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बीबीसी हिन्दी से लखनऊ, कोलकाता, श्रीनगर और भोपाल के कुल चार पत्रकारों की छंटनी!

नई दिल्ली। बीबीसी हिन्दी में हाल के दिनों में कुछ कर्मचारियों को बाहर किए जाने को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। जानकारी के अनुसार, जिन चार लोगों को हाल में संस्थान से हटाया गया है, उनमें सैय्यद इमाम मौजेज (लखनऊ), इलमा हसन (कोलकाता), माजिद जहांगीर (श्रीनगर) और रोहित लोहिया (भोपाल) शामिल हैं। इससे पहले भी सलमान रावी और जुबैर अहमद को संस्थान से बाहर किया जा चुका है।

इन घटनाओं के बाद संस्थान के अंदरूनी माहौल को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ आरोपों में यह भी कहा जा रहा है कि बीबीसी हिन्दी के दफ्तर में कर्मचारियों के बीच भेदभावपूर्ण व्यवहार की स्थिति है, हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

वहीं, यह भी उल्लेख किया जा रहा है कि बीबीसी की शीर्ष नेतृत्व टीम में विभिन्न समुदायों के लोग शामिल हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, संगठन में सारा हसन, मोहम्मद नकवी और इकबाल अहमद जैसे नाम वरिष्ठ पदों पर हैं। इसके अलावा हाल ही में बीबीसी उर्दू में एक सामाजिक कार्यकर्ता को नेतृत्व की जिम्मेदारी दिए जाने की भी चर्चा है।

पूरे मामले को लेकर अभी तक बीबीसी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।


सोशल मीडिया पर कुछ प्रतिक्रियाएं-

जितेंद्र कुमार- तो बीबीसी (ब्राह्मणवादी ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन) ने जिन चार लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है, उसमें तीन मुसलमान हैं! इससे पहले दो और मुसलमानों, सलमान रावी और जुबैर अहमद को बाहर कर दिया गया था! इतना ही नहीं, अब बीबीसी हिन्दी के हेड ऑफिस में दो- दो माइक्रोवेव है जिसमें से एक में सवर्ण अपने खाना को गरम करके खाए और दूसरा 90 फीसदी बहुसंख्य दलित-बहुजनों के लिए है जो गलती से या सवर्ण या सवर्ण जैसा कंफ्युजन में वहां नियुक्त हो गए हैं! हांलाकि दो माइक्रोवेव रखे जाने को मैं गलत नहीं मानता क्योंकि जब संस्थान ही सवर्णों के लिए बना है तब तो सबकुछ उसी के लिए होगा न! इसके लिए तो मैं ब्राह्मणवादी ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन को धन्यवाद देता हूं कि रखे गए कुछ ‘अल्पसंख्यकों’ को उदारतापूर्वक सवर्णों ने अलग माइक्रोवेव दे दिया है. अगर नहीं ही देता तो इस देश में ऐसी बातों के लिए कौन क्या कर सकता है? मैं प्रमाण के साथ कह सकता हूं कि मौजूदा दौर सवर्णों का सबसे बेहतर दौर है, वैदिक काल में भी सवर्ण इतने ताकतवर नहीं थे! जिन चार लोगों को अभी निकाला गया है उसमें सैय्यद इमाम मौजेज (लखनऊ), इलमा हसन (कोलकाता), माजिद जहांगीर (श्रीनगर) और रोहित लोहिया (भोपाल) हैं. रोहित लोहिया उनके खांचे में इसलिए नहीं बैठते थे क्योंकि वह हर बार बीजेपी की लाइन नहीं ले पाते थे. कई बार नौकरी से बढ़कर जर्नलिस्टिक इथिक्स पर विश्वास करने लगते थे! और हां, सारे के सारे साल भर के अगल बगल में निकाल दिए गए हैं.

विश्व दीपक- बीबीसी की टॉप लीडरशिप में मुसलमान हैं. सारा हसन सीओओ, मोहम्मद नकवी सीएफओ.इकबाल अहमद. सब टॉप पोस्ट. इसके अलावा हाल फिलहाल एक सामाजिक कार्यकर्ता को वहां बीबीसी उर्दू में लीड नियुक्त किया गया है. लोग बताते हैं कि पहले जमात ए इस्लामी के कार्यकर्ता हुआ करते थे. बेवजह, कम्युनल एंगल नहीं देना चाहिए

रोहित जोशी- ये इतने गंभीर आरोप हैं कि इनमें गंभीरता का नितांत अभाव नज़र आता है.. बीबीसी में मैंने काम नहीं किया होता तो मैं भी एक ‘प्रगतिशील’ होने के चलते संभवतः इन्हें स्वीकार लेता..या संशय में आ जाता.. दो माइक्रोवेव की इस थ्येरी पर यकीन कर पाना मेरे लिए असंभव है.. मैं वहाँ हूँ नहीं तो सटीक वजह पर कोई अंतिम बात नहीं कहूँगा.. लेकिन सामान्य विवेक के आधार पर लगता है कि संभवतः शाकाहारियों और मांसाहारियों के लिए यह अलग-अलग व्यवस्था की गई हो.. जिसका इस तरह का इंटरप्रिटेशन बेहद अगंभीर नज़र आता है.. जब आप किसी विचारधारा से प्रेरित हों और उसके हवाले से बात कर रहे हों तो आप पर और अधिक दायित्व आ जाता है कि आप यदि किसी पर आरोप लगा रहे हों तो उसकी गंभीरता और वजन तो तथ्यों की प्रामाणिकता की कसौटी पर तोल लें.. अन्यथा एक गंभीर और ज़रूरी विचार की अपनी क्रेडिबिलिटी गिरती है.. खैर सोशल मीडिया के दौर में पोलराइजेशन और पॉपुलिज़्म इतना हावी है कि किसी को उपरोक्त बात से कोई ख़ास फ़र्क़ पड़ता नहीं है..

जितेंद्र कुमार- रोहित बाबू, मुझे आप अगंभीर व्यक्ति ही मानिए. लेकिन बीबीसी या आपको इस बात का एहसास होने में इतना लंबा समय क्यों लगा कि शाकाहारी भोजन को मांसाहारी भोजन वाले माइक्रोवेव में नहीं डाला जाना चाहिए? मासांहार भोजन तो हमेशा से ही अलग स्वाद या ‘अप्रवित्रता’ लेकर आता था, एकाएक इतने वर्षों के बाद क्यों यह एहसास हुआ कि इससे शाकाहारियों की पवित्रता चली जाती है, इसलिए अलग माइक्रोवेव होना चाहिए? जातीय प्रिविलेज से बाहर निकलकर सोचेंगे तो कई चीजें दिखने लगेंगी, अन्यथा सामान्य विवेक पर जब रहेंगे तो ‘किया गया हर व्यवस्था’ आपको न्यायोचित और कभी-कभी क्रांतिकारी भी लगता ही रहेगा! और हां, मुसलमानों को निकाले जाने पर सामान्य विवेक का इस्तेमाल करके जस्टीफिकेशन तो आपने नहीं किया? यह भी करना चाहिए न, नहीं? आपने तो वहां काम किया है!

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