीडिया को ‘ख़बर’ तो है पर ‘कवरेज’ नहीं. समाचार चैनलों के दफ़्तरों के आसपास चाय-सुट्टा के ठीयों पर मीडियाकर्मियों की बातचीत में ज़रूर इसका ज़िक्र है कहीं बेबसी के साथ, कहीं ग़ुस्से और कहीं अविश्वास के साथ.

इस मामले के बारे में इसके अलावा कहीं कोई बात चल रही है, तो वह सोशल मीडिया और मीडिया पर नज़र रखने वाली वेबसाइट्स पर है. दो एक अंग्रेज़ी अख़बारों ने ज़रूर इस मामले को छापा.

मीडिया में काम की जगह पर प्रताड़ना के आरोपों से जुड़ा ये पहला मामला नहीं है. पर तहलका मैगज़ीन के संपादक क्लिक करें तरुण तेजपाल के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के आरोप को छोड़ दें, तो इससे पहले भी, मीडिया की मुख्यधारा ने अपने ही कर्मियों के साथ प्रताड़ना के किसी अन्य मामले को ख़बरों में जगह नहीं दी है.

बीबीसी ने इसी ख़ामोशी के पीछे की ‘कहानी’ टटोलने की कोशिश की.

पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/07/140702_tanu_sharma_india_tv_harassment_media_journalists_da.shtml

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Comments on “तनु शर्मा के आरोपों पर मीडिया की चुप्पी को लेकर बीबीसी ने की कवरेज

  • nisha mishra says:

    Rajat Sharma ji ke khilaaf koi badi Saazish……kai sawaal hai..
    1.Tanu Sharma ne turant istifa kyu nahi diya ?
    2.20 saal se mahilaon ke sath vyawahar me bedaag chal rahe channel pe bhadda ilzam, aur hum turant bharosa kar lete hai ?
    3.Agar Tanu Sharma itni pratadit thi ke khudkushi karne ki maansik haalat me pahunch gai thi, to use aisi haalat me bhi ye idea aaya ke pehle “Mai Atmahatya karne wali Hu ‘ wo ye khabar banaye ?
    4..Ye khabar banane ke baad wo itni hosh me thi ke channel ke saamne atmahatya ka melodrama kare ?
    5.Tanu Sharma me aisa kya adbhut tha ke use hi pratadit kiya gaya…?
    6.Aur agar aapko lagta hai ke baki ladkiyon ke sath hua hoga jinhone awaaz nahi uthai…to yaad rakhe ki aaj ki sari reporters tez tarrar hai, aur sab apne adhikaron se awgat….toh kya aap mante hai ke 20 saal me sari journalist chup chap atyachar seh rahi hai….aur bas Tanu Sharma ne hi awaaz uthai hai ?
    7.Yaad rahe ke wo kuch hi mahino pehle India TV aayi thi….aur itni jaldi usne itna ghatiya aarop lagaya…kya ye saazish nahi hai ?
    8. Kya in pehluon pe gaur karne ke baad ye sawaal nahi uthta ke, Rajat ji ke kisi dushman ki gehri saazish ho sakti hai ? Tanu Sharma sirf ek mohra !

    Aakhir me phir se kehna chahungi, ke Tanu Sharma ne Atmhatya ka melodrama karke un sari mahilaon ka bhadda mazak udaya hai, jo ghinoune jurm ki shikar hoti hai….

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  • RAHUL VAISH says:

    आज के भ्रष्ट्राचार से इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी अछुता नहीं है, आपने भले ही आज जनसंचार में PH.D क्यों न कर रखी हो लेकिन आज का इलेक्ट्रोनिक मीडिया तो उसी फ्रेशर को नौकरी देता है जिसने जनसंचार में डिप्लोमा इनके द्वारा चालए जा रहे संस्थानों से कर रखा हो .. ऐसे में आप जनसंचार में PH.D करके भले ही कितने रेजिउम इनके ऑफिस में जमा कर दीजिये लेकिन आपका जमा रेजिउम तो इनके द्वारा कूड़ेदान में ही जायेगा क्यों की आपने इनके संस्थान से जनसंचार में डिप्लोमा जो नहीं किया है ..आखिर मीडिया क्यों दे बाहर वालों को नौकरी ? क्योंकि इन्हें तो आपनी जनसंचार की दुकान खोल कर पैसा जो कमाना है .आज यही कारण है की देश के इलेक्ट्रोनिक मीडिया में योग्य पत्रकारों की कमी है. देश में कोई इलेक्ट्रोनिक मीडिया का संगठन पत्रकारों की भर्ती करने के लिए किसी परीक्षा तक का आयोजन भी नहीं करता जैसा की देश में अन्य नामी-गिरामी मल्टी नेशनल कंपनियाँ अपने कर्मचारियों की भर्ती के लिए परीक्षा का आयोजन करती है. यह महाबेशर्म इलेक्ट्रोनिक मीडिया तो सिर्फ अपनी पत्रकारिता संस्थान की दुकान चलाने के लिए ही लाखों की फीस लेकर सिर्फ पत्रकारिता के डिप्लोमा कोर्स के लिए ही परीक्षा का आयोजन कर रहा है. आज यही कारण है कि सिर्फ चेहरा देकर ही ऐसी-ऐसी महिला न्यूज़ रीडर बैठा दी जाती है जिन्हें हमारे देश के उपराष्ट्रपति के बारे में यह तक नहीं मालूम होता की उस पद के लिए देश में चुनाव कैसे होता है? आज इलेक्ट्रोनिक मीडिया के गिरते हुए स्तर पर प्रेस कौसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष भी काफी कुछ कह चुके है लेकिन ये इलेक्ट्रोनिक मीडिया की सुधरने का नाम ही नहीं लेता ….इलेक्ट्रोनिक मीडिया तो पैसों से खेलने वाला वो बिगड़ा बच्चा बन चुका है जो पैसों के लिए कुछ भी कर सकता है. इतना ही नहीं खुद को देश के लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहने बाले इस महाबेशर्म इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए नियम-कायदे उस समय बदल जाते है जब यह खुद गलती करता है. अगर देश का कोई भी मंत्री भ्रष्ट्राचार में लिप्त पाया जाता है तो ये चीख-चीख कर उसके इस्तीफे की मांग करता है लेकिन जब किसी इलेक्ट्रोनिक मीडिया का कोई पत्रकार भ्रष्ट्राचार में लिप्त पाया जाता है तो ना तो वह अपनी न्यूज़ एंकरिंग से इस्तीफा देता है और बड़ी बेशर्मी से खुद न्यूज़ रिपोर्टिंग में दूसरो के लिए नैतिकता की दुहाई देता रहता है. कमाल की बात तो यह है की जब कोई देश का पत्रकार भ्रष्ट्राचार में लिप्त पाया जाता है तो उस न्यूज़ की रिपोर्टिंग भी बहुत कम मीडिया संगठन ही अपनी न्यूज़ में दिखाते है, क्या ये न्यूज़ की पारदर्शिता से अन्याय नहीं? हाल में ही जिंदल कम्पनी से १०० करोड़ की घूसखोरी कांड में दिल्ली पुलिस ने जी मीडिया के मालिक सहित इस संगठन के सम्पादक सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया के खिलाफ आई.पी.सी. की धारा ३८४, १२०बी, ५११, ४२०, २०१ के तहत कोर्ट में कानूनी कार्रवाई का आग्रह किया है. इतना ही नहीं इन बेशर्म दोषी संपादको ने तिहाड़ जेल से जमानत पर छूटने के बाद सबूतों को मिटाने का भी भरपूर प्रयास किया है. गौरतलब है की कोर्ट किसी भी मुजरिम को दोष सिद्ध हो जाने तक उसको जीवनयापिका से नहीं रोकता है लेकिन एक बड़ा सवाल ये भी है की जो पैमाना हमारे मुजरिम राजनेताओं पर लागू होता है तो क्या वो पैमाना इन मुजरिम संपादकों पर लागू नहीं होता? क्या मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ नहीं है ? क्या किसी मीडिया संगठन के सम्पादक की समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है? अगर कोई संपादक खुद शक के दायरे में है तो वो एंकरिंग करके खुले आम नैतिकता की न्यूज़ समाज को कैसे पेश कर सकता है? आज इसी घूसखोरी का परिणाम है कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया का एक-एक संपादक करोड़ो में सैलरी पाता है. आखिर कोई मीडिया संगठन कैसे एक सम्पादक को कैसे करोड़ो में सैलरी दे देता है ? जब कोई मीडिया संगठन किसी एक सम्पादक को करोड़ो की सैलरी देता होगा तो सोचिये वो संगठन अपने पूरे स्टाफ को कितना रुपया बाँटता होगा? इतना पैसा किसी इलेक्ट्रोनिक मीडिया संगठन के पास सिर्फ विज्ञापन की कमाई से तो नहीं आता होगा यह बात तो पक्की है.. तो फिर कहाँ से आता है इतना पैसा इन इलेक्ट्रोनिक मीडिया संगठनो के पास? आज कल एक नई बात और निकल कर सामने आ रही है कि कुछ मीडिया संगठन युवा महिलाओं को नौकरी देने के नाम पर उनका यौन शोषण कर रहे है. अगर इन मीडिया संगठनों की एस.आई.टी. जाँच या सी.बी.आई. जाँच हो जाये तो सुब दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा.. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आज जो गोरखधंधा चल रहा है उसको सामने लाने का मेरा एक छोटा सा प्रयास था. मैं आशा करता हूँ कि मेरे इस लेख को पड़ने के बाद स्वयंसेवी संगठन, एनजीओ और बुद्धिजीवी लोग मेरी बात को आगे बढ़ाएंगे और महाबेशर्म इलेट्रोनिक मीडिया को आहिंसात्मक तरीकों से सुधार कर एक विशुद्ध राष्ट्र बनाने में योगदान देंगे ताकि हमारा इलेक्ट्रोनिक मीडिया विश्व के लिए एक उदहारण बन सके क्यों की अब तक हमारी सरकार इस बेशर्म मीडिया को सुधारने में नाकामयाब रही है. इसके साथ ही देश में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के खिलाफ किसी भी जांच के लिए न्यूज़ ब्राडकास्टिंग संगठन मौजूद है लेकिन आज तक इस संगठन ने ऐसा कोई निर्णय इलेक्ट्रोनिक मीडिया के खिलाफ नहीं लिया जो देश में न्यूज़ की सुर्खियाँ बनता. इस संगठन की कार्यशैली से तो यही मालूम पड़ता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तमाम घपलों के बाद भी ये संगठन जानभूझ कर चुप्पी रखना चाहता है.
    धन्यवाद
    द्वारा – राहुल वैश्य( रैंक अवार्ड उपविजेता),
    एम. ए. जनसंचार (राज्य पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण, हिमाचल लोक सेवा आयोग)
    एवम
    भारतीय सिविलसेवा के लिए प्रयासरत

    फेसबुकपरमुझेशामिलकरे- vaishr_rahul@yahoo.com और Rahul Vaish Moradabad

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