
संजय कुमार सिंह
आज तो संविधान हत्या दिवस पर चर्चा का दिन है। वैसे मीडिया ऐसी चर्चा करेगा इसकी कोई उम्मीद नहीं है और सरकार समर्थक यू-ट्यूबर्स में से एक के वीडियो की सूचना आ गई है, “केजरीवाल को राहत आम लोगों को तारीख पर तारीख”। ऐसे में आज अघोषित इमरजेंसी की पत्रकारिता पर भी लिखा जा सकता है पर वह मेरा विषय नहीं है। उल्लेख सिर्फ यह बताने के लिए कि मैं खुशकिस्मत हूं कि इस अघोषित इमरजेंसी में मुझे ऐसी पत्रकारिता नहीं करनी पड़ रही है। संविधान हत्या दिवस मनाने की सरकार की घोषणा को आज हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों ने लीड बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है, हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर है। द हिन्दू में खबर अंदर होने की सूचना है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है और द टेलीग्राफ में इस सरकार द्वारा घोषित और भी दिनों की सूची के साथ हाईलाइट करके कहा गया है कि इसमें अच्छे दिन और अमृतकाल के प्रति कोई पूर्वग्रह नहीं है। मुख्य खबर का शीर्षक है, इमरजेंसी पर हत्या दिवस का प्रलोभन। खबर के पहले पैरे में सूचना है और दूसरे में कांग्रेस की प्रतिक्रिया।
कांग्रेस ने यह कहते हुए पलटवार किया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तहत भारत में अघोषित इमरजेंसी हैं। इसका पता इस बात से भी चलता है कि एक प्रमुख विपक्षी दल जो भाजपा से समझौता नहीं कर रहा है या वाशिंग मशीन की पेशकश स्वीकार नहीं कर रहा है सरकारी हमलों का सामना कर रहा है उसके कई नेता जेल में हैं और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रचार के लिए जमानत दी तो गृहमंत्री ने कहा (बहुत लोग मानते हैं यह) स्पेशल ट्रीटमेंट था। जो भी हो, यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी तो है ही और मुझे लगता है कि न्याय के मार्ग में सरकारी बाधा है और केजरीवाल के साथ ही बाद में जो सब हुआ उससे लगता है कि इसका भी असर रहा होगा। हालांकि वह सब अलग मुद्दा है। इसपर सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि उसने कोई विशेष छूट नहीं दी है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि हम इसको लेकर होने वाली आलोचनाओं का स्वागत करते हैं। आप जानते हैं कि अरविन्द केजरीवाल को कल एक मामले में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई लेकिन वे जेल में ही रहेंगे क्योंकि उनपर सीबीआई का एक और मामला है। फिर भी सरकार समर्थक जो कह रहे हैं उसका एक वीडियो उदाहरण ऊपर है।
जहां तक संविधान हत्या दिवस को खबर के रूप में प्रस्तुत करने का सवाल है, जैसा मैंने पहले बताया, इंडियन एक्सप्रेस ने इसे पहले पन्ने पर नहीं छापा है और द टेलीग्राफ ने कांग्रेस के जवाब और मोदी सरकार द्वारा घोषित कुछ और राष्ट्रीय दिवस की सूची के साथ छापा है। हिन्दी अखबारों के लिए यह बेशक बड़ी खबर है। हालांकि, नवोदय टाइम्स ने अपनी मुख्य खबर के साथ बताया है कि संविधान में इमरजेंसी लगाने का प्रावधान है और देश में तीन बार इमरजेंसी लगी है। 25 जून 1975 वाली इमरजेंसी तीसरी थी। अमर उजाला को यह चरणबद्ध तरीके से विपक्ष की घेराबंदी लगता है। हालांकि, खरगे का बयान, भाजपा सरकार के 10 साल का हर दिन संविधान हत्या दिवस शीर्षक से प्रमुखता से छपा है। इंडियन एक्सप्रेस समेत अंग्रेजी के मेरे पांचों अखबारों में आज अरविन्द केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने की खबर लीड है। अमर उजाला में यह खबर लीड के साथ टॉप पर दो कॉलम में है। शीर्षक है, केजरीवाल को जमानत तो मिली, पर जेल में ही रहेंगे। शीर्षक कोर्ट ने कहा, पीएमएलए में सिर्फ पूछताछ के लिए गिरफ्तारी का अधिकार नहीं है …. मामला बड़ी पीठ को भेजा।
आप समझ सकते हैं कि इमरजेंसी का राजनीतिक लाभ लेने के लिए संविधान हत्या दिवस मनाने की घोषणा करने वाली केंद्र सरकार ने केजरीवाल (और उनकी पार्टी) के खिलाफ कैसी रणनीति बनाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पूछताछ के लिए गिरफ्तार नहीं रख सकते और जाहिर है यह आम आदमी के लिए है लेकिन ‘अच्छे दिन’ और ‘अमृतकाल’में यह मुख्यमंत्री पर लागू हुआ, एक नहीं, दो पर। अखबारों में यह खबर नहीं छपी है तो इसी कारण और अमर उजाला ने अंग्रेजी अखबारों की तरह इसे लीड नहीं बनाया है तो अपनी ही इस खबर के बावजूद कि निर्वाचित मुख्यमंत्री के जेल में रहने पर दिल्ली का काम कज देख रहे उपराज्यपाल के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है और अमर उजाला ने पांच कॉलम में बॉटम ली़ड बनाया है – क्या एलजी खुद को अदालत समझते हैं। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि केजरीवाल को निचली अदालत से जमानत मिलने की शाम की सूचना पर ईडी रातो रात तैयारी करके हाईकोर्ट पहुंच गया और जैसी खबर थी अदालत ने आदेश की प्रति के बिना स्टे कर दिया। आप कह सकते हैं कि यह सब अदालती कार्रवाई है, इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है।

