
संजय कुमार सिंह-
पांच राज्यों के कल के चुनाव नतीजों में तमिलनाडु के नतीजे अप्रत्याशित कहे जा सकते हैं। बंगाल में भाजपा के नहीं जीतने का कोई कारण नहीं था जबकि असम में भ्रष्टाचार के आरोपी कांग्रेसी से भाजपाई बने मुख्यमंत्री के बावजूद भाजपा को दो तिहाई बहुमत मिल जाना भी साधारण नहीं है। सबको पता है और साफ दिख रहा था कि इस बार भाजपा ने बंगाल जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था और जीतना लगभग तय था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह चुनाव के दौरान 15 दिन बंगाल में रहने की घोषणा कर चुके थे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा के शपथग्रहण में आने की घोषणा की थी। गड़बड़ ईवीएम, ढेरों अनिल मसीहों, बदनाम ईवीएम और पक्षपाती चुनाव आयोग के रहते प्रधानमंत्री की घोषणा के मायने थे और हैं। ऐसे में बंगाल की जीत क्यों महत्वपूर्ण है केरल में कांग्रेस की जीत क्या किसी आंधी के बिना है – समझना मुश्किल नहीं है। सोशल मीडिया पर इस नतीजे का श्रेय एंटी इनकंबेंसी को दिया जा रहा है। ऐसा दिखाने की कोशिश की जा रही है कि वह सिर्फ गैर भाजपा सरकारों के खिलाफ होती है। भाजपा की सरकार के खिलाफ तो हो ही नहीं सकती। प्रधानमंत्री भी ऐसा नहीं मानते हैं और लोकसभा चुनाव में सीटें कम हुई थीं तो उन्होंने ईवीएम गड़बड़ होने के आरोपों पर कटाक्ष करते हुए कहा था, मैंने पूछा ईवीएम जिन्दा है कि मर गया। इसलिए नरेन्द्र मोदी जिस एंटायर पॉलिटिकल साइंस को लागू कर रहे हैं उसमें मीडिया को झुकने के लिए कहने पर लेट जाना शामिल है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक ‘धुरंघर नरेन्द्र’ – मुझे सरेंडर से मिलता जुलता लगता है। लेकिन बात इतनी ही नहीं है, नरेन्द्र मोदी ने कहा है और नवोदय टाइम्स ने पहले पन्ने पर छापा है, बंगाल में डर नहीं, लोकतंत्र जीता। सच्चाई यह है और आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा है कि ट्रम्प ने ईरान से लड़ने के लिए 50 हजार सैनिक उतारे थे लेकिन नारी शक्ति वंदन करने वाली पार्टी और उसके मुखिया ने महिला मुख्यमंत्री और ढेरों महिला सांसद या नेताओं वाली पार्टी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ ढाई लाख सैनिक सिर्फ बंगाल में उतारे थे। चुनाव के दौरान बख्तरबंद गाड़ियां तो घूम ही रही थीं मुझे सोशल मीडिया पर एक टैंक भी सड़क पर दिखा। उसपर सीआरपीएफ लिखा था जिस सड़क पर चल रहा था उसकी दुकानों के साइन बोर्ड बांग्ला में थे। एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट वहां मौजूद थे, धमकाने के उनके अंदाज का वीडियो वायरल था।
कुल मिलाकर, टीएमसी को हर तरह से आतंकित किया गया। कार्यकर्ताओं की पिटाई के कितने ही वीडियो दिखे। ऐसा नहीं है कि राज्य में सुरक्षा कर्मी चुनाव की निष्पक्षता और स्वतंत्रता के लिए लगाए गए थे। ऐसा होता तो भाजपा के उम्मीदवार को दौड़ाकर पीटा नहीं जाता और डर खत्म करना होता तो पीटने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रचार भी किया जाता। लेकिन वह सब नहीं हुआ, फिर भी प्रधानमंत्री ने न सिर्फ दावा किया उसे पहले पन्ने पर जगह भी मिली है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, बंगाल में पहली बार खिला कमल। बाकी राज्यों के नतीजे उपशीर्षक हैं। तमिलनाडु को प्रमुखता देने के लिए लाल रिवर्स में छापा गया है, तमिलनाडु में सुपरस्टार विजय की दमदार एंट्री। बंगाल में ममता की हार का कारण अगर एंटी इनकमबेंसी बताया जा रहा है तो अमर उजाला ने असम में भाजपा की हैट्रिक बताई है। अमर उजाला ने लिखा है, ….पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरलम में भय, तुष्टीकरण और भ्रष्टाचार से नाराज जनता ने सत्ताधारी दल को उखाड़ फेंका। इससे असम में भ्रष्टाचार नहीं होने का सर्टिफिकेट भले नहीं दिया गया हो, बाकी राज्यों में भ्रष्टाचार होने की पुष्टि कर दी गई है और ये ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा सत्ता में नहीं थी। अमर उजाला ने यह भी लिखा है कि तमिल फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता विजय चंद्रशेखर ने सिर्फ दो साल पहले पार्टी बनाकर दशकों से जमे द्रमुक-अन्ना द्रमुक को धूल चटा दी। जाहिर है कि उन्हें भाजपा की तरह केंद्रीय एजेंसियों की मदद नहीं मिली होगी और ईवीएम का इस्तेमाल भी उनके पक्ष में नहीं हुआ होगा। इस लिहाज से यह जीत बड़ी और अप्रत्याशित है। तथ्य यह भी है तमिलनाडु की राजनीति में विजय चंद्रशेखर (थलपति विजय) का ‘तमिलगा वेत्री कज़गम’ (टीवीके) के साथ प्रवेश एक बड़े बदलाव का संकेत है। उनकी राजनीतिक यात्रा सिनेमाई लोकप्रियता से आगे बढ़कर अब गंभीर चुनावी चुनौतियों के बीच है। विजय और विजय की पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान करूर की उनकी रैली में भगदड़ मचने से मिली। इसमें 41 लोगों की मृत्यु की खबर है। यह उनके करियर का सबसे कठिन मोड़ था।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर घटना की सीबीआई जांच शुरू हुई। विजय से दिल्ली में घंटों पूछताछ की गई, जिसे कई विश्लेषकों ने केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा उभरते हुए क्षेत्रीय नेतृत्व पर ‘दबाव’ बनाने की रणनीति के रूप में देखा। दिल्ली के मीडिया में इन खबरों का व्यापक प्रकाशन विजय की छवि को एक ‘गैर-जिम्मेदार नेता’ के रूप में पेश करने की कोशिश के तौर पर देखा गया। माना गया कि इसका मकसद उनकी बढ़ती लोकप्रियता को नियंत्रित करने की कोशिश था। भाजपा पर आरोप लगे कि वह सीबीआई के जरिए विजय को अपने पक्ष में करने या कमजोर करने की कोशिश कर रही है। हालांकि, विजय ने खुद को भाजपा का ‘वैचारिक विरोधी’ और डीएमके का ‘राजनीतिक विरोधी’ बताकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी। भाजपा की कोशिशों के बावजूद वह इसमें कामयाब भी रहे। तमाम कानूनी अड़चनों और दिल्ली के दबाव के बावजूद, 2026 के चुनावों में विजय की पार्टी का अकेले चुनाव लड़ना और प्रारंभिक रुझानों में 100 सीटों के आंकड़े को छूना उनकी ‘अप्रत्याशित और साहसिक यात्रा’ को दर्शाता है। निश्चित रूप से इसने द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक किलों को हिला दिया है। इसके बावजूद, बंगाल में पहली बार कमल खिला बड़ा और मुख्य शीर्षक है। इस लिहाज से देशबन्धु की प्रस्तुति संतुलित लगती है। शीर्षक है – पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भारी उलटफेर असम, पुडुचेरी में राजग तो केरल में यूडीएफ सरकार। उपशीर्षक है, तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। एक और खबर का शीर्षक है, राजनीति में विजय की शानदार शुरुआत। स्पष्ट है कि यहां भाजपा या बंगाल की जीत का शोर नहीं है।
