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भास्कर स्टिंग : प्राइवेटाइजेशन के बाद भारत में भ्रष्टाचार और बढ़ा है!

दीपांकर-

उटसोर्सिंग के जरिए जो कॉन्ट्रैक्ट के कर्मचारी भरे जा रहे हैं, उसमें भी घूस चल रहा है. पहले घूस का खुला रेट था 12 महीने की प्राइवेट नौकरी चाहिए तो 1 महीने की सैलरी कॉन्ट्रैक्टर को पहले ही दे दो.

सब कुछ सही चल रहा था लेकिन अब व्यवस्था बदल गई है. अब 5-5 महीने की सैलरी लेकर नियुक्ति दी जा रही है.

इतना पैसा क्यों लिया जा रहा है और लोग दे क्यों रहे हैं ये बात शायद आपको मालूम न हो. लेकिन नियुक्ति पाने वाला कर्मचारी जानता है कि वो ये पैसा 2 महीने में कमा लेगा क्योंकि इनमें से कई ऐसे पद होते हैं जहां पर पब्लिक से पैसा लेने की खुली छूट होती है.

एक छोटा सा सरकारी काम करवाने गई पब्लिक से ये कॉन्ट्रैक्ट का कर्मचारी 2-4 सौ रुपए आराम से ऐंठ लेता है. सरकारी कर्मचारी की जगह उसे नौकरी जाने का भी डर नहीं है क्योंकि उसे पता है कि वो प्राइवेट है, कॉन्ट्रैक्टर को फिर से पैसा देगा तो कहीं और नियुक्ति पा जाएगा.

सरकारी कर्मचारी तो नौकरी जाने के डर से डरता है, कॉन्ट्रैक्ट के कर्मचारी को वो भी डर नहीं.

लोग कितने मासूम हैं जो सोचते हैं कि प्राइवेटाइजेशन से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा. भारत में तो ये और बढ़ गया है.

बिना पैसा दिए उत्तर भारत के कितने सरकारी ऑफिसों में कितने काम आप करवा सकते हैं बताइए? जबकि ज्यादातर जगहों पर कॉन्ट्रैक्ट के कर्मचारी काम कर रहे हैं.

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