मैं भी इसपर कुछ नहीं कह रहा पर याद दिला रहा हूं कि इसी देश के एक हाईकोर्ट ने पॉस्को मामले में पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में कहा है कि वे ऐरे गैरे नहीं है और उनकी गिरफ्तारी रुक गई थी। जो विपक्ष के दो मुख्यमंत्रियों के मामले में दो अन्य हाईकोर्ट ने अमृतकाल में भी नहीं कहा। द टेलीग्राफ में प्रकाशित केजरीवाल को जमानत की खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से पूछा है कि आरोपी को कब गिरफ्तार करना है इस संबंध में उसके पास एक सी नीति है? मुख्य शीर्षक है, ईडी की बेमेल गिरफ्तारी से सुप्रीम कोर्ट चिंतित। आर बालाजी की बाइलाइन वाली इस खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गिरफ्तारी, तलाशी और प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) पर प्रवर्तन निदेशालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों में विरोधाभासों पर चिंता जताई और सवाल किया कि क्या एजेंसी के पास किसी आरोपी को गिरफ्तार करने के बारे में एक समान नीति है। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने कहा कि ईडी द्वारा की गई गिरफ्तारियों की संख्या दर्ज मामलों और दायर किए गए आरोपपत्रों (अभियोजन शिकायतों) की संख्या से बहुत कम हैं।
पीठ ने कहा, “डीओई (प्रवर्तन निदेशालय) की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 31.01.2023 तक 5,906 ईसीआईआर (पुलिस की एफआईआर के बराबर) दर्ज किए गए थे।” “हालांकि, 4,954 सर्च वारंट जारी करके 531 ईसीआईआर में तलाशी ली गई। पूर्व सांसदों, विधायकों और एमएलसी के खिलाफ दर्ज ईसीआईआर की कुल संख्या 176 थी। गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों की संख्या 513 है। जबकि दायर अभियोजन शिकायतों की संख्या 1,142 है। “डेटा कई सवाल उठाता है, जिसमें यह सवाल शामिल है कि क्या डीओई ने कोई नीति बनाई है कि उन्हें पीएमएल (धन शोधन निवारण) अधिनियम के तहत किए गए अपराधों में शामिल व्यक्ति को कब गिरफ्तार करना चाहिए।” यह एक मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी के मामले में यह सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है और निचली अदालत ने जमानत दे दी तो न सिर्फ ईडी ने अप्रत्याशित जल्दी दिखाई बल्कि जज को भी ट्रोल किया गया। इसके बाद हाईकोर्ट ने जमानत को स्टे कर दिया तो उसपर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी आप पढ़ चुके हैं। इस संबंध में टाइम्स ऑफ इंडिया की 12 जुलाई 2024 की खबर का शीर्षक था, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अदालतों को चलताऊ अंदाज में जमानत आदेश स्टे नहीं करना चाहिये। अदालत की कल प्रकाशित गुरुवार की इस टिप्पणी के बाद सरकार समर्थक यू ट्यूबर को केजरीवाल को जमानत मिलने पर दिक्कत है। वह भी तब जब वे जेल में ही रहेंगे।

ऐसी हालत में भारत रत्न बांट कर दिल जीतने के बाद मोदी सरकार ने जब राजनीतिक लाभ लेने के लिए राष्ट्रीय दिवस की घोषणा करने की अति कर दी तो एक दिलचस्प ट्वीट दिखा। कांग्रेस नेता गुरदीप सिंह सप्पल ने लिखा है, “अब एक राष्ट्रीय पकौड़ा दिवस और घोषित कर दें, तो बेरोज़गारी भी ख़त्म हो! अब तक पिछले दस साल में –
गुड गैवरनेंस डे से प्रशासन चुस्त हो ही चुका है; योगा डे से स्वास्थ्य समस्यायें हल हो ही चुकी हैं; विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस से नफ़रत मिट कर राष्ट्रीय एकता स्थापित हो गई है; संविधान दिवस मनाते मनाते लॉ के सिलेबस में मनुस्मृति पढ़ाने लग ही गये हैं; स्वच्छता दिवस के बाद पूरा देश साफ़-सुथरा जगमगा रहा है, स्मार्ट बन गया है, जनजातीय गौरव दिवस के बाद आदिवासी नागरिकों के मुँह पर अब कोई पेशाब नहीं करता, कोई उत्पीड़न नहीं होता; पराक्रम दिवस के बाद देश से डर का माहौल ख़त्म हो गया है; अन्तोदय दिवस के बाद देश से ग़रीबी ख़त्म कर दी गई है; और हाँ, जैसा सांसद मनोज झा ने कहा है, महात्मा गाँधी की हत्या वाले दिन, 30 जनवरी को राष्ट्रीय हत्या दिवस भी घोषित कर दें तो देश हमेशा हमेशा एहसानमंद रहेगा।” वैसे संघियों की हिन्दी में गांधी हत्या नहीं वध है और राम मनोहर लोहिया की किताब गिल्टी मेन ऑफ इंडियाज पार्टिशन का हिन्दी अनुवाद बंटवारे के दोषी नहीं विभाजन के गुनाहगार हैं।


