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बदल रही है हिन्दी की दुनिया

हिन्दी और पत्रकारों के बीच लोकप्रिय साइट भड़ास4मीडिया (Bhadas4Media) पर ‘जिन्दगी’ का विज्ञापन अमैजन की ओर से। हिन्दी के दिन बदलेंगे? सरकारी खरीद के भरोसे रहने वाले हिन्दी के प्रकाशकों ने हिन्दी के लेखकों को खूब छकाया है। किताबें बिकती नहीं हैं, खरीदार कहां हैं – का रोना रोने वाले प्रकाशकों के रहते हुए मुमकिन है कि हिन्दी के लेखक भविष्य में खुद ही प्रकाशक भी बन जाएं। या लेखक और रचना को पहचानने वाले नए प्रकाशक सामने आएं और लेखक पाठकों तक आसानी से पहुंच सकें। भड़ास4मीडिया चलाने वाले यशवंत सिंह नेट पर लिखकर पैसा कमाने के तरीके बताने के लिए अलग आयोजन कर चुके हैं और चाहते हैं कि हिन्दी वाले कुछ अलग और नया करें। आत्म निर्भर हों। इसपर फिर कभी। 

हिन्दी और पत्रकारों के बीच लोकप्रिय साइट भड़ास4मीडिया (Bhadas4Media) पर ‘जिन्दगी’ का विज्ञापन अमैजन की ओर से। हिन्दी के दिन बदलेंगे? सरकारी खरीद के भरोसे रहने वाले हिन्दी के प्रकाशकों ने हिन्दी के लेखकों को खूब छकाया है। किताबें बिकती नहीं हैं, खरीदार कहां हैं – का रोना रोने वाले प्रकाशकों के रहते हुए मुमकिन है कि हिन्दी के लेखक भविष्य में खुद ही प्रकाशक भी बन जाएं। या लेखक और रचना को पहचानने वाले नए प्रकाशक सामने आएं और लेखक पाठकों तक आसानी से पहुंच सकें। भड़ास4मीडिया चलाने वाले यशवंत सिंह नेट पर लिखकर पैसा कमाने के तरीके बताने के लिए अलग आयोजन कर चुके हैं और चाहते हैं कि हिन्दी वाले कुछ अलग और नया करें। आत्म निर्भर हों। इसपर फिर कभी। 

हालांकि, हिन्दी की दुनिया नेट पर भी अजीब है। कल मैंने ‘काशी का अस्सी’ खरीदने के लिए वेबसाइट टटोलना शुरू किया तो हिन्दी वाले (प्रकाशक आदि) इसे 250 रुपए से लेकर 13 अमेरिकी डॉलर तक में बेच रहे थे पर आखिरकार मुझे फ्लिपकार्ट पर सिर्फ 98 रुपए में मिल गया। इससे लग रहा है कि हिन्दी के लेखक और पाठक दोनों के अच्छे दिन आने वाले हैं। पाठक को 98 रुपए में 250 रुपए की किताब मिली और लेखक को 98 रुपए पर ही सही, रायल्टी तो मिलेगी! ‘जिन्दगी’ के बारे में जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दूं, यह पत्रकार और मित्र संजय सिन्हा की तीसरी पुस्तक है। पहली पुस्तक 6.1 रिक्टर स्केल एक विदेशी प्रकाशक लिट्रेट वर्ल्ड ने छापी थी जो बाद में बंद हो गई। इस तरह, यह लिट्रेट वर्ल्ड की पहली और आखिरी पुस्तक रही। तमाम कारणों, प्रेरणाओं या मजबूरियों के बाद संजय सिन्हा ने नवंबर 2013 में फेसबुक पर नियमित लिखना शुरू किया और ‘रिश्तों’ पर रोज कुछ ना कुछ लिख रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने इमरजेंसी की याद पर भी कई दिनों तक लिखा। 

फेसबुक पर लिखे उनके इन्ही विचारों, कहानियों का संकलन पहले ‘रिश्ते’ और अब ‘जिन्दगी’ (प्रभात प्रकाशन) के नाम से आया है। ‘रिश्ते’ को इस साल का सुप्रतिष्ठित सावित्र त्रिपाठी स्मृति सम्मान मिला है। और जैसा कि चयन समिति के अध्यक्ष और अग्रणी साहित्यकार, प्रो काशीनाथ सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा, “सावित्री त्रिपाठी स्मृति सम्मान के लिए संजय सिन्हा की पुस्तक ‘रिश्ते’ को चुनने से पहले उन्हें कई बार सोचना पड़ा, क्योंकि ‘रिश्ते’ परंपरागत तरीके से लिखा कोई उपन्यास, कोई कथा या कोई कहानी नहीं है। न तो वो डायरी का कोई अंश है, न यादों का कोई संग्रह। पर जो है, शानदार है और उसे पढ़ कर, उन्हें और पूरी चयन समिति को लगा कि इसबार कुछ ‘अलग’ को चुनने का साहस किया जाए। और बस चुन लिया गया ‘रिश्ते’ को।” जबकि पुरानी स्थितियों में या शर्तों के आधार पर यह पुस्तक प्रकाशित ही नहीं होती (क्योंकि सरकारी खरीद के दायरे में नहीं आती है) और जहां तक अपनी कृति के बारे में लेखक के विचार का सवाल है, संजय सिन्हा ने कहा कि ये किताब मैंने नहीं लिखी है, न ये किताब मेरी है। ये किताब मेरे फेसबुक परिजनों की है। इसलिए इस सम्मान के हकदार आप सभी (फेसबुक के पाठक जिन्हें वह परिजन कहता है) हैं। 

हिन्दी में लेखक और प्रकाशक का संबंध ऐसा है कि एक मशहूर प्रकाशक जो मुझे पिछले 20 साल से ज्यादा समय से जानते हैं, से मैंने पूछा कि मैंने एक किताब लिखी है आप देखना चाहेंगे। उन्होंने कहा अभी नहीं। कब तक? छह महीने बाद। वो छह महीने निकले कई महीने हो गए। उन्होंने तो नहीं ही पूछा – अपना भी मिजाज ऐसा नहीं है कि मैं उन्हें फिर फोन करूं।

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