सौमित्र रॉय-
जुलाई से नवंबर के बीच होम लोन में 13%, वाहन लोन में 16% और रिटेल लोन में 13% की गिरावट बताती है कि भारत आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ा है।
अभी डोनाल्ड ट्रंप भारत को बड़ा झटका देने वाले हैं। कच्चा तेल 80 डॉलर के पार जा चुका है।
वित्त मंत्री ने बीते महीने संसद में ऑल इज वेल का झूठा राग अलापने के बाद कल कहा कि बैंकों को ब्याज दर और सत्ता को इनकम टैक्स में कटौती करनी होगी।
उधर, मंदी की ओर बढ़ते भारत का महामानव अब 10 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी का झांसा दे रहा है।
वह भी तब, जबकि रुपया 86 पार है।
मनमोहन राज में डॉलर 61 का था और अगर अभी यही रेट होता तो भारत की इकॉनमी मौजूदा 3.8 ट्रिलियन डॉलर से 5 ट्रिलियन तक पहुंच चुकी होती।
जाहिल संघी मुल्ले इसी सच से भागते रहे हैं।


हफ्ते के पहले ही दिन डॉलर के मुकाबले रुपया 86.27 का गोता लगा चुका है। शेयर बाजार रक्तरंजित है।
मोदी सत्ता इस देश को आर्थिक मंदी की कगार पर ले आई है। कोविड का वह दौर याद करें, जब भारत को मंदी से बचाने इसी सत्ता ने प्रोत्साहन पैकेज बांटने शुरू किए थे।
इससे अवाम को तो धेला भर फायदा नहीं हुआ, लेकिन प्राइवेट सेक्टर ने तिजोरियां भर ली।

वही प्राइवेट सेक्टर अब नौकरियां देने में कंजूसी कर रहा है। बिना उत्पादन के सस्ता चीनी माल बेचकर कोई मुनाफा कमाए तो नौकरियां किस बात की?
हालत यह कि अब सत्ता के पास नई परियोजनाओं, आर्थिक प्रोत्साहन के लिए भी पैसा नहीं है।
लाड़ली जैसी योजनाओं के लिए भी आगे पैसा नहीं होगा।
बैंकों में लोन वसूली के लिए बाउंसर्स भरे जा रहे हैं और सत्ता को तेल लगाकर लोन डकारने वाले बेखौफ हैं।
बीजेपी के पास हराम का पैसा खूब आ रहा है, क्योंकि उसने हराम की कमाई करने का सिस्टम खड़ा किया है।
आंकड़ों के लिहाज से मोदी सत्ता के लिए बजट में कुछ है नहीं।
इसीलिए दिल्ली चुनाव में फर्जी कैग रिपोर्ट को आगे किया गया है।
कांग्रेस चुप है। अलग–थलग। बहिष्कृत।