अब आज के अंग्रेजी अखबारों पर आऊं तो सबसे पहले कोलकाता से प्रकाशित होने वाले द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, भाजपा का बंगाल। मुझे लगता है कि बंगाल के अखबार के लिए बंगाल की खबर को प्राथमिकता देना वाजिब है इसलिए इसका मामला अमर उजाला जैसा नहीं हो सकता है फिर भी जो आलोचना करना चाहे कर ही सकता है और सबको पसंद आए जरूरी नहीं है। मुख्य खबर का शीर्षक, भगवा सुनामी ने टीएमसी को एक तरफ कर दिया। मुझे लगता है तथ्य है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक ऐसा ही है, बीजेपी बंगाल (की) जनता पार्टी है। मुझे लगता है कि भारतीय जनता पार्टी को बंगाल जनता पार्टी या बंगाल की जनता पार्टी कहना उसका अवमूल्यन ही है लेकिन द टेलीग्राफ यही लिख औऱ बता कर भगवा हो सकता है तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने जो किया है उसे भी अलग-अलग तरीकों से समझा जा सकता है। हालांकि टीओआई ने तमिलनाडु के लिए विजय दिवस और कांग्रेस के लिए केरल में केरालव भी लिखा है। भाजपा और बंगाल पहले या ऊपर होना भी अमर उजाला होना नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स बाकी अखबारों से बहुत आगे लग रहा है। इसका शीर्षक, ‘सत्रपों का सूर्यास्त’ (या अंत) खासा गंभीर है लेकिन खेल भावना के खिलाफ है। चुनाव लड़ना खेल न हो पर युद्ध भी नहीं होना चाहिए और युद्ध ही हो तो अपनी ताकत से लड़ा जाना चाहिए, सत्ता की ताकत से नहीं। खेल में हार का मतलब सूर्यास्त नहीं होता है। और होता भी हो तो 24 घंटे के लिए होने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन यहां मामला पांच साल का है और पांच साल बाद 80 पार नरेन्द्र मोदी का एंटायर पॉलिटिकल साइंस कितना कामयाब होगा – कहा नहीं जा सकता है। यह अलग बात है कि बंगाल में मोदी युद्ध की तरह चुनाव लड़े थे और तमिलनाडु में विजय को साथ लेने में कामयाबी मिल गई होती तो इस शीर्षक का मतलब था। पर जो है सो है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, भाजपा की आंधी में ममता डूब गईं, विजय ने तमिलनाडु के तूफान की सवारी कर ली। असम में हिमंत वापस आए, कांग्रेस ने वामपंथियों को उखाड़ कर केरल पर फिर कब्जा जमाया। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, बंगाल, तमिलनाडु और केरल में बदलाव और मंथन। दि एशियन एज का शीर्षक है, हिन्दुत्व की आंधी ने भाजपा को बंगाल में ऐतिहासिक जीत दिलाई; ममता अपनी सीट हार गईं। मुझे नहीं लगता है कि बंगाल में हिन्दुत्व की आंधी थी और होती तो ढाई लाख सुरक्षा बलों की जरूरत क्यों पड़ती। 27 लाख मतदाताओं को मताधिकार से वंचित क्यों रखना पड़ता। आंधी अगर कहीं थी तो तमिलनाडु में विजय की थी पर उसे महत्व नहीं मिला है। केरल में कांग्रेस का दोबारा काबिज होना कम नहीं है। आंधी तो वहां भी रही ही होगी लेकिन सिर्फ भाजपा की आंधी को देखना – नजरिया है या विचारधारा पता नहीं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



Devesh Alok
May 9, 2026 at 4:47 pm
आपका दुःख देखा जा सकता